Wednesday 31 December 2008

प्रीत,प्यार और स्नेह की धरा पर

वृन्दावन,नंदगाँव,बरसाना ये वो जगह है जहाँ पर श्री कृष्ण- राधा के अलावा कुछ भी नहीं है। गत पांच दिनों में से चार दिन इन्ही के सानिध्य में गुजरे। राधा कभी थी या नहीं, लेकिन आज इन स्थानों के चप्पे चप्पे पर राधा ही राधा है। बहती हवा राधा राधा करके कान के पास से उसके होने का अहसास करवाती है। दीवारों पर राधा, श्री राधा लिखा हुआ है। एक रिक्शा वाला भी घंटी नहीं बजाता, राधे राधे बोलकर राहगीरों को रास्ता छोड़ने को कहता है। वृन्दावन में ५५०० मन्दिर हैं। सब के सब राधा कृष्ण के। बांके बिहारी का मन्दिर, कोई समय ऐसा नहीं जब भीड़ ना होती हो। मन्दिर में आते ही मन निर्मल हो जाता है। आंखों के सामने, मन में केवल होता है बांके बिहारी। रास बिहारी मन्दिर। मन्दिर में चार शतक पुरानी मूर्तियाँ हैं। मगर ऐसा लगता है जैसे आज ही उनको घडा गया हो। मन्दिर का रूप रंग देखते देखते मन नहीं भरता। श्री रंगराज का मन्दिर। मन्दिर में सोने की मूर्तियाँ, उनके सोने के वाहन,सोने के गरुड़ खंभ। क्या कहने! गोवर्धन की परिकर्मा। लोगों की आस्था को नमन करने के अलावा कुछ करने को जी नहीं हुआ। वाहन के लोग कहते हैं। वृन्दावन,नंदगाँव,बरसाना दूध दही का खाना। इस क्षेत्र में ताली बजाकर हंसने का भी बहुत महत्व है। हर किसी से सुनने को मिल जाएगा-जो वृन्दावन में हँसे,उसका घर सुख से बसे। जो वृन्दावन में roye वो अपने नैना खोये।वहां मधुवन है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यहाँ श्री कृष्ण गोपियों के संग रास रचाया करते थे। अब भी ऐसा होता है। इसलिए मधुवन में रात को किसी को भी रुकने नही दिया जाता। बाकायदा ढूंढ़ ढूंढ़ कर सबको वन से बहार निकल दिया जाता है। वृन्दावन में बंदरों का बहुत बोलबाला है। लेकिन आप उनके सामने राधे राधे बोलोगे तो बन्दर चुपचाप आपके निकट से चला जाएगा। इन बंदरों को चश्मा और पर्स बहुत पसंद हैं। पलक झपकते ही आपका चश्मा उतार लेंगें। इसलिए जगह जगह लिखा हुआ है कि चश्मा और पर्स संभाल कर रखें। यहाँ एक मन्दिर है इस्कोन। मन्दिर में कैमरा मोबाइल फ़ोन तक नहीं ले जा सकते। मन्दिर के अन्दर आरती के समय जब "हरे कृष्णा हरे कृष्णा, कृष्णा कृष्णा हरे हरे,हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे" के स्वर गूंजते हैं तो हर कोई अपने आप ही झुमने को मजबूर हो जाता है। कृष्ण नाम की ऐसी मस्ती आती है की मन्दिर से जाने को जी नहीं करता। मथुरा तो है ही कृष्ण की जन्म स्थली। जन्म स्थली पर सी आर पी एफ की चौकसी है। सब कुछ देखने लायक। चार दिन कैसे बीत गए पता ही नहीं चला। अब उस व्यक्ति के बारे जिसकी भावना के चलते हम इन स्थानों के दर्शन कर सके। उनका नाम हैं श्री मारुती नंदन शास्त्री। कथा वाचक हैं, मुझ से स्नेह करतें हैं। उनका कोई आयोजन था। उन्होंने स्नेह से बुलाया और हम कच्चे धागे से बंधे चले गए। कहतें हैं कि वृन्दावन में किसी ना किसी बहाने से ही आना होता है। अगर आप सीधे वृन्दावन आने को प्रोग्राम बनाओगे तो आना सम्भव नही होता। इसलिए शास्त्री जी को धन्यवाद जिनके कारन हम प्रेम की नगरी में आ सके।

