Monday 6 August 2012

दुनिया थी मगर सहोदर नहीं था

श्रीगंगानगर-विकास डब्ल्यूएसपी लिमिटेड के सर्वे सर्वा बी डी जिंदल के सर्व समाज छात्रवृति समारोह में वह तमाम ठाठ-बाठ थे जिसकी कामना हर इंसान करता है। प्रशंसा के खूब सारे शब्द थे। उनके काफी भक्त थे। एक से बढ़कर एक मीठे बोल थे। ढम ढमा ढम करते ढ़ोल थे। उनके लिए ताली बजाते अनगिनत हाथ थे। क्षेत्र के जाने माने व्यक्ति उनके साथ थे। मालाएँ थी। बड़ी मात्र में फूल थे। अनेकानेक अलंकार थे। ग्रीवा में मान सम्मान के हार थे। कई हजार इंसान थे। बी डी जिनके भगवान थे। लिखने के लिए शब्द कम हैं। कोई राजनीतिक देखे तो समझ जाए कि बी डी में कितना दम है। आन,बान,शान.....सब कुछ बी डी अग्रवाल को दिखाई दे रहा था। दुनिया बी डी को देख रही थी। बी डी की एक नजर को लालायित थी। मगर इसे विडम्बना कहें या बेबसी, समय का कोई चक्र कहें या अहंकार। जिसके लिए दुनिया आई थी। जिसका गुणगान हो रहा था। शॉल ओढ़ाकर सम्मान हो रहा था... इसके बावजूद सब का सब जीरो.....बेशक बी डी अग्रवाल हीरो......किन्तु सब कुछ जीरो.....शून्य। क्यों? क्योंकि उसका सहोदर जयदेव जिंदल नहीं था वहां। बाल मुक्न्द जिंदल का परिवार भी नहीं था जिसकी एक दशक पहले हत्या हो गई थी। तालियाँ तो थी मगर उनमें बड़े भाई जयदेव जिंदल के आशीर्वाद की ताली नहीं थी। मान सम्मान तो खूब था, नहीं था तो जयदेव जिंदल का आशीर्वाद। ऐसा नहीं हो सकता कि बी डी अग्रवाल को इसका अहसास नहीं होगा। होगा...तालियों की गड़गड़ाहट उनके कानों में चुभी होंगी। ढ़ोल की ढम ढमा ढम के बावजूद पैर नहीं उठे होंगे थिरकने को। अलंकार सहोदर की अनुपस्थिति में मन को भाए नहीं होंगे। मीठे बोल रस नहीं घोल पाए क्योंकि बड़ा भाई साथ नहीं था। जब हर वर्ग की पीड़ा उनके दिल में है तो यह संभव नहीं कि भाई के साथ ना होने की पीड़ा उनके मन में न हो। लेकिन वे अपनी पीड़ा डिकहये,बताए किसको?खुद ही पी रहें हैं इसे। ये कैसी विवशता है! जिसने क्षेत्र को अपनी मुट्ठी में कर लिया हो। अपना बना लिया हो। अपने साथ खड़ा कर लिया हो वह भाई को अपने साथ नहीं ला पाया। वह अपने दिवंगत अनुज के परिवार को इस खुशी में शामिल नहीं कर सका। दूसरों को अपना बना लिया सगा भाई दूर ही रहा। अपने अनुज की शान देख के किस भाई का सीना गर्व से चौड़ा ना होता। कौन ऐसा भाई है जो अपने भाई का इतना मान सम्मान देख आत्म विभोर होकर उसके गले लगकर भावुक ना हो। परंतु सच्चाई यही है कि सब कुछ था लेकिन भाई के बिना कुछ नहीं जैसा था।

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