Sunday, 27 February, 2011

सौ बहाने ,सौ अफसाने

बेशक, शहर की
चर्चाओं में
तेरे-मेरे
सौ अफसाने हैं,
पर मिलने
के
भी

तो

मेरी जां
सौ बहाने हैं

Saturday, 26 February, 2011

राजनेताओ से सीख मिलना


आज के राजनीतिज्ञों से कुछ भी नहीं सीखा जा सकता। वे किसी के आदर्श नहीं हो सकते। जनता,समाज को देने के लिए उनकी झोली में आश्वासनों के आलावा कुछ नहीं है। यह कहना और सुनना दोनों गलत है। उनको शान में गुस्ताखी है। धरती पर जो भी जीव या निर्जीव हैं ,उनमे से शायद ही कोई हो जिससे कोई कुछ सीख या प्राप्त नहीं कर सकता। ये अलग बात है कि हम उसके बारे में जानते ना हों। जब सबसे सीखा जा सकता है तो फिर राजनेता से क्यों नहीं! ये तो हमारे अपने हैं। हम इनसे ले सकते हैं सब से मिलने की कला। कट्टर से कट्टर विरोधी से भी हाथ,गले मिलने का दर्शन। राजनीतिक दुश्मन से हंस हंस के बात करने की अदा। एक दूसरे की जड़ काटने वालों का आपस में यूँ मिलना जैसे उनसे पक्की दोस्ती किसी में नहीं होगी। पूर्व मंत्री राधेश्याम गंगानगर की पोती की शादी में इसी प्रकार के सीन देखते हुए अन्दर ही अन्दर कई बार मुस्कुराने का मौका मिला। अचरज भी हुआ कि कार्यकर्त्ता तो एक दूसरे के प्रति गांठ बाँध लेते हैं और उनके नेता सामाजिक रिश्तों का निर्वहन करते हैं। यही तो सीखने की बात है। यह कोई छोटी बात नहीं सीखने की। बहुत बड़ी है। जब नेता सबको बुलाते हैं। सबके जातेहैं। कार्यकर्त्ता भी करें ऐसा। उनको क्या परेशानी है। नेता से कार्यकर्त्ता नहीं होते । कार्यकर्ताओं से नेता बनते हैं।
वैसे राजनीतिक दृष्टी से देखें तो राधेश्याम गंगानगर को बीजेपी वालों ने अधिक अहमियत नहीं दी। कोई बड़ा बीजेपी नेता उनके समारोह में नहीं आया। आने की बात तो वसुंधरा राजे सिंधिया के भी थी। ये भी सुना जा रहा था कि वसुंधरा राजे सिंधिया के दाएं -बाएं राजेन्द्र सिंह राठौड़ और दिगम्बर सिंह का आना तो तय ही है। मैडम वसुंधरा राजे ने तो क्या आना था दाएं बाएं भी कहीं नजर नहीं आये। हाँ , यूँ उनके यहाँ मंत्री,पूर्व मंत्री,विधायक तो आये ही।

Friday, 25 February, 2011

मौन तोड़ेगा कौन


एक क्षण में
एक बार नहीं
कई बार
मोबाइल फोन
टटोलता हूँ, फिर
अपने आप से
बोलता हूँ
किसका आएगा
किसके पास जायेगा
फोन,
एक एक करके
सब तो चले गए
बात करने वाला
रहा है कौन?
सबके सामने है
अहम् की दीवार
अपना मौन
तोड़ेगा कौन!


