Saturday, 29 November, 2008

बहादुरों को सलाम नमन शहीदों को

देश भर में जब मुंबई काण्ड पर राजनेता राजनीति कर रहें हैं वहीँ भारत-पाक सीमा से सटे श्रीगंगानगर में जागरूक लोगों ने अपने अंदाज में सुरक्षा बलों के बहादुरों को सलाम कर शहीदों को नमन किया। बिना किसी तामझाम के नगर के गणमान्य नागरिकों ने मौन शान्ति मार्च निकाला। इन नागरिकों ने अपने गलों में आतंकवाद के खिलाफ और देश में अमन चैन बनाये रखने की अपील करते पोस्टर लटका रखे थे। महात्मा गाँधी चौक पर इन लोगों ने " भारत माता की जय" "आतंकवाद मुर्दाबाद " के नारे लगाये और मोमबत्ती जलाकर शहीदों को नमन किया। बेशक शान्ति मार्च में शामिल लोगों की संख्या कम थी मगर उनका मकसद बहुत बढ़ा था। इस मार्च में श्रीराम तलवार, विजय अरोडा,अशोक नागपाल,निर्मल जैन,तेजेंदर पाल तिम्मा,मुकेश कुमार, निर्मल जैन,नरेश शर्मा,दर्शन कसेरा आदि प्रमुख लोग थे।

Friday, 28 November, 2008

आडवानी आए पर भाए नहीं

श्रीगंगानगर जिले के एक कस्बे में आज लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवानी ने एक सभा को संबोधित किया। बीजेपी उम्मीदवार वर्तमान सांसद निहाल चंद के पक्ष में हुई इस सभा में उन्होंने एन डी ऐ सरकार की खूब तारीफ की। विकास के नाम पर वोट मांगे। आतंकवाद पर भी बोले। लेकिन वैसा नही जैसा लोग सुनना चाहते हैं। लोग तो वह सुनना पसंद करते हैं जो नरेंद्र मोदी बोलते हैं। उनकी सभा से निहाल चंद को कितने वोट मिलेंगें यह ८ तारीख को पता लगेगा। श्री आडवानी की सभा के लिए सुरक्षा क्या थी उसकी एक बानगी बतातें हैं। उनकी सभा के लिए प्रेस के पास एक बीजेपी कार्यकर्त्ता की जेब में थे। वह भी खाली। ना तो उस पर यह लिखा था कि ये पास किसने किस हैसियत से जारी किए हैं। पास के पीछे काम के बोझ के मारे वहां के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक ने ऐसे किए जैसे स्कूल में मास्टर करते हैं। ना कोई मोहर ना नाम,ना कोई पोस्ट का जिक्र। पास पर ख़ुद नाम लिखो और साहब से हस्ताक्षर करवा लो। यह हाल तो तब है जब मुंबई में आतंकवादियों से सेना लोहा ले रही है। जब कोई घटना हो जाती है तो फ़िर बलि का बकरा तलाश किया जाता है। समझ नहीं आता कि पुलिस के अधिकारी यह सब जानते नहीं या वे जिम्मेदारी से काम नही करना चाहते। बॉर्डर के साथ लगते इस जिले का तो भगवान ही मालिक है। ये तो उसी की कृपा है की सब ठीक से निपट जाता है।

