Friday, 31 December, 2010

कलेंडर के अलावा क्या बदला

श्रीगंगानगर--आओ मन बहलाएं, बदल कर एक कलेंडर नया साल मनाएं । कलेंडर के अलावा आज क्या बदला है? कुछ भी तो नहीं। हजारों घरों में तो कलेंडर भी नहीं बदला होगा। देश- दुनिया के साथ हम अपनी कल वाली सोच लिए वैसे ही तो हैं जैसे कल थे। संभव है बहुत से लोग इसको नकारात्मक कह कर नजर फेर लें। इसके बावजूद दो और दो का जोड़ चार ही होगा तीन या पांच नहीं । सच्चाई यही है कि कलेंडर ही बदला जाता है। हम और कुछ बदलना चाहते ही नहीं। डेट,वार,दिन रात का छोटा बड़ा होना,गर्मी,सर्दी,बरसात,पतझड़,आंधी,तूफान के आने जाने ,उनका अहसास करवाने के लिए प्रकृति कलेंडर बदलने का इंतजार नहीं करती। वह यह सब पल पल ,क्षण क्षण करती ही रहती है। ऐसा तब से हो रहा है जब कलेंडर बदलने का रिवाज आया भी नहीं होगा। जिस नए का अनुभव हमें आज हो रहा है वह नया तो होता ही रहता है। किन्तु हम इसको तभी मन की आँख से देख पाते हैं जब कलेंडर बदलते हैं। जिन घरों में कलेंडर नहीं बदले जाते वहां भी प्रकृति के वही रंग रूप होते हैं जैसे अन्य स्थानों पर। जहाँ कलेंडर बदले जाते हैं संभव है वहां भौतिक साधनों से प्रकृति के असली रंग रूप को अपनी पसंद के अनुरूप ढाल लिया जाता हो। सृष्टी का सृजन करने वाली उस अदृश्य शक्ति के पास तो बहुत कुछ नया है। वह तो इस नए पन से रूबरू भी करवाता रहता है। हम खुद इसे ना तो देखना चाहते हैं ना मिलना। जो नयापन वह शक्ति ,प्रकृति हम हर रोज प्रदान करती है उसको महसूस हम तब करते हैं जब पुराना कलेंडर उतारते हैं। नया कलेंडर ही अहसास है नए साल का। यह अहसास होता नहीं तो करवाया जाता है उनके द्वारा जिनके लिए यह एक बाज़ार के अलावा कुछ नहीं। ये भावनाओं का बाज़ार इस प्रकार से सजाते हैं कि आँखोंऔर दिल को नया ही नया लगता है। बहुत बड़ा बाज़ार हर उत्सव,वार और त्योहार की तरह। ऐसा बाज़ार जहाँ गंजे भी कंघी खरीदने को अपने आप को रोक ना सकें।एक कवि की इन पंक्तियों के साथ बात को विराम दूंगा--रेगिस्तानों से रिश्ता है बारिश से भी यारी है,हर मौसम में अपनी थोड़ी थोड़ी हिस्सेदारी है। अब बैंगलोर से विनोद सिंगल का भेजा एस एम एस --वडी सुखी सी जिन्दगी जदों पानी दे वांग चल्दे सी, हुण नित तूफान उठदे ने जदों दे समन्दर हो गए।
---गोविंद गोयल

Tuesday, 28 December, 2010

पहले दो थे अब जितने नेता उतने गुट


श्रीगंगानगर-किसी ज़माने में यहाँ कांग्रेस में दो गुट हुआ करते थे एक राधेश्याम गंगानगर का,दूसरा उनके विरोधियों का। विधानसभा चुनाव से पहले तक कांग्रेस में ऐसा रहा। जब तक ऐसा रहा तब तक राधेश्याम गंगानगर उर्फ़ बाऊ जी ने कांग्रेस में दूसरे की पार नहीं पड़ने दी। वो तो नियम थोड़ा सख्त हो गए इसलिए बाऊ जी के दिन कांग्रेस में खत्म हो गए वरना....... । जब से बाऊ जी का ह्रदय परिवर्तन हुआ है तब से कांग्रेस में दो गुटों वाली परम्परा बीते ज़माने की बात हो गई। कांग्रेस में जो जो नेता बाऊ जी का विरोधी था अब उन सब के अलग अलग गुट बन चुके हैं। राजशाही के अंदाज में कहें तो कांग्रेस के चक्रवर्ती नेता बाऊ जी के विदा होते ही उनके सब विरोधी स्वतन्त्र हो गए। जब किसी का राजनीतिक डर नहीं रहा तो सभी ने अपने गुट बना लिए। हर गुट का अपना नेता। पिरथी पाल सिंह, राज कुमार गौड़, शंकर पन्नू, संतोष सहारण, गंगाजल मील आदि आदि। पिरथी पाल सिंह ने जिलाध्यक्ष के नाते जयपुर दिल्ली के कांग्रेसी राजनीतिक गलियारों में पहचान बने। पद के साथ साथ सादुलशहर के जगदीश शर्मा ने इनके लिए दिल्ली में बड़े नेताओं से लोबिंग की। श्री शर्मा का वहां खुद का एक नेटवर्क है जो कांग्रेस राजनीति में पिरथी पाल सिंह के साथ खड़ा दिखाई देता है। विधान सभा चुनाव के बाद गौड़ की कांग्रेस में अप्रोच बढ़ी है। इसके बावजूद उनको भरोसा केवल अशोक गहलोत पर है। सांसद रहे पन्नू को दिल्ली - जयपुर में नेता जानते हैं मगर इन्होने ने भी अपनी डोर श्री गहलोत जी के हाथ में दे रखी है। संतोष सहारण को कांग्रेस में अपने रिश्तेदार परस राम मदेरणा/मही पाल मदेरणा का सहारा है। गंगाजल मील के पास राजस्थान जाट महासभा है। दो साल में ये दोनों नेता पार्टी की ना तो दिल्ली,जयपुर में किसी बड़ी लौबी से जुड़े दिखे ना इन्होने यहाँ मजबूत गुट दिखाया। जगतार सिंह कंग गत दो साल में कई चुनाव हारने के बाद कहीं के नहीं लगते। के सी बिश्नोई,विजय लक्ष्मी बिश्नोई, सोहन नायक,को वक्त ने पीछे कर दिया। दुलाराम तो ऐसे लगता है जैसे भूतकाल हो गए हों। वर्तमान तो उनका बेटा है। इन्दौरा परिवार के लिए यह सब गौण है। बात कांग्रेस की हो रही है इसलिए मंत्री गुरमीत सिंह कुनर,सभापति जगदीश जांदू के बारे में अधिक कुछ कहना ठीक नहीं । श्री कुनर तो मंत्री हैं इसलिए जयपुर से दिल्ली तक उनके सम्बन्ध पहले से बढे हैं। जांदू का भी एक ग्रुप है। बात फिर बाऊ जी की। पहले उन्होंने कांग्रेस में अपने पर अपने विरोधियों की पार नहीं पड़ने दी अब बीजेपी में। यूँ राजनीति में कभी भी किसी भी सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता। सन्नी सिंह ने एसएमएस से भेजा है परीक्षा का नया पैट्रन --जनरल वर्ग -सभी प्रश्न करो। ओ बी सी --कोई एक प्रश्न करो। एस सी--केवल प्रश्न पत्र पढो। एस टी--परीक्षा में आने का शुक्रिया। गुर्जर--दूसरों को परीक्षा देने की अनुमति प्रदान करने के लिए थैंक्स। अब एक संत से सुनी बात, भारत की राष्ट्रपति हिन्दू,उप राष्ट्रपति मुसलमान,प्रधानमंत्री सिख और सोनिया गाँधी पारसी/ईसाई।
---गोविंद गोयल
हिन्दूस्तान का राष्ट्रपति हिन्दू। उप-राष्ट्रपति मुसलमान। प्रधानमंत्री सिख। यू पी ए की अध्यक्ष सोनिया जी पारसी/ईसाई। लो जी सार्थक हो गया हमारा नारा- हिन्दू,मुस्लिम,सिख, ईसाई , आपस में हैं भाई भाई।

Saturday, 25 December, 2010

सी एम के मोहल्ले का आदमी

थानों में जब से डिजायर से नियुक्ति होने लगी है तब से टाइगर बिना दन्त और नाख़ून के हो गया। उस से केवल जनता डरती और घबराती है थाने वाले नहीं। एक थाना अधिकारी तो सी एम से नीचे बात ही नहीं करता। कहता है, मैं तो जोधपुर में सी एम के मोहल्ले में रहता हूँ। उनके रिश्तेदार के किसी बच्चे से फोन पर भी कुछ कहूँ तो मेरी बात सी एम तक पहुँच जाती है। लोग तो जयपुर जायेंगे, समय लेंगे तब कहीं अपना पक्ष रख पाएंगे, मेरा पक्ष यहाँ बैठे बैठे फोन पर ही उनके पास पहुँच जाता है। तो अब क्या किया जाये? नगर की जनता को कांग्रेस के नेताओं की चौखट पर जाने के स्थान पर इस थाना अधिकारी के पास जाना चाहिए। सी एम से इतनी सीधी और दमदार अप्रोच किसी कांग्रेसी की तो है नहीं। इलाका वासियों हमें इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए। गंगा हमारे घर चल के आई है। मेरी राय में तो एस पी के पास ज्ञापन लेकर जाने इस थाना अधिकारी के पास अपनी अलख जगाएं। नगर यू आई टी की अध्यक्षी के तलबगार भी प्लीज़ इस सुपरपावर थानाधिकारी से संपर्क करें। कुछ अधिक ही हो गया। रोजनामचे में रपट दाल दी तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी। इसलिए श्री कैलाश दान जी को सॉरी बोलने में ही भलाई है। रवीन्द्र कृष्ण मजबूर कहते हैं--चलते जग के चलते खाते,मतलब निकले बदले नाते,"मजबूर" हकीकत कहते आये,बाकी रहा गुबार है। एसएमएस के डोडा का जो हिमाचल में रहते हैं। ताजी हवाओं में फूलों की महक हो, पहली किरण में चिड़ियों की चहक हो, जब भी खोलें आप अपनी पलक, उसमे बस खुशियों की झलक हो।

Monday, 20 December, 2010

आज के इस युग में जब दमड़ी के बिना चमड़ी काम नहीं करती वहां डी एम एक एसएमएस पर कार्यवाही करवाता है। हम किसी और जिले के डी एम की नहीं हमारे जिले के डी एम सुबीर कुमार की चर्चा कर रहे हैं। किसी विनीत नाम के शख्स का एस एम एस जिला कलेक्टर को मिला-" बड़े दुःख की बात है कि रिद्धि सिद्धि के बाहर हनुमानगढ़ रोड पर गंदगी का साम्राज्य कायम है। कोलोनाइजर कालोनी की सारी गंदगी वहां पर रोजाना डाल रहे हैं।क्या सार्वजनिक स्थान पर प्राइवेट कालोनी वालों को इसकी छूट आपके राज में यूँही जारी रहेगी। पैनल्टी का कोई प्रावधान नहीं है क्या?क्या इसके लिए सी एम तक जाना पड़ेगा? कृपया इसे गंभीरता से लें।" कलेक्टर ने एस एम एस मिलते ही सम्बंधित विभाग को निर्देश दिए। विभाग के अधिकारियों,कर्मचारियों ने मौके पर जाकर जिला कलेक्टर को वस्तुस्थिति की जानकारी दी। ना कलेक्टर के पास के पास जाने की जरुरत ना अर्जी लिखवाने का झंझट। सीधा एस एमएस टू कलेक्टर और काम मिनट में। ऐसा होना उस जिले के लिए अच्छी बात है जहाँ सी एम सबसे अधिक करप्शन बताते हैं।---फ्लाई ओवर के कारण सम्पति के दाम में काफी फर्क पड़ने लगा है। एक सच्चे सौदे की जानकारी इसी संदर्भ में। लक्कड़ मंडी चौराहे पर एक दुकान का सौदा हुआ साढ़े तीन करोड़ का। दस लाख रूपये साई पेटे दिए गए। दोनों पार्टियाँ एकदम पायेदार,साफ सुथरी बिज़नस फैमिली। सौदा के समय फ्लाई ओवर का ज़िक्र नहीं था। बाद में सम्पति की कीमत कम आंकी गई। पहले वाला सौदा रद्द कर दिया गया। खरीदार ने साढ़े तीन करोड़ में दुकान लेने से इंकार कर दिया। बाद में यही दुकान उसी ने साढ़े दो मतलब ढाई करोड़ में ली। साई के दस लाख रूपये भी इसी अडजस्ट किये गए। फ्लाई ओवर ने एक को एक करोड़ की बचत करवा दी दूसरे को नुकसान। इस सौदे की पूरे बाजार में चर्चा है। वैसे फ्लाई ओवर के चक्कर में सूरतगढ़ रोड पर बनी लोहा मंडी में दुकानों के भाव एक दाम से ही बढ़ा दिए गए। लक्कड़ मंडी के पूर्व और पश्चिम की तरफ की सम्पतियों की देखभाल आरम्भ हो गई है।----प्याज बहुत महंगा है। लेकिन इसकी बात करने की बजाय चांदी की महंगाई पर चर्चा कर लेते हैं। शेयर बाजार और एनसीडीएक्स पर निगाह या रूचि रखने वाले कई दिनों से चांदी के भाव में काफी तेजी आने का एलान कर रहे हैं। इस प्रकार का कारोबार करने वाले चांदी की खरीदारी भी करने लगें हैं। मगर इसमें संभाल कर कदम बढ़ाने की आवश्यकता होती है। वरना सबकुछ सफ़ेद होते देर नहीं लगती। हाथ से रकम तो जाती ही है कई बार इज्जत भी चली जाती है। कई सप्ताह पहले ऐसा हो भी चुका है। एक जानदार,शानदार,दमदार परिवार के समझदार आदमी ने बड़ा सौदा कर लिया। जोर से झटका इस प्रकार लगा कि गूंज पूरी बिरादरी और बाजार में अभी तक सुनी जा रही है। किस्मत से जान बच गई। इसलिए जरा संभाल के। मजबूर का शेयर है--"इश्क है तो साथ ही चले चलो,प्रीत यादों से मेरी ना जताए कोई।" aanand मायासुत का एसएमएस --एक सास अपने तीन दामादों को प्यार देखने के लिए दरिया में कूद गई। एक दामाद ने उसे बचा लिया, सास ने उसको कार दी । दूसरे दिन सास फिर दरिया में। दूसरे दामाद ने बचाया तो उसको मोटर साईकल मिली। तीसरे दिन वही कहानी । तीसरे दामाद ने सोचा अब तो साईकल ही बची है क्या फायदा। सास डूब गई। अगले दिन दिन ससुर ने उसको मर्सडीज कार और एक मकान दिया।

Tuesday, 14 December, 2010


ऐसी भी हो सकती है सी एम की प्रेस वार्ता

श्रीगंगानगर--जयपुर का पिंक सिटी प्रेस क्लब। दोपहर का समय। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत आ चुके है। गले में बेतरतीब सा मफलर ऐसे पड़ा है जैसे उनका मंत्री मंडल। खुश हैं। पत्रकारों की भरमार है। सबसे मिलते हुए उस ओर कदम बढ़ा रहे हैं जहाँ प्रेस वार्ता होनी है।उन्होंने जिस पत्रकार को नाम लेकर पुकारा उसने अपनी कॉलर ऊँची की। जिसका हाथ मिलाते हुए हाल चाल पूछा उसकी चाल बदल गई। जिस पत्रकार ने अपना परिचय खुद दिया उससे केवल यही कहा, अच्छा अच्छा और चलते रहे। कई मिनट के बाद मुख्यमंत्री जी और प्रेस दोनों आमने सामने थे। गहलोत जी ने एक नजर चारों तरफ दौड़ाई और कहा, पूछो क्या पूछना है। प्रेस बोली ,सर आप बताइए। हमारे पास बताने के लिए कुछ होता तो कब का बता चुके होते। हँसते हुए कहने लगे, बोलो तो सही। प्रेस को और तो कुछ सुझा नहीं, उपलब्धियां बताने को कहा। सी एम का चेहरा चमक गया। उपलब्धियां! सी एम बोलने लगे, उपलब्धियां बहुत है। सबसे बड़ी उपलब्धि तो ये कि हम ९६ से १०५ हो गए। हमारे व्यवहार, नीति, सदभाव और राज्य के प्रति प्रेम को देख पांच विधायकों ने कांग्रेस का झंडा पकड़ कर संख्या १०५ तक पहुंचा दी। कई निर्दलीय विधायकों को मंत्री बना कर समर्थन जुटाया। वर्तमान में जब भाई भाई का दुश्मन है, ऐसे में किसी को अपना बनाना कोई कम उपलब्धि नहीं है। आते समय जिसको गहलोत ने ज्यादा भाव नहीं दिया था उसने प्रश्न करने की कोशिश की तो वह पत्रकार बीच में आ गया जिसका हाल चाल मुख्यमंत्री ने पूछा था। कहने लगा,यार पहले गहलोत जी को बात तो पूरी कर लेने दो। हाँ सर आप क्या कह रहे थे। सी एम अपनी उपलब्धियां बता रहे थे। गोलमा को अपने साथ रखना, उसके नखरे सहना केवल हम ही जानते हैं। विपक्ष करके दिखाए ये सब। कितने ही मंत्री अपनी मन मर्जी करते हैं। ये हमारी उपेक्षा नहीं उनको दी गई स्वायतता है। करप्शन.... भीड़ में से दबी सी आवाज आई। वैरी गुड प्रश्न। सी एम ने कहा । वे बोले, आजकल तो बड़े पत्रकारों के नाम भी इसमें शामिल हो गए हैं। ये ख़ुशी की बात है। करप्शन का दायरा बढ़ा है। एक पत्रकार बोला, सर आपके राज में करप्शन की बात। बेकार के प्रश्न क्यों पूछते हो। वह पत्रकार बोला जिसे नाम लेकर सी एम ने बुलाया था। सी एम जारी थे, विपक्ष ने बहुत अधिक करप्शन किया। सबकी जांच चाल रही है। देखना नतीजा आएगा। सर कोई और उपलब्धि । कोई धीरे से बोला। हाँ हैं ना। सी एम ने कहा, हमें जैसे ही कहीं से किसी अधिकारी की शिकायत मिलती है हम उसका तबादला दूसरी जगह कर देते हैं। दूसरी से तीसरी जगह, इसी प्रकार चौथी,पांचवी.... । ऐसा किसी सरकार ने नहीं किया होगा। और कभी नहीं भी करते, एक पत्रकार दूसरे के कान में फुसफुसाया। गहलोत जी ने वातावरण अपने पक्ष में देख थोडा खुलना शुरू किया। कहने लगे, हमने सी पी जोशी की नजर के बावजूद अपनी कुर्सी बचाए रखी ताकि प्रदेश की सेवा कर सकूँ। आपको डर लगता है क्या जोशी से? एक पत्रकार ने हिम्मत दिखाई। गहलोत बोले, वे दिल्ली की बजाये राजस्थान में अधिक रहते हैं। इसके बाद भी हमने अपनी कुर्सी पर आंच नहीं आने दी। वैसे डर सबको लगता है गला सबका सूखता है....सी एम थोडा मुस्कराए। गला सबका सूखता है कि बात से सबको कुछ याद आ गया। प्रेस वार्ता समाप्त। जैसे जिसके सी एम से सम्बन्ध वैसी उसकी टिप्पणी। पिंक सिटी में उसके बाद क्या हुआ जरुर बताता। मगर इस बीच फोन की घंटी ने कल्पनाओं की प्रेस वार्ता की इतिश्री कर दी। हम तो यही सोचते रहे कि क्या ऐसा हो सकता है!