Wednesday, 23 February, 2011

कलेक्टर की जनसुनवाई

श्रीगंगानगर--कलेक्टर मैडम की जनसुनवाईभीड़ इतनी की मैडम दिखाई नहीं दे रहीउनके कहे शब्द कान में पड़ेंगे यह सोचना बेकार थाइसके लिए इंतजार करना पड़ाजिनकी सुनवाई हुई वे चले गएअब मैडम दिख भी रहीं थी और उनके कहे शब्द कानों तक पहुँच भी रहे थेनगर का एक प्रतिष्ठित आदमी आवेदन लेकर मैडम के समक्ष आयाउसने एक सरकारी कर्मचारी की शिकायत की-मैडम वह कभी ऑफिस में नहीं आताउसके अधिकारी को भी बताया मगर कुछ नहीं हुआमैडम बोली, आपको उस से क्या तकलीफ है? मुझ से उसका कान मरोड़ कर अपना काम निकलवाना चाहते होखैर, मैडम ने आवेदन रख लियाकेसरीसिंहपुर से दो तीन लोग थेएक बोला,मैडम गैस एजेंसी वाले ने इसके साथ मारपीट कीएफआईआर करवाई क्या? मैडम ने पूछामैडम कहने लगी, सरकारी एजेंसी तो है नहींवैसे भी गैस एजेंसी वाले जनता से बहुत अधिक दुखी हैंकिसी दिन छोड़ कर चले जायेंगेमैडम ने डीएस से पता करवाने का आश्वासन देकर आवेदन ले लियाएक पुराना कांग्रेसी किन्ही लोगों के साथ आयावह उनकी पीड़ा बताने लगा तो मैडम ने उस से परिचय पूछ लिया और फिर सीधे पीड़ित से मुखातिब हो गईकांग्रेसी ने बताया कि हर कलेक्टर कार्यवाही की कहता हैहुआ आज तक कुछ नहींमैडम ने टिप्पणी के रूप में कुछ लाइन कहीहमें [ पी आर भी वहीँ खड़े थे ] हंसी आईमेरी नजर में वह यहाँ लिखना गरिमा के अनुकूल नहींएक बुजुर्ग कांग्रेसी को देख मैडम बोली, आप हर जनसुनवाई के समय होते होआखिर आप हो कौन? बुजुर्ग ने अपने बारे में बताया और अतिक्रमण तोड़ने का आग्रह के साथ कहा, नाजायज कब्जे तोडना जायज नहींमैम ने कहा, अतिक्रमण तो नाजायज ही होते हैंइस प्रकार से लगभग पचास व्यक्तियों की दुःख,तकलीफ,पीड़ा से कलेक्टर मैडम रूबरू हुईंये तो थी कलेक्टर की मक्खनबाजीअब असली बात
जिला कलेक्टरअर्थात ,जिले का मालिकसरकार का जिले में सबसे बड़ा प्रतिनिधिजिस से मंत्री तक को काम पड़ता हैउसके पास कोई कब जायेगा? तभी ना जब किसी को लगेगा कि अब तो बस कलेक्टर पर ही उम्मीद हैआने वाले सच्चे भी होंगे,झूठे भीइसका पता लगा उचित कार्यवाही करना कलेक्टर का काम हैएक तरफ तो कलेक्टर सरकारी दफ्तरों में छापे मार कर यह निरीक्षण करते हैं कि कितने कर्मचारी उपस्थित हैंदूसरी तरफ कलेक्टर उस शहरी को निरुत्साहित कर रहीं हैं जो लिखित में उनको बता रहा है कि फलां कर्मचारी कभी आता ही नहींडीएस गैस उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए नए नए फंडे इस्तेमाल करते हैं और कलेक्टर मैडम जनसुनवाई में ये कहती हैं कि गैस एजेंसी वाले लोगों से दुखी हैंकलेक्टर मैडम गलत हैंसीधे सीधे ये कहने की हिम्मत तो नहीं हैंलेकिन अगर वे अपने पास फरियाद लेकर आये किसी इन्सान के सामने ही दूसरे का पक्ष लेंगी तो फिर उनके पास कोई जायेगा ही क्यों? वे जाँच करवाएंपता लगवाएंअगर शिकायत करने वाला गलत है तो उसको चेतावनी देंउसके विरुद्ध कार्यवाही करेंउसको सबक सिखाएं ताकि वह आइन्दा किसी की झूठी शिकायत कर कलेक्टर जैसे अधिकारी का समय ना ख़राब करेशिकायत करते ही अपना फैसला सुना देना तो उसके साथ अन्याय है जो चल कर आपके दरबार में आया है कलेक्टर मैडमरामसनेहीलाल शर्मा"यायावार" का शेर है--हमने शीशे के घरोंदे पर अभी चन्दन मला है ,और उनके हाथ में पत्थर नहीं पूरी शिला है