Thursday, 27 November, 2008

कब तक सोते रहेंगें

कभी अजमेर, कभी दिल्ली ,कभी जयपुर और अब मुंबई आतंक के साये में। घंटों चली मुठभेड़,प्रमुख अफसर मरे,विदेशी मरे, आम आदमी मरा। और हम हैं कि सो रहें हैं। देश में सांप्रदायिक सदभाव कम करने की कोशिश लगातार की जा रहीं हैं। आतंकवाद हमारी अर्थव्यवस्था को नेस्तनाबूद करने जा रहा है। हम घरों में बैठे अफ़सोस पर अफ़सोस जता रहें हैं। हमारी सरकार कुछ नहीं कर रही। नेता हिंदू मुस्लिम का नाम लेकर असली आतंकवाद को अनदेखा कर रहें हैं। इस देश में कोई ऐसा नहीं है जो उनसे इस बात का जवाब मांग सके कि यह सब क्यों और कब तक? पहली बार कोई यहाँ खेलनी आई विदेशी टीम दौरा अधुरा छोड़ कर वापिस जा रही है। शेयर बाज़ार बंद रखा गया। देश के कई महत्वपूर्ण राज्यों में चुनाव हो रहें हैं। अगले साल लोकसभा के चुनाव होने हैं। राजनीतिक दल एक दुसरे पर प्रहार कर रहें हैं। आतंकवाद चुनावी मुद्दा है,जिसके सहारे सब अपना वोट बैंक बढ़ाने में लगें हैं। इस मुद्दे पर बोलते तो सभी हैं लेकिन कोई भी करता कुछ नहीं। अगर हम सब इसी प्रकार सोते रहें तो आतंकवादियों के हौंसले बुलंद ही बुलंद होते चले जायेंगें। इसलिए बहुत हो चुका, बहुत सह चुके इस आतंकवाद को,अब हमें एक जुट होकर लडाई लड़नी होगी। शब्दों से नहीं उन्ही की तरह हथियारों से। कब तक सोये रहोगे अब तो जाग जाओ। ----स्वाति अग्रवाल

एक छोटी सी नाव

पानी का एक अनंत समंदर
उसमे उमड़ रहा भयंकर तूफान
आकाश से मिलने को आतुर
ऊपर ऊपर उठती लहरें
ऐसे मंजर को देख
बड़े बड़े जहाजों के कप्तान
हताश होकर एक बार तो
किनारे की आश छोड़ दें,
मगर एक छोटी सी नाव
इस भयंकर तूफान में
इधर उधर हिचकोले खाती हुई
किस्मत की लकीरों को मिटाती हुई
यह सोच रही है कि
कभी ना कभी तो
मुझे किनारा नसीब होगा
या बीच रस्ते में ही
इस समंदर की अथाह गहराइयों में
खो जाउंगी सदा के लिए।
नाव की कहानी मेरे जैसी है
वह समुंदरी तूफान में
किनारे की आस में है
चली जा रही हैं,
और मैं जिंदगी के तूफान में
जिंदगी की आस में
जिए जा रहा हूँ।

Sunday, 23 November, 2008

यूँ अचानक वो याद आए

चौंक चौंक उठता है आलम मेरी तन्हाई का
यूँ अचानक वो हर बात पे याद आतें हैं।
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दस्ताने इश्क में कुछ भी हकीकत हो तो फ़िर
एक अफ़साने के बन जाते हैं अफ़साने बहुत।
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आज दुनिया में वो ख़ुद अफसाना बन के रह गये
कल सुना करते थे जो दुनिया के अफ़साने बहुत।
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पीते पीते जब भी आया तेरी आंखों का ख्याल
मैंने अपने हाथों से तोडे हैं पैमाने बहुत।
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नहीं मालूम अब क्या चीज आंखों में रही बाकी
नजर तो उनके हुस्न पे जाकर जम गई अपनी।
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उन आंखों में भी अश्क भर्रा गए हैं
कभी हम जो भूले से याद आ गए हैं।
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खिजां अब नहीं आ सकेगी चमन में
बहारों से कह दो की हम आ गए हैं।