ओशो ने कहा है -आप बच्चे की सारी आवश्कताएं पूरी कर दें। उसे दुनियां की सभी आरामदायक चीजें दें। लेकिन यदि आप उसे आलिंगन नहीं करते तो उसका कभी सम्पूर्ण विकास नहीं हो पायेगा। अब एक एस एम एस नरेन् का--एक बच्चा चोकलेट खा रहा था। एक आदमी ने उसे टोका, बोला इतनी चोकलेट खाना ठीक नहीं। बच्चा बोला, मेरे दादा जी १०५ साल जिए। आदमी--वो चोकलेट खाते थे? बच्चा--नहीं, वो केवल अपने काम से काम रखते थे बस।

--- गोविंद गोयल

Monday, 6 December, 2010

सी एम यूँ ही तो नहीं कहते

दुविधा भी है और डर भी। कहीं ऐसा ना हो जाये, कहीं वैसा ना हो जाये। आज के इस दौर में किसी बड़े अफसर के बारे में लिखना,छापना कम हिम्मत का काम नहीं है। सब को याद होगा कुछ दिन पहले मीडिया में श्रीगंगानगर जिले में करप्शन की स्थिति के बारे में छपा था। करप्शन इस देश के कण कण में है। जन्म से लेकर मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए कैश या काइंड के रूप में किसी ना किसी को कुछ देना पड़ता है। फिर सी एम ने यहीं के कलेक्टर क़ो क्यूँ इस बारे में कुछ कहा? कोई तो कारण जरुर होगा।। मुख्यमंत्री कोई बात बेवजह तो नहीं कहते। इसकी वजह है उनका श्रीगंगानगर में आना। उसके बाद यहाँ के प्रभावशाली नेताओं का सी एम के समक्ष रोना। सी एम को वह सब कुछ बताया गया जो नेताओं ने सुना था। सी एम ओ के एक बड़े अधिकारी के खास होने के कारण उनकी नियुक्ति हो गई तो हो गई। अब क्या हो सकता था। ऐसा कौन है जो उनको तुरंत वापिस भेजने की हिम्मत करता। इसलिए माँ -मायत के आगे रोया ही जा सकता था, रो लिए । वो जमाना और था जब तत्कालीन मंत्री गुरजंट सिंह बराड़ ने श्रीगंगानगर में एस पी का चार्ज लेनेआ रहे के एल शर्मा का चार्ज लेने से पहले ही तबादला करवा दिया था। श्री शर्मा तब सीकर ही पहुंचे थे कि उनकी जगह आलोक त्रिपाठी को एस पी लगाने के आदेश सरकार ने दिए। अब बात और है। मंत्री गुरमीत सिंह कुनर का इस मामले में अधिक मगजमारी नहीं करते । जो आ गया वही ठीक है। जब नियुक्तियों में उनका अधिक हस्तक्षेप नहीं है तो प्रशासन उनसे डरता भी नहीं। या यूँ कहें कि वे प्रशासन को डराते ही नहीं। मंत्री होने के बावजूद श्री कुनर के जिले में रहने का अधिकारियों पर कोई फर्क नहीं पड़ता। ना उनको मंत्री के घर जाना पड़ता है ना उनके आगमन पर सर्किट हाउस । वे खुद भी किसी को नहीं बुलाते। आजकल बिना बुलाये कोई आता भी नहीं। इस से भला मंत्री और कहाँ मिलेगा। इसलिए सब के सब मजे में है सिवाय आम जन के।----अग्रवाल समाज की एक संस्था ने समाज के बुजुर्गों का सम्मान किया। अपने जिला कलेक्टर को भी बुलाया गया था। उनके पिता श्री को तो बुलाना ही था। कलेक्टर तो नहीं आये। उनके बिना ही कार्यक्रम करना पड़ा। कलेक्टर के गुणी पिताश्री मदन मोहन गुप्ता ने एक बात बड़े ही मार्के की कही। वे बोले, मुझे यहाँ इसलिए बुलाया गया है क्योंकि मेरा बेटा यहाँ का कलेक्टर है। वरना मुझे यहाँ कौन आमंत्रित करता। उन्होंने अपनी बात को विस्तार दिया, सभी को अपने बच्चों को पढ़ा कर इस लायक बनाना चाहिए ताकि परिवार को सम्मान मिल सके। बात तो सच्ची है। बेटा कलेक्टर है तभी तो मंच पर विराजे, नहीं तो उनके जैसे बुजुर्गों की श्रीगंगानगर में कोई कमी थोड़ी थी।-----राज्य के मंत्री गुरमीत सिंह कुनर इस बारे जिले के लम्बे दौरे पर हैं। उनसे मिलना कोई मुश्किल नहीं है। जल्दी उठने वाले सुबह दस- साढ़े दस बजे तक उनसे गाँव में मिल सकते हैं। उसके बाद श्रीकरनपुर विधानसभा क्षेत्र में लगने वाले किसी शिविर में। जहाँ प्रशासन आया हुआ होता है। पता चला है कि श्री कुनर कम से कम एक सप्ताह तो यहाँ हैं ही। इस बार पहले एस एम एस। भेजा है राकेश मितवा पत्रकार ने वह भी बिना एडिट किये--"बाबा साहेब के परिनिर्वाण दिवस पर कल पी आर ओ ऑफिस में एक प्रोग्राम होगा। प्लीज़ सभी मीडिया कर्मियों कोआमंत्रित करो ई टी वी सहित। मेरी पत्नी बाबा साहेब पर लेक्चर देगी।--कलेक्टर। " अब एक शेर शकील शमसी का--शाम के वक्त वो आते ही नहीं छत पै कभी, आपने इनको नहीं चाँद को देखा होगा।

Friday, 3 December, 2010

आज रोने का मन किया

आज ना जाने क्यूँ
रोने को मन किया,
मां के आँचल में सर
छुपा के सोने का मन किया,
दुनिया की भाग दौड़ में
खो चुके रिश्ते सब,
आज उन रिश्तों को सिरे से
संजोने का मन किया,
किसी दिन भीड़ में
देखी थी किसी की आँखें ,
ना जाने क्यूँ आज उन आखों में
खो जाने का मन किया,
रोज सपनों से बातें
करता था मैं,
आज ना जाने क्यूँ उनसे
मुंह मोड़ने का मन किया,
झूठ बोलता हूँ
अपने आप से रोज मैं,
आज ना जाने क्यूँ खुद से
एक सच बोलने का मन किया,
दिल तोड़ता हूँ सबका
अपनी बातों से मैं,
आज एक टूटा हुआ दिल
जोड़ने का मन किया।
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यह कविता मेरे मित्र और साहित्यप्रेमी आनंद मयसुत ने भेजी थी एस एम एस के द्वारा। खुद शिक्षक हैं। इनके पिता श्री मोहन आलोक राजस्थानी के जाने माने साहित्यकार हैं।

Sunday, 28 November, 2010

किस्से में खबर, खबर में किस्सा

श्रीगंगानगर- पहले एक किस्सा,उसके बाद खबर। आज के सिस्टम को सालों पहले समझ लेने वाले एक अधिकारी को ऐसी जगह लगा दिया गया जहाँ पीने को पूरा पानी तक नहीं था। अफसर करियर के बारे में सचेत था। लिहाजा हर ताले की कुंजी उसके पास थी। उसने अपनी अंटी से लाखों रूपये खर्च कर प्रोजेक्ट बनाया। जिसमे ये बताया गया था कि इलाके में बाँध बनाया जाये तो पानी की समस्या का समाधान हो सकता है। जमीन फसल के रूप में सोना उगलेगी। अफसर सिस्टम का हिस्सा था। ले देकर अरबों रुपयों का प्रोजेक्ट सरकार से मंजूर करवा लिया। सब हजम । बाँध के नाम पर पिल्ली ईंट भी नहीं लगी। तीन साल बाद उसका तबादला हुआ तो नया अफसर आया। फ़ाइलें देखी,बांध नहीं दिखा। माजरा समझ गया। वह कौनसा कम था। उसने बांध की मरम्मत का प्रोजेक्ट बना स्वीकृत करवा लिया। इसने भी क्या करना था। बजट आपस में बांटा,मौज मारी। समय पर ट्रांसफर हो गया। तीसरा ऑफिसर आया। वह भी इसी व्यवस्था में रचा बसा था।कमाल देखा, फाइल में बाँध बना, मरम्मत भी हुई। मौके पर मोडल भी नहीं। उसने नई तरकीब निकली। सरकार को प्रोजेक्ट भेजा। कई साल पहले जो बाँध बना था वह नकारा हो गया। उसको हटाया जाना जरुरी है। वरना इलाका तबाह हो सकता है। साथ में उसने बाँध वाली जगह पर कालोनी और कमर्शियल कोम्प्लेक्स बनाने का प्रस्ताव भी भेज दिया। प्रस्ताव पास होना ही था। लिहाजा इलाके को बचाने के लिए बाँध हटा दिया गया। मतलब सब कुछ वैसा ही जैसा था। अरबों रूपये सिस्टम में बंट गए। अब खबर। श्रीगंगानगर जिले में ईंट भट्ठा मालिकों को नोटिस दिए गए। उसके बाद निजी कालोनियों को नोटिस देकर रिसीवर नियुक्त करने की कार्यवाही करवाई गई। हंगामा तो मचना ही था। बचने के लिए लाखों रुपयों का फंड बनाया गया। अभी तक इनमे से कोई कार्यवाही नोटिस से आगे नहीं बढ़ी। बढती दिखती भी नहीं। इलाके के लोगों को रोजी रोटी से महरूम और घर से बेघर कर बरबाद थोड़ी करना है। राजकीय अस्पताल में मेडिकल की दुकानों को कुछ जमीन देने का भरोसा दिया गया। जिनको कुछ मिलना था उन्होंने सिस्टम में शामिल होने के लिए रूपये इकट्ठे किये। नियमानुसार उनको जगह मिलने का सवाल ही पैदा नहीं होता। कमेटी ने अडंगा लगाया तो बात बिगड़ गई। अब साहब ने सड़क की तरफ उनकी दुकानों के दरवाजे खुलवाने का आश्वासन दिया बताते हैं।
अब बात एस पी की कर लें। रुपिंदर सिंह बहुत अच्छे, धर्म परायण इन्सान हैं। लेकिन एस पी के रूप में उनका कोई रोब कहीं न तो दिखता है ना महसूस होता है।एसपी के रूप में उनकी पकड़ कहीं नजर नहीं आती। कोई कुछ भी करने को स्वतंत्र है। पुलिस वाले भी और नियम कानून को अपनी उँगलियों पर नचाने वाले भी। जो कोई भी एस पी से मिलने गया , उसकी बात उन्होंने तसल्ली से सुनी, मिलने वाले को भरोसा भी हुआ। किन्तु उसका परिणाम कुछ नहीं निकलता। कुछ दिन पहले कांग्रेस पार्टी के नेता अपने मुख्यमंत्री से इस बारे में मिले थे। ये कहा और सुना जा रहा है कि एसपी रुपिंदर सिंह का तबादला होने वाला है। एस पी साहेब से इतना ही कहना है कि आपके दफ्तर में लगे एक बोर्ड पर वो नाम हैं जो आपसे पहले यहाँ एसपी रहे हैं। लेकिन आम जन को वही नाम याद हैं जिन्होंने अपराधियों में डर पैदा कर आम आदमी का भरोसा जीता। आप केवल इस बोर्ड पर ही अपना नाम लिखा देखना चाहते हैं या लोगों के दिलो दिमाग पर भी,यह आप पर निर्भर है। हमें तो एस पी दूसरा मिल ही जायेगा। ना भी मिले तो भी क्या है! सहेल गाजीपुरी का शेर है---उस से उसके दोस्त भी नाराज होते जायेंगे, जिस को सच्ची बात कहने का हुनर आ जायेगा। अब साथी पत्रकार राकेश मितवा का मोबाइल सन्देश--श्वास का हर फूल अर्पण कर अमन को, प्यार का हर दीप पीड़ा के शमन को, है तू स्वयं परमात्मा का अंश भू पर, तू जहाँ भी है वहीँ महका चमन को।
---गोविंद गोयल

Monday, 22 November, 2010

सवाल का जवाब ढूढ़ने के लिए चिंतन

की बोर्ड उँगलियों के नीचे हैं। उँगलियाँ कभी मन के भाव को शब्दों का रूप देती है और अगले ही पल उसी मन का आदेश मान उनको डीलिट कर ठहर जाती हैं की बोर्ड पर। सब्जेक्ट ही कुछ ऐसा है। कई देर की उलझन के बाद दिमाग ने मन को काबू में कर उँगलियों को स्वामी ब्रह्मदेव के बारे में लिखने का आदेश दिया। शनिवार को सुबह स्वामी जी से मिलने का अवसर मिला। क्षमा याचना के साथ स्वामी जी से सवाल किया, स्वामी जी आपके बाद संस्था को इसी प्रकार से कौन संभालेगा? स्वामी जी ने सवाल को बहुत सहज ढंग से लिया। कहने लगे, यही प्रश्न यहाँ भी गूंज रहा है। आजकल हम लोग इसी सवाल का जवाब खोजने में लागे हुए हैं। स्वामी जी बताने लगे, संस्था के सभी बावन सदस्य चिंतन कर रहे है कि ऐसी क्या व्यवस्था की जाये ताकि संस्था का संचालन,विकास,प्रतिष्ठा इसी प्रकार बनी रहे। उनका संकेत था कि जो भी होगा यहीं से होगा। संस्था के बाहर से कोई आकर इसकी जिम्मेदारी नहीं संभालेगा। एक ऐसा फंड बनाया जायेगा जिसके ब्याज से संस्था का बड़ा खर्च निकलता रहेगा। इस फंड को कोई भी कभी किसी भी हालत में प्रयोग नहीं कर सकेगा। बाकी जन सहयोग से चलेगा। वर्तमान में प्रतिमाह साढ़े अठारह लाख रूपये का खर्चा है संस्था को चलाने का। अभी सरकारी अनुदान भी। मगर इस प्रकार के इंतजाम करने की योजना है जिस से कि अनुदान बंद भी हो जाये तब भी संस्था को आर्थिक संकट से दो चार ना होना पड़े। एल के सी [ लालचंद कुलवंत राय चलाना] श्री जगदम्बा अंध विद्यालय समिति की नींव १३ दिसम्बर १९८० को रखी गई थी। लाल चंद कुलवंत राय चलाना समिति के पहले दानदाता थे। इन तीन दशकों में संस्था ने स्वामी ब्रह्मदेव के मार्गदर्शन में ऐसा विकास किया कि जिसकी मिसाल दूर दूर तक देखने सुनने को नहीं मिलती। श्रीगंगानगर इलाके में यह संस्था केवल दर्शनीय ही नहीं, इसके प्रति श्रद्धा भी है।
जुबां फिसली तो फिसलती ही गई--अग्रवाल सम्मलेन कीराष्ट्रीय कार्यकारिणी के स्वागत समारोह में नेताओं की जुबां फिसली तो स्वागत का स्वाद रात तक कडवा रहा। छोटे बड़े अग्रजन हर कार्यक्रम में इस कड़वाहट को एक दूसरे के सामने बाहर निकालते दिखे। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जुबां इस लिए फिसली कि उनको वक्ताओं को बुलाने,उनके स्वागत का क्रम गरिमा के अनुकूल नहीं लगा। उपाध्यक्ष श्याम सुन्दर अग्रवाल को इसमें अपना अपमान महसूस हुआ। बी डी अग्रवाल को उपाध्यक्ष का बर्ताव सहन नहीं हुआ। लिहाजा उनकी जुबां भी फिसलने नहीं बच सकी। मामला अधिक बिगड़ गया। इसी वजह से दो पदाधिकारी प्रेस कांफ्रेंस में नहीं बैठे। उसके बाद हुए हर कार्यकर्म में यही समीक्षा होती रही कि कौन सही था कौन गलत। जिला कार्यकारिणी का स्वागत समारोह तो छोटा था बात बड़ी हो गई। संभव तय बड़ी बात मुश्किल से ही छोटी होगी। बेचारी आयोजक संस्था ये सोच सोच कर परेशान है कि आखिर यह सब कैसे और क्यों हुआ। वाली आसी का शेर है--आ मेरे यार एक बार गले लग जा, फिर कभी देखेंगे क्या लेना है क्या देना है। आर ए एस अधिकारी का मोबाइल सन्देश--दसना तुसी वी नी ते कहना असी वी नी। सदना तुसी वी नी ते आना असी वी नी। बोलना तुसी वी नी ते बुलाना असी वी नी। पर एक गल पक्की है के भुलना तुसी वी नी ते भुलाना असी वी नी।

Sunday, 21 November, 2010

चार बेटियों सहित आत्महत्या

आज सुबह की शुरुआत इस खबर से हुई कि एक दम्पती ने चार बच्चों सहित आत्महत्या कर ली। जानकारी को अधिकृत रूप मिला तो खबर ये थी। एक दम्पती ने अपनी चार लड़कियों के साथ आत्म हत्या कर ली। सबसे छोटी लड़की की उम्र मात्र एक माह थी। सबसे बड़ी लड़की अपने ससुराल गई हुई थी। फिलहाल यही पता चला है कि यह सब आर्थिक तंगी के कारण हुआ। पुलिस हर नजरिये से इस मामले की तहकीकात कर रही है। घटना हनुमानगढ़ जिले के रोड़ावाली गाँव की है। यह गाँव हनुमानगढ़ से अबोहर जाने वाली सड़क पर है।

Friday, 19 November, 2010

---- चुटकी---

एक
दूसरे की
तकदीर,
बरखा
राजा
वीर।
----
बरखा
राजा
वीर,
कहाँ
मिलेगी
ऐसी
तकदीर।
-----
जो पसंद आये उसको रख लेना। चुटकी ।