Tuesday, 22 February, 2011

क्रांति की बात बस! और कुछ नहीं

श्रीगंगानगर --मिश्र,लीबिया सहित अरब देशों की जनक्रांति की ख़बरें देख सुन पढ़े लिखे लोगों के दिल में ये उम्मीद जगी है कि यहाँ भी ऐसा ही कुछ हो सकता हैनहीं होगाऐसा कुछ होने वाला नहींसम्पूर्ण क्रांति तो क्या क्रांति भी नहीं होने वालीकिस के दिल में है ऐसी चिंगारी जो शोला बनकर पहले खुद जलाने को आगे आएजिस देश का प्रधानमंत्री भावहीन चेहरा लेकर बार बार ये कहे कि वह मजबूर हैजिस देश की जनता को प्याज,दाल, रोटी का जुगाड़ करने के लिए पूरा दिन खपाना पड़ता होहजार नहीं लाखों करोड़ों के घोटाले होते होआम आदमी की शासन ,प्रशासन में सुनवाई का सवाल ही पैदा ना होता होवोट बैंक देश के दुश्मनों से असल में किये जाने वाले बरताव को प्रभावित करता होनेताओं से विश्वास उठ गया होसभी राजनीतिक दल, सत्ता और विपक्ष के नेताओं का नाता घी-खिचड़ी होऔर भी बहुत कुछ ऐसा है जो यह बताता है कि देश के अनेक हिस्से तो ऐसे हैं जहाँ यह आभास ही नहीं होता कि वहां सरकार नाम की कोई चीज हैकम शब्दों में सच्ची बात ये कि किसी को ये समझ नहीं रहा कि देश में हो क्या रहा है? किसकी सरकार है? कौन चला रहा है? जवाबदेही किस पर है? किस के लिए किसको जिम्मेदार ठहराया जाये? जिस से बात करो वही पल्ला झाड कर यह कह देता है कि मैं तो बेकसूर हूँ! मैं मजबूर हूँ! अरब देशो में के हालत भी ऐसे ही रहे होंगेतभी वहां के लोग अपने काम छोड़कर सड़कों पर आए और दुर्दशा के दोषी नेताओं को चलता कर दियायहाँ ऐसा नहीं हो सकताबात नकारात्मक सोच या निराश होने की नहीं हैक्रांति जैसी जज्बा उन लोगों में होता है जिनके अन्दर कोई चिंगारी होफिर उसमे कोई फूंक मारेतब कहीं क्रांति की सूरत उभरती हैहम ये नहीं कहते कि यहाँ के लोगों के दिलों में चिंगारी नहीं हैहै, मगर वह शोला बनने से पहले ही बुझा दी जाती हैयहाँ के राजनीतिक दलों के संचालक जनता से अधिक समझदार हैंउन्होंने देश में ऐसा सिस्टम बनाया कि किसी के अन्दर की चिंगारी शोला बनकर क्रांति में तब्दील ना होये सब जनता की आँखों के सामने होता हैइसमें सबकी भागीदारी हैइस सिस्टम का नाम है चुनावयहाँ की जनता पांच साल में अपने अन्दर की चिंगारी को मतदान बूथ पर ठप्पा लगाते हुए, बटन दबाते हुए कई बार बुझाती हैबूथ से हर कोई यह सोच कर ख़ुशी ख़ुशी बाहर आता है कि अब सब ठीक हो जायेगाकिन्तु नहीं होतावह फिर आहें भरता हैहर रोज तिल तिल मरता हैबेबसी पर रोता हैफिर कोई चिंगारी उसके अन्दर जन्म लेती हैइस बीच फिर कोई चुनाव जाता हैवही बूथवही मशीनजो चिंगारी बनी वह फिर से बुझ गईश्रीगंगानगर में देख लो२००८ में विधानसभा चुनाव२००९ में पहले लोकसभा और फिर नगर परिषद के चुनाव२०१० में पंचायत चुनावइतने से समय में जनता को अपने अन्दर की भड़ास तीन बार निकालने का मौका मिल गयाभड़ास निकल गई तो चिंगारी कहाँ से आएगीचिंगारी नहीं तो शोला नहींशोला नहीं तो आग और क्रांति की बात केवल दिल को बहलाने के लिए एक अच्छे ख्याल के अलावा कुछ भी नहीं हैवैसे भी हम तो डरे सहमे लोग हैंजो हर बात पर यही कह कर अपना फ़र्ज़ पूरा कर लेता ही कि कोई नृप होए हमें क्या हानि! सब अपने नफे नुकसान तक सीमित हैंजब सबका यही हाल है, यही सोच है तो फिर क्रांति का तो सवाल ही पैदा नहीं होताक्रांति तो तब जन्म लेती है जब जन जन को देश की फ़िक्र हो