----सब कुछ संकलित है

Friday, 21 November, 2008

बीजेपी बचाव की मुद्रा में

श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ में विधानसभा की ११ सीट हैं। गत चुनाव में बीजेपी ने सात,कांग्रेस,लोकदल[चौटाला] ने एक एक सीट जीती। दो निर्दलीय भी विजयी हुए थे। इस बार देखते हैं कि कहाँ क्या हो सकता है।श्रीगंगानगर- यहाँ से कांग्रेस के राज कुमारगौड़,बीजेपी के राधेश्याम गंगानगर मुख्य उम्मीदवार हैं। गजेंद्र सिंह भाटी बीजेपी का बागी है। बीएसपी का सत्यवान है। इनके अलावा 9 उम्मीदवार और हैं। जिनके नाम हैं-ईश्वर चंद अग्रवाल,केवल मदान,पूर्ण राम, भजन लाल, मनिन्द्र सिंह मान, राजेश भारत,संजय ,सत्य पाल और सुभाष चन्द्र। बीजेपी के राधेश्याम गंगानगर गत चुनाव में कांग्रेस की टिकट पर ३६००० वोट सर हारे। उन्होंने कुछ दिन पहले ही बीजेपी का दामन थामा और बीजेपी ने टिकट उनको थमा दी। बस यह बात जन जन को हजम नहीं हो रही। जिसको जनता ने ३६०० मतों से हराया वह चौला बदल कर फ़िर सामने है। जिस कारण राजकुमार गौड़ भारी पड़ रहें हैं। बीजेपी के दिमाग में यह बात फिट करदी कि श्रीगंगानगर से केवल अरोडा बिरादरी का उम्मीदवार ही चुनाव जीत सकता है। राधेश्याम गंगानगर इसी बिरादरी से है। जैसे ही कांग्रेस ने इनको नकारा बीजेपी ने लपक लिया। मगर ये बात याद नही आई कि इसी अरोडा बिरादरी के राधेश्याम गंगानगर ने सात चुनाव में से केवल तीन चुनाव ही जीते। जो जीते वह कम अन्तर से जो हारे वह भारी अन्तर से। बीजेपी कार्यकर्त्ता क्या आम वोटर को राधेश्याम का चौला बदलना हजम नहीं हो रहा। राधेश्याम अभी तक बीजेपी के नेताओं को अपने पक्ष में नहीं कर पाए। एक को मना भी नहीं पाते कि दूसरा कोप भवन में चला जाता है। सब जानते हैं कि राधेश्याम गंगानगर ने कांग्रेस में किसी को आगे नहीं आने दिया, इसलिए अगर यह बीजेपी में जम गया तो उनका भविस्य बिगड़ जाएगा। लोग सट्टा बाजार और अखबारों में छपी ख़बरों की बात करतें हैं। लेकिन इनका भरोसा करना अपने आप को विचलित करना है। १९९३ में सट्टा बाजार और सभी अखबार श्रीगंगानगर से बीजेपी के दिग्गज नेता भैरों सिंह शेखावत की जीत डंके की चोट पर दिखा रहे थे। सब जानतें हैं कि तब श्री शेखावत तीसरे स्थान पर रहे थे।

Thursday, 20 November, 2008

हौंसला देंगी ये चिठ्ठियाँ

फाड़ मत इनको कि जब अपनों से दिल घबराएगा
हौंसला देंगी ये चिठ्ठियाँ रहने भी दे।
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तेरा दीवाना गुजरा है जिधर से
खुलीं हैं खिड़कियाँ सारे घरों की।
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सौ बार बिगाड़ी हैं बनाकर तेरी तस्वीरें
रंग उसमे मोहब्बत के उभर के नहीं आए।
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लिख रखा है आंखों में मिले वक्त तो पढ़ना
वो लफ्ज जो तहरीर से बहार नहीं आए।
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घर से निकला तो सोचा कि किधर जाओगे
हर तरफ़ तेज हवाएं हैं बिखर जाओगे।
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सब पंक्तियाँ संकलित हैं।

Tuesday, 18 November, 2008

तन्हा ना अपने आप को पाइए

दुआ करो कि ये पौधा सदा हरा ही लगे
उदासियों में भी चेहरा खिला खिला लगे।
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तन्हा ना अपने आप को पाइए जनाब
मेरी गजल को साथ लिए जाइये जनाब।
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मैं इस उम्मीद पे डूबा कि तू बचा लेगा
अब इसके बाद मेरा इम्तिहान क्या लेगा।
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मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊंगा
कोई चराग नहीं हूँ जो फ़िर जला लेगा।
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मैं उसका हो नहीं सकता बता ना देना उसे
लकीरें हाथ की अपनी वो सब जला लेगा।
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मेरे बारे में हवाओं से कब पूछेगा
खाक जब खाक में मिल जायेगी तब पूछेगा।
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घर बसाने में ये खतरा है कि घर का मालिक
रात को देर से आने का सबब पूछेगा।
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लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।
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ये सब लाइन संकलित की हुई हैं।