Monday, 15 November, 2010

खजाने का बाजा दिया बाजा

---- चुटकी---

सरकारी
खजाने का
बजा दिया
बाजा,
हजारों करोड़
में पड़ा
एक राजा।

Tuesday, 9 November, 2010

मुश्किल डगर पर पहला कदम

इन्सान के सामाजिक होने का प्रमाण है उसके यहाँ आने वाले निमंत्रण पत्र। शादी,सगाई,जन्म,विवाह की वर्षगांठ,जन्म और शादी की सिल्वर और गोल्डन जुबली सहित अनेक अवसरों पर निमंत्रण पत्र आना भिजवाना एक सामान्य बात है। ऐसे आयोजनों में जाना-आना रिश्तों को निभाने के लिए जरुरी भी है। कहीं कहीं सामाजिक शिष्टाचार के लिए हाजिरी लगवानी होती है। जाना है तो खाली हाथ जाने का सवाल ही पैदा नहीं होता। जैसा जिसके साथ रिश्ता वैसा ही उपहार या लिफाफे के अन्दर शगुन के नाम पर नकदी। किसी के यहाँ अकेले गए तो कहीं कहीं परिवार के साथ। कार्ड आने का सीधा सा मतलब होता है कि खर्चा आ गया। भोजन करो, लिफाफा दो और लौट जाओ घर। कई बार तो भोजन भी जरुरी नहीं होता। लिफाफे से ही हाजिरी लगवाई जाती है। सब चलता है। रिवाज ही ऐसा हो गया। हर कोई चर्चा करता है। इस रिवाज की बातचीत में खिल्ली उड़ाने वालों की कमी नहीं है।। दशकों पहले जो एक सामान्य रिवाज था वह विकृति के रूप में समाज के सामने आ खड़ा हुआ। पहली बार एक ऐसा निमंत्रण मिला जिसने ध्यान अपनी तरफ खींचा। वैसे तो यह लक्ष्मी ट्रेडिंग कंपनी के संचालक निर्मल कुमार बंसल के सुपौत्र के जन्मोपलक्ष में आयोजित होने वाले भोज में आने का निमंत्रण है, लेकिन इस पर आने के आग्रह के साथ ये लिखा है" नोट--आपसे करबद्ध अनुरोध है कि किसी प्रकार का गिफ्ट स्वीकार्य नहीं होगा। केवल आपका आशीर्वाद ही चाहिए। " किसी निमंत्रण पत्र में इस प्रकार अनुरोध पहली बार देखने का अनुभव हुआ। अच्छा लगा। सुखद अहसास हुआ। लाइन बेशक छोटी है, इनका सन्देश बहुत और बहुत बड़ा है। वर्तमान में कहें तो बराक ओबामा की भारत यात्रा से भी बड़ा। शुरुआत छोटी के साथ साथ मुश्किल भरी होती है। आयोजन में इसका कोई अर्थ रहे या ना रहे। मेहमान चाहे गिफ्ट,लिफाफा लाएं, मनुहार करके जबरदस्ती मेजबान को दे भी जाएं। उनको मज़बूरी में,शिष्टाचार में ,रिश्तों की गरिमा रखने हेतु संभव है कुछ स्वीकार करना पड़े। इसके बावजूद निमंत्रण पत्र पर छपी लाइन की भावना दूर दूर तक जाएगी। जानी ही चाहिए।आज के परिवेश में जब लिफाफा हमारी संस्कृति बन चुका है तब आमंत्रित मेहमान को आने से पहले ही यह अनुरोध कर देना कि प्लीज़ कुछ लाना मत, कम महत्व पूर्ण नहीं है। घर घर में घर कर चुके ऐसे रिवाजों के खिलाफ किसी ना किसी को तो बोलना ही था। कोई अकेला चलने की हिम्मत करेगा तभी कारवां बनने का रास्ता बनेगा। ये जरुर है कि पहले पहल यह आड़ी,टेढ़ी, धुंधली सी पगडंडी हो उसके बाद एक आम रास्ता बन जाये। किसी के आना जाना बोझ,खर्च महसूस होने की बजाय आनंद और उत्साह की बात लगे। संभव है रास्ता कई साल गुजरने के बाद भी न बने, ये भी हो सकता है कि इस रास्ते की आवश्यकता जल्दी ही सबको होने लगे। फिलहाल तो निर्मल कुमार बंसल परिवार की भावना,सोच,हिम्मत को सलाम। जिसने एक नई परम्परा की ओर अपने कदम बढ़ाये हैं। हस्ती मल हस्ती की लाइन हैं---रास्ता किस जगह नहीं होता,सिर्फ हमको पता नहीं होता। बरसों रुत के मिज़ाज सहता है, पेड़ यूँ ही बड़ा नहीं होता। अब एक एस एम एस जो हनुमानगढ़ के राजेश अरोड़ा का है--अक्सर लोग कहते हैं कि जिंदगी रही तो फिर मिलेगें। मगर हम लोगों से ये कहते हैं कि मिलते रहे तो जिंदगी रहेगी।
----चुटकी---

मनमोहन-ओबामा
दोनों खुश,
पाकिस्तानी
पटाखा
हो गया फुस्स।

Thursday, 4 November, 2010

करोड़ों कृषि शरणार्थी होंगे इस देश में


विकास डब्ल्यू एस पी लिमिटेड के चेयरमैन बी डी अग्रवाल, जिन्होंने ये लेख लिखा है, का कहना है कि इस लेख को पढ़कर बीजेपी के विधायक अभिषेक मटोरिया सहित कई जनप्रतिनिधियों ने उनसे मुलाकात की। हर किसी ने इस बात पर अचरज जताया कि देश में किसानों के साथ ऐसा हो रहा है और कोई भी राजनीतिक दल बोलता नहीं। श्री अग्रवाल का दावा है कि वे जो कुछ इस लेख में कह रहे हैं वह तथ्यों पर आधारित है। तथ्यों को कोई झुठला नहीं सकता हाँ कोई आँख मूंद ले तो कोई क्या कर सकता है।

Wednesday, 3 November, 2010

कौन देता मेरा साथ

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मेरे मासूम
सवालों के
झूठे थे तेरे
सभी जवाब,
तेरी चाहत की
दीवानगी में
गुम हो गए
मेरे सभी ख्वाब।
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अमावस का हूँ
अँधेरा, जो था
पूनम की रात,
दीप की भांति
जलो तो
बन जाये बात।
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तुम्हारी तुला
तोलने वाले भी
तुम्हारे ही हाथ,
ऐसे में कोई
क्यूँ देने लगा
मेरा साथ।
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***गोविंद गोयल

Sunday, 31 October, 2010

परम्पराओं से भरा जीवन

हम सबका जीवन परम्पराओं के मामले में बहुत अमीर है। परम्परा कोई भी कहीं भी हो सबकी अपनी अलग कहानी,दास्ताँ है। कोई चाहे इसकी खिल्ली उड़ाए तो उड़ाए ,परम्परा का निर्वहन जारी रहता है। ऐसी ही एक परम्परा है, लंकेश रावण के कुल का बारहवां । श्रीगंगानगर में दशहरे का आयोजन श्रीसनातन धर्म महावीर दल करता है। रावण,मेघनाथ और कुम्भकर्ण के पुतलों के दहन के बाद किसी दिन लंकेश के कुल का बारहवां यही संस्था करती है। इस दिन विधि विधान से ब्राह्मणों को भोजन करवाया जाता है। नगर के गणमान्य नागरिक, दशहरा आयोजन से जुड़े सभी व्यक्ति इसमें शामिल होते हैं। कुछ व्यक्तियों की राय में यह महान पंडित रावण के पुतले जलाने के कथित पाप से मुक्ति हेतु किया जाता है। कई सज्जनों का मत है कि यह प्रायश्चित है ,उनके द्वारा जो रावण,कुम्भकर्ण और मेघनाथ के पुतले जलाते हैं। वजह जो भी हो परन्तु यह आयोजन गत छ:दशक से हो रहा है। संस्था के पदाधिकारी चाहे कोई रहा ,यह आयोजन अवश्य हुआ और होता रहेगा।

सरदार पटेल को याद करें


राजनेताओं के सरदार वल्लभ भाई पटेल को हमारा शत शत प्रणाम। हमारी राय में उनके जैसा राजनेता अब तो इस भारत में नहीं है। पता नहीं वो दिन कब आएगा जब हिन्दूस्तान में एक बार फिर कोई वल्लभ भाई पटेल जन्म लेगा। आज उनका जन्म दिन है।

Saturday, 30 October, 2010

श्रीगंगानगर में पत्रकारिता

मोबाइल फोन की घंटी बजी...टू..न न,टू न न [ आपकी मर्जी चाहे जैसी बजा लो] । गोविंद गोयल! जी बोल रहा हूँ। गोयल जी ...बोल रहा हूँ। फलां फलां जगह पर छापा मारा है। आ जाओ। इस प्रकार के फोन हर मीडिया कर्मी के पास हर रोज आते हैं। सब पहुँच जाते हैं अफसर के बताए ठिकाने पर। एक साथ कई पत्रकार, प्रेस फोटोग्राफर,पुलिस, प्रशासन के अधिकारी को देख सामने वाला वैसे ही होश खो देता है। अब जो हो वही सही। श्रीगंगानगर में पत्रकार होना बहुत ही सुखद अहसास के साथ साथ भाग्यशाली बात है। यहाँ आपको अधिक भागादौड़ी करने की कोई जरुरत नहीं है। हर विभाग के अफसर कुछ भी करने से पहले अपने बड़े अधिकारी को बताए ना बताए पत्रकार को जरुर फोन करेगा। भई, जंगल में मोर नचा किस ने देखा। मीडिया आएगा तभी तो नाम होगा। एक साथ कई कैमरे में कैद हो जाती है उनकी फोटो। जो किसी अख़बार या टी वी पर जाकर आजाद हो जाती है आम जन को दिखाने के लिए। ये सब रोज का काम है। गलत सही की ऐसी की तैसी। एक बार तो हमने उसकी इज्जत को मिट्टी में मिला दिया । जिसके यहाँ इतना ताम झाम पहुँच गया। सबके अपने अपने विवेक, आइडिया। कोई कहीं से फोटो लेगा, कोई किसी के बाईट । कोई किसी को रोक नहीं पाता। आम जन कौनसा कानून की जानकारी रखता है। वह तो यही सोचता है कि मीडिया कहीं भी आ जा सकता है। किसी भी स्थान की फोटो अपने कैमरे में कैद करना उसका जन्म सिद्ध अधिकार है। उसकी अज्ञानता मीडिया के लिए बहुत अधिक सुविधा वाली बात है । वह क्यों परवाह करने लगा कि इस बात का फैसला कब होगा कि क्या सही है क्या गलत। जो अफसर कहे वही सही, आखिर ख़बरों का स्त्रोत तो हमारा वही है। अगर वे ना बताए तो हम कोई भगवान तो है नहीं। कोई आम जन फोन करे तो हम नहीं जाते। आम जन को तो यही कहते हैं कि जरुरत है तो ऑफिस आ जाओ। अफसर को मना नहीं कर पाते। सारे काम छोड़ कर उनकी गाड़ियों के पीछे अपनी गाड़िया लगा लेते है। कई बार तो भ्रम हो जाता है कि कौन किसको ले जा रहा है। मीडिया सरकारी तंत्र को ले जा रहा है या सरकारी तंत्र मीडिया को अपनी अंगुली पर नचा रहा है। जिसके यहाँ पहुँच गए उसकी एक बार तो खूब पब्लिसिटी हो जाती है। जाँच में चाहे कुछ भी न निकले वह एक बार तो अपराधी हो ही गया। पाठक सोचते होंगे कि पत्रकारों को हर बात कैसे पता लग जाती है। भाइयो, अपने आप पता नहीं लगती। जिसका खबर में कोई ना कोई इंटरेस्ट होता है वही हमको बताता है। श्रीगंगानगर में तो जब तक मीडिया में हर रोज अपनी फोटो छपाने के "लालची" अफसर कर्मचारी रहेंगे तब तक मीडिया से जुड़े लोगों को ख़बरों के पीछे भागने की जरुरत ही नहीं ,बस अफसरों,उनके कर्मचारियों से राम रमी रखो। इस लिए श्रीगंगानगर में पत्रकार होना गौरव की बात हो गया। बड़े बड़े अधिकारी के सानिध्य में रहने का मौका साथ में खबर , और चाहिए भी क्या पत्रकार को अपनी जिंदगी में। बड़े अफसरों के फोन आते है तो घर में, रिश्तेदारों में,समाज में रेपो तो बनती ही है। श्रीगंगानगर से दूर रहने वाला इस बात को समझाने में कोई दिक्कत महसूस करे तो कभी आकर यहाँ प्रकाशित अख़बारों का अवलोकन कर ले। अपनी तो यही राय है कि पत्रकारिता करो तो श्रीगंगानगर में । काम की कोई कमी नहीं है। अख़बार भी बहुत हैं और अब तो मैगजीन भी । तो कब आ रहें है आप श्रीगंगानगर से। अरे हमारे यहाँ तो लखनऊ ,भोपाल तक के पत्रकार आये हुए हैं । आप क्यों घबराते हो। आ जाओ। कुछ दिनों में सब सैट हो जायेगा। श्रीगंगानगर में पत्रकारिता नहीं की तो जिंदगी में रस नहीं आता। ये कोई व्यंग्य,कहानी, टिप्पणी या कटाक्ष नहीं व्यथा है। संभव है किसी को यह मेरी व्यथा लगे, मगर चिंतन मनन करने के बाद उसको अहसास होगा कि यह पत्रकारिता की व्यथा है। कैसी विडम्बना है कि हम सब सरकारी तंत्र को फोलो कर रहे है। जो वह दिखाना चाहता है वहीँ तक हमारी नजर जाती है। होना तो यह चाहिए कि सरकारी तंत्र वह करे जो पत्रकारिता चाहे। ओशो की लाइन पढो--- जो जीवन दुःख में पका नहीं ,कच्चे घट सा रह जाता है। जो दीप हवाओं से न लड़ा,वह जलना सीख न पाता है। इसलिए दुखों का स्वागत कर,दुःख ही मुक्ति का है आधार। अथ तप: हि शरणम गच्छामि, भज ओशो शरणम् गच्छामि

Thursday, 28 October, 2010

श्रीगंगानगर में "गुंडे' की दहशत

हुजूर अहमद "शफक" की लाइन -चिंताजनक है आज जो हालात मेरी जां,हैं सब ये सियासत के कमालात मेरी जां, से आज बात की शुरुआत करते हैं।दीवाली अभी दूर है मगर लक्ष्मी का आगमन साफ दिखता है। देखना हो तो चले आओ चिकित्सा पेशे से जुड़े किसी भी आदमी या संस्था के यहाँ। आपको साफ दिखाई देगा कि किस प्रकार लक्ष्मी वहां अपनी मेहरबानी की बरसात कर रही है। नगर में चर्चा है कि इस बार लक्ष्मी इन्ही के घर विराजमान है। इसका कारण है "गुंडे" का आतंक। जल्दी में कुछ उल्टा हो गया। गुंडे नहीं डेंगू। बात तो एक ही है। श्रीगंगानगर में इन दिनों वो घर बहुत ही भाग्यशाली है जिसका कोई सदस्य बीमार नहीं है। सरकारी हो प्राइवेट ,तमाम हॉस्पिटल में बुखार से पीड़ित लोगों का आना लगा रहता है। प्रशासन पता नहीं क्या कहता है लेकिन निजी अस्पतालों के आंकड़े लोगों के दिलों में खौफ पैदा करने के लिए काफी हैं। एक बार बुखार होने का मतलब है कई हजार रूपये की चट्टी। मानसिक चिंता अलग से। जिनके यहाँ हर रोज या हर माह एक निश्चित राशि आनी है उसके यहाँ तो समस्या अधिक है। हमें इस बात की जलन नहीं है कि लक्ष्मी चिकित्सा से जुड़े व्यक्तियों के यहाँ क्यों डेरा लगाकर बैठी है। चिंता है कि इस बात की है कि अगर यही हाल रहा तो इस बार की दीवाली कैसी होगी? दीवाली, जो सबसे बड़े त्यौहार के रूप में आती है, कई प्रकार के सपने साथ लेकर आती है। घर घर में कुछ ना कुछ नया लाने के लिए बजट का इंतजाम रहता ही है। जैसी जिसकी जेब वैसे उसके सपने। मगर इस बार सभी के नहीं तो बहुतों के छोटे बड़े सभी सपने इस गुंडे के डर से किसी ओर के यहाँ चले जा रहे हैं। सामान्य बुखार ,जो कभी दादी नानी के नुस्खों से ठीक हो जाया करता था वह अब जिंदगी के लिए संकट बन कर आ खड़ा होता है। जिंदगी है तो सपने हैं, ये सोचकर सब अपना सब कुछ इस गुंडे पर लगाने को तैयार हो जाते हैं। कोई हिसार भागता है कोई जयपुर तो कोई लुधियाना। बस किसी प्रकार से जिन्दगी बच जाये,रोटी के लिए कौड़ी बचे ना बचे। कोई कर भी क्या सकता है। इससे पहले तो कभी यहाँ इस प्रकार के हालत पैदा नहीं हुए। नगर के उन व्यक्तियों को जो अपने आप को इस नगर की आन, बान, शान समझते हैं,इस बारे में चिंतन मनन जरुर करना चाहिए कि आखिर ऐसे हालत बने क्यों? अब तो जो होना था हो गया आइन्दा तो शहर को इस स्थिति से दो चार ना होना पड़े। ----कांग्रेस नेताओं को याद होगा कि १९७७ में करारी हार के बाद उनकी नेता इंदिरा गाँधी १९८० में फिर सत्ता में वापिस आ गई थी। क्योंकि हार के बावजूद श्रीमती गाँधी लगातार मिडिया की पहली खबर रहीं। इसका कारण वे खुद नहीं चरण सिंह बने , जो सरकार में उप प्रधानमंत्री के साथ साथ गृह मंत्री भी थे। वे उठते ,बैठते केवल श्रीमती गाँधी को कोसते। वे श्रीमती गाँधी को कोसते रहे, श्रीमती गाँधी लोगों की सहानुभूति बटोर कर सत्ता में लौट आई। इसी से मिलता जुलता यहाँ कांग्रेस की राजकुमार गौड़ एंड कम्पनी कर रही है। जांदू ये , जांदू वो। हाय जांदू,हे जांदू। मेरे मालिक ,आप कांग्रेस के नेता हो, जो राजस्थान की नहीं हिन्दूस्तान की भी सत्ता चला रही है। आपको लगता है कि नगर परिषद् शहर में ठीक या जनहित का काम नहीं कर रही तो अफसरों को बदल दो। जो स्थान खाली है उनको भरवा दो। यहाँ के कर्मचारी,अफसर आपको भाव नहीं देते तो उनके तबादले करवाओ । जांदू नहीं सुहाता तो उसको बर्खास्त करवा दो। ये क्या विपक्ष की तरह स्यापा करने लगे हो। शोर मचाना विपक्ष का काम होता है। सत्ता पक्ष तो चमत्कार दिखाता है। इस हाय तोबा से राजकुमार गौड़ एंड कंपनी को कब क्या मिलेगा पता नहीं, हाँ जांदू जरुर अख़बारों में छाये रहते हैं। अगर जांदू को जांदू को डाउन करना है तो उसका नाम ही लेना बंद कर दो। नहीं करोगे तो वह राजनीति का डौन बन जायेगा। ओशो ने कहा था--कौन सही है कौन गलत है, क्या रखा इस नादानी में,कौड़ी की चिंता करने में हीरा बह जाता पानी में। जब भी शिकवा शिकायत हो ,समझो तुम्ही खलनायक हो, अथ प्रमम शरणम् गच्छामि, भज ओशो शरणम् गच्छामि। अब आनंद मायासुत का भेजा एस एम एस --इस दुनिया में भगवान का संतुलन कितना अचरज भरा है। सौ किलो गेहूं का बोरा जो आदमी उठा सकता है वह उसे खरीद नहीं सकता। जो इसे खरीद सकता है वह इसे उठा नहीं सकता। ---