Tuesday 30 December 2008

युद्ध? को भी बना देंगें बाज़ार

इतने दिन कहाँ रहा, ये चर्चा बाद में, पहले उस "युद्ध" की बात जिसका अभी कोई अता पता ही नही है। इन दिनों शायद ही कोई ऐसा मीडिया होगा जो "युद्ध" युद्ध" ना चिल्ला रहा हो। हर कोई "युद्ध" को अपने पाठकों को "बेच" रहा है जैसे कोई पांच पांच पैसे की गोली बेच रहा हो। इतने जिम्मेदार लोगों ने इसको बहुत ही हलके तरीके से ले रखा है। मेरा शहर बॉर्डर के निकट है। हमने १९७१ के युद्ध के समय भी बहुत कुछ झेला और देखा। इसके बाद वह समय भी देखा जब संसद पर हमले के बाद सीमा के निकट सेना को भेज दिया गया था। बॉर्डर के पास बारूदी सुरंगे बिछाई गई थी। तब पता नहीं कितने ही लोग इन सुरंगों की चपेट में आकर विकलांग हो गए। अब ऐसी कोई बात नहीं है। मैं ख़ुद बॉर्डर पर होकर आया हूँ। पुरा हाल देखा और जाना है। पाक में चाहे जो हो रहा हो, भारत में सेना अभी भी अपनी बैरकों में ही है। बॉर्डर की और जाने वाली किसी सड़क या गली पर सेना की आवाजाही नहीं है। मीडिया में पता नहीं क्या क्या दिखाया,बोला और लिखा जा रहा है। ठीक है वातावरण में तनाव है, दोनों पक्षों में वाक युद्ध हो रहा है, मगर इसको युद्ध की तरह परोसना, कमाल है या मज़बूरी?अख़बारों में बॉर्डर के निकट रहने वाले लोगों के देश प्रेम से ओत प्रोत वक्तव्य छाप रहें हैं।अब कोई ये तो कहने से रहा कि हम कमजोर हैं या हम सेना को अपने खेत नहीं देंगें। मुफ्त में देता भी कौन है। जिस जिस खेत में सुरंगें बिछाई गई थीं उनके मालिकों को हर्जाना दिया गया था। हमारे इस बॉर्डर पर तो सीमा सुरक्षा बल अपनी ड्यूटी कर रहा है. सेना उनके आस पास नहीं है। हैरानी तो तब होती है जब दिल्ली ,जयपुर के बड़े बड़े पत्रकार ये कहतें हैं कि आपके इलाके में सेना की हलचल शुरू हो गई। अब उनको कौन बताये कि इस इलाके में कई सैनिक छावनियां हैं , ऐसे में यहाँ सेना की हलचल एक सामान्य बात है। आम जन सही कहता है कि युद्ध केवल मीडिया में हो रहा है।
video

Tuesday 23 December 2008

मंदी की मार,पत्रकार बेकार

videoश्रीगंगानगर में पत्रकारों पर मंदी की मार का असर होने लगा है। हिंदुस्तान के सबसे बड़े प्रिंट मीडिया ग्रुप दैनिक भास्कर के श्रीगंगानगर संस्करण से दो पत्रकारों को नौकरी से अलग कर दिया गया है। इसके विरोध में आज राजस्थान पत्रकार संघ और श्रमजीवी पत्रकार संघ ने अखबार के स्थानीय ऑफिस के आगे धरना देकर एक ज्ञापन कार्यकारी सम्पादक को दिया। ज्ञापन ग्रुप के चेयरमेन के नाम था। धरना स्थल पर अखबार के प्रतियाँ जलाई गईं। यह पहला मौका था जब पत्रकारों के संगठनो ने पत्रकारों को निकाले जाने के विरोध में धरना दिया। श्रीगंगानगर में बड़ी संख्या में दैनिक अख़बार प्रकाशित होते हैं। यहाँ अक्सर कोई ना कोई अखबार के sanchalak किसी reporter को रखते या नौकरी से अलग करते रहें हैं।तीन माह पहले तो एक चलता दैनिक अख़बार समाचार भारती अचानक बंद कर दिया गया। वी ओ आई ने अपना श्रीगंगानगर ऑफिस बंद करके कई जनों को चलता कर दिया था। तब किसी ने इस प्रकार का विरोध नही किया। चलो, देर आयद दुरस्त आयद। उम्मीद है यह सिलसिला बरक़रार रहेगा।

