Friday, 17 August, 2012

बहुत मुश्किल है उलझी फूल मालाओं को सुलझाना


श्रीगंगानगर-एक समारोह में फूलों की मालाएँ उलझ गईं। मन में विचार आया कि रिश्तों और मालाओं में कोई फर्क नहीं है। माला ने जैसे एक संदेश दिया कि रिश्तों को फूल मालाओं की तरह रखो, तभी ये हर किसी के गले की शोभा बनेंगे वरना तो उलझ कर टूट जाएंगे।  जैसे माला एक दूसरे में उलझ कर टूट जाती हैं। ऐसा इसलिए हुआ कि मालाएँ गड-मड हो गई। ऊपर नीचे हो गई। बस उलझ गई। जब उलझ गई तो उनको जल्दबाज़ी में नहीं सुलझाया जा सकता। उलझी मालाओं को सुलझाने के लिए धैर्य और समझदारी की आवश्यकता होती है। जल्दबाज़ी और झुंझलाने के नहीं। कौनसी माला का धागा किसमें उलझ गया....किस माला का फूल किस माला के फूल में अटक गया। फिर उनको इधर उधर से सहजता से निकालना...कभी किस धागे पकड़ना कभी किसी को। किसी को ज़ोर से,खीजे अंदाज में खींचा तो माला टूट जाएगी....फूल बिखर जाएंगे। टूटी माला किस काम की। रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं। एक एक फूल से माला बनती है तो एक एक मेम्बर से घर । एक माला एक घर। कई घर तो परिवार हो गए। सभी का अपना महत्व...खास महक...अलग रंग रूप...जुदा मिजाज। ठीक फूलों की तरह। माला की भांति। रिश्ते  भी जब उलझते हैं तो उनको सुलझाना बड़ी ही मुश्किल का काम होता है। एक घर को खींच के इधर उधर करते हैं हैं तो वह किसी और में उलझ जाता है। कभी कोई धागा अटका कभी कोई फूल उलझा। ......बहुत समय लगता है उलझे रिश्ते सुलझाने में। कई बार तो उलझन ऐसी होती है कि कोई ना कोई माला तोड़नी पड़ती है। तोड़ा किसको जाता है जो सभी से उलझी हो...अब या तो वह माला छोटी हो जाएगी या टूट कर बिखर जाएगी। माली को देखो....वह कितनी ही मालाओं को सहेज कर रखता है...बंधी होती हैं सबकी सब एक धागे में। कहीं कोई उलझन नहीं। वह जानता है मालाओं का मिजाज...उनको बिना उलझाए रखने का ढंग। बस, बड़े परिवारों में पहले कोई ना कोई मुखिया होता जो अपने सभी घरों को इसी प्रकार रखता था। अपने अनुभव और धैर्य से वह या तो रिश्तों को उलझने देता ही नहीं था अगर उलझ भी जाते थे तो उसे उनको सुलझाना आता था बिना कोई माला को तोड़े। अब तो सब कुछ नहीं तो बहुत कुछ बदल गया। ना बड़े परिवार है ना कोई मुखिया। छोटे छोटे घर हैं..और एक एक घर के कई मुखिया। जब इन घरों के रिश्ते उलझते हैं तो फिर...फिर मामला बिगड़ जाता है। लोग बात बनाते हैं। जैसे किसी समारोह में.....अरे मालाएँ तो उलझ गई....टूट गई...ठीक से नहीं रखा....क्यों होता है ना ऐसा ही। कचरा पुस्तक की लाइन है---लबों कों खोल दे,तू कुछ तो बोल दे....मन की सारी, गाँठे प्यारी....इक दिन मुझ संग खोल दे.....तू मुझ से बोल रे...... ।  