मिल गया काम

----चुटकी----

सुषमा की
जुबां से
जैसे ही निकला
नरेंद्र मोदी का नाम,
चैनल वालों को
मिल गया
एक नया काम।

Tuesday, 26 October, 2010

एक दिन की चांदनी

करवा चौथ की
हमको तो
समझ आती है
यही एक बात,
बस, एक
दिन की चांदनी
फिर अँधेरी रात।
----
एक दोस्त है, सालों से पत्नी के लिए करवा चौथ का व्रत रखता है। बड़ा प्रभावित रहा आज तक। कितना मान करता है पत्नी का। उसके साथ खुद भी भूखा रहता है। बहुत प्रशंसा करता उसकी। कल रात को भी की थी। असली कहानी आज समझ आई। वह व्रत अपनी मर्जी से या पत्नी की सहानुभूति के लिए नहीं रखता। व्रत रखना उसकी मज़बूरी है। क्योंकि पत्नी या तो सजने संवरने में लगी रहती है या व्रत भंग ना हो, इस वजह से कुछ काम नहीं करती। तब पति क्या करता। एक दो साल तो देखा। बाज़ार में कुछ खाया। लेकिन बात नहीं बनी । उसके बाद उसने भी व्रत रखना आरम्भ कर दिया। मैंने खुद देखा सुना। पति बोला, सुनो मेरी शर्ट में बटन लगा दो ऑफिस जाना है। पत्नी कहने लगी, मेरा तो आज करवा चौथ का व्रत है। सुई हाथ में नहीं लेनी या तो खुद लगा लो या फिर दूसरी शर्ट पहन लो। ऐसी स्थिति में कोई क्या करे! व्रत करे और क्या करे। पत्नी भी खुश शरीर को भी राहत।

Sunday, 24 October, 2010

मियां बीबी का रिश्ता मतलब वीणा की तार


बात बहुत पुरानी है। पति के मना करने के बावजूद पत्नी सत्संग में चली गई। वापिस आई तो पति ने नाराजगी दिखाई। बात इतनी बढ़ी कि बोलना तो दूर दोनों ने मरने तक एक दूसरे की सूरत नहीं देखी। वह भी एक घर में रहते हुए। पति ने बाहर वाले कमरे में डेरा जमा लिया। दोनों ऐसे विरागी हुए कि गठजोड़ा फिर बंधा ही नहीं। एक पति ऐसा था कि पत्नी के अचानक हुई मौत के बाद उसके प्रति अनुराग ने उसके दिमागी संतुलन को बिगाड़ दिया। बच्चे परेशान हुए। दोनों बात एक दम सच्ची। मियां बीबी का रिश्ता है ही कुछ ऐसा। करवा चौथ आ गई, इसी बहाने मियां-बीबी लिखने का बहाना बन गए। एक अनूठा रिश्ता जो कभी कभी रिसता भी रहता है इसके बावजूद सब रिश्तों में यह नाजुक,गरिमामय,आभायुक्त और मर्यादित के साथ साथ बेशर्मी से ओत प्रोत होता है। दोनों में लाज,शर्म का आवरण है भी और जब नहीं होता तो बिलकुल भी नहीं होता। फिर भी पाक। दोनों ही स्थिति में प्रगाढ़ता होती है। जब से रिश्तों का महत्व समझ आने लगा तब से आज तक जिन घरों तक अप्रोच रही ,उनमे एक दम्पती ऐसे मिले जिनकी आपसी समझ का कोई मुकाबला नहीं। दो जवान बेटे हैं फिर भी इस प्रकार रहतेहैं जैसे मियां बीबी नहीं प्रेमी प्रेमिका हो। मजाल है जो कभी किसी के चेहरे पर खीज दिखाई दी हो। बेशक यह बात साधारण सी है लेकिन है बड़ी व्यावहारिक। पत्नी अगर अपने पति की प्रेमिका बनकर रहे तो घर आनंद प्रदान करता है। रिश्ते हर समय गर्माहट लिए रहते हैं। तब पति को भी प्रेमी होना होगा। असली गड़बड़ वहां होती है जहाँ पत्नी केवल और केवल गृहणी बनी रहना चाहती है। तब इस रिश्ते में रिसाव कुछ अधिक होने लगता है। रिश्ते बेशक टूटने की कगार पर ना पहुंचे मगर आनंद का अभाव जरुर जीवन में आ जाता है। पति पत्नी के प्रेमी -प्रेमिका होने का यह मतलब नहीं कि वे हाथों में हाथ डाले पार्कों में गीत गाते हुए घूमे। प्रेम की भी अपनी मर्यादा होती है। या यूँ कहें कि मर्यादित प्रेम ही असली प्रेम कहलाने का हक़ रखता है तो गलत नहीं होगा। एक बार क्या अनेक बार देखा होगा। सत्संग,कथा में किसी प्रसंग के समय महिलाएं किसी के कहे बिना ही नृत्य करना शुरू कर देती हैं। भाव विभोर हो ऐसे नाचती हैं कि उनको इस बात से भी कोई मतलब नहीं रहता कि यहाँ कितने नर नारी हैं। मगर ऐसी ही किसी महिला से घर में उसका पति दो ठुमके लगाने की फरमाईस कर दे या घरेलू उत्सव में नाचने के लिए कह दे तो क्या मजाल कि महिला अपनी कला दिखाने को तैयार हो जाये। संभव है पति को कुछ सुन कर अपने शब्द वापिस लेने पड़ें। बहुत मुश्किल होता है भई,अपनों के आनंद के लिए नाचना। कितना खटती है गृहणी। देर रात तक। दोनों एक साथ सोयेंगें। पति देर तक सोता रहे तो चलेगा, पत्नी को उठना ही पड़ेगा ,पौ फटने से पहले। कोई कानून नहीं है। ये तो मर्यादा है,कायदा है,संस्कार है। दो,चार ऐसी भी होगीं जो नहीं भी उठती। फिर भी घर चलते हैं। चलते रहेगें। मतलब ये कि ये सम्बन्ध वीणा की तारों की तरह है। अधिक कसोगे तो टूट जाते हैं और ढीला छोड़ दिया तो उनमे स्वर नहीं निकलते। इसलिए करवा चौथ भी तभी सार्थक होगी जब दोनों के दिलों में एक दूसरे के लिए अनुराग और विराग दोनों होंगे। ऐसा न हो कि ये कहना पड़े--" करवा चौथ का रखा व्रत, कई सौ रूपये कर दिए खर्च,श्रृंगार में उलझी रही, घर से भूखा चला गया मर्द।" शारदा कृष्ण की लाइन हैं--जेठ दुपहरी सा जीवन ये, तुम होते तो सावन होता। इन ठिठुरती सी रातों में ,थोडा बहुत जलावन होता। ---गोविंद गोयल

Saturday, 23 October, 2010

रस्सी से घिस जाता पत्थर

बहती हो प्रतिकूल हवा, तुम शांत बैठ जाओ कुछ पल।
जब हवा थमे आगे चल दो,तेरी मुट्ठी में होगा कल।
तुम डटे रहो अपने पथ पर,रस्सी से घिस जाता पत्थर।
अथ धैर्यम शरणम् गच्छामि, भज ओशो शरणम् गच्छामि।
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लगता होगा बहुत बार,कुछ लोग नहीं सुनते तुमको।
घायल हो जाता अहंकार,दुःख पागल कर देता मन को।
मत कथा गढ़ो या चिल्लाओ,नूतन अनुरोध किये जाओ।
अनुरोधम शरणम् गच्छामि,भज ओशो शरणम् गच्छामि।
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ये पंक्तियाँ ओशो की है। मेरे मित्र नरेंद्र शर्मा ने मुझे दी। हम इनको जन जन पहुँचाने से अपने आप को नहीं रोक सके। उम्मीद है ओशो के अनुयायी इसे अन्यथा नहीं लेंगे।

Friday, 22 October, 2010

छोड़ गया वह साथ

जब जब
जिस जिस को
रखना चाहा
अपने
दिल के पास,
तब तब
अकेला रहा
छोड़ गया
वह साथ।

Wednesday, 20 October, 2010

साधू,संत,सैनिक कहाँ से आयेंगें

श्रीगंगानगर-- जोधपुर के राधाकृष्ण महाराज यहाँ आये तो नानी बाई का मायरा सुनाने थे। परन्तु इसके साथ साथ उन्होंने वो कह दिया जिसकी ओर अभी तक शायद ही किसी का ध्यान गया हो। राधाकृष्ण ने "हम दो हमारे दो" नारे पर बहुत अधिक क्षोभ प्रकट किया। उन्होंने मायरा सुनने आये नर नारियों की मार्फ़त देश से ये प्रश्न किया कि अगर ऐसा ही रहा तो हिन्दूस्तान में साधू,सैनिक और विद्वान् कहाँ से आयेंगे? अपने एक ही बेटे को कौन से माता पिता साधू या सैनिक बनना चाहेंगे। राधाकृष्ण के शब्दों में--हम दो हमारे दो और कोई आये तो धक्के दो। पति पत्नी और दो बच्चे, माता पिता से भी कुछ लेना देना नहीं। उनका कहना था कि हम बहुसंख्यक नहीं अल्पसंख्यक हो रहे हैं।लेकिन कोई इस बारे में सोचने को तैयार नहीं। उनके अनुसार परिवार नियोजन की नीति सबसे ख़राब नीति है।
राधाकृष्ण ने कहा कि नारी स्वतंत्रता की बातें बहुत होती हैं। बड़े बड़े सम्मलेन होते है। किन्तु कपड़ों के अलावा नारी की स्वतंत्रता कहीं दिखाई नहीं देती। एकता,स्वतंत्रता के नाम पर नारी को प्रदर्शन की वस्तु बना दिया गया है। घर में देवरानी-जेठानी एक नहीं होती। उन्होंने घूंघट को सौन्दर्य का संकोच बताया। उनका कहना था कि दायरे में रहने से कद बढ़ता है। आज कल पता ही नहीं लगता कि सास कौनसी है बहु कौनसी। उन्होंने कहा कि घर की बहू जेठ को देख कर घूंघट करती और जेठ उसको देख दूर से निकल जाता। ये था कायदा। इस से दोनों का कद बढ़ता। इसके बाद वे कहने लगे मैं कितना भी कहूँ रहना तो आपने वैसा ही है। राधाकृष्ण ने खेती के लिए बैल को सबसे उपयोगी बताया। उनका कहना था कि बैल से जुताई करने से खेत उपजाऊ होते हैं। उन्होंने अपने मायरे के दौरान प्लास्टिक की थैलियों का उपयोग ना करने का सन्देश दिया। राधाकृष्ण ने कहा कि कथा में आना तभी सार्थक होता है जब कोई उसे समझे,सीखे और माने। उन्होंने ने कहा कि रसोई में जो कुछ बनता है वह सब को मिलना चाहिए। परोसने में भेद भाव हो तो अन्नपूर्णा का अपराधी बन जाता है परोसने वाला। राधाकृष्ण ने यह सब किसी न किसी प्रसंग के समय कहा। हालाँकि कई बार उनकी बात विनोद के अंदाज में थी ,किन्तु निरर्थक नहीं। कथा कहने का उनका अंदाज जितना अनूठा है उतना ही निराला है उनका नृत्य। कथा के बाद जब नर नारी घरों को लौटने की जल्दी में होते हैं तब शुरू होता है उनका नाच। उनकी लम्बी छोटी से लेकर उनके पैरों का ऐसा नृत्य कि कोई भी कुछ क्षण के लिए अपने आप को भूल जाये। भक्ति भाव का नृत्य कैसा होता है उनसे सीखा जा सकता है। उनसे मुलाकात करने से पहले उनका नृत्य देखा होता तो ये जरुर पूछता कि महाराज आपने नृत्य किस से सीखा?
सहज,सरल और आडम्बर से दूर राधाकृष्ण की कथा में भी यह साबित हो गया कि मां के आँचल के अलावा सब जगह सब बराबर नहीं होते। इसका अहसास आयोजन से जुड़े व्यक्तियों को उन्होंने कई बार करवाया मगर भीड़ देखकर बोराए वे लोग बार बार वही करते रहे जो राधाकृष्ण महाराज को पसंद नहीं आ रहा था। उन्होंने कथा आरम्भ होने के कुछ मिनट बाद उनसे कहा, चलो आपके नए कुर्ते देख लिए बहुत अच्छे हैं, अब गैलरी से हट जाओ, जहाँ हो वहीँ बैठ जाओ। बाद में मंच पर चढ़ते हुए इनको कई बार रोका। नीचे उतारा। एक कार्यकर्त्ता को तो यहाँ तक कह दिया कि जब मैंने मायरे के लिए सामान ना लेने के लिए कह दिया था तो क्यों इकट्ठा कर रहे हो, वापिस करो। एक महिला को उन्होंने आवाज देकर उसका सामान वापिस किया। उन्होंने इशारों इशारों में कार्यकर्ताओं से विशिष्टता न दिखाने को कहा, संकेत दिया। इसके बावजूद कोई खास असर देखने को नहीं मिला। आयोजन जबरदस्त था। पुरुषो की संख्या नारियों से एक चौथाई रही। ये आश्चर्यजनक था कि महिलाओं ने कथा के दौरान आपस में बात चीत नहीं की। सबका ध्यान व्यास गद्दी की ओर ही रहा।
कृपा शंकर शर्मा "अचूक" की लाइन हैं --मंजिले हैं कहाँ यह पता कुछ नहीं,सिर्फ आदी हुए लोग रफ़्तार के। जिंदगी एक पल में संभाल जाएगी, गर समझ लें सलीके जो व्यवहार के। ---

Tuesday, 19 October, 2010

मुलाकात महाराज राधाकृष्ण से


शायर मजबूर की पंक्तियाँ हैं--"सीधे आये थे मेरी जां, औन्धे जाना, कुछ घड़ी दीदार और कर लूँ।" उन्होंने ये संभव तय किसी प्रेम करने वाले के लिए लिखी हों। हम तो इनको "नानी बाई रो मायरो "सुनाने आये राधा कृष्ण महाराज के साथ जोड़ रहे हैं। श्रीगंगानगर में पहली बार मायरा हो रहा है। छोटे बड़े कथा वाचक महंगी गाड़ियों में आते हैं या उनको लाना पड़ता है। परन्तु राधाकृष्ण जी तो खुद ही पैसेंजर गाड़ी से यहाँ पहुँच गए, बिना किसी आडम्बर और दिखावे के।नगर भर में लगे पोस्टर,होर्डिंग में क्यूट से दिखने वाले महाराज जी से मिलने की इच्छा हुई। बिना किसी मध्यस्थ के उनसे मिला,बात की। वे केवल २७ साल के अविवाहित युवक हैं। वे कहते हैं कि शादी की इच्छा नहीं है, अगर ठाकुर जी की मर्जी हुई तो बात अलग है। उनका मानना है कि अगर बचपन में ही सत्संग मिल जाये तो देश की किशोर और युवा पीढ़ी पथभ्रष्ट नहीं हो सकती। महाराज जी जोधपुर के हैं और इनके पिता अनाज का कारोबार करते हैं। जिसमे इनका छोटा भाई सहयोग करता है। तीन बहिन हैं जो अपने अपने ससुराल में सुखी हैं। राधाकृष्ण कहते हैं कि घर में मैं महाराज नहीं होता। पुत्र और भाई होता हूँ। जैसे आप रहते हैं मैं भी वैसे ही रहता हूँ। कथा में माता-पिता आये हों और वे व्यास गद्दी पर आकर आपकी चरण वंदना करें तो ! ऐसा नहीं होता। मैं उनको प्रणाम करके कथा शुरू करता हूँ। फिर भी ऐसा हो तो वे उनके भाव हैं। मेरे भाव तो यहीं हैं कि ऐसा ना करें। उन्होंने बताया, स्कूल कॉलेज की शिक्षा तो कोई खास नहीं है। साधू संतों के श्रीमुख से जो सुना वही सुनाता हूँ। एक पुस्तक भी लिखी है। श्रीमदभागवत और मायरा करते हुए सालों बीत गए। पहली बार तीन व्यक्तियों के सामने कथा की। अब यह संख्या हजारों में होती है।
महाराज जी ने कहा कि नानी बाई कोई काल्पनिक पात्र नहीं है। यह सच्ची कथा है। इसे आम बोल चाल की भाषा में सुनाता हूँ तो सबके मन में बस जाती है, रस और भाव आते हैं। कथा में कोई चुटकुले,टोटके किसी प्रसंग को समझाने के लिए इस्तेमाल हों तो ठीक। केवल हंसाने के लिए हो तो अच्छा नहीं माना जाता।
राधाकृष्ण ने कहा कि मैं तो एक आम आदमी ही बना रहना चाहता हूँ। विशिष्ट नहीं बनना मुझे। विशिष्ट होने के बाद कई झंझट गले पड़ जाते हैं। राधाकृष्ण गौड़ ब्राहम्ण परिवार से हैं। खानदान में इनके अलावा कोई और इस लाइन में नहीं है। घर के पास मंदिर था, वहां जाया करता था। मन कृष्ण में ऐसा लगा कि बस इसी में राम गया। वे कहते हैं , यह मेरा व्यवसाय नहीं सेवा है। कथा करने का कुछ भी नहीं लिया जाता। अगर कोई देता भी है तो वह जन और गाय की सेवा में लगा देते हैं। मुलाकात के लिए उन्होंने काफी लम्बा समय दिया मगर उनका मोबाइल फोन इसमें से कुछ भाग ले गया। उनकी फोन पर बात चीत से ऐसा लगा कि अप्रैल तक उनके सभी दिन बुक हैं। कहीं श्रीमदभागवत है कहीं नानी बाई का मायरा। जोधपुर में २१-२२ अक्टूबर को कोई बड़ा कार्यकर्म करने की योजना भी है। राधाकृष्ण पहली बार श्रीगंगानगर आये हैं। उनका कहना था कि श्रीगंगानगर में मायरा करने में आनंद ही आनंद होगा ऐसा पहले दिन की भीड़ से लगता है। नर नारी कथा को भाव से सुनने के लिए आये थे। बातें बहुत थी। मगर यहाँ इतना काफी है। रमा सिंह की लाइन है--मैं तुझमे ऐसी रमी, ज्यों चन्दन में तीर, तेरे-मेरे बीच में, खुशबू की जंजीर। किसी कवि की दो लाइन महाराज जी के लिए--" शख्स तो मामूली सा था, दुनिया जेब में थी, हाथ में पैसा न था। ----गोविंद गोयल

