Thursday 20 June 2013

गुड्डू बड़ी परेशान है...चन्नी को भी टेंशन

श्रीगंगानगर-गुड्डू बड़ी परेशान है। चन्नी को भी टेंशन है। दिक्षा की भागादौड़ी बढ़ी है। गुड्डू,चन्नी,दिक्षा ना तो किसी पोलिटिकल पार्टी की  लीडर है और ना ही तबादले के मारे कोई अफसर। इन पर महंगाई का भी कोई भार नहीं है। ना ही इनको सुराज संकल्प या संदेश यात्रा के लिए कोई भीड़ जुटानी है। ये तो कान्वेंट स्कूल में पढ़ने वाली लड़कियां हैं। इनको परेशानी अपनी रोज़मर्रा की पढ़ाई से नहीं। परेशानी है नित नए प्रोजेक्ट से। प्रोजेक्ट भी ऐसे जैसे ये छोटी छोटी कक्षाओं के विद्यार्थी ना होकर किसी प्रोफेशनल कॉलेज की पढ़ाकू हों। इनको सम सामायिक घटना पर खबर लिखनी है। खबर भी वो  जिसमें कब,क्यूँ,कहां,कैसे,क्या,कौन जैसे प्रश्नों के जवाब हों। साथ में हो सरकारी पक्ष...जनता की राय, जिन पर घटना का अच्छा बुरा प्रभाव पड़ा हो। ये सब कोई एक दो पैरे  में नहीं लिखना। किसी स्कूल ने बच्चों को 15 पेज लिखने के निर्देश दिये हैं तो किसी ने बीस। सब कुछ अंग्रेजी में होना चाहिए। अब ये विद्यार्थी लगी हैं खबर के जुगाड़ में। जिनका कोई मीडिया में जानकार...रिश्तेदार है वे उनसे मदद ले रहें हैं। कोई टीचर से लिखवा रहा है। बाकी सब के लिए इंटरनेट जिंदाबाद। जहां सब कुछ उपलब्ध है। हिन्दी में लो या अंग्रेजी में। अब जब ये बच्चे इंटरनेट से खबर ले प्रोजेक्ट पूरा कर भी लेंगे तो क्या होगा? इनका ज्ञान बढ़ेगा ! इनका मीडिया में सम्मान बढ़ेगा ! या ये इनके लिए कोई बेहतर भविष्य का दरवाजा खोल देगा ! कुछ भी तो नहीं होने वाला। बच्चे रुचि से नहीं बोझ  मानकर इसको जैसे तैसे निपटाएंगे। ना तो उसे ये पढ़ने की कोशिश करेंगे ना समझने की। जरूरत भी क्या है उसको जानने की....समझने की। गर्मी की छुट्टी का काम है.....बस,पूरा करना है। खुद खबर लिखने वाला शायद की कोई हो। चूंकि बच्चे कोनवेंट स्कूल के हैं इसलिए अभिभावकों की इतनी हिम्मत नहीं कि वे टीचर से इस बारे में कुछ पूछ सकें। ना वे प्रिंसिपल के पास जाकर बच्चों की टेंशन दूर करने की कह सकते हैं। कहेंगे,पूछेंगे तो शान जाने का डर....क्योंकि स्कूल वालों को ये कहने में कितनी देर लगती है...ऐसा है तो बच्चे को किसी दूसरे स्कूल में डाल दो। इसलिए लगे हैं सब के सब बच्चों के साथ उस बड़ी खबर का जुगाड़ करने में जो उन्हे स्कूल टीचर को देनी है। पता नहीं टीचर भी क्या सोच कर 15 पेज की खबर लिखने को देते हैं। कितने टीचर होंगे जो खुद 15 पेज की वैसी खबर लिख सकें जैसी उन्होने बच्चों से मांगी है। मीडिया से जुड़े व्यक्ति को भी 15 पेज की खबर लिखने के लिए बहुत कुछ सोचना और करना पड़ता है। ये तो अभी बच्चे हैं।


