Friday 10 August 2012

मजबूरी,बेबसी,लाचारी,विवशता ने ममता से देखो क्या करवा दिया


श्रीगंगानगर- ममता की ये कैसी लाचारी है!विवशता है!बेबसी है!मजबूरी है!  वह भी  उस शहर में जहां एक जागरण पर कई कई हजार रुपए खर्च कर दिये जाते हैं। उस नगर में जहां धार्मिक आयोजन पर लाखों रुपयों का प्रसाद बांट कर गौरवान्वित होने की हौड़ लगती है। उस क्षेत्र में जहां दान,धर्म की कोई कमी नहीं है। वहां, जहां सेठ बी डी अग्रवाल करोड़ो रुपए की छात्रवृति देते हैं, उन परिवारों को  भी जिनके बच्चे महंगे अंग्रेजी स्कूल में पढ़ते हैं, गंदे पानी की निकासी के लिए दस करोड़ ऐसे देते हैं जैसे कोई दस रुपए, एक  माँ को, जिसे देवी,देवताओं और गुरु से भी ऊंचा स्थान दिया गया है अपने एक बच्चे का इलाज करवाने के लिए नवजात को नकद उपहार के बदले गोद देना पड़ता है। माता कुमाता नहीं हो सकती। इस मामले में इस सौदे को पाप भी कहना पाप होगा। क्योंकि यह सब माँ-बाप ने लालच के लिए नहीं किया। ऐसा करना उनकी विवशता हो गई थी। मजबूरी बन गई थी। एक बेटे को नकद उपहार के बदले देकर  दूसरे बेटे का इलाज करवाने की मजबूरी। छोटे को बेचकर बड़े को अपने पैरों पर खड़ा करने की चाह। घर का पुराना सामान बेचते समय भी इंसान थोड़ा उदास होता है। यह तो कोख से जन्म बेटा था। वह बेटा जिसने अपनी  जननी की सूरत भी आँखों में नहीं होगी। उसे बड़े बेटे के इलाज के लिए दूसरे की गोद में दे दिया। कलेजा चाहिए ऐसा करने के लिए। ममता को मारा होगा ऐसा करने से पहले इस माँ ने। कोतवाली में मैंने देखा उस माँ की जिसकी गोद में उसका नवजात था। पिता के कंधे पर वह बेटा जो विकलांग है। कोई चेहरे पढ़ने का विशेषज्ञ होता तो माँ-बाप के चेहरे पढ़ कर बताता कि उन पर क्या लिखा था। उनकी आंखें जैसे पूछ रही थी कि हमारा कसूर क्या है? मेरे जैसा  जड़बुद्धि तो उनसे आँख मिला कर बात तक नहीं कर सका। उनकी  बेबस,लाचार,मजबूर नजरों का सामना करना बड़ा मुश्किल था। यह खबर तो थी लेकिन इतनी दर्दनाक और मन को पीड़ा देने वाली,दिलो दिमाग को झकझोर देने वाली। इस शहर,सामाजिक संस्थाओं,दानवीरों,बड़े बड़े धार्मिक आयोजन करने वाली संस्थाओं,सरकार की योजनाओं  के लिए इससे अधिक शर्म और लानत की बात क्या होगी कि ऐसे शहर में एक माँ को अपने एक बेटे के इलाज के लिए दूसरे को अपने से दूर करना पड़ा। समाज ये पूछ सकता है कि वह किसी के पास मदद मांगने गया क्या? शायद या तो गया नहीं होगा या उसका स्वाभिमान ने उसको कहीं जाने नहीं दिया होगा। यह तो मानना हे होगा कि उसके पास कोई विकल्प नहीं होगा तभी तो उसे ऐसा कदम उठाना पड़ा जिसकी कल्पना तक मुश्किल है।
 

1 comment:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

हमारे समाज को सोचने की ज़रूरत है