Monday, 18 October, 2010

राज राज की स्थापना हो गई

ना जी, ऐसी बात नहीं है, हमारे पास जिला मुख्यालय पर एसपी से लेकर थानों में लांगरी तक है। प्रशासनिक अमले में पटवारी से डीएम तक,सब एक से बढ़कर एक। एसपी ऐसा जेंटलमैन कि जितनी तारीफ की जाये उतनी कम है। विनम्र,धार्मिक विचारों का सीधा -साधा एसपी। डीएम भी कमाल का मिला है हमारे जिले को। अपने सरकारी काम के अलावा बच्चों को उनके करियर के लिए गाइड करता है। कोई आम आदमी उसके दर पर आकर वापिस ना लौट जाये इसके लिए वे खुले में सबसे मिलते हैं, ऑफिस से बाहर, बरामदे में। फिर समस्या क्या है? समस्या सुमस्या कुछ नहीं है। इस इलाके के अनेक नेता कई सरकारों में मंत्री .......... । ये एसपी-डीएम के बीच मंत्री....... । टोका टाकी मत कर पहले पूरी बात सुन। जो नेता मंत्री हुए उन्होंने कभी सरकारी या प्राइवेट वाहन पर अपने मंत्रालय का नाम नहीं लिखवाया।
तो इसमें क्या बात है। ऐसा तो कोई किसी राज्य में नहीं करता। गलत, बिलकुल गलत। हमारे यहाँ तो कोई भी ऐसा कर सकता है। श्रीगंगानगर में कई प्राइवेट वाहन हैं जिस पर लाल प्लेट लगाकर मंत्रालयों के नाम लिखे हुए हैं। कई वाहनों पर लिखा है "इस्पात मंत्रालय", इस्पात मिनिस्टरी। कई बार तो इनमे से एक वाहन पर लाल बत्ती भी लगी होती है। दो कारों पर वित्त मंत्रालय लिखा हुआ है। ये दोनों कारें बैंक से सम्बंधित हैं। इनको कोई पुलिस वाला नहीं रोकता। मंत्री आने पर पुलिस को सूचना होती है। दोनों मंत्रालय केंद्र के हैं। हैरानी इस बात की है कि किसी ने इनको आज तक नहीं रोका,टोका। ये बोर्डर वाला जिला है। प्रेस लिखे वाहनों में कारोबारी माल ढोया जाता है। जिनका कपडे प्रेस करने का काम तक भी नहीं वे भी प्रेस लिखे वाहनों का प्रयोग करते हैं। पत्रकारों ने एक साथ इस बारे में एसपी को बताया था।
आधी रात के बाद सड़कों पर पुलिस की गश्त नहीं आवारा लड़कों की मटरगश्ती होती है। शराब के नशे में ये लोग हुड़दंग मचाते हैं। एसपी साहेब कोई शिकायत नहीं करेगा। किसकी हिम्मत है जो इनसे पंगा ले। छोटी छोटी चोरी वाले तो थानों तक पहुँचते ही नहीं। क्या होगा, कुछ भी तो नहीं।
डीएम ने अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस में कब्जों के खिलाफ कार्यवाही तुरंत करने की बात कही थी। उन्होंने अपनी बात पूरी की। सड़कों पर सुबह शाम लगने वाली फल सब्जी की रेहड़ियों को हटवा दिया। बेचारे गरीब लोग थे। सड़कों,सरकारी जमीन पर मकान दुकान बनाने का सिलसिला जारी है। हर इलाके में अंडर ग्राउंड बन रहे है। शहर को खोखला किया जा रहा है। प्रकृति ने एक झटका दिया तो नगर गुजरात बन जायेगा। मगर हम किसी को कुछ नहीं कहेंगे। इतने डीएम आये किसी ने किसी को कुछ नहीं कहा, हम क्यों कहें। यही हाल छोटे अफसरों का है। आम आदमी को झटके देने में कोई अफसर चूक नहीं करता। मिडिया में वाह वाही होती है। बड़े को सब सलाम बजाते हैं। क्योंकि इनकी बेगारें भी तो यही पूरी करते हैं। कोई रेहड़ी वाला किसी अफसर को क्या ओब्लाईज कर सकता है।
चलो बहुत हो गया। कल ही तो लंकापति के कुल को समाप्त कर राम राज्य की स्थापना की है। जब राम राज हो तो फिर किस को किस बात का डर। सब एक समान है। सब कोई सब काम करने को स्वतंत्र है। इसलिए एक कवि की दो लाइन पढो-" पुलिस पकड़ कर ले गई,सिर्फ उसी को साथ, आग बुझाने में जले जिसके दोनों हाथ।" एक एसएमएस -- भिखारी मंदिर के बाहर भीख मांगता है और सेठ मंदिर के अंदर।

Sunday, 17 October, 2010

दशहरा पूजन किया घर में


बुराई पर अच्छाई की जीत की ख़ुशी में हर साल आज के दिन दशहरा मनाया जाता है। इस दिन घर में इसकी पूजा अर्चना के बाद भोजन लेने की परम्परा है। सुबह गृहलक्ष्मी गाय के गोबर से दशहरे का प्रतीक मनाती है। उसके सामने दो टोकनी भी गोबर की बनाई जाती है। पूजा के बाद इनको दाल चावल का भोग अर्पित किया जाता है। दोनों टोकनी में भी दाल चावल भरे जाते हैं। शायद यह घर में अन्न के भंडार भरें रहे इस कामना से किया जाता है। हमने भी आज अभी दशहरा पूजन कर घर में सुख शांति,समृद्धि की प्रार्थना इश्वर से की।

राम राज को आयेंगे

---- चुटकी----

वो रावण
भी नहीं रहा,
ये भी
मारे जायेंगे,
तू उदास
मत हो
रे मना
राम राज
को आयेंगें।

पत्रकार साथियों को शोक

श्रीगंगानगर से प्रकाशित दैनिक प्रशांत ज्योति के प्रधान संपादक श्री ओ पी बंसल की माता श्रीमती अंगूरी देवी का निधन हो गया। वे ८२ साल की थी।

श्रीगंगानगर के एक और पत्रकार श्री संजय सेठी की माता श्रीमती माया देवी का भी इसी रात को निधन हो गया। उनके परिवार ने उनकी मृत देह मेडिकल कॉलेज को दान कर दी।

हम दोनों आत्माओं को नमन कर परिवार को यह शोक सहन करने की प्रार्थना इश्वर से करते हैं। नारायण नारायण।

Friday, 15 October, 2010

अष्टमी पर माँ की आरती




श्रीगंगानगर के दुर्गा मंदिर में आज रात को अष्टमी के पर देवी दुर्गा की महाआरती की गई। एक साथ कई सौ बत्तियां प्रज्जवलित कर यह आरती हुई। मंदिर के कई दशकों पुराने पुजारी श्याम सुन्दर ने आरती की शुरुआत की। उसके बाद उसको उनके बेटे ऋषि कुमार ने संपन्न किया। आरती के समय बहुत बड़ी संख्या में धर्म परायण नर नारी,बच्चे मौजूद थे। दुर्गा मंदिर देवी माँ के जयकारों से गूंज रहा था। आरती के बाद प्रसाद का वितरण हुआ। अनेकानेक नर नारियों ने देवी माँ को चुनरी,सुहाग का सामान अर्पित किया।

Thursday, 14 October, 2010

खबर के अन्दर खबर

ख़बरें वही नहीं होती जो हमारी नजरों को दिखाई दें। हालाँकि सब लोग खबर पढतें हैं, देखतें हैं और सुनते हैं। मगर बहुत सी खबरें बड़े बड़े लोगों के चेहरों, हाव-भाव और उनके अंदाज से भी निकल कर आती हैं। कई बार खबर के अन्दर भी खबर होती है। कुछ ऐसी ही खबरों का ज़िक्र आज यहाँ करने की कोशिश करते हैं।
----- राजस्थान में पंचायत विभाग को बहुत ही ताकतवर बना दिया गया है। पांच विभाग और उसके सुपुर्द हो गए हैं। जो विभाग पंचायत की झोली में डाले गए हैं उनके मंत्रियों का वजन कम होना स्वाभाविक है। शिक्षा मंत्री भंवर लाल मेघवाल की मनमर्जी सब जानते हैं। मुख्यमंत्री क्या उनके तबादलों के कारनामे तो प्रधानमंत्री तक पहुँच गए हैं। [ऐसा एक मंत्री ने मुझे बताया था।] कई मंत्री आपस में उलझे रहते हैं। मतलब की मंत्री परिषद् में सब ठीक नहीं कहा जा सकता। इसलिए इसमें फेरबदल होना संभव है। कब होगा इसके लिए कोई डेट निश्चित नहीं की जा सकती। इस प्रकार की "घटनाएँ" कभी भी हो सकती हैं। जिले के एक मात्र मंत्री गुरमीत सिंह कुनर बने रहेंगे। उनका विभाग बदल सकता है।वैसे वो बड़ा विभाग ना लेना चाहे तो अलग बात है। उनके पास अभी जो विभाग है वह असल में तो मार्केटिंग बोर्ड है। उसको मंत्रालय बना दिया गया है। उसमे से भी सड़कों का काम अब सार्वजनिक निर्माण विभाग को दे दिया जिस से वह और छोटा हो गया। चलो इंतजार करते हैं जादूगर के जादू का।
----- अभी कुछ दिन पहले अग्रवाल समाज की शोभायात्रा का आयोजन हुआ। श्रीगंगानगर के इतिहास में अग्रवाल समाज के लोग इतनी बड़ी संख्या में एक साथ कभी सड़कों पर नहीं आये। इस आयोजन के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर आरम्भ है। इस बात की चर्चा होना स्वाभाविक है कि विकास डब्ल्यू एस पी के बी डी अग्रवाल विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रहे हैं। उनकी सहानुभूति बीजेपी के साथ है। बताते हैं कि उनकी बीजेपी नेता वसुंधरा राजे सिंधिया से भी मुलाकात हुई है। श्री अग्रवाल श्रीमती राजे को श्रीगंगानगर लाने की योजना बना रहे हैं। अभी तक तो यहाँ के विधायक राधेश्याम गंगानगर को श्रीमती राजे के निकट माना जाता रहा है। अब ये नए समीकरण राधेश्याम की नींद उड़ाने के लिए काफी हैं। हालाँकि राधेश्याम गंगानगर इलाके के ऐसे राजनेता हैं जो कुछ भी कर सकने में संभव हैं। लेकिन संघ से उनकी पटरी नहीं बैठ रही। दूसरा सालों से वसुंधरा जी के आस पास रहने वाले नेता ये कब सहन करने लगे कि कल बीजेपी में आया राधेश्याम उनसे आगे निकल जाये। चुनाव में अभी तीन साल है। यहाँ की राजनीति कई रंग बदलेगी ऐसा आभास होने लगा है।
----- अग्रवाल समाज की शोभा यात्रा के समय विधायक राधेश्याम गंगानगर ने महाराजा अग्रसेन जी के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उनको नमन किया। यह एक सामान्य बात है। जनप्रतिनिधि ऐसा करते ही हैं। अग्रवाल समाज के एक व्यक्ति, जो यहाँ अधिकारी हैं ने एतराज जताया। उन्होंने शोभा यात्रा के साथ चल रहे अग्रबंधुओं से कहा कि वे अरोड़ा समाज के राधेश्याम को उस वाहन पर मत चढ़ने दें जहाँ अग्रसेन महाराज की फोटो रखी है। यह अधिकारी वही हैं जो राधेश्याम के विधायक बनने बाद उनसे मिलने को आतुर था। अपने एक कर्मचारी की मार्फ़त जो सहायक के रूप में विधायक के साथ था। नरेश गोयल नामक इस अधिकारी ने अपनी एक किताब का विमोचन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से करवाया। हैरानी की बात ये कि उसी किताब का विमोचन उससे पहले इन्होने श्रीगंगानगर में एक समारोह में करवा लिया था।

Wednesday, 13 October, 2010

वक्त निगाहें फेर लेता है

निगाहें फेर
लेता है
जब वक्त,
जीवन पथ
हो
जाता है
कुछ सख्त ।

Wednesday, 6 October, 2010

अग्रवाल होंगे सम्मानित

अग्रवाल सेवा समिति ,श्रीगंगानगर
विशेष आग्रह व सूचना
राजस्थानवासी अग्रवाल समाज के सभी छात्र -छात्राओं को सूचित किया जाता है कि अग्रवाल सेवा समिति द्वारा राजस्थान के समस्त अग्रवाल समाज के विद्यार्थियों को सम्मानित करने के लिए निम्नलिखित योजना है।
१-भारतीय प्रशासनिक सेवाओं आईएएस/आईपीएस तथा आईआरएस में वर्ष २०१० तथा इसके बाद के वर्षों में चयनित परीक्षार्थियों को समिति गोल्ड मैडल से सम्मानित करेगी।
२-राजस्थान प्रशासनिक सेवाओं आरएएस/आरपीएस तथा आरजेएस में वर्ष २०१० में तथा इसके बाद के वर्षों में चयनित परीक्षार्थियों को समिति सिल्वर मैडल से सम्मानित करेगी।
३-अखिल भारतीय स्तर पर [ सीबीएसई/ एनसीईआरटी] तथा राजस्थान राज्य माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, अजमेर द्वारा सैकेंडरी तथा सीनियर सैकेंडरी परीक्षा में प्रथम स्थान पाने वाले विद्यार्थी को समिति गोल्ड मैडल तथा दूसरा स्थान पाने वाले को सिल्वर मैडल दिया जायेगा।
४-अखिल भारतीय स्तर पर आईआईएम ,आईआईटी ,एआईआईएमएस ,सीपीएमटी तथा राजस्थान में राज्य स्तर पर पीएमटी की प्रवेश परीक्षा तथा सी ए फ़ाइनल परीक्षा में प्रथम स्थान पाने वाले परीक्षार्थियों को गोल्ड मैडल, दूसरा स्थान पाने वाले विद्यार्थी को सिल्वर मैडल दिया जायेगा।
५-पिछले दो साल में एमबीए ,सीए किये तथा कैम्पस भर्ती के इच्छुक विद्यार्थी जो बैंकों में सर्विस के इच्छुक हो को योग्यता के आधार पर सर्विस दिलवाने का प्रयास किया जायेगा। कृपया सभी पात्र अपना बायोडाटा ई मेल या डाक द्वारा निम्न पते पर भेजे।
बी डी अग्रवाल [मुख्य सरंक्षक ]
अग्रवाल सेवा समिति ,विकास दाल मिल परिसर
नई धान मंडी गेट नंबर २,
श्रीगंगानगर ३३५००१
फोन ०९४१३९३४६४४ , ई मेल-
beedeeagarwal@gmail.com
निवेदक
बी डी अग्रवाल,प्रबंध निदेशक
विकास डब्ल्यू एस पी लिमिटेड
श्रीगंगानगर
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विकास डब्ल्यू एस पी के प्रबंध निदेशक श्री बी डी अग्रवाल राजस्थान का तो पता नहीं श्रीगंगानगर में पहले ऐसे आदमी है जिन्होंने अपने समाज के प्रतिभाशाली बच्चों के लिए प्रोत्साहन योजना शुरू की है। कुछ दिन पहले इन्होने समिति के माध्यम से कई लाख रूपये की सहायता अग्रवाल समाज के उन विद्यार्थियों के लिए डी जो अपनी फीस जमा नहीं करवा पाए थे। श्री अग्रवाल ने कल प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि यह सब हमारे जाने के बाद भी चलता रहेगा, इस प्रकार की व्यवस्था की जा रही है।

Tuesday, 5 October, 2010

बेचारे मास्टर जी

मास्टर/मास्टरनी को किसी ज़माने में बेचारा कहा जाता था। तब से अब तक नहरों में बहुत पानी बह गया। अब मास्टर/मास्टरनी बेचारे नहीं रहे। बढ़िया तनख्वाह है। अच्छा घर चलता है। खुद सरकारी हैं लेकिन बच्चे निजी स्कूल्स में पढ़ते हैं। क्योंकि वहां व्यवस्था ठीक नहीं रहती। जब मास्टर जी अपने लाडलों को इन स्कूलों में नहीं पढ़ाएंगे तो कोई और क्यों ये रिस्क ले। लिहाजा सरकारी स्कूल्स में मास्टर/मास्टरनी को पढ़ाने के अलावा और काम करने का खूब समय मिल जाता है। अब कुछ मुश्किल होने लगा है। मास्टरजी को सत्तारूढ़ पार्टी के छोटे बढे नेताओं की चौखट पर हाजिरी देनी पड़ती है। किसी समय इनके तबादलों से नेताओं का कोई लेना देना नहीं था। अब तो विधायक या विधानसभा का चुनाव हुए नेता के परवाने के बिना तबादला नहीं होता। जिन मास्टर/ मास्टरनियों की राजनीतिक गलियारों में पहुँच थी उन्होंने अपने तबादले अपनों मनपसंद जगह करवा लिए। बाकियों को फंसा दिया। ऐसे लोग राजनीतिज्ञों के यहाँ धोक लगा रहे हैं। किसी की धोक सफल रहती है किसी की नहीं। चढ़ावे के बिना तो कोई मन्नत पूरी ही नहीं होती। राजनीति की दखल जितनी शिक्षा में है उतनी तो किसी में भी नहीं है। प्रदेश में हजारों हजार मास्टर/मास्टरनी है। इतना चढ़ावा है कि गिनती करने के लिए मशीन लगानी पड़े। नीचे से ऊपर तक सब जानते हैं। कहाँ कहाँ कौन कौन ये सब करवा रहा है, ना तो सरकार की नजर से छिपा है न अधिकारिओं की आँखों से। लेकिन होगा कुछ नहीं। जिसकी अप्रोच है वह मजे में है। जिसको तबादल के रास्ते पता है, उसको कोई टेंशन नहीं है। बाकी सब निराश होकर ऐसे बन्दों की तलाश कर रहे है जो उनका काम करवा सके, दाम लेकर। राजस्थान सरकार का एक मंत्री खुद कहता है कि पैसे देकर करवा लो मेरे बसकी बात नहीं है। इस से अधिक लिखना कोई मायने नहीं रखता। तबादले शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए नहीं होते। ये तो कमाई का जरिया है। जो मास्टर/मास्टरनी एक से दो घंटे का सफ़र करके अपने स्कूल में पहुंचेगा वह क्या तो पढ़ा पायेगा क्या देश की शिक्षा के बारे में चिंतन मनन करेगा। ऐसा तो है नहीं की जिसको जिस गाँव में लगाया है वह वहीँ रहेगा। पता नहीं सरकार कब इन मास्टर/मास्टरनियों को अपने नेताओं के चंगुल से मुक्त करेगी।