Sunday 21 December 2008

देखो कारस्तानी

--- चुटकी---

हमारे नेताओं की
देखो कारस्तानी,
तन है हिंदुस्तान में
मन है पाकिस्तानी।

Saturday 20 December 2008

चुटकी


जिसका ना दीन
ना कोई ईमान,
उसका नाम है
पाकिस्तान।

--- गोविन्द गोयल
श्रीगंगानगर

Friday 19 December 2008

कमाऊ पूत की उपेक्षा

अक्सर यह सुनने को मिल ही जाता है कि माँ भी उस संतान का थोड़ा पक्ष जरुर लेती है जो घर चलने में सबसे अधिक योगदान देता हो। किंतु राजनीति में ऐसा नही है। ऐसा होता तो राजस्थान के सी एम अशोक गहलोत अपने मंत्री मंडल गठन में श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ की उपेक्षा नही करते। दोनों जिले खासकर श्रीगंगानगर आर्थिक,सामाजिकऔर सामरिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। किंतु श्री गहलोत ने अपने मंत्री मंडल में इस जिले के किसी विधायक को शामिल नही किया। यह जिला सरकार को सबसे अधिक राजस्व देता है,लेकिन इसकी कोई राजनीतिक पहुँच दिल्ली और जयपुर के राजनीतिक गलियारों में नही है। श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ जिले से कांग्रेस को ६ विधायक मिले। इसके अलावा २ निर्दलियों ने सरकार बनने हेतु अशोक गहलोत ने समर्थन दिया। समर्थन देने वाला एक निर्दलीय सिख समाज से है इसी ने सबसे पहले अशोक गहलोत को समर्थन दिया। यह पहले भी विधायक रह चुका है। सब लोग यहाँ तक की मीडिया भी सभी क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व मिलने के गीत गा रहा है। पता नहीं उनका ध्यान भारत-पाक सीमा से सटे श्रीगंगानगर जिले की ओर क्यूँ नही जाता। क्या इस इलाके के विधायक उस गोलमा देवी जितने भी लायक नहीं जिसको शपथ लेनी भी नही आई। इस से साफ साबित होता है कि जयपुर के राजनीतिक गलियारों में हमारे जिले की क्या अहमियत है। किसी को यह सुनने में अटपटा लगेगा कि राजस्थान के इस लाडले जिले की कई मंडियों में रेल लाइन तक नहीं है जबकि वहां करोड़ों रुपयों का कारोबार हर साल होता है। छोटे से छोटा मुकदमा भी एस पी की इजाजत के बिना दर्ज नही होता। जिला कलेक्टर ओर एस पी नगर की गली ओर बाज़ार तक नहीं जानते। उनके पास नगर के ऐसे पॉँच आदमी भी नहीं जो नगर में कोई कांड होने पर उनकी मदद को आ सके, या उनके कहने से विवाद निपटाने आगे आयें। यहाँ उसी की सुनवाई होती है या तो जिसके पैर में जूता है या काम के पूरे दाम। इसके अलावा कुछ नहीं । हमारें नेताओं में इतनी हिम्मत ही नहीं जो अपना दबदबा जयपुर और दिल्ली के गलियारों में दिखा सकें।
"चिंताजनक हैं आज जो हालात मेरी जां,हैं सब ये सियासत के कमालात मेरी जां"
"खुदगर्जियों के जाल में उलझे हुये हैं सब,सुनकर समझिये सबके ख्यालात मेरी जां"
"अब अपराधियों से ख़ुद ही निपटो, फरियादी का तो रपट लिखवाना मना है"