Friday, 10 August, 2012

मजबूरी,बेबसी,लाचारी,विवशता ने ममता से देखो क्या करवा दिया


श्रीगंगानगर- ममता की ये कैसी लाचारी है!विवशता है!बेबसी है!मजबूरी है!  वह भी  उस शहर में जहां एक जागरण पर कई कई हजार रुपए खर्च कर दिये जाते हैं। उस नगर में जहां धार्मिक आयोजन पर लाखों रुपयों का प्रसाद बांट कर गौरवान्वित होने की हौड़ लगती है। उस क्षेत्र में जहां दान,धर्म की कोई कमी नहीं है। वहां, जहां सेठ बी डी अग्रवाल करोड़ो रुपए की छात्रवृति देते हैं, उन परिवारों को  भी जिनके बच्चे महंगे अंग्रेजी स्कूल में पढ़ते हैं, गंदे पानी की निकासी के लिए दस करोड़ ऐसे देते हैं जैसे कोई दस रुपए, एक  माँ को, जिसे देवी,देवताओं और गुरु से भी ऊंचा स्थान दिया गया है अपने एक बच्चे का इलाज करवाने के लिए नवजात को नकद उपहार के बदले गोद देना पड़ता है। माता कुमाता नहीं हो सकती। इस मामले में इस सौदे को पाप भी कहना पाप होगा। क्योंकि यह सब माँ-बाप ने लालच के लिए नहीं किया। ऐसा करना उनकी विवशता हो गई थी। मजबूरी बन गई थी। एक बेटे को नकद उपहार के बदले देकर  दूसरे बेटे का इलाज करवाने की मजबूरी। छोटे को बेचकर बड़े को अपने पैरों पर खड़ा करने की चाह। घर का पुराना सामान बेचते समय भी इंसान थोड़ा उदास होता है। यह तो कोख से जन्म बेटा था। वह बेटा जिसने अपनी  जननी की सूरत भी आँखों में नहीं होगी। उसे बड़े बेटे के इलाज के लिए दूसरे की गोद में दे दिया। कलेजा चाहिए ऐसा करने के लिए। ममता को मारा होगा ऐसा करने से पहले इस माँ ने। कोतवाली में मैंने देखा उस माँ की जिसकी गोद में उसका नवजात था। पिता के कंधे पर वह बेटा जो विकलांग है। कोई चेहरे पढ़ने का विशेषज्ञ होता तो माँ-बाप के चेहरे पढ़ कर बताता कि उन पर क्या लिखा था। उनकी आंखें जैसे पूछ रही थी कि हमारा कसूर क्या है? मेरे जैसा  जड़बुद्धि तो उनसे आँख मिला कर बात तक नहीं कर सका। उनकी  बेबस,लाचार,मजबूर नजरों का सामना करना बड़ा मुश्किल था। यह खबर तो थी लेकिन इतनी दर्दनाक और मन को पीड़ा देने वाली,दिलो दिमाग को झकझोर देने वाली। इस शहर,सामाजिक संस्थाओं,दानवीरों,बड़े बड़े धार्मिक आयोजन करने वाली संस्थाओं,सरकार की योजनाओं  के लिए इससे अधिक शर्म और लानत की बात क्या होगी कि ऐसे शहर में एक माँ को अपने एक बेटे के इलाज के लिए दूसरे को अपने से दूर करना पड़ा। समाज ये पूछ सकता है कि वह किसी के पास मदद मांगने गया क्या? शायद या तो गया नहीं होगा या उसका स्वाभिमान ने उसको कहीं जाने नहीं दिया होगा। यह तो मानना हे होगा कि उसके पास कोई विकल्प नहीं होगा तभी तो उसे ऐसा कदम उठाना पड़ा जिसकी कल्पना तक मुश्किल है।
 

Monday, 6 August, 2012

दुनिया थी मगर सहोदर नहीं था

श्रीगंगानगर-विकास डब्ल्यूएसपी लिमिटेड के सर्वे सर्वा बी डी जिंदल के सर्व समाज छात्रवृति समारोह में वह तमाम ठाठ-बाठ थे जिसकी कामना हर इंसान करता है। प्रशंसा के खूब सारे शब्द थे। उनके काफी भक्त थे। एक से बढ़कर एक मीठे बोल थे। ढम ढमा ढम करते ढ़ोल थे। उनके लिए ताली बजाते अनगिनत हाथ थे। क्षेत्र के जाने माने व्यक्ति उनके साथ थे। मालाएँ थी। बड़ी मात्र में फूल थे। अनेकानेक अलंकार थे। ग्रीवा में मान सम्मान के हार थे। कई हजार इंसान थे। बी डी जिनके भगवान थे। लिखने के लिए शब्द कम हैं। कोई राजनीतिक देखे तो समझ जाए कि बी डी में कितना दम है। आन,बान,शान.....सब कुछ बी डी अग्रवाल को दिखाई दे रहा था। दुनिया बी डी को देख रही थी। बी डी की एक नजर को लालायित थी। मगर इसे विडम्बना कहें या बेबसी, समय का कोई चक्र कहें या अहंकार। जिसके लिए दुनिया आई थी। जिसका गुणगान हो रहा था। शॉल ओढ़ाकर सम्मान हो रहा था... इसके बावजूद सब का सब जीरो.....बेशक बी डी अग्रवाल हीरो......किन्तु सब कुछ जीरो.....शून्य। क्यों? क्योंकि उसका सहोदर जयदेव जिंदल नहीं था वहां। बाल मुक्न्द जिंदल का परिवार भी नहीं था जिसकी एक दशक पहले हत्या हो गई थी। तालियाँ तो थी मगर उनमें बड़े भाई जयदेव जिंदल के आशीर्वाद की ताली नहीं थी। मान सम्मान तो खूब था, नहीं था तो जयदेव जिंदल का आशीर्वाद। ऐसा नहीं हो सकता कि बी डी अग्रवाल को इसका अहसास नहीं होगा। होगा...तालियों की गड़गड़ाहट उनके कानों में चुभी होंगी। ढ़ोल की ढम ढमा ढम के बावजूद पैर नहीं उठे होंगे थिरकने को। अलंकार सहोदर की अनुपस्थिति में मन को भाए नहीं होंगे। मीठे बोल रस नहीं घोल पाए क्योंकि बड़ा भाई साथ नहीं था। जब हर वर्ग की पीड़ा उनके दिल में है तो यह संभव नहीं कि भाई के साथ ना होने की पीड़ा उनके मन में न हो। लेकिन वे अपनी पीड़ा डिकहये,बताए किसको?खुद ही पी रहें हैं इसे। ये कैसी विवशता है! जिसने क्षेत्र को अपनी मुट्ठी में कर लिया हो। अपना बना लिया हो। अपने साथ खड़ा कर लिया हो वह भाई को अपने साथ नहीं ला पाया। वह अपने दिवंगत अनुज के परिवार को इस खुशी में शामिल नहीं कर सका। दूसरों को अपना बना लिया सगा भाई दूर ही रहा। अपने अनुज की शान देख के किस भाई का सीना गर्व से चौड़ा ना होता। कौन ऐसा भाई है जो अपने भाई का इतना मान सम्मान देख आत्म विभोर होकर उसके गले लगकर भावुक ना हो। परंतु सच्चाई यही है कि सब कुछ था लेकिन भाई के बिना कुछ नहीं जैसा था।