Monday, 17 November, 2008

जनता का उम्मीदवार कुन्नर

जब राजनीतिक दलों के नेता बिना समझे टिकट की बन्दर बाँट करतें हैं तो जनता को सामने आना पड़ता है। ऐसा ही कुछ हुआ श्रीगंगानगर जिले के श्री करनपुर में , यहाँ एक नेता हैं गुरमीत सिंह कुन्नर। इनको पार्टी ने टिकट नहीं दिया, नहीं दिया तो नहीं दिया। कुन्नर ने चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया। बस उसके बाद इलाके की जनता कुन्नर के यहाँ पहुँच गई। कोई सौ दो सौ नहीं। कई हजार। श्री कुन्नर ने चुनाव ना लड़ने की बात कही। लेकिन जनता कुछ भी सुनाने को तैयार नहीं हुई। आख़िर श्री कुन्नर को यह कहना पड़ा, जो आपकी इच्छा हो, मैं आपके साथ हूँ। लो साहब, इलाके में जनता का उम्मीदवार बन गया कुन्नर। कांग्रेस और बीजेपी की टिकट पाने वाले जनता को तरस गए और श्री कुन्नर के यहाँ अपने आप कई हजार लोग आ पहुंचे। इस भीड़ ने कुन्नर का पर्चा दाखिल करवाया। भीड़ ने कुन्नर को भरोसा दिलाया है कि वे उनके लिए दिन रात एक कर देंगे। हिंदुस्तान में बहुत कम जगह ऐसा होता होगा जब जनता किसी को जबरदस्ती चुनाव लड़ने को मजबूर करती है। जब जन जन साथ हो तो फ़िर विजय कैसे दूर रह सकती है।

Sunday, 16 November, 2008

गिरगिट समाज के सामने संकट

श्रीगंगानगर की सड़कों पर बहुत ही अलग नजारा था। चारों तरफ़ जिधर देखो उधर गिरगिटों के झुंड के झुंड दिखाई दे रहे थे। गिरगिट के ये झुंड नारेलगा रहे थे " नेताओं को समझाओ, गिरगिट बचाओ", "गिरगिटों के दुश्मन नेता मुर्दाबाद", " रंग बदलने वाले नेता हाय हाय"," गिरगिट समाज का अपमान नही सहेगा हिंदुस्तान"। ये नजारा देख एक बार तो जो जहाँ था वही रुक गया। ट्रैफिक पुलिस को उनके कारन काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था। गिरगिटों के ये सभी झुंड जा रहे थे राम लीला मैदान। वहां गिरगिट बचाओ मंच ने सभा का आयोजन किया था। रामलीला मैदान का नजारा, वह क्या कहने। लो जी सभा शुरू हो गई। जवान गिरगिट का नाम पुकारा गया। उसने कहा- यहाँ सभा करना कायरों