Friday, 18 February, 2011

सोनिया गाँधी को समझाओ

--- चुटकी---


मजबूर नहीं
मजबूत
प्रधानमंत्री लाओ,
अरे! कोई तो
ये बात
सोनिया को समझाओ।

Thursday, 17 February, 2011

मनमोहन सिंह नहीं जनता मजबूर है

श्रीगंगानगर- "पापा इतने बिजी होते हैं कि हमें उनसे मिलने के लिए सुबह छः बजे उनके पास पहुंचना पड़ता है। उसके बाद उनसे दिन भर मुलाकात नहीं हो सकती।" यह बात देश के मजबूर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बेटी दमन सिंह ने जयपुर में एक पत्रकार से कही थी। ये बात यहाँ लिखना इसलिए जरुरी हो गया कि मीडिया प्रधानमंत्री की मज़बूरी को प्रेस कांफ्रेंस बता रहा है। जबकि ऐसा है नहीं। वह तो तरस खाकर प्रधानमंत्री ने संपादकों को ओब्लाइज कर दिया अपने साथ बैठाकर। वरना उनके पास समय ही कहाँ है देश की बात सुनने का। मनमोहन सिंह ने तो दिल खोलकर कह दिया कि मैं मजबूर हूँ। उन्होंने सौ मजबूरियां गिना दी। संपादक तो यह भी नहीं कह सके। ऐसे मजबूर प्रधानमंत्री के साथ बात करने की उनकी पता नहीं क्या मज़बूरी थी। संसार के सबसे शानदार,दमदार,जानदार लोकतंत्र के लिए विख्यात भारत के प्रधानमंत्री बार बार ये कहे कि वो मजबूर हैं, मजबूर हैं। इस से ज्यादा बड़ी बात और क्या हो सकती है। ये तो सब जानते और समझते हैं कि जब समाज में कोई बार बार ये कहता है कि मैं मजबूर हूँ तो हर कोई आपको यही कहता सुनाई देगा--चलो छोड़ो यार बेचारा मजबूर है। देश का आम आदमी तो आज मजबूर है किन्तु ताकतवर देश का प्रधानमंत्री ये कहे कि वो मजबूर है तो फिर कोई क्या कर सकता है। दिमाग तय नहीं कर पा रहा कि मजबूर प्रधानमंत्री की इस मज़बूरी पर हँसे,रोए,अफ़सोस करे या ईश्वर से उनकी मज़बूरी दूर करने की प्रार्थना करे। देश इस बात पर विचार तो करे कि प्रधानमंत्री की क्या मज़बूरी हो सकती है। जिस देश का प्रधानमंत्री ही मजबूर है तो उस देश का क्या होगा? कौन उसकी बात को मानेगा,सम्मान करेगा,गंभीरता से लेगा। मजबूर प्रधानमंत्री से बारी बारी से एक सवाल पूछ कर या अपना परिचय दे कर देश के मीडिया का प्रतिनिधित्व करने वाले टी वी चैनलों के संपादकों/मालिक को कुछ कहना सूरज को दीपक दिखाना है। कैसी विडम्बना है कि प्रधानमंत्री अपने आप को मजबूर बता कर एक समान रहम की भीख मांग रहा है। "हे! संपादकों मेरी मज़बूरी समझो। मेरा साथ दो। मैंने मक्खन नहीं खाया। मैं तो मजबूर हूँ मक्खन खा ही नहीं सकता। कोई खा रहा है तो उसको रोक नहीं सकता। क्योंकि मैं मजबूर हूँ। चूँकि मैं मजबूर हूँ इसलिए दया,रहम को हकदार हूँ।"