Wednesday 17 December 2008

बड़े के मुंह लगाने की हसरत

पैरों में रहना
मेरी नियति है,
फ़िर पैर मेरा हो
आपका उसका
या हो बुश का,
पहली बार किसी ने
मुझ पर दया दिखाई
किसी बड़े के मुंह
लगने की उम्मीद जगाई,
उसने पैरों में पड़े
जूते को हाथ में लिया
और फैंक दिया
पूरी ताकत से
ताकि मैं ठीक से
बुश के मुंह जा लगूं
या उसके शीश पर
सवार हो ताज बनू ,
अफ़सोस बुश के
घुटनों ने वफ़ा निभाई
मुझे आता देख
तुंरत झुक गए मेरे भाई,
दोनों बार ऐसा ही हुआ
पर, मैं तो कहीं का ना रहा,
मुंह लगने की हसरत
तो पूरी क्या होनी थी
मैं तो पैरों से भी गया,
हाँ इस बात का
गर्व जरुर है कि
जो किसी के
बस में नहीं आता है
वह हमें आते देख
घुटनों के बल झुकने को
मजबूर हो जाता है।

Tuesday 16 December 2008

सब वक्त की बात है

सॉरी ! अचानक बिना बताये गायब रहना पड़ा। इस बीच बुश के साथ वो हो गया जो किसी ने कल्पना भी नही की होगी। कभी ज़िन्दगी में ऐसा होता है कि हम सोच भी नहीं पाते वह हो जाता है। अमेरिका के प्रेजिडेंट की ओर किसी की आँख उठाकर देखने भर की हिम्मत नहीं होती यहाँ जनाब ने दो जूते दे मारे, वो तो बुश चौकस थे वरना कहीं के ना रहते बेचारे। अमेरिकी धौंस एक क्षण में घुटनों के बल झुक गई। इसे कहते हैं वक्त ! वक्त से बड़ा ना कोई था और ना कोई होगा। यह वक्त ही है जिसे हिन्दूस्तान की लीडरशिप को इतना कमजोर बना दिया कि वह पाकिस्तान को धमकी देने के सिवा कुछ नहीं कर पा रहा है। यह वही हिन्दूस्तान तो है जिसने आज के दिन [ १६/१२/१९७१] को पाकिस्तान का नक्श बदल दिया था। आज हमारी हालत ये कि जब जिसका जी चाहे हमें हमारे घर में आकर पीट जाता है। हमारी लीडरशिप के पैर इतने भारी हो गए कि वह पाकिस्तान के खिलाफ उठ ही नहीं पा रहे। हिन्दूस्तान की विडम्बना देखो कि उसके लिए क्रिकेट ही खुशी और गम प्रकट करने का जरिए हो गया। क्रिकेट में टीम जीती तो भारत जीता। कोई सोचे तो कि क्या क्रिकेट में जीत ही भारत की जीत है? इसका मतलब तो तो क्रिकेट टीम भारत हो गई, वह मुस्कुराये तो हिन्दूस्तान हँसे वह उदास हो तो हिन्दुस्तानी घरों में दरिया बिछा लें, ऐसा ही ना। क्या हिन्दूस्तान की सरकार उस इराकी पत्रकार की हिम्मत से कुछ सबक नही ले सकती? उसका जूता मारना ग़लत है या सही यह बहस का मुद्दा हो सकता है लेकिन उसने अपनी भावनाएं तो प्रकट की। हिन्दुस्तानी अगर मिलकर अपने दोनों जूते पाकिस्तान को मारे तो वह कहीं दिखाई ना दे। सवा दो करोड़ जूते कोई काम नहीं होते। लेकिन हम तो गाँधी जी के पद चिन्हों पर चलने वाले जीव हैं इसलिए ऐसा कुछ भी नही करने वाले। चूँकि लोकसभा चुनाव आ रहे हैं इसलिए थोड़ा बहुत नाटक जरुर करेंगें।

Friday 12 December 2008

मौन ! अर्थात झूठ

मौन ! अर्थात
सबसे बड़ा झूठ
भला आज
मौन सम्भव है?
बाहर से मौन
अन्दर बात करेगा
अपने आप से
याद करेगा उन्हें
जिन्होंने उसे
किसी भी प्रकार से
लाभ पहुँचायाया
मदद की,
कोसेगा उन जनों को
जिनके कारण उसको
उठानी पड़ी परेशानियाँ
झेलनी पड़ी मुसीबत,
मौन है , मगर
अपनी सफलताओं की
सोच मुस्कुराएगा
जब अन्दर ही अन्दर
कुछ ना कुछ
होता रहा हर पल
तो मौन कहाँ रहा?
मौन तो तब होता है
जब निष्प्राण हों
तब सब मुखर होते हैं
और वह होता है
एकदम मौन
जिसके बारे में
सब के सब
कुछ ना कुछ
बोल रहे होते हैं
यही तो मौन है
जब सब
जिसके बारे में बोले
वह कुछ ना बोले
पड़ा रहे निश्चिंत
अपने में मगन