का काम है। हमें तो उस नेता के घर के सामने प्रदर्शन करना चाहिए जिसने रंग बदल कर हमारी जात को गाली दी है। बस फ़िर क्या था सभा में सही है, सही है, के नारों के साथ जवान गिरगिट खड़े हो गए। एक बुजुर्ग गिरगिट ने उनको समझा कर शांत किया। गिरगिट समाज के मुखिया ने कहा, इन नेताओं ने हमें बदनाम कर दिया। ये लोग इतनी जल्दी रंग बदलते हैं कि हम लोगों को शर्म आने लगती है। जब भी कोई नेता रंग बदलता है , ये कहा जाता है कि देखो गिरगिट कि तरह रंग बदल लिया। हम पूछतें हैं कि नेता के साथ हमारा नाम क्यों जोड़ा जाता है। नेता लोग तो इतनी जल्दी रंग बदलते हैं कि गिरगिट समाज अचरज में पड़ जाता है। मुखिया ने कहा, हम ये साफ कर देना चाहतें है कि नेता को रंग बदलना हमने नहीं सिखाया। उल्टा हमारे घर कि महिला अपने बच्चों को ये कहती है कि -मुर्ख देख फलां नेता ने गिरगिट ना होते हुए भी कितनी जल्दी रंग बदल लिया, और तूं गिरगिट होकर ऐसा नहीं कर सकता,लानत है तुझ पर ... इतना कहने के बाद तडाक और बच्चे के रोने की आवाज आती है।मुखिया ने कहा हमारे बच्चे हमें आँख दिखातें हैं कहतें हैं तुमको रंग बदलना आता कहाँ है जो हमको सिखाओगे, किसी नेता के फार्म हाउस या बगीचे में होते तो हम पता नहीं कहाँ के कहाँ पहुँच चुके होते। मुखिया ने कहा बस अब बहुत हो चुका, हमारी सहनशक्ति समाप्त होने को है। अगर ऐसे नेताओं को सबक नहीं सिखाया गया तो लोग "गिरगिट की तरह रंग बदलना" मुहावरे को भूल जायेंगे। लम्बी बहस के बाद सभा में गिरगिटों ने प्रस्ताव पास किया। इस प्रस्ताव में सभी दलों के संचालकों से कहा गया कि अगर उन्होंने रंग बदलने वाले नेता को महत्व दिया तो गिरगिट समाज के पाँच जीव हर रोज उनके घर के सामने नारे बाजी करेंगे। मुन्ना गिरी से उनको समझायेंगे। इन पर असर नही हुआ तो सरकार से "गिरगिट की तरह रंग बदलना" मुहावरे को किताबों से हटाने के लिए आन्दोलन चलाया जाएगा। ताकि ये लिखवाया जा सके "नेता की तरह रंग बदलना"। सभा के बाद सभी गिरगिट जोश खरोश के साथ वापिस लौट गए।