Saturday, 2 October, 2010

तुझे पराई क्या पड़ी

मसला तो हिन्दूस्तान का है और पेट में दर्द हो रहा है पाकिस्तान के। इस बारे में तो यही कहना ठीक रहेगा।

ओरों के घर
के झगड़े
ए रावण
ना छेड़ तू,
तुझे पराई
क्या पड़ी
अपनी
नीबेड़ तू।

Thursday, 30 September, 2010

फैसला है या न्याय

---- चुटकी----

देश की जनता
ये तो बताए,
इसको फैसला
कहेंगे
या न्याय।

Friday, 24 September, 2010

आयोजन ही आयोजन

श्रीगंगानगर में आजकल धार्मिक आयोजनों की बहुत अधिक धूम है। किसी मंदिर में हनुमान चालीसा के पाठ हो रहे हैं तो किसी मैदान में क्रिस्चन समाज का उत्सव। नगर में २५-२६ सितम्बर को प्रभु दुःख निवारण समागम का आयोजन होगा। २८ की सुबह बाबा रामदेव जी लोगों को योग की शिक्षा देंगे। इन दोनों कार्यकर्मों के लिए बड़े स्तर पर प्रचार किया जा रहा है। दोनों आयोजनों पर लाखों रुपया खर्च होगा। बाबा रामदेव के लिए तो यहाँ के डीएम भी भीड़ के प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने स्कूल संचालकों को विद्यार्थियों को योग शिविर में ले जाने के निर्देश दिए हैं। कई सौ लोग इन आयोजनों को सफल बनाने के लिए भागदौड़ कर रहे हैं।
नगर के लोगों को इस बात से कोई लेना देना नहीं कि हमारे यहाँ किसी भी रेल फाटक पर पुल नहीं है। हम लोग इस बात की भी परवाह नहीं करते कि श्रीगंगानगर में सिवरेज नहीं है। बरसात का पानी शहर की हालत बिगाड़ देता है। सड़कें ख़राब हैंइस बारे में सरकार सोचे , हम क्यों अपना दिमाग ख़राब करें। शहर ऐसा मस्त हुआ है जैसे इन आयोजनों के बाद नगर में कोई समस्या रहेगी ही नहीं।

Wednesday, 15 September, 2010

सीमावर्ती का विमोचन

"तेवर वही,सोच नई" की पंच लाइन के साथ "सीमावर्ती"पाक्षिक पत्रिका का विमोचन समारोह आज दोपहर को देव पैलेस में हुआ। मंच पर बुजुर्ग सुदर्शन कुमार मल्होत्रा, दैनिक लोकसम्मत के प्रधान संपादक शिव स्वामी,बिरला सनलाइफ के ब्रांच मैनेजर लव भूषण गुप्ता,सीओ सिटी हरी राम गहलोत,पुलिस इंस्पेक्टर नन्द लाल सैनी,सीमावर्ती के प्रधान संपादक संजीव भाटिया, हांसल समाचार के प्रधान संपादक अशोक चुघ और एक स्कूल संचालक मौजूद था। समारोह में मीडिया कर्मियों की उपस्थिति नाम मात्र की थी। समय से काफी देर बाद शुरू हुआ समारोह फीका था। संचालन सुधीर मिश्रा ने किया। सीमावर्ती किसी ज़माने में नगर का जाना माना दैनिक समाचार पत्र हुआ करता था। प्रदुमन कुमार भाटिया इसके संस्थापक संपादक थे।लम्बे समय से इसका प्रकाशन बंद था। अब उनके बेटे संजीव भाटिया ने दैनिक अख़बार की जगह पाक्षिक पत्रिका आरम्भ की है। संजीव नगर के अनेक अख़बारों में कम कर चुके हैं। नई पत्रिका की टीम को शुभकामनायें।

Monday, 13 September, 2010

गणपति बाबा हमारे घर


फिर से आये हमारे द्वार
गणपति बाबा जी,
आरती उतारूँ बारम्बार
गणपति बाबा जी।
आप आये तो रौनक लागी
रोज मनाये त्यौहार
गणपति बाबा जी।
हम तो बालक भोले भाले
कैसे कर सत्कार
गणपति बाबा जी।

Wednesday, 8 September, 2010

हस्ताक्षर को गणपति का रूप देने वाला कलाकार

श्रीगंगानगर में विजय गौड़ एक ऐसा कलाकार है जो किसी भी शब्द को गणपति का रूप प्रदान कर देता है। आप हस्ताक्षर करो विजय उसको गणपति बना देगा। एक हस्ताक्षर के अनेक गणपति।

Friday, 3 September, 2010

गोरी राधा, सांवरे श्याम


हर शाम किसी के लिए सुहानी नहीं होती
हर चाहत के पीछे कोई कहानी नहीं होती,
कुछ तो असर होता ही है मोहब्बत में
वरना गोरी राधा यूँ सांवरे श्याम की दीवानी नहीं होती।

कोटा से मैडम संतोष बैरवा द्वारा भेजा गया एस एम एस।

Thursday, 26 August, 2010

आम आदमी से मुलाकात

संवेदनशील कवि की दो लाइन से बात आरम्भ करते हैं-प्रश्नोत्तर चलते रहे,जीवन में चिरकाल,विक्रम मेरी जिन्दगी,वक्त बना वेताल। ये पंक्तियां देश के आम आदमी को समर्पित हैं। उस आदमी को जिसे मैं तब से जानता हूँ जब से अखबार पढना शुरू किया था। आम आदमी!मतलब,जो किसी को नहीं जानता हो और कोई खास आदमी उसको ना पहचानता हो। अपने काम से काम रखने को मजबूर। ना साधो से लेना न माधो का देना। पीपली लाइव के नत्था से भी गया गुजरा। इसी फिल्म के उस लोकल पत्रकार से भी गया बीता। जिसकी मरने के बाद भी पहचान नहीं होती। देश के न्यूज़ चैनल्स में तो यह लापता है, हाँ कभी कभार प्रिंट मीडिया के किसी कौने में जरुर इसके बारे में पढ़ने को मिल जाता है। इन दिनों ऐसे ही एक आम आदमी से साक्षात मिलने का मौका मिला। जिस पर एक कवि की ये लाइन एक दाम फिट है--एक जाए तो दूसरी मुश्किल आए तुरंत,ख़त्म नहीं होता यहां इस कतार का अंत।
आम आदमी ने अपना कर्म करके कुछ रकम जोड़ी, पांच सात तोला सोना बनाया। सोचा, घर जाऊंगा ले जाऊंगा। परिवार के काम आयेंगे। बहिन की शादी में परेशानी कम होगी। घर जाने से पहले ही चोर इस माल को ले उड़ा। थाने में गया, परन्तु मुकदमा कौन दर्ज करे? चलो किसी तरह हो गया तो चोर के बारे में बताने,उसे पकड़ने की जिम्मेदारी भी इसी की। घर में इतना सामान क्यों रखा? इस बारे में जो सुनना पड़ा वह अलग से। मोहल्ले वालों ने बता दिया। इस बेचारे ने समझा दिया। पुलिस पुलिस है, समझे समझे,ना समझे ना समझे। बेचारा आम आदमी क्या कर सकता है। जिस पर शक है वह मौज में है। इसी मौज में वह वहां चला जायेगा जिस प्रदेश का वह रहने वाला है। आम आदमी अब भी कुछ नहीं कर पा रहा बाद में भी कुछ नहीं कर पायेगा।
पेट काट कर सरकारी कालोनी में भूखंड लिया। सोचा मकान बना लूँ। बैंक आम आदमी के लिए होता है। यह सोचकर वह वहां चला गया उधार लेने। किसी ने एक लाख उधार पर साढ़े तीन हजार मांगे किसी ने तीन हजार। कोई जानता नहीं था इसीलिए किसी ने उसकी सूनी नहीं, मानी नहीं। यह रकम देनी पड़ी। लेकिन मकान का निर्माण इतनी आसानी से तो शुरू नहीं हो सकता ऐसे आदमी नक्शा बनना पड़ेगा। वह पास होगा। तब कहीं जाकर आदमी मकान की नीव भर सकता है। सरकारी कालोनी थी। कब्ज़ा पत्र लिया था। वह गुम हो गया नक्शा पास करवाने की जो फाइल ऑफिस में थी वह ऑफिस वालों से इधर उधर हो गई। सरकारी,गैर सरकारी जितनी फीस लगती है उससे डबल फीस देनी पड़ी। अब यह क्या जाने की किस काम के कितने दाम लगते हैं। कई दिन तक घर ऑफिस के बीच परेड होती रही, काम नहीं हुआ। होता भी कैसे आम आदमी जो ठहरा। उस पर आवाज ऐसी मरी मरी जैसे कोई जबरदस्ती बुलवा रहा हो। यह तो उसकी कई दिनों की कहानी है। टटोले तो अन्दर और भी दर्द हो सकते हैं। मगर हमें क्या पड़ी है। ऐसे आदमी का पक्ष लेने की जिसको कोई नहीं जानता। उस से जान पहचान करके भी क्या फायदा! देश में पता नहीं ऐसे कितने प्राणी है जो इस प्रकार से अपने दिन कटते हैं। इसके लिए तो यही कहना पड़ेगा--कैसे तय कर पायेगा, वो राहें दुशवार,लिए सफ़र के वास्ते, जिसने पाँव उधार। नारायण नारायण।

Tuesday, 24 August, 2010

बेगाना सा रहता हूँ

अपनों के बीच
बेगाने की तरह
रहता हूँ,
कोई क्यों जाने
क्या क्या
सहता हूँ,
वो पतझड़
समझते हैं
जो
बसंत कहता हूँ।

Sunday, 22 August, 2010

स्वाति महासचिव


श्री आत्मवल्ल्भ जैन कन्या महाविद्यालय के छात्र संघ चुनाव में स्वाति गोयल को महासचिव चुना गया है। दस साल पहले स्थापित इस कॉलेज में १४०० से अधिक छात्राएं हैं। कॉलेज में चुनाव पहली बार हुए। स्वाति गोयल पुत्री गोविंद गोयल बीए द्वितीय वर्ष की छात्रा है।

Monday, 16 August, 2010

पीपली लाइव के संग


आजादी की ६३वी सालगिरह,सावन की बरसात,दोस्त के साथ, चले गए पीपली लाइव देखने। सालों बाद किसी फिल्म को थियेटर में देखने का मन बना था। बनना ही था। प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने इसकी इतनी बल्ले बल्ले की कि हमें ऐसा लगा अगर पीपली को नहीं देखा तो हमारा जीना ही बेकार हो जायेगा। लोग ताने मार मार के हमें जिन्दा ही मार देंगे। अंत देखकर यही सोचा कि क्यों आ गये इसे देखने। सब कुछ ठीक था। मीडिया जो असल में करता है वह तो फिल्म में जानदार शानदार और दमदार तरीके से दिखाया गया है। लेकिन आखिर में मीडिया को क्या हो जाता है। वह ऐसा तो नहीं है कि उसे पता ही ना लगे कि मरने वाला नत्था नहीं लोकल पत्रकार है। पोस्ट मार्टम के दौरान भी पहचान नहीं हुई कि मरने वाला नत्था नहीं है। जबकि दोनों के पहनावे, बदन की बनावट में काफी अंतर था। इससे भी कमाल तो ये कि "नत्था" की लाश को ख़बरों में दिखाने से पहले ही मीडिया छूमंतर हो गया। ऐसा होता नहीं है। मुझे तो लगता है यह फिल्म किसान की स्थिति पर नहीं मीडिया के प्रति दिल में छिपी कोई भड़ास निकालने के लिए है। इसमें कोई शक नहीं कि लोकल लेवल की किसी बात का बतंगड़ इसी प्रकार बनता है। मगर ये नहीं होता कि किसी को पता ही ना लगे कि मरने वाला नत्था था या कोई ओर। जिस तमन्ना से फिल्म देखने और दिखाने ले गए थे वह पूरी नहीं हुई। लेकिन फिर भी दो घंटे तक दर्शक इस उम्मीद के साथ थियेटर में बैठा रहता है कि कुछ होगा और फिल्म ख़त्म हो जाती है। समस्या के साथ समाधान भी होता हो अच्छा होता।

Thursday, 12 August, 2010

सात दिन बाद आई बड़ी खबर

बात की शुरुआत रहीम जी के दोहे से करते हैं। वे कहते हैं, अब रहीम मुश्किल परी, कैसे काढ़े काम, सांचे से तो जग नहीं,झूठ मिले ना राम। कई घंटों से मन दुविधा में है। सात दिन पहले शराब,पोस्त के ठेकेदार,बिल्डर, कोलोनाइजेर, सत्ता के गलियारों में ख़ास पहुँच रखने वाले अशोक चांडक ने लगभग तीन दशक पुराने मामले में कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण किया। कोर्ट ने उसको केन्द्रीय कारागृह भेज दिया। दुविधा चांडक के जेल जाने की नहीं है। दुविधा ये कि यह खबर कल शाम से पहले मिडिया से गायब रही। चांडक की खबर तब थोड़ी सी छापनी पड़ी जब इसी मामले में सीनियर वकील पीडी लूथरा ने कल कोर्ट के सामने सरेंडर किया। श्रीगंगानगर के मिडिया की गिनती ताकतवर मिडिया में होती है। ये तो मानने को दिल नहीं कहता कि ये खबर मिडिया को पता नहीं लगी होगी। ये समझ से परे है कि आखिर ऐसी कौनसी बात थी जो मिडिया ने एक लाइन भी नहीं दी कि अशोक चांडक ने सरेंडर कर दिया। बस दुविधा यही है। अख़बार में क्या प्रकाशित होगा,टीवी में कौनसी खबर दिखाई जाएगी, इसमें आम आदमी की कोई भागीदारी नहीं होती। संपादक,मालिक की मर्जी है, वह जो चाहे छापे, दिखाए , नहीं इच्छा तो ना प्रकाशित करे न दिखाए। कोई कुछ नहीं कर सकता सिवाए यह सोचने के कि ये खबर छपी क्यों नहीं? जब छोटी छोटी ख़बरें कवर करने के लिए बड़ी संख्या में प्रेस फोटोग्राफर, कैमरा मैन पल भर में मौके पर पहुँच जाते हैं तो ऐसा क्या हुआ कि एक भी रिपोर्टर कोर्ट, कचहरी या जेल के आस पास नहीं पहुँच सका। मिडिया का प्रबंधन कैसा है ये वो जाने जिनका वो घराना है। हाँ ये सच है कि अशोक चांडक का मैनेजमेंट जबरदस्त है कि उसने अपने सरेंडर की खबर को हवा तक लगने नहीं दी।
१३ अगस्त १९८२ को श्रीगंगानगर के सैसन जज रणवीर सहाय वर्मा ने अशोक चांडक,पीडी लूथरा,जसजीत सिंह और सुनील भाटिया को कातिलाना हमले का मुजरिम करार देकर चारों को चार चार साल की कैदे बामशक्कत की सजा सुनाई थी। सैसन जज के इस निर्णय के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील करीब २७ साल तक लंबित रही। १३ जनवरी को हाई कोर्ट ने अपील ख़ारिज करते हुए निचली अदालत का फैसला बहाल रखा था। गत २८ सालों में अशोक चांडक और पीडी लूथरा ने अपने अपने क्षेत्रों में काफी नाम और दाम कमाया। आज दोनों जेल में हैं।

Wednesday, 11 August, 2010

डाकू जी प्रणाम

नॉएडा की एक महिला अपने पति को डाकुओं के गढ़ से वापिस ले आई। महिला की हिम्मत को स्वतंत्रता दिवस का सलाम। खबर यही होती तो भी बहुत था लेकिन इसके साथ तो एक और बड़ी खबर है जो हमें सोचने को मजबूर कर देती है। खबर यह कि डाकू ने महिला का चरण स्पर्श किये, उसको शगुन के ५१०० रूपये दिए। इस दौरान उसकी आँखे भर आई। अब डाकू को डाकू जी कहना पड़ेगा। जो कुछ डाकू जी ने किया वह तो हमारे नेता भी नहीं करते। डाकू ने बीहड़ में रहकर रिश्तों को नए तरीके से परिभाषित कर दिया। फिरौती लेकर अपने धंधे के प्रति ईमानदारी रखी और घर आई महिला का सम्मान कर भारतीय संस्कारों को मान दिया। बुराई में रहकर इतना बढ़िया आचरण! जिनसे उम्मीद होती है उनके कदम तो डगमगा जाते हैं और जिनसे कोई उम्मीद नहीं होती वे समाज के लिए उदाहरण पेश कर देते हैं। सावित्री के साथ भी तो यमराज ने ऐसा ही किया था। उसके पति के प्राण के साथ साथ उसको अपने वरदानों के साथ विदा किया था यमराज ने। हमारा मकसद किसी की किसी के साथ तुलना करना नहीं है। तुलना तो किसी की किसी के साथ हो ही नहीं सकती। काश! हमारे देश के नेता, अफसर इस डाकू से कुछ आदर्श,प्रेरणा,संस्कार लेकर देश की जनता के बारे में सोचे। नारायण नारायण।

Sunday, 1 August, 2010

छोड़ सभी तकरार रे

---- चुटकी----

रिमझिम रिमझिम
बूंदें पड़ती
ठंडी चले
बयार रे,
आजा अब तो
गले लग जा
छोड़ सभी
तकरार रे।