Tuesday 9 December 2008

आपका कर्जदार हूँ--कुन्नर


videoआदर और मान के हकदार मेरे इलाके के नागरिकों आपने अपने इरादों से ना केवल लोकतंत्र का मतलब सार्थक किया है बल्कि यह संदेश भी घर घर पहुँचाया है कि लोकतंत्र में लोक ही सबसे शक्तिशाली और सर्वोपरि होता है। मैंने आप के बीच में पंच से विधायक तक का चुनाव लड़ा। मगर ये चुनाव इनमे सबसे अलग था। क्योंकि यह चुनाव जनता ने जनता के लिए लड़ा। आप सब जानते हैं कि मैं तो अपने कदम पीछे हटा चुका था लेकिन वह आपका संकल्प और पक्का इरादा ही था जो ताकत बनकर मेरे साथ आ खड़ा हुआ। आप सब मेरे सारथी बने और मुझे चुनाव मैदान में उतर दिया। मगर मैं एकला नहीं था आप सब थे मेरे साथ कदम कदम पर। लोकतंत्र का क्या अदभुत नजारा था जब जनता अपने आप के लिए घर घर वोट मांग रही थी। जीत आप सब की हुई,लोकतंत्र जीता, आपकी भावना को विजयी मिली मगर कर्जदार हुआ गुरमीत सिंह कुन्नर ,आपके प्यार और स्नेह का। चुनाव तो मैं इस से भी पहले जीता हूँ मगर असल जीत अब हुई जब जन जन मेरे लिए गुरमीत सिंह कुन्नर बनकर मैदान में आया। आप विश्वास रखें आपकी भावना को सम्मान मिलेगा,आपके इरादे और संकल्पों को मिलकर पुरा करेंगें। जिस लोकतंत्र के नाम को आपने सार्थक किया है मैं उसको कलंकित नहीं होने दूंगा। मन,कर्म और वचन से आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मैं जिस हाल में जैसे भी हूँ हमेशा आपका था आपका रहूँगा। मेरा हर कदम आम जन की भलाई और इलाके के विकास के लिए उठे ऐसा आशीर्वाद मैं आपसे चाहता हूँ।
---आपका - गुरमीत सिंह कुन्नर

Monday 8 December 2008

जनता ने की नई पहल

videoश्रीगंगानगर जिले के श्रीकरणपुर विधानसभा क्षेत्र की जनता ने एक नया इतिहास रचा है। उन्होंने विधानसभा चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस के मुकाबले अपना उम्मीदवार गुरमीत सिंह कुन्नर को मैदान में उतारा। उनके मुकाबले में थे राजस्थान सरकार के मंत्री सुरेन्द्रपाल सिंह टीटी, कांग्रेस सरकार के पूर्व मंत्री जगतार सिंह कंग के अलावा १० और उम्मीदवार। आज घोषित चुनव परिणाम में जनता के उम्मीदवार गुरमीत सिंह कुन्नर विजयी हुए हुये हैं। गुरमीत सिंह कुन्नर चुनाव लड़ने के मूड में नहीं थे। मगर जनता ने जबरदस्ती उनसे पर्चा भरवाया। उसके बाद उन्होंने ख़ुद पचार की कमान संभाली और गुरमीत सिंह को विजयी बना दिया। श्रीगंगानगर -हनुमानगढ़ जिले की ११ विधानसभा सीट में से ६ कांग्रेस ने जीती जबकि २-२ बीजेपी और निर्दलीय ने। एक सीट माकपा के खाते में गई है। ११ में से ७ आदमी पहली बार विधायक बने हैं। श्रीगंगानगर से कांग्रेस से बीजेपी में आए राधेश्याम गंगानगर और सूरतगढ़ में बीजेपी से कांग्रेस में आए गंगाजल मील चुनाव जीत गए। गत चुनाव में बीजेपी ने दोनों जिलों में दस सीट हासिल की थी। [ विडियो में गुरमीत सिंह कुन्नर]