मनमोहन सिंह जी आप तो क्या मजबूर हैं , मजबूर तो हम हैं जो आपको ढो रहे हैं। देश की इस से बड़ी मज़बूरी क्या होगी कि वह सब कुछ जानता है इसके बावजूद कुछ नहीं कर पा रहा। एक लाइन में यह कि हमारा दुर्भाग्य तो देखो कि हमारा प्रधानमंत्री खुद अपने आप को मजबूर बता रहा है। जिस देश का प्रधानमंत्री मजबूर हो उस देश की जनता की मज़बूरी का कोई क्या अंदाजा लगा सकता है। मजबूर के शब्द हैं-अब तुम ही कहो क्या तुमसे कहें, वो सहते हैं जो सह नहीं सकते।

Wednesday, 16 February, 2011

पी एम ही मजबूर है

--- चुटकी---

पी एम
मजबूर है,
उनका यही
सबसे बड़ा
कसूर है।
दे दो इस्तीफा
छोड़ दो पद
सोनिया का घर
कौनसा दूर है ।

Monday, 14 February, 2011

वो प्यार है

शोखियों में
घोला जाए
फूलों का शबाब
उसमे फिर

मिलाई जाए

थोड़ी सी शराब

होगा वो

नशा जो तैयार

वो प्यार है........

Sunday, 13 February, 2011

--- चुटकी---

मंदिर हमने
बना दिए
श्रद्धालुओं की
लगी कतार
,
खाली झोली
लौट गए सब
मंदिर हुए व्यापार

Saturday, 12 February, 2011

जीवन में पतझड़

---- चुटकी---

सुना है हर
पतझड़ के बाद
आता है बसंत,
पता नहीं
मेरे जीवन के
पतझड़ का
कब होगा अंत।

दोस्ती ऐसे टूटती है

Both Friends Will Think The Other Is Busy And Will Not Contact. Thinking It May Be Disturbing. As Time Passes Both Will Think Let The OTher Contact. After That each Will Think Why I Should Contact First ? .Here Your Love Will Be Converted To Hate .Finally Without Contact The Memory Becomes Weak .They Forget Each Other. So Keep In Touch With All And Pass This TO All Your Friends... . I Don`t Want To One Of This Kind. So Here I Am sending Mail To you To Say Dear
I Am Fine Here Please keep in touch with me.... Ha Ha Ha Ha ... Have a Nice Day....