Saturday 15 June 2013

गर्भ में ही शुरू हो जाती है जीव की यात्रा

श्रीगंगानगर- जीव के गर्भ में आते ही उसकी यात्रा शुरू हो जाती है। जीवन पूरा करने के बाद उसकी अंतिम यात्रा। इन दोनों यात्राओं के बीच जीव ना जाने कैसी कैसी यात्रा करता है। कोई काम की होती है कोई बेकाम ही। कई बार यात्रा निरर्थक हो जाती है तो बहुत दफा पूरी तरह सार्थक। कभी यात्रा का उद्देश्य होता है कभी ऐसे ही इंसान घूमता है बे मतलब ही। कभी अंदर की यात्रा तो कभी बाहर की। जीवन चलने का नाम जो है....जब जीवन में विभिन्न यात्राएं करनी ही है तो फिर सुराज  संकल्प यात्रा क्यों नहीं! यह वसुंधरा राजे सिंधिया की यात्रा है। इसके साथ साथ सभी बीजेपी नेताओं की अपनी अपनी यात्रा भी है अलग से। नेता छोटा हो या बड़ा सब यात्रा पर निकले हैं। कई दिनों से यात्रा कर रहा है हर नेता। जरूरी भी है। नहीं करेगा तो मंजिल पर कैसे पहुंचेगा। चलना तो पड़ेगा....एक गाना भी  तो है...तुझको चलना होगा,....तुझको चलना होगा। इसलिए चल रहे हैं....यात्रा कर रहे हैं। तो शब्द कह रहे हैं...सबकी अपनी अपनी यात्रा...इन नेताओं की यात्रा कहाँ जाकर रुकेगी ये वे खुद जानते हैं...या यात्रा के माध्यम से जान लेंगे। क्योंकि यात्रा से बहुत कुछ जाना जा सकता है। कितने ही विदेशियों ने  हिंदुस्तान को जानने के लिए यहाँ की यात्रा की। पहले विद्यार्थियों को देशाटन पर ले जाया  जाता था ताकि वे देश के बारे में जान सकें।.....तो साबित हुआ कि यात्रा जानकारी बढ़ाती  है। इसलिए नेता निकले हैं अपनी अपनी यात्रा पर। वसुंधरा राजे बड़ी हैं तो उनकी यात्रा भी बड़ी। ऐसी ही स्थानीय नेताओं के बारे में कहा जा सकता है। जो जैसा नेता...जिसकी  जैसी पकड़ उसकी वैसी ही यात्रा। किसी ने दो गली नापी   किसी ने दो गांव। कोई दो घर ही जा पाया कोई घर घर गया। किसी ने यात्रा पर काफिला बनाया किसी के साथ कोई नहीं आया। कोई यात्रा पर निकला तो सभी को बुला लिया। कोई ऐसा भी था जो बुलाने तो गया लेकिन लोग नहीं आए...आए तो दूसरे स्टेशन पर उतर गए। कितने ही यात्रा पूरी होने से पहले ही थक जाएंगे। हिम्मत छोड़ देंगे। अकेले रह जाएंगे। उनके साथी दूसरे के साथ चले जाएंगे। किसी की यात्रा आनंदमय होगी किसी की कष्टदायक। यात्रा होती ही ऐसी है। इसलिए फिलहाल जो किसी की यात्रा में शामिल नहीं हैं वे सभी की यात्रा का अवलोकन करें। देखें, किसका सांस  फूला। कौन सांस भूला। किसकी सांस में सांस आई। किस की धड़कन बढ़ी। किसकी लौटी। कौन थका। कौन बैठा। कौन कम है....किसमें दम है। याद रहे, ये छोटी छोटी यात्रा वसुंधरा की बड़ी यात्रा में विलीन हो जाएगी। ठीक वैसे जैसे नदियां समंदर में समा जाती हैं। समंदर मंथन हुआ तो बहुत कुछ निकला था। अब यात्रा का मंथन होगा। उसमें से टिकट निकलेगी। एक को मिलेगी। बाकी साथ हो जाएंगे या उत्पात मचाएंगे।.....तो यात्रा जारी है...नेताओं की भी और जीव की भी।