Saturday, 4 August, 2012

सम्मान का यह ढंग तो गरिमामय नहीं हो सकता


श्रीगंगानगर-वर्तमान समय ने कुछ सौ रुपए के शॉल और कुछ सौ रुपए के ही स्मृति चिन्ह को बहुत बड़े सम्मान का पर्याय बना दिया गया है। यह शुरू तो किया था क्लब संस्कृति ने ...अब इसे अपना लिया सभी ने। सम्मान भी इस प्रकार से करते हैं जैसे मजबूरी हो या चापलूसी करना जरूरी हो। सम्मान की अपनी गरिमा है। किसी का सम्मान, सम्मान जनक तरीके से गरिमामय माहौल में होना चाहिए ना कि केवल दिखावे के लिए। अब देखो, कुछ संस्थाएं सेठ बी डी अग्रवाल का सम्मान करेंगी। सम्मान भी कहां करेंगी जहां बी डी अग्रवाल करोड़ों रुपए के छात्रवृति देंगे। समारोह बी डी अग्रवाल का और सम्मानित करेंगे वे लोग व्यक्ति जो उन्हीं की समिति के हिस्से या पधाधिकारी हैं। । एक है मंदिर समिति। दूसरा सम्मान करेगी स्वर्णआभा विद्यार्थी शिक्षा सहयोग समिति,तीसरा सम्मान होगा बाला जी अन्नपूर्णा समिति की ओर से। और इन सबके बीच शिक्षा जगत में इस क्षेत्र की बहुत बड़ी संस्था टान्टिया हायर एज्यूकेशन इंस्टीट्यूट कैंपस की ओर से बी डी अग्रवाल को शॉल ओढ़ाया जाएगा। भीड़ बी डी की। समारोह बी डी का। खर्चा बी डी का। और उसी में सम्मान उस बी डी अग्रवाल का जो करोड़ों रुपया लोगों की शिक्षा पर खर्च कर रहा है। उस बी डी का जिसने करोड़ों रुपए के बीज किसानों को इस लिए बांट दिये ताकि किसान कर्ज मुक्त हो सके। उस बी डी अग्रवाल को जो कई अरब रुपए से मेडिकल कॉलेज खोलना चाहते हैं। उनके प्रोग्राम में उनको स्मृति चिन्ह देकर,शॉल ओढ़ाकर सम्मान। यह सम्मान करने का कोई सम्मान जनक और गरिमापूर्ण ढंग नहीं है। यह बी डी अग्रवाल का सम्मान नहीं....सम्मान तो तब हो जब ये संस्थाएं अपने यहां प्रोग्राम करें। ऐसा प्रोग्राम जिसमें हर जाति,धर्म,वर्ग,राजनीति,प्रशासन के खास व्यक्ति हों। आम जनता हो। वहां बी डी अग्रवाल की सेवाओं की जानकारी देकर संस्थाओं को उनके सम्मान के लिए प्रेरित क्या जाए। और उसके बाद बड़े आदर,विनम्रता,सरलता के साथ फूलों की,तुलसी की,चन्दन की माला भी पहना दी  जाए तो वह होगा असली सम्मान। सम्मान कोई मंहगा समान देने से नहीं होता। सम्मान तो गरिमा चाहता है। सम्मान की भी और जिसका सम्मान हो रहा है उसकी भी। फिर बी डी अग्रवाल का सम्मान तो वह करे जो बी डी अग्रवाल से बड़ा हो...सोच में। दानवीरता में। लोगों की भलाई करने में  । समाज हित की सोच रखने में। किसी का  घर जाकर सम्मान तो तब किया जाता है जब वह कहीं जाने में असमर्थ हो....बी डी अग्रवाल तो देश दुनिया घूमते हैं। उनका सम्मान तो एक भव्य समारोह में हो तभी बात हो....वरना तो वह सम्मान बी डी अग्रवाल के लिए तो नहीं। हां उनके खुद के लिए जरूर हो जाएगा।