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आज फ्रेंडशिप डे है।

Saturday, 31 July, 2010

हंगामा तोड़फोड़ और कारोबार

प्राइवेट हॉस्पिटल के अन्दर बाहर हंगामे की खबर चंद पलों में ही शहर की हवा में घुल गई। गली,नेशनल हाई वे, गाँव, शहर के छोटे बड़े ,नामी बेनामी नेता हॉस्पिटल पहुँच गए। उनके आगे पीछे आये मीडिया कर्मी। हॉस्पिटल कैम्पस में स्ट्रेचर। उस पर एक पूरी तरह से ढका हुआ एक शव। स्ट्रेचर के निकट दर्जन भर लोग लुगाई। रोना पीटना, हल्ला गुल्ला। नेताओं के पहुंचते ही माहौल गरमा गया। प्रतीकात्मक तोड़ फोड़ हुई। मीडिया कर्मी जुट गए अपने काम में ,नेता अपने।फोटो,बातचीत,कमेन्ट,तर्क- वितर्क के साथ कुतर्क भी। तमाशबीनों की भीड़ आ डटी। पोलिसे अधिकारी भी आ गए दल बल के साथ। नगर के जाने माने नागरिक, डाक्टर के रिश्तेदार, मित्रों ने भी आना ही था। ऐसे मामले में नेताओं से वार्ता करने वाले भी आ गए, बुला लिए गए। नेताओं ने स्ट्रेचर के निकट खड़े लोगों से जानकारी ली और डाक्टर व उसके स्टाफ को दोषी करार देकर उनकी गिरफ्तारी की मांग कर डाली। मध्यस्थों ने डाक्टर से बात की। डाक्टर का कहना था कि उसने इनमे से किसी का या उसकर रिश्तेदार का इलाज नहीं किया। ना हॉस्पिटल में किसी की इलाज के दौरान मौत हुई है। लेकिन डाक्टर की बात सुनाने वाला वहां कोई नहीं था। डाक्टर की सफाई के बाद हंगामा और बढ़ गया। नारेबाजी में अधिक जोर लगा, तोड़ फोड़ फिर हुई। मीडिया कर्मियों को नए सीन मिले। पुलिस अलर्ट हुई। तमाशबीन थोडा पीछे हते, हटाये गए। कई घंटे इसी प्रकार गुजर गए। सयाने आदमी आगे आये। भीड़ से डाक्टर के प्रति कमेंट्स आने लगे। समझौता वार्ता आरम्भ हुई। माइक लग गया। नेता गला साफ करने लगे। हॉस्पिटल में जो भर्ती थे वे हाथों में ग्लूकोज की बोतल, पेशाब की थैली पकडे कहीं ओर चले गए। हॉस्पिटल में नेताओं ओर उनके समर्थकों का कब्ज़ा था। स्ट्रेचर के आस पास जितने लोग लुगाई शुरू में दिखे वे अब वहां नहीं थे। लम्बी वार्ता के बाद समझौता हो गया। डाक्टर आइन्दा लापरवाही नहीं करेगा। जो कुछ हुआ उसकी माफ़ी मांगेगा। पीड़ित पक्ष थाना में अर्जी देगा तो मुकदमा दर्ज किया जायेगा। वे चाहे तो पोस्टमार्टम करवा ले, पुलिस दवाब नहीं डालेगी। नेताओं ने माइक पर समझौते का ऐलान करते हुए अन्य अस्पतालों को सावचेत किया। अब शुरू हुआ शव के परिजनों को माइक पर बुलाने की कोशिश। किसी को मालूम ही नहीं था कि परिजन कौन है? शव किस का है? आदमी का या महिला का? तलाश आरम्भ। हॉस्पिटल की फाइल देखी गई। हर किसी की जुबान पर यही था कि शव को छोड़ कर उसके परिजन कहाँ चले गए ? एक दूसरे से पूछा , कोई जानता हो तो बताये । पुलिस हैरान। हॉस्पिटल का मालिक डाक्टर उनसे अधिक परेशान हैरान। पुलिस का कम बढ़ गया। वह आगे आई। अम्बुलैंस बुलाई गई। स्ट्रेचर से लाश उठाकर जब अम्बुलैंस में राखी जाने लगी तो हवा से कपड़ा क्या उड़ा कि साथ में सबके होश भी उड़ गए। वह कोई इंसानी लाश नहीं पुतला था। नया बखेड़ा खड़ा हो गया। नेता समझौता करवा के जा चुके थे। धीरे धीरे तमाशबीन भी चले गए। पुलिस, डाक्टर और उसके परिजन ही बाकी बचे थे। पुलिस पुतले को देख रही थी और डाक्टर अपने हॉस्पिटल तथा सबके सामने कटी जेब को। उन्होंने किसी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाने से इंकार कर दिया। पुलिस पुतले का क्या करती! वहीँ सड़क पर फैंक कर लौट गई। पुतला पता नहीं कब तक सड़क पर पड़ा रहा।
एक काल्पनिक घटनाक्रम।

Friday, 30 July, 2010

भीगी गौरी

----तड़फ----

बैरी
सावन
रोज
बरसे,
भीगी
गौरी
पिया को
तरसे।

Thursday, 29 July, 2010

सी पी जोशी


केंद्र सरकार के मंत्री हैं श्री सीपी जोशी। इनके पास ग्रामीण विकास और पंचायत राज विभाग है। केंद्र के मंत्री के नाते इन पर पूरे देश की जिम्मेदारी है। लेकिन हाय रे मन! इनका अधिक समय राजस्थान में बीतता है। २००८ में इनको राजस्थान में मुख्यमंत्री पद का दावेदार माना जाता था। केवल एक वोट से चुनाव हार गए। उसके बाद इनको भीलवाड़ा से लोकसभा का चुनाव लड़वाया गया। जीतने के बाद केंद्र में मंत्री बन गए। ऐसा लगता है कि जितना समय इन्होने मंत्री के रूप में अपने ऑफिस में नहीं बिताया होगा उतना राजस्थान में बिता दिया। राजस्थान के अख़बार देख लो आप को पता लग जायेगा कि जोशी राजस्थान के किस हिस्से में हैं। अख़बार में ना हो तो ई टीवी राजस्थान देख लेना, आपको उनकी पल पल की खबर मिल जाएगी। शायद ही कोई दिन ऐसा होगा जब ये मंत्री राजस्थान में ना होते हों। इनके पास राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी है। जोशी जी को चाहिए तो ये कि वे देश के ग्रामीण इलाकों का भ्रमण कर वहां के हालत देखें, किन्तु मन का क्या करे। वह तो राजस्थान में पड़ा हुआ है, मुख्यमंत्री बनने के सपने देख रहा है। सपने देखना तो अच्छी बात है, देखो, मगर उनके सपने तो पूरे करो जिनका मंत्रालय आपके पास है जनाब। आज जोशी जी का जन्मदिन है। उनको इस ये संकल्प लेना चाहिए कि वे आज से राजस्थान के साथ साथ देश भर के ख्याल करेंगे, उन गांवों की संभाल करेंगे, जिनके बारे में ये कहा जाता है वहां असली हिन्दूस्तान रहता है। ये ऐसा नहीं करते तो फिर सोनिया मैडम को कुछ करना चाहिए।

Friday, 23 July, 2010

गाँव का कार्यकर्म,सरपंच नहीं

केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री आदर्श ग्राम योजना का शुभारम्भ आज श्रीगंगानगर जिले के १८ बीबी गाँव में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत,केंद्र के ग्रामीण विकास मंत्री सी पी जोशी और सामाजिक न्याय मंत्री मुकुल वासनिक ने किया। मंच पर राज्य के कई मंत्री, विधायक, चुनाव में हारे हुए कांग्रेस नेता सहित अनेक लोग थे। लेकिन विडम्बना ये थी कि समारोह में इस गाँव की सरपंच मौजूद नहीं थी। यहाँ की सरपंच महिला है। यूँ तो सभी महिलाओं के बारे में बड़ी बड़ी बात करते हैं लेकिन आयोजकों ने उस गाँव की सरपंच को भी बुलाना उचित नहीं समझा जिस गाँव को आदर्श ग्राम योजना के लिए चुना गया और जिसका शुभारम्भ करने के लिए राजस्थान के मुख्यमंत्री खुद यहाँ आये। पता नहीं कांग्रेस का यह कैसा पंचायती राज है। गाँव में इतना बड़ा कार्यकर्म हो और गाँव की संसद की मुखिया को बुलाया तक नहीं गया तो फिर कोई क्या कहे।

Thursday, 15 July, 2010

एक बार बूढे दम्पति घर में अकेले बैठे अपने पुराने दिनों की यादें तजा कर रहे थे। अचानक वृद्ध पति बोला--चलो कहीं डेट पर चलते हैं। जैसे जवानी में जाते थे। पत्नी बड़ी रोमांचक अंदाज में बोली--हाँ बहुत आनंद आएगा। दम्पति ने स्थान तय किया। निश्चित तिथि पर पति उस स्थान पर पहुँच गया। पत्नी नहीं आई। पांच मिनट,दस मिनट, पंद्रह मिनट, आधा घंटा, एक घंटा और फिर दो घंटे बाद भी पत्नी नहीं आई तो पति उदास हो गया। घर आया तो देखा पत्नी सोफे पर उदास सी बैठी है। पति को गुस्सा आ गया, बोला - कमाल करती हो, तुम आई क्यों नहीं? पत्नी शरमा कर बोली- मम्मी ने आने ही नहीं दिया।

Monday, 12 July, 2010

चैनल पर चर्चा

कल रात को स्टार न्यूज़ पर एक परिचर्चा हो रही थी। विषय, विषय तो ऑक्टोपस बाबा के अलावा कुछ हो ही नहीं सकता था। उसमे कई ज्योतिषविद ,तर्क शास्त्री और वैज्ञानिक भाग ले रहे थे। चैनल का खेल संपादक उसका संचालन कर रहा था। सबकी अपनी अपनी राय, तर्क,कुतर्क थे। इसमें एक बात बड़ी जोरदार थी। जैसे ही संचालक किसी ज्योतिषाचार्य को अपनी बात कहने के लिए माइक देता, स्टूडियो में काम करने वाला एक बड़ा पत्रकार [ शायद ] आकर जबरदस्ती उससे माइक लेकर अपनी बात कहने लगता। बात भी पूरी गुस्से में कहता। एक बार नहीं ऐसा बार बार हुआ। परिचर्चा का संचालन करने वाला उसको बुलाता या नहीं वह आ जाता। ज्योतिषाचार्य अपनी बात शुरू भी नहीं कर पाते कि वह टपक पड़ता। संचालक भी उसको ऐसा करने से रोक नहीं रहा था। जब चैनल ने उनको बुलाया है, अपनी बात कहने के लिए तो उनको अपना कथन पूरा ना करने देना कहाँ की सभ्यता है। फिर ऐसे कार्यकर्म में तथाकथित नास्तिकों को हिन्दू धर्म, देवी देवताओं, उनसे जुड़ी मान्यताओं को गाली निकालने का खुला मौका मिल जाता है या ये कहें कि दिया जाता है।। गलत को गलत कहना बुरी बात नहीं लेकिन केवल अपनी ही बात को सच साबित करने के लिए जोर से बोलना, दूसरे की भावनाओं को ठेस पहुँचाना कौनसा वैज्ञानिक तथ्य है। चैनलों पर बैठ कर हिन्दुओं, देवी-देवताओं को अपमानित करने वाले इस प्रकार से किसी और धर्म के बारे में एक शब्द भी बोल कर दिखाएँ। चैनल से लेकर सरकार तक की जड़ें हिल जाएँगी। बात कहने वालों का चैनल से बाहर आना मुश्किल हो जायेगा। आप सच्चें हैं, आपका तर्क वैज्ञानिक कसौटी पर खरा है। मगर चैनल वाले ने जिस को बुला रखा है वह भी तो कुछ ज्ञान रखता होगा। मेरी इस पोस्ट से भी ऐसे नास्तिकों के पेट में मरोड़ उठेगी। चलो ठीक है पेट साफ हो जायेगा। ऐसी वार्ता संचालन करने वालों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि स्टाफ को कोई बन्दा यूँ किसी की बात को ना काटे। अगर उसको बुलाना मज़बूरी है तो उसको भी परिचर्चा में शामिल कर लो। जिस से बीच बीच में माइक छीन कर वह किसी का अपमान ना कर सके। तर्क शास्त्रियों पर भी किसी धर्म की निंदा करने पर रोक होनी चाहिए। आप समालोचना करो, तर्क से अपने कथन की सार्थकता सिद्ध करो, ये क्या कि जब कोई बस ना चले तो आपे से बाहर होकर किसी का अपमान करना शुरू कर दो। ताकि दूसरा कोई जवाब ही न दे सके। नारायण,नारायण।

Sunday, 11 July, 2010

---- चुटकी-----

इंसानों ने
तोड़
दिया विश्वास,
इसलिए
जानवरों में
नजर आने
लगी आस।

Saturday, 10 July, 2010



---- चुटकी----

हे आक्टोपस बाबा
हमारी
जान छुड़ाओ,
कुछ ना कुछ
इस
शरद पवार
के बारे में
भी बताओ।

Thursday, 8 July, 2010

सरकार से भी बड़े डीएम

श्रीगंगानगर के डीएम आशुतोष एटी पेडणेकर राज्य सरकार के मंत्रियों,बड़े अफसरों से भी बहुत बड़े पद के हैं। इसी कारण उन्होंने अपने पास आने जाने वालों पर निगाह रखने के लिए पांच सीसीटीवी कैमरे लगा रखे हैं। इनकी नजर से बचना बहुत ही मुश्किल है। एक अफसर के लिए इतने कैमरे दिल्ली में भी नहीं होंगे। डीएम से मिलने के लिए छोटा सा वेटिंग रूम है। वहां दो कैमरे हैं। एक वहां बरामदे में है जहाँ से वोटिंग रूम में दाखिल होते हैं। एक बरामदे से बाहर। इसके अलावा एक कैमरा उनके निजी सचिव के कमरे के बाहर है। इतने सीसीटीवी कैमरे जयपुर में किसी मंत्री,अधिकारी के ऑफिस या घर में नहीं मिलेंगे। पता नहीं डीएम को किस से क्या डर है जो इतने कैमरे लगाने की जरुरत पड़ी। डीएम इस बारे में कुछ भी नहीं कहते।
एक बात और, नव दम्पति विवाह का पंजीयन करवाने के लिए डीएम [मैरीज रजिस्ट्रार ] के समक्ष पेश होते हैं। ये जोड़े वहां से कोई अच्छी याद अपने साथ लेकर नहीं जाते। पेडणेकर जी पहले तो उनको लम्बा इंतजार करवाते हैं। जोड़े इंतजार के दौरान वहां आने आने वालों की नज़रों से अपने आप को असहज महसूस करते हैं। बहरहाल, यागल जब उनके दरबार में पहुँचते हैं तो डीएम उनसे उनके नाम पता यूँ जैसे नव विवाहित दम्पति नहीं बंटी-बबली जैसे कोई शातिर मुजरिम हों। या शादी करके उन्होंने कोई गुनाह कर लिया हो। पहले तो इंतजार के कारण मूड ऑफ़ उस पर पुलिसिया स्टाइल की पूछताछ । कोई कुंवारा साथ हो तो शादी करने से तोबा कर ले। साहब जी हमारी सलाह मानो तो ऐसे दम्पतियों को स्नेह से कुर्सी पर बिठाओ,उनका मुहं मीठा करवाओ। मिठाई ना हो तो मिश्री इलायची चलेगी। उनको दूधो नहाओ, पूतो फलो का आशीर्वाद दो। फिर देखो। कहने को तो ये केवल बात है। आपके मुहं से निकलेगी तो उनके लिए सोगात हो जाएगी। वे बाहर आकर हर जगह आपके गीत गायेंगे। अपने बच्चों को आपके बारे में बताएँगे। उनका ही नहीं आपका सुना चेहरा भी खिल उठेगा। डीएम जी बड़े वही होते हैं जो बड़ा पन दीखते हैं। वरना तो बड़े दही में पड़े होते है।
" कहना है इतना कुछ, मगर कह नहीं सकते,फितरत है अपनी भी चुप रह नहीं सकते।"
---- चुटकी----

कई नावों
पर सवार,
हमारे प्यारे
शरद पवार।

Monday, 5 July, 2010

मां का आँचल

--------------
मां के आँचल
में सोने का सुख
अगली पीढ़ी
नहीं ले पायेगी,
क्योंकि
जींस पहनने वाली
मां आँचल
कहाँ से लाएगी।

मेरे मित्र राजेश कुमार द्वारा भेजा गया एक एस एम एस।

Sunday, 4 July, 2010

---- चुटकी----

कल सगाई
आज धोनी का
ब्याह,
इस ख़ुशी में
देश के
सारे मुद्दे
स्वाह।

Saturday, 3 July, 2010

---- चुटकी----

सिपाही मरें
तो
सोते
लम्बी तान,
नक्सली मरे
तो
करते
जाँच की मांग।

Wednesday, 30 June, 2010

---- चुटकी----

कश्मीर का
खेल,
कोई लगाए
आग
कोई डाले
तेल।

Monday, 28 June, 2010


---- चुटकी----

सांसद बोले
बढाओ
हमारी पगार,
मैं बोला
ये भी
खूब कही
सरकार।

Saturday, 26 June, 2010

---- चुटकी----

कुछ काम
नहीं आये तो
बढ़ा दो
पेट्रोल,डीजल
गैस के दाम,
आप के
अर्थशास्त्र को
मान गए
श्रीमान।

Friday, 25 June, 2010

---- चुटकी----

पेट्रोल,डीजल
गैस पर अब
सरकारी नियंत्रण
नहीं,
वैसे
सच्ची बताओ
सरकार का
नियंत्रण दिखता
भी है कहीं।