Thursday, 10 February, 2011

सत्य मेव जयते! सॉरी रोंग नंबर लग गया

सच्चाई की जीत होती है। सच से बड़ा कोई नहीं। सच कभी नहीं हारता। सदा सच ही बोलो। ये वाक्य मास्टरों से लेकर घर के बड़ों से सुनते आये हैं। सद्पुरुष भी यही कहते हैं। शास्त्रों, ग्रन्थों में भी ऐसा ही लिखा हुआ है। अगर किसी ने इस सच्चाई का सामना ना किया हो तो वह चुटकियों में रूबरू हो सकता है। अशोक स्तम्भ! कौन नहीं जानता! सरकार का राज चिन्ह। संवैधानिक पदों का प्रतीक। इसके नीचे लिखा हुआ है, सत्य मेव जयते! ये हमने या आपने नहीं लिखा। सरकार ने लिखा। आज तक लिखा रहता है। भारतीय नोटों पर भी यही अंकित है। परन्तु व्यवहार में सबकुछ इसके विपरीत है। दो और दो को चार कहना अपने आप को संकट में डालना है। आप से सब कुछ नहीं तो बहुत कुछ छीना जा सकता है। यही तो हो रहा है आमीन खां के साथ। कांग्रेस कल्चर को सहज भाषा में बताना,कार्यकर्ताओं को समझाना उनके लिए परेशानी का सबब बन गया। उन्होंने उदाहरण देकर अपनी बात में वजन डाला। यही वजन अब उनसे, उनके आकाओं से सहन नहीं होगा। सरकार आजादी के बाद से जिस सत्य मेव जयते का ढिंढोरा पीट रही है वही सत्य आमीन खां के लिए चिंता का कारण बन गया। जिस सत्य को संवैधानिक पद के लिए अशोभनीय टिप्पणी बताया जा रहा है उसी संवैधानिक पद के प्रतीक अशोक स्तम्भ के नीचे हमेशा से लिखा हुआ है -सत्य मेव जयते। तो क्या यह गलत लिखा हुआ है। संवैधानिक पद सत्य मेव जयते से भी बड़ा हो गया! या इस पद पर विराजमान इन्सान के पास सत्य का सामना करने की ताकत नहीं। मुख्य सतर्कता आयुक्त भी तो संवैधानिक पद है। श्री थामस कौनसी संवैधानिकता का निर्वहन कर रहे हैं? आमीन खां का बयान सत्य है तो उनको सजा क्यों मिले! पद से वो लोग हटें जिन्होंने चरण चाटुकारिता के जरिये पद प्राप्त किये हैं। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि सच की अपनी गरिमा होती है। सच कहाँ,किसके सामने,किसके लिए,किस बारे में,कब कहना है, यह बहुत ही महत्वपूर्ण होताहै। कोई सच चारदीवारी में ही सबको अच्छा लगता है। यही सच बाहर आते ही अफसाना बनते देर नहीं लगाता। यही हुआ आमीन खां के साथ। किसने किस की रसोई में काम किया और किसने लड़की शादी में झूठे बर्तन साफ़ किये। ये सब आपसी सम्बन्धों पर निर्भर करता इन रिश्तों को महसूस किया जाता है,उजागर नहीं। क्योंकि इसको सब जानते ही होतेहैं। सहज भाषा में आमीन खां ने एक सच कहा और आज वह उनके लिए भारी पड़ गया। उनको पता होता कि मेरे साथ ऐसा होगा तो वे कभी इस बारे में कुछ नहीं कहते। वैसे आजकल सच बोलने वाले हैं ही कितने! सच सुनने वालों की संख्या भी ऐसी ही होगी। हकीकत तो ये कि सच सुनने की हिम्मत नहीं रही इसलिए बोलने वाले भी नहीं रहे। कभी किसी की जुबां से गलती से सच निकल भी जाये तो उसको निगलना मुश्किल हो जाता है। यही हुआ आमीन खां के साथ और यही हो रहा है उसके बाद। पंजाबी में किसी ने कहा है --इन्ना सच ना बोलीं कि कल्ला रह जावें, चार बन्दे छड्ड देंवी मोड्डा देण लई।