Thursday, 13 November, 2008

कभी श्याम बन के कभी राम बन के

श्रीगंगानगर के दिग्गज कांग्रेसी नेता राधेश्याम पार्टी ले टिकट नही मिलने के बाद बीजेपी में शामिल हो गए। यह सब लिखा है " तिरंगे नेता की दुरंगी चाल में" आज कई लोग मिले और कहा कि कुछ हो जाए, तो जनाब उनका सुझाव सर माथे।नेता जी का नाम है राधेश्याम और ये बीजेपी में शामिल हुए हैं। तो कहना पड़ेगा---
कभी श्याम बन के कभी "राम" बन के चले आना, ओ राधे चले आना।कभी तीन रंग में आनाकभी दुरंगी चाल सजानाओ राधे चले आना।
अब राधेश्याम का नाम बदल कर राधेराम कर दिया गया है। ताकि सनद रहे और वक्त जरुरत काम आए। श्रीगंगानगर इलाके में राधेश्याम के राधेराम में बदल जाने की बात लोगों को हजम नही हो रही। क्योंकि यह आदमी कांग्रेस को अपनी माँ कहता था।

Wednesday, 12 November, 2008

तिरंगे नेता की दुरंगी चाल

लगभग चालीस साल पहले की बात है श्रीगंगानगर में राधेश्याम नाम का एक आदमी था। बिल्कुल एक आम आदमी जो पाकिस्तान से आया था। उसने मेहनत की, आगे बढ़ा,थोड़ा जयादा आगे बढ़ा,राजनीति में आ गया। नगरपालिका का चेयरमेन बना। नगर में पहचान बनी,रुतबा हुआ। तकदीर ने साथ दिया दो पैसे भी पल्ले हो गए। उसके बाद इस आदमी ने पीछे मुड़कर देखा ही नही। कांग्रेस ने इसका ऐसा हाथ पकड़ा कि यह कांग्रेस का पर्याय बन गया। १९७७ से २००३ तक सात बार कांग्रेस की टिकट पर श्रीगंगानगर से विधानसभा का चुनाव लड़ा। तीन बार जीता चार बार हारा। एक बार तो राधेश्याम के सामने भैरों सिंह शेखावत तक को हारना पड़ा। उसके बाद राधेश्याम, राधेश्याम से राधेश्याम गंगानगर हो गए। २००३ में यह नेता जी ३६००० मतों से हार गए। तब इनको ३४१४० वोट मिले थे। इनको हराने वाला था बीजेपी का उम्मीदवार। इस बार कांग्रेस ने राधेश्याम को उम्मीदवार नही बनाया। बस उसके बाद तो नेता जी आपे से बहार हो गए,कांग्रेस नेताओं को बुरा भला कहा। बिरादरी की पंचायत बुलाई,लेकिन सभी ने नकार दिया। आज इस नेता जी ने दिल्ली में बीजेपी को ज्वाइन कर लिया। अब इनके श्रीगंगानगर से बीजेपी उम्मीदवार होने की उम्मीद है। इनके घर पर कई दशकों से इनकी शान का प्रतीक बना हुआ कांग्रेस के झंडे के स्थान पर बीजेपी का झंडा लगा दिया गया है। जब झंडा बदला जा रहा था तब लोग यह कह रहे थे कि झंडा डंडा सब बदल गया, तब नारदमुनि का कहना था कि जब आत्मा ही बदल गई तो झंडे डंडे की क्या बात। आत्मा के इस बदलाव ने सब के चेहरे के भाव बदल कर रख दिए। राजनीति तेरी जय हो,ऐसी राजनीति जिसमे नीति कहीं दिखाई नहीं देती।

श्रीगंगानगर में नॅशनल कांफ्रेंस

भारत-पाक सीमा के निकट स्थित श्रीगंगानगर के एम डी कॉलेज में आगामी १२-१३ दिसम्बर को "भारतीय बैंकिंग का बदलता हुआ चेहरा" विषय पर नॅशनल कांफ्रेंस का आयोजन किया जाएगा। इस में हिंदुस्तान के जाने माने लोग अपने पत्रों का वाचन करेंगे। दुनिया भर में जारी मंदी के इस दौर में इस कांफ्रेंस का बहुत महत्व माना जा रहा है।यहाँ यह इसलिए लिखा जा रहा है क्योंकि एक तो यह उस कॉलेज में हो रही है जिसमे मैं पढता था। दूसरा इसके संयोजक हैं मेरे लिए सम्माननीय डॉ ओ पी गुप्ता। कोई भी जानकारी या सुझाव का आदान प्रदान उनसे इस नम्बर ०९४१४९४८९१३ पर किया जा सकता है।

Friday, 7 November, 2008

गम-ऐ-जिन्दगी के मारे हैं

गम ऐ जिंदगी के मारे हैं
हर बाजी जीत के हारें हैं
ये जो मेरी झोली में पत्थर हैं
सब चाहने वालों ने मारें हैं।
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महक दोस्ती की इश्क से कम नही होती
इश्क पर भी दुनिया खत्म नहीं होती
अगर साथ हो जिंदगी में अच्छे दोस्तों का
तो जिन्दगी जन्नत से कम नही होती।
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भुला सकते तो कब का भुला दिया होता
मिटा सकते तो कब का मिटा दिया होता
तुम्हें क्या पता कितना दर्द देतीं हैं यादें
बता सकता तो बता दिया होता।