Thursday, 24 June, 2010

---- चुटकी----

बस !
ओनर किलिंग
मत करो यारो,
वैसे चाहो
जिसको मारो।

Wednesday, 16 June, 2010

चुटकिय

---- चुटकी----

प्रणब
अर्जुन
पवार,
ये किस
मिट्टी के
बने हैं
मेरे यार।

----चुटकी-----

जिन्ना
बोतल
में बंद,
जसवंत सिंह
फिर हुए
बीजेपी के संग।

Monday, 14 June, 2010

न्याय नहीं फैसले होते हैं

---- चुटकी----

आजकल

पीड़ित लोग
इसलिए
रोते हैं,
क्योंकि
अब
पंचायत में
न्याय नहीं
फैसले होते हैं।

Sunday, 13 June, 2010

समझ गए अफजल कसाब

---- चुटकी----

अब समझें हैं
अफजल
और कसाब,
भारत में
अतिथि देवो भव
का
क्या अर्थ है जनाब।

Saturday, 5 June, 2010

ईमान हो ना हो

---- चुटकी----

ईमान हो
ना हो
गांठ में
पैसा जरुरी है,
आज के
जीवन की
ये सबसे बड़ी
मज़बूरी है।

Saturday, 22 May, 2010

चार साल बाकी हैं मेरे यार

केंद्र में श्री मनमोहन सिंह की सरकार एक साल की हुई।

-
--- चुटकी---

एक साल में
खूब पड़ी
महंगाई की मार,
पर अभी भी
चार साल
बाकी हैं
मेरे यार।

Friday, 21 May, 2010

कहानी इस बार जरा लम्बी है

माननीय आई पी एस ........ जी नमस्कार। आप ज्ञानवान और बुद्धिमान हैं तभी तो आई पी एस हैं। छोटी उम्र में बड़ी सफलता मिलने पर थोड़ा बहुत अहंकार तो आ ही जाता है। अहंकार आते ही विवेक इन्सान के बस में नहीं रहता। हो सकता है यहाँ लिखे गए शब्द आपके व्यक्तित्व के अनुरूप ना लगे लेकिन क्या करें आपकी और मेरी मुलाकात ही ऐसे समय हुई जब आपके साथ आपका विवेक नजर नहीं आया। जिस समय मैने आपसे मिलने की अभिलाषा की उस समय आपने कुछ समय पहले गिरफ्तार किये व्यक्ति को अपने सामने अलफ नंगा खड़ा कर रखा था। मुझे किसी ने बताया नहीं,थाने में खुद देखा। आपने और आपके शागिर्द एक पुलिस वाले ने ऑफिस का दरवाजा बंद कर पर्दा लगा ये पक्का इंतजाम किया था कि आपके अलावा उसे कोई और ना देखे। लेकिन ऑफिस में चलने वाले पंखे के कारण सारा कबाड़ा हो गया। मैने भी उसको देख लिया। पता नहीं कानून की कौनसी धारा के तहत आपने उसको नंगा किया? साहब जी, आपने यहाँ तक आते आते बहुत सा ज्ञान अर्जित किया है,बहुत मोटी-मोटी हिंदी अंग्रेजी की किताबें पढ़ी हैं। क्या किसी किताब में ये ज़िक्र है कि अंग्रेजों के राज में किसी अंग्रेज अफसर ने किसी हिन्दुस्तानी को इस प्रकार से नंगा किया हो। कहीं तालिबान का राज भी रहा है,उनके बारे में भी ऐसा पढ़ने या सुनने में नहीं आया। लादेन का भी सिक्का चलता है मगर ये खबर तो नहीं आई कि वह अपने मुलजिमो को अपने सामने नंगा कर देता है। शायर रवीन्द्र कृष्ण मजबूर कहते हैं कि हट के दिया,हट के किया याद रहता है। इसलिए आँखों में अब भी वह बसा हुआ है जो ४५ घंटे पहले देखा था। क्योंकि वह हट के था। मुलजिम को अपने सामने नंगा करने का आपका तर्क भी हट के है। तब आपने कहा था कि ऐसा करने से मुलजिम दुबारा अपराध करने से डरता है। वह तो थाने में महिला सिपाही भी थी इस कारण से उसको घुमाया नहीं। साहब जी, आपको याद होगा, आपने कहा था कि आप कभी कभी नंगे मुलजिम की अपने मोबाइल फोन से तस्वीर भी ले लेते हैं। ताकि उसको यह कहकर डराया जा सके कि अगर दुबारा अपराध किया तो फोटो घर वालों को दिखा देंगे। मुझे याद है इसके बाद आपने ये कहा, किन्तु अभी तक ऐसा किया नहीं है। मैं फोटो डीलिट कर देता हूँ।
साहब जी, चूँकि ज्ञान, बुद्धि और संस्कार में हम आपका मुकाबला नहीं कर सकते इस वजह से ये तो नहीं जानते की आपने जो किया वह सही है या गलत हाँ इतना जरुर पता है कि किसी को किसी के सामने नंगा कर देने से बड़ी जलालत उस आदमी के लिए तो हो ही नहीं सकती। भारतीय संस्कृति में तो नंगा नहाना भी पाप है,किसी के सामने नंगा होना या किसी को अपने सामने नंगा होने के लिए मजबूर करना तो हट के है। आज आप आई पी एस हैं, वक्त आपके साथ है। जो करोगे सब कानूनन सही कहलायेगा। कल का क्या पता । वक्त किसी दूसरे के पास जा सकता है। मुलजिमो को दुबारा अपराध करने से रोकने के लिए बहुत कुछ है। आपकी फाइल मजबूत हो तो अपराधी सजा से बच ही नहीं सकता। किन्तु आपका तो अपराध समाप्त करवाने का नजरिया ही हट के है। ऐसे में किसी और कानून की तो जरुरत ही नहीं। आज आप उस पोजीशन में हैं जहाँ आप पर कोई पाबन्दी नहीं। कानून! कानून तो वही है जो आप कहें और जो आप करें। किस की मजाल जो आपके हुकम की पालना में जय हिंद ना कहे। मजबूर के ही शब्दों में "कहने को तो सब कुछ कह डाला,कुछ कहते हैं कुछ कह नहीं सकते।" आप मुझे अपना तो मान ही नहीं सकते। इसलिए आपका गोविंद गोयल लिखना तो ठीक नहीं।
चुनांचे केवल -गोविंद गोयल
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यह श्रीगंगानगर में नियुक्त एक आई पी एस को समर्पित है।

Thursday, 20 May, 2010

अँधेरा है,रोशनी नहीं है


अँधेरे का अपना
कोई
अस्तित्व नहीं है,
बस,
रोशनी नहीं है
इसलिए अँधेरा है,
वरना तो
जिधर देखो
उधर
सवेरा ही सवेरा है।

Wednesday, 19 May, 2010

तुम क्या हो


मैं नहीं जानता
तुम क्या हो और
क्या बनना चाहते हो,
लेकिन तुम से
इतना अवश्य कहूँगा
तुम जो हो वही रहो
वो बनने की कोशिश
मत करो
जो तुम नहीं हो,
कहीं ऐसा ना हो कि
भविष्य का कोई झोंका
तुम्हारे वर्तमान अस्तित्व
कि मिटा दे,और
बाद में तुम
अपने अतीत को
याद करके अपनी
करनी पर पछताते रहो।

Saturday, 15 May, 2010

कौन बताएगा जात

---- चुटकी----

ना
बनी नहीं
ये बात,
जनगणना में
कौन बताएगा
नेताओ की जात।

कुछ पाने के लिए सब कुछ खोया


ठीक है कुछ पाने के लिए
कुछ ना कुछ
खोना ही पड़ता है,
मगर ये नहीं जानता था कि
मैं, कुछ पाने के लिए
इतना कुछ खो दूंगा कि
मेरे पास कुछ और पाने के लिए
कुछ भी तो नहीं बचेगा,
और मैं थोडा सा कुछ
पाने के लिए
अपना सब कुछ खोकर
उनके चेहरों को पढता हुआ
जो मेरे पास कुछ पाने की
आस लिए आये हैं,
लेकिन मैं उनको कुछ देने की बजाए
अपनी शर्मसार पलकों को झुका
उनके सामने से
एक ओर चला जाता हूँ
किसी और से
कुछ पाने के लिए।

Friday, 14 May, 2010

एक व्यापारी ऐसा भी

---- चुटकी----

हमारी गली में
एक व्यापारी
आता है,
खुशियों के बदले

सबके
गम ले जाता है।
सौदा घाटे का
करता है,
मगर खाते में
मुनाफा दिखाता है,

Thursday, 13 May, 2010

तुम्हारी किताबों की किस्मत

मुझसे अच्छी है तुम्हारी इन
किताबों की किस्मत
जिन्हें हर रोज तुम
अपने सीने से लगाती हो,
मेरे बालों से भी
अधिक खुशनसीब हैं
तुम्हारी किताबों के पन्ने
जिन्हें तुम हर रोज
प्यार से सहलाती हो,
मेरी रातों से भी हसीं हैं
तेरी इन किताबों की रातें
जिन्हें तुम अपने
पास सुलाती हो,
इतनी खुशनसीबी देखकर
तुम्हारी इन किताबों की
मेरी आँखे सुबह शाम
बार बार बस रोती हैं,
क्योंकि हर नए साल
तुम्हारे सीने से लगी
एक नई किताब होती है,
और वो पुरानी किताब
पड़ी रहती है
अलमारी में एक तरफ
गोविंद की तरह
इस उम्मीद के साथ कि
एक बार फिर उठाकर
अपने सीने से लगा लो
शायद तुम उस किताब को ।

Wednesday, 12 May, 2010

साथी तू बिछड़ गया,तोड़ी दोस्ती

आज एक ऐसा काम करना पड़ा जो मैं समझता था कि मुझे नहीं करना पड़ेगा।तीस साल पुराने मित्र को अपने कंधे पर वहां सदा के लिए छोड़ आया जहाँ जाना कोई नहीं चाहता लेकिन जाना सबको पड़ेगा। बात १९८० के आस पास की है।हरी किशन अग्रवाल उम्र में मुझसे कोई पांच साल छोटा था। दोस्ती हुई, ना जाने कैसे हमारे ग्रुप में उसका नाम एक्स्ट्रा प्लयेर हो गया। इंजीनियर बनना चाहता था, मगर सफलतम कारोबारी बन गया। बीज के कारोबार में उसने वह तरक्की की जो लोग कई दशक तक नहीं कर सकते। तीस साल में कभी उसको गुस्सा करते नहीं देखा। कोई दोस्त नाराज होता तो बस मुस्कुरा कर उसकी नाराजगी दूर कर देता।१०-११ मई की रात को पंजाब में एक सड़क दुर्घटना ने उसकी जान ले ली। आज उसके दस साल के लड़के ने सफ़ेद धोती बांध कर अंतिम क्रिया करवाई तो दिल के जैसे टुकड़े टुकड़े हो गए। आँख से आंसू तो नहीं निकले लेकिन रोम रोम अन्दर से रो रहा था। इसकी तो कल्पना ही नहीं की थी कि ऐसा देखना पड़ेगा। उम्र तो मेरी अधिक थी चला वह गया। उसकी मौत के समाचार से लेकर अब तक आँखों में बस उसी और उसीके साथ बिताये पलों का स्लाइड शो चल रहा है। हालाँकि वह हमारे ग्रुप का एक्स्ट्रा प्लयेर था, इसके बावजूद वह अपनी इनिंग खेल कर चला गया। इनिंग भी शानदार,जानदार दमदार।
एक बार मैंने उसके घर फोन किया, उसकी मम्मी ने फ़ोन उठाया। मैंने कहा,आंटी हरी से बात करवाना। आंटी ने कहा-हरी तो गोविंद के साथ फिल्म देखने गया है। मैंने बताया कि मैं गोविंद ही बोल रहा हूँ। तब आंटी को गुस्सा आया और मुझे हंसी। शाम को जनाब मिले, उससे कहा भई तूने फिल्म जाना था तो मुझे बता तो देता ताकि तेरा झूठ सच बना रहता। आज भी यह बात हम लोग भूले नहीं हैं। मगर अब वह नहीं जिसके साथ इस बात को लेकर चुहल बाजी किया करते थे। उसके दो मासूम लड़कों को देखने की हिम्मत नहीं हुई, उनसे बात करने का हौसला तो होते होते ही होगा।

Sunday, 9 May, 2010

माँ सा कोई नहीं


माँ! क्या है माँ? कौन होती है माँ? कैसी होती है माँ? इन प्रश्नों के उतर हर किसी ने अपनी समझ से दिए है। कोई कहता है कि माँ एक सीप है जो अपनी संतान के लाखो रहस्य सीने में छुपा लेती है। माँ ममता की अनमोल दास्ताँ है। जो हर दिल पर अंकित है। भगवान कहता है कि माँ मेरी ओर से मूल्यवान और दुर्लभ उपहार है। इसके कदमो में स्वर्ग है। मै भी इसके आगे नत मस्तक हूँ । हर संतान को माँ की ममता नसीब है।
माँ वो है जिसने नो माह गर्भ में रखकर हमे मानव का रूप दिया। जिसने पंचतत्व से बने शरीर में जान डाली। जिसने दूध पिलाकर हमे बड़ा किया है। हमारी हर गलती पर हमे समझाया है। हमने चाहे उसे दुःख दिया पर उसने हमे हमेशा सुख दिया। हमारे दुखो को उसने अपनी खातिर मांग लिया। वो हमारी प्रथम गुरु बनी। हमे बोलना सिखाया। हमे संस्कार दिए, संसार में जीने लायक बनाया। कहानी, लोरी सुनकर हमे ज्ञान दिया। माँ की महिमा को हम शब्दों में बयान नहीं कर सकते। उसने हमे इतने उपहार दिए जिसकी गिनती मुश्किल है। हमे व्यंजन देकर खुद रुखा सुखा खाया।
जिस व्यक्ति को जीवन में माँ का प्यार मिले आशीर्वाद मिले वो किस्मत वाले होते है। माँ के बारे में लिखे तो शब्द कम पद जाते है। कितना भी लिख ले लगता है कि अभी तो कुछ लिखा ही नहीं। उसकी सहनशीलता, ममता , प्यार, दुलार, दया, तपस्या, अनुराग, वात्सल्य, स्नेह, संस्कार, के बारे में तो हम लिख ही नहीं पाए। शायद कभी लिख भी नहीं पाएंगे। क्योंकि इन शब्दों को न तो परिभाषित किया जा सकता है और न ही इनका वर्णन किया जा सकता है। माँ से जुड़े ये सारे शब्द माँ के बारे में सिर्फ एक ही बिंदु बता पते है। माँ शब्द फिर भी अनसुलझा रह जाता है। जिस शब्द की व्याख्या भगवान भी न कर सका, उस शब्द की व्याख्या करने की कोशिश हमे बेकार मालूम पड़ती है। हम तो सिर्फ उस माँ के चरणों में शत शत प्रणाम करते है। हम उसे कुछ और तो डे नहीं सकते सिर्फ मदर्स डे के रूप में अपने साल का एक दिन उसे जरुर डे सकते है। अपनी कृतज्ञता माँ को प्रकट कर सकते है। मदर्स डे पर माँ को हमारा कोटि कोटि प्रणाम। अभी भी एसा लग रहा है मानो कुछ लिखा ही नहीं। माँ के बारे में लिखने के लिए शब्द ही नहीं। असंख्य शब्दों का ज्ञाता भी माँ के बारे में लिखते समय शब्द विहीन सा हो जाता है। अंत में सिर्फ इतना ही-जिंदगी में खुशिया भर देती है माँ , हमारे ख्वाबो को हकीकत बनती है माँ, बेनूर जिंदगी कि महकती है माँ, पथरीले पथ पर चलना सिखाती है माँ।
मेरे पापा के अस्पाल में व्यस्त होने के कारन आज मुझे इस पोस्ट पर लिखने का मौका मिला है। मै स्वाति अग्रवाल गोविंद गोयल की छोटी बेटी हूँ ।

Thursday, 6 May, 2010

----चुटकी----

हमारे धर्मनिरपेक्ष
नेताओं को
आदाब,
कसाब भी
बन गया
अफजल की भांति
देश का दामाद।

जीवन का सार

---- चुटकी----

सर्दी
प्रचंड गर्मी
आंधी
फिर
बरखा बहार,
मानो ना मानो
यही है
हमारे

जीवन का सार।

Wednesday, 5 May, 2010

----चुटकी----

हमारे नेता हैं
बच्चो
बड़े कमाल के,
अफजल की भांति
कसाब को
रखेंगें
संभाल के ।

Tuesday, 4 May, 2010

अब कसाब

---- चुटकी---

पहले
अफजल
अब कसाब,
आप इनका
क्या करोगे
जनाब।

Thursday, 29 April, 2010

पार्क में एक सुहानी सुबह की कहानी

गर्मी के दिनों की सुहानी सुबह के समय पार्क में काफी रौनक है। एक पत्रकार का आगमन। किसी ने कोई परवाह नहीं की। पांच सात जनों ने दूर से हाय हैल्लो किया बस। उसके मित्र कुछ क्षण उसके पास रुके। वहीँ हवा खोरी करने एक बड़ा सरकारी अफसर आ गया। बहुत से लोग घूमना छोड़ कर उसके आस पास आ गये। जो ज्यादा चालाक थे उन्होंने अपना परिचय भी दे दिया। कुछ लोग उसके साथ साथ सैर करने लगे। अभी अफसर गया भी नहीं था कि सत्तारूढ़ पार्टी का नेता आ गया। उसके आते ही तो अफसर सहित बड़ी संख्या में लोग उसके करीब आ गये। उसका जलवा अफसर से अधिक लगा। लेकिन पता नहीं आज क्या बात थी कि अभी नेता जी का जलवा पूरे शबाब पर आया भी नहीं था कि सरकार के एक मंत्री का निजी सचिव पार्क में पहुँच गया। उसके आते ही नेता जी का जलवा ठंडा हो गया। जो लोग नेता जी की हाँ में हाँ मिला रहे थे वे निजी सचिव से दुःख सुख की बात करने लगे। अफसर कहाँ जाता वह तो उनके निकट ही था। मंत्री की कृपा से तो टिका हुआ था। लेकिन ये क्या, मंत्री जी भी वहीँ आ गये। बस अब तो पार्क में सैर को आये लोगों ने अपने परिचितों को भी फोन करके बुला लिया। मंत्री जी का एक समान दरबार लग गया। सब मंत्री के आगे पीछे। दूर बैठ के नेता, अफसर,निजी सचिव के जलवे देखने वाले पत्रकार को भी मंत्री के न केवल निकट आना पड़ा बल्कि फोन करके फोटोग्राफर को बुलाना पड़ा ताकि अख़बार में फोटो सहित खबर लग सके। वही हुआ भी। अगले दिन के अख़बार में मंत्री जी की संवेदनशीलता की जानदार शानदार खबर छपी,फोटो के साथ। ये कोई कहानी नहीं वह है जो आजकल होता है। उन्ही पत्रकारों को आम जन की तवज्जो मिलती है जिसके पत्रकारिता से हटकर सामाजिक सम्बन्ध हों। वरना तो कहीं कोई नहीं पूछता। लोकतंत्र का चौथा खम्बा कहलाने वाला यह मीडिया लोकतंत्र के ठेकेदारों के आगे पीछे घूमता है। ऐसा करना उसकी मज़बूरी है या नहीं ये तो बड़े पत्रकार जाने। लेकिन सच तो यही है। आम आदमी से लेकर पूरा सिस्टम मंत्रियों के इर्द गिर्द रहता है। मंत्री नहीं होता तो नेता या उनका सचिव। वह भी हाथ नहीं आये तो कोई कार्यकर्त्ता ही सही। अब ऐसे में ताकतवर कौन है इसका फैसला कम से कम हम तो नहीं कर सकते।