Tuesday, 8 February, 2011

हे अफसर तुम महान हो

श्रीगंगानगर-देश -विदेश के नेताओं की तरफ फैंके गए सभी जूतों को प्रणाम और मायावती की "खडाऊं" को वंदना। मुख्यमंत्री मायावती के जूते एक अफसर ने साफ़ क्या कर दिए मीडिया में हल्ला मच गया। जैसे अफसर ने राजकीय मेहमान कसाब जैसा कोई गुनाह कर दिया। उसकी मज़बूरी तो किसी को दिखाई नहीं दी। नौकरी करनी है तो ऐसा करना ही पड़ता है। सबके सामने जूते पर रुमाल या कपड़ा मार दिया तो अफसाना बन गया,क्या पता अन्दर पालिश भी करनी उसकी मज़बूरी हो। फिर अफसर ने किसी ऐरेगेरे नत्थू खेरे के जूतों के तो हाथ नहीं लगाया। अफसर का सौभाग्य है कि उसे इस युग में ऐसी महिला के जूते चमकाने का मौका मिला जो देश के दलितों की किस्मत चमकाने के लिए अवतरित हुई है। अवतार रोज रोज इस धरा पर नहीं आते। पता नहीं कितने ही सद्कर्मों के उपरांत इस अफसर को इस अलौकिक आत्मा रूपी मायावती के जूते चमकने का अवसर मिला होगा। धन्य हो गया उसका जन्म। बडभागी है उसका परिवार। भाग्यशाली हैं वे लोग जो उस अफसर को जानते हैं,उस से मिलते हैं, उसके साथ रहते हैं। मीडिया कुछ दिखाए और लिखे। हे ! अफसर आपको विचलित नहीं होना है। जब भी इस प्रकार की सेवा मिले तुरंत करना। महान आत्माओं की निष्काम सेवा, चाकरी से बढ़कर इस कलयुग में और कुछ नहीं है। ऐसी चरण चाकरी से ही तुझे इस संसार में आगे बढ़ने के ढेरों मौके मिलेंगे। अगर तू आलोचनाओं से घबरा गया, भटक गया तो कल्याण नहीं होगा। मोक्ष को तरस जायेगा। माया तो क्या किसी भिखारी के जूते भी हाथ लगाने को उपलब्ध नहीं होंगे। हे! पुलिस अधिकारी तू तो मिसाल है विनम्रता की,सेवा भावना की। पुलिस वाले तो अपने जूते साफ़ करवाने के मास्टर होते हैं। तूने एक दलित महिला के जूते साफ़ कर देश की तमाम पुलिस का सर गर्व से ऊँचा कर दिया। ये साबित कर दिया कि पुलिस कितनी कर्तव्य परायण है। हे! अफसर तूने दिखा दिया कि हम ताकतवर के जूते चमकाने में कोई जलालत महसूस नहीं करते। आज गोपी फिल्म का यह गाना सार्थक हो गया-चोर उचक्के नगर सेठ और प्रभु भगत निर्धन होंगे,जिसके हाथ में होगी लाठी भैंस वही ले जायेगा। हे!अफसर ऐसी विनम्र निष्काम सेवा को देख कर पुलिस तुझे अपना आदर्श मानेगी। हो सकता है जलोकडे किस्म के पुलिस वाले , जिनको इस सेवा के काबिल नहीं समझा गया, आपसे बैर रखे। आपके काम में बाधा डालने की की कोशिश करे। पर हे!महान पुलिस अधिकारी तुमको इनकी ओर ध्यान नहीं देना। ऐसे कलयुगी प्राणी तेरी इस अनोखी तपस्या को भंग करने का प्रयत्न कर सकते हैं। क्योंकि ये खुद तो सेवा कर नहीं सकते कोई करे तो इनके पेट में दर्द होने लगता है। ऐसे ना समझ प्राणियों के प्रति दिल में कोई भेद मत रखना। हे! अफसर अब तेरा स्थान इस सबसे से ऊपर बहुत ऊपर है। आप कोई साधारण इन्सान हो नहीं सकते। इतनी महान सेवा के लिए संसार में कोई नोबल,आस्कर होता तो वह आज आपके पास आकर गौरवान्वित हो जाता । देश की पुलिस संभव है कोई नई शुरुआत करके इतिहास में नया पन्ना जोड़े। हे ! अफसर आपके नाम, काम के बिना तो भारत का आधुनिक इतिहास पूरा ही नहीं हो सकता। उस दिन इस देश की शिक्षा में चार चाँद लग जायेंगे जब आपकी सेवा के तराने हर शिक्षण संस्था में गर्व से गए जायेंगे। मजबूर का शेर है--आदत है ज़माने कि दिल रखने की,कह दे जो साफ वो मेहरबां अच्छा।

