Saturday 14 June 2014

समय पंख लगा उड़ेगा और नाम भूल जाएगा


श्रीगंगानगर-धरती से प्रस्थान करने के बाद भी उसका नाम उसके गांव,शहर,देश में जिन्दा रहे. इसके लिए इंसान अनेक जतन करता है.सद कर्म में लगता है. . साधन हो तो धर्मशाला,मंदिर,स्कूल जैसी संस्थाएं बना समाज को अर्पित करता है. जैसा जिसका सामर्थ्य,सोच वह उसके अनुरूप कदम उठाता है. पीढ़ियों तक उनका नाम अमर रहता है. जमाना बदल रहा है. अनेक ऐसे हैं जिनके नाम रहेंगे पीढ़ियों तक तो बहुत सारे ऐसे भी जिनके नाम खुद उनके पुत्रों की वजह से मिट जाएगानहीं जी, पुत्र कुपात्र नहीं है. सुपात्र होने के बावजूद ऐसा होगा. कोई ईलाज नहीं है. सोच बदल गई जनाब. चाव से बेटा जना.लाड से पाला. उम्मीदों से बढ़ा किया. सपने देखे और दिखाए. समय इतनी जल्दी बीता कि पता ही नहीं चला कि कब पढाई पूरी हुई और कब बेटा विदेश में नौकरी जा अलग.घर परिवार में आनंद,उत्साह,उमंग की कोई कमी नहीं. हो भी कैसे बेटी की शादी बढ़िया घर में हुई और बेटा विदेश में नौकरी करता है. समय तो जैसे भागने लगा. माँ-बाप भी विदेश हो आए. बेटे के लिए बहु भी विदेश में ही मिल गई. बेटा विदेश में रहता है तो बहु इधर क्या करती! समय पंख लगा उड़ने लगा. दादा -दादी बनने के सपने आने लगे. पोत-पोती की तोतली बातें उनके बिना ही मन सोच कर खुश होने लगा.समय क्यों रुकने लगा. खबर मिली बहु उम्मीद से है. माँ ने फोन,फेसबुक के माध्यम से निर्देश,आदेश देने शुरू कर दिए. ये करना ये नहीं करना. समय तो भाग ही रहा था. जापे के समय बेटे ने माता-पिता दोनों को फिर विदेश बुला लिया.पोता हुआ तो ख़ुशी का ठिकाना ना रहा. तीन चार महीने रहे दोनों. जब पोता बड़ा हो गया तो उधर उनके लिए कोई काम नहीं था. अपने देश आ गए माँ-बाप. खुश विदेश घूम ली. पोता खिला लिया गोद में. वह पोता जो विदेश में पैदा हुआ.वहीं का होकर रहेगा. जिसे इधर देश के घर में पैदा किया वही इधर का नहीं हुआ तो वह कैसे संभव है जो विदेश का है. वह तो उधर का नागरिक है. जब से आए हैं तब से दोनों विदेश के गीत गाते हैं. पोते की बात करते हैं. बेटा ये. बहु वो. पोता के तो कहने ही क्या. गली,मोहल्ले रिश्तेदारों में बल्ले बल्ले कर दी बेटे बहु की. पर अंदर सन्नाटा. समय जैसे ठहर गया अब. ना आंगन में पोते की किलकारियां ना बहु की पायल की छम छम. बस दो बुढा चुके मियां बीवी.समय पास नहीं होता. उम्र बढ़ी तो दर्द बढ़ने लगा.रोएं भी तो किसके आगे! दर्द सुनाएं भी तो किसे! उनको जिनको चटकारे लेकर विदेश की बातें सुना चुके. बहु बेटे की दरिया दिली के किस्से बता चुके. उनको जिनको पोते की सूरत अंग्रेजों जैसी बता कर ख़ुशी प्रकट की थी. वो जुबां दर्द का बयां कैसे करे जिसने विदेश के कसीदे पढ़ें हों. मन के दर्द का तो ईलाज भी नहीं कोई. मन की बीमारी कैसे कटे! यह तो प्राणों के साथ ही जाएगी.प्राणों के साथ ही मिट जाएगा उनका नाम. कोई नहीं होगा उनका नाम लेने वाला. किया कराया सब मिट्टी. अब जब सोच यही है तो नाम रहे भी कैसे. एक बेटा ,एक बेटी. बेटी ससुराल है. इधर आए कैसे.जिन बेटे पोतों से नाम आगे चलते हैं वे हैं नहीं इधर. बस काम ख़त्म. एक दो पीढ़ी बाद कौन जानेगा कि कोई था जिसका बेटा विदेश में था. उसका पोते की सूरत अंग्रेजों जैसी थी.