Sunday 7 December 2008

पत्रकारों पर अंकुश


चुनाव आयोग का डंडा प्रशासन से लेकर उम्मीदवारों पर तो पड़ता ही रहा है अब उसने मीडिया के ओर भी अपना कदम बढ़ा दिया है। राजस्थान में विधानसभा के चुनाव की गिनती ८ दिसम्बर को होनी है। मतगणना स्थल पर जाने के लिए मीडिया को मुख्य निर्वाचन अधिकारी,राजस्थान जयपुर ने पास जारी किए। मगर इस बार गिनती के पत्रकारों को ही ये पास दिए गए। श्रीगंगानगर के पी आर ओ ने ९९ पत्रकारों के नाम मुख्य निर्वाचन अधिकारी को भेजे थे। लेकिन कुल २० पत्रकारों के ही पास जयपुर से बनकर आए। ऐसा ही कुछ हनुमानगढ़ में हुआ। वहां केवल ६ पत्रकारों को मतगणना स्थल पर जाने के लिए पास जारी किए गए। दोनों जिलो के पत्रकारों ने इस बाबत जिला कलेक्टर को अपनी अपनी भावनाओं से अवगत करवाया। किंतु हुआ कुछ नहीं। मीडिया के लिए सख्ती पहली बार हुई है।

Monday 1 December 2008

उफ़! बड़ा कन्फ्यूजन है जनाब

श्रीगंगानगर में एक दर्जन दैनिक समाचार पत्र प्रकाशित होते हैं। सब के सब जानदार शानदार। यहाँ विधानसभा के चुनाव ४ तारीख को होने हैं। लेकिन कोई भी माई का लाल, बड़े से बड़ा पाठक अखबारों में छपने वाली ख़बरों से यह अनुमान नहींलगा सकता कि कौनसा उम्मीदवार जीतेगा। कुछ हैडिंग यहाँ आपकी नजर है----"मान के समर्थन में विशाल जनसभा, समर्थन में उमड़ा जनसैलाब","हजारों की भीड़ ने शहर की फिजां बदली, राधेश्याम की जीत के चर्चे"," गौड़ को समर्थन देने वालों की तादाद बढ़ी"" शिव गणेश पार्क के निकट गौड़ की सभा में उमड़ी भीड़"। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ये तीनों[ मनिंदर सिंह मान, राधेश्याम,राजकुमार गौड़] श्रीगंगानगर से उम्मीदवार हैं। सभी अखबारों में सभी १३ उम्मीदवारों की बल्ले बल्ले होती है। खबरें अब विज्ञापन बन गईं हैं। कोई विज्ञापन लिख कर खबरें छाप रहा है, कोई इम्पेक्ट के साथ। कोई अखबार ऐसा नहीं जो ये लिख सके कि फलां उम्मीदवार की हालत ख़राब, दूसरा जीतेगा। खबरों का नजरिया पुरी तरह बदल गया है। अब तो हालत ये कि जो ख़बर है वह अखबार और चैनल मालिक/संचालक की नजरों में ख़बर है ही नहीं। न्यूज़ चैनल के लिए तो जो महानगर में हुआ वही न्यूज़ है। छोटे नगर में कोई पहल हो तो कोई मतलब नहीं। सब की अपनी अपनी मज़बूरी है। पाठक/दर्शक लाचार और बेबस। वह दाम खर्च कर वह सब देखता और पढता है जो उसे दिखाया और पढाया जाता है। खैर चूँकि मीडिया ताक़तवर है इसलिए ये जो कुछ कर रहें हैं सर माथे।

शर्म नैतिकता अभी बाकी है!

---- चुटकी---
इस बात पर
हँसी आती है,
कि पाटिल में
शर्म और नैतिकता
अभी बाकी है।
----
वो हमें जब चाहें
घर में
घुसकर मारते हैं,
और फ़िर हम
लुटी पिटी हालत में
अपनी बहादुरी की
शेखी बघारतें हैं।