लोकतंत्र का घाटा

प्रत्येक ऋतु के

सभी बसंत

नेताओं के खाते में ,

आदमी

मारा गया

लोकतंत्र के

इस घाटे में।

Sunday, 6 February, 2011

--चुटकी--

क्रांति की जरुरत
वहां होती है
सरकार,
जहाँ मौजूद हो
कोई सरकार।

Tuesday, 1 February, 2011

हेलमेट

श्रीगंगानगर--पुलिस जी जयहिंद!......आज आपको जयहिंद का जवाब देने का समय नहीं हैं। हो भी कैसे, सब के सब तो जनता को हेलमेट पहनाने में लगे हैं। आपने अपनी पूरी ताकत इसी काम में लगा रखी है। लगा क्या रखी है झोंक रखी है। क्योंकि आपकी नजर में शहर में होने वाले सभी अपराधों से मुक्ति पाने का हेलमेट ही एक मात्र उपाए हैं। "हेलमेट पहनाओ,अपराध घटाओ ।" यह नया नारा है। राजस्थान की पुलिस अपनी प्राथमिकता तय करती है। नगर के मिजाज के अनुसार वहां के अधिकारियों के सामने कुछ अलग प्रकार की प्राथमिकता भी हो सकती है। पुलिस जी, आपकी एक मात्र प्राथमिकता है सबको हेलमेट पहनाना। नगर में चोरी,चैन स्नेचिंग, लड़कियों से छेड़छाड़, आवारा किस्म के लोगों की सड़कों पर मनमानी ,रात को इधर-उधर जाना पड़जाये तो लुटने का भय । यह सब कुछ उस दिन गधे के सर से सींग की तरह गायब हो जायेगा जब सब हेलमेट में नजर आयेंगे। साइकल पर आवाजाही करने वाले हो या पैदल चलने वाला सबको हेलमेट जरुरी करना होगा। पता नहीं कब इनमे से कोई सड़क पर दुर्घटना का शिकार हो जाये। सबकी सुरक्षा तो जरुरी है। वैसे पुलिस जी आपको डरते डरते बता दूँ कि आजतक शहर में एक भी दुर्घटना ऐसी नहीं हुई जो यह कहती हो कि हेलमेट नहीं था इसलिए मर गया। एक बात और , श्री पुलिस जी यहाँ समस्या हेलमेट की नहीं है, समस्या है अस्त व्यस्त ट्रैफिक। ट्रैफिक सिस्टम सही नहीं है तो फिर कितने भी हेलमेट पहना दो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। पुलिस जी, आपने जितनी ताकत हेलमेट पहनाने में लगाई है उतनी ट्रैफिक सुधार में लगाते तो सब कुछ नहीं तो बहुत कुछ तो ठीक हो जाता। पुलिस जी, आप विचार करके देखो क्या यह शहर इतना बड़ा हो गया कि यहाँ हेलमेट के बिना काम नहीं चल सकता! ले दे के ढाई सड़क हैं। राजमार्ग १५, रविन्द्र पथ ,हनुमानगढ़ रोड बस। हेलमेट के लिए कानून के साथ व्यवहारिकता भी अपने साथ रखो पुलिस जी। शहर से बाहर जाने वाले मार्गों पर नाके लगाओ। वहां दो पहिया वाहन चालकों के ही क्यों उसके साथ बैठने वाले को भी हेलमेट पहनाओ। पुलिस जी, शहर में कोई नेता,प्रभावशाली सामाजिक आदमी, आप तक यह बात कहने वाला कोई व्यापारी नेता नहीं, इसलिए मुझे ही यह लिखना पड़ा। ये बात ऐसे ही नहीं कह रहा। पुलिस जी आपको बताऊँ , मैंने जनप्रतिनिधि,नेता,व्यापारी नेता, बड़े सेठ ,सामाजिक आदमी, सभी से बात की। मगर लगता है किसी की हिम्मत आपके समक्ष शहर की सच्चाई रखने की नहीं हुई। कोई क्यों आपको नाराज करने लगा। सौ काम पड़ते है पुलिस जी आपसे इनको। इसलिए सब देख रहे हैं आपका हेलमेट पहनाने का अभियान। जनता के फोन इनके पास जायेंगे। जनता पर अहसान जताने के लिए पुलिस जी ये आपको फोन करेंगे। आपके पास इन पर अहसान जताने का मौका होगा। इसी से सामाजिक सम्बन्ध ताकतवर बनते हैं। तो पुलिस जी ये तय रहा कि शहर में चोरी होती है तो होती रहे। वाहनों की चोरी की रिपोर्ट दर्ज करें या ना करे। कोई सरे राह किसी की चैन छीनता है तो छीने। लड़कियों को छेड़ता है तो छेड़े । सड़कों पर मर्जी से वाहन पार्क करके सड़क रोकता है तो रोके, आपको इनकी तरफ कोई ध्यान नहीं देना। पुलिस जी अब आपका एक ही लक्ष्य है कि श्रीगंगानगर में सड़क पर आवाजाही करने वाला कोई भी वह सर जो कार में ना हो बिना हेलमेट के नहीं रहना चाहिए। गुड लक। किसी शायर ने कहा है ...अब तो यकीं मानिए जीने को भी जी नहीं,पर जहर भी तो मुफ्त कब आवे है साहब जी। राजू ग्रोवर का एस एम एस-डियर गोड , जो इस एस एम एस को पढ़ रहा हो उसे दुनिया की हर ख़ुशी देना। क्योंकि कुछ लोग हमेशा मुस्कुराते हुए ही अच्छे लगते हैं।