Thursday, 6 November, 2008

यमराज को भाई बनाया

हिंदुस्तान की संस्कृति उसकी आन बान और शान है। दुनिया के किसी कौने में भला कोई सोच भी सकता है कि मौत के देवता यमराज को भी भाई बनाया जा सकता है। श्रीगंगानगर में ऐसा होता है हर साल,आज ही के दिन। महिलाएं सुबह ही नगर के शमशान घाट में आनी शुरू हो गईं। हर उमर की महिला,साथ में पूजा अर्चना और भेंट का सामान,आख़िर यमराज को भाई बनाना है। यमराज की बड़ी प्रतिमा, उसके पास ही एक बड़ी घड़ी बिना सुइयों के लगी हुई, जो यह बताती है की मौत का कोई समय नहीं होता। उन्होंने श्रद्धा पूर्वक यमराज की आराधना की उसके राखी बांधी, किसी ने कम्बल ओढाया किसी ने चद्दर। यमराज को भाई बनाने के बाद महिलाएं चित्रगुप्त के पास गईं। पूजा अर्चना करने वाली महिलाओं का कहना था कि यमराज को भाई बनाने से अकाल मौत नहीं होती। इसके साथ साथ मौत के समय इन्सान तकलीफ नही पाता। चित्रगुप्त की पूजा इसलिए की जाती है ताकि वह जन्मो के कर्मों का लेखा जोखा सही रखे। यमराज की प्रतिमा के सामने एक आदमी मारा हुआ पड़ा है,उसके गले में जंजीर है जो यमराज के हाथ में हैं। चित्रगुप्त की प्रतिमा के सामने एक यमदूत एक आत्मा को लेकर खड़ा है और चित्रगुप्त उसको अपनी बही में से उसके कर्मों का लेखा जोखा पढ़ कर सुना रहें हैं। सचमुच यह सब देखने में बहुत ही आनंददायक था। महिलाएं ग़लत कर रही थी या सही यह उनका विवेक। मगर जिस देश में नदियों को माता कहा जाता है वहां यह सब सम्भव है।

निष्ठा अपने स्वार्थ तक

श्रीगंगानगर में एक कांग्रेस नेता हैं राधेश्याम गंगानगर। इनको कांग्रेस का पर्याय कहा जाता था। गत सात विधानसभा चुनाव ने ये कांग्रेस के उम्मीदवार थे। बीजेपी के दिग्गज भैरों सिंह शेखावत को भी इनके सामने हार का मुहं देखना पड़ा। इस बार कांग्रेस ने इस बुजुर्ग को टिकट देना उचित न समझा। बस तो निष्ठा बदल गई,बगावत की आवाज बुलंद कर दी। जिनकी चौखट पर टिकट के लिए हाजिरी लगा रहे थे उन नेताओं को ही कोसना शुरू कर दिया। यहाँ तक कहा कि टिकट पैसे लेकर बांटी गई हैं। ऐलान कर दिया कि कांग्रेस उम्मीदवार की जमानत जब्त करवा देंगें। अब इस नेता ने महापंचायत बुलाई है उसमे निर्णय होगा कि नेता जी को चुनाव लड़ना चाहिए या नही। राधेश्याम आज जो कुछ है वह कांग्रेस की ही बदोलत है जिसकी खिलाफत करने की वह शुरुआत कर रहा है। कांग्रेस ने जिस राज कुमार गौड़ को टिकट दी है वह बुरा आदमी नहीं है, साफ छवि का मिलनसार आदमी है। ३७ साल से राजनीति में है। सीधे सीधे किसी प्रकार का कोई आरोप नहीं है। लेकिन उसके पास कार्यकर्त्ता नहीं हैं। इतने लंबे राजनीतिक जीवन में गौड़ के साथ केवल तीन आदमी ही दिखे। ऐसे में वे क्या करेंगे कहना मुश्किल है। रही बात बीजेपी कि तो उसके पास इस से अच्छा मौका कोई हो नहीं सकता। जाति गत समीकरणों की बात करें तो उसके पास प्रहलाद टाक है। राजनीति में बिल्कुल फ्रेश चेहरा। इनके कुम्हार समाज को अभी तक बीजेपी कांग्रेस ने टिकट नहीं दी है। ओबीसी के इस इलाके में बहुत अधिक मतदाता हैं। कांग्रेस में बगावत के समय वे बीजेपी के लिए कोई चमत्कार करने सकते हैं। अन्य उम्मीदवार फिलहाल पीछे हुए हैं, उनकी टिकट मांगने की गति धीमी हो गई उत्साह भी नहीं रहा। जनता तो बस इंतजार ही कर सकती है।

Wednesday, 5 November, 2008

जड़ हुए मील के पत्थर

जड़ हुए मील के पत्थर ये सही है लेकिन
चलने वालों को वो मंजिल का पता देतें हैं।
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ये अलग बात है ना माने उन्हें आज के बच्चे
पर बुजुर्ग की दुआओं का असर आज भी है
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कुछ तो आधार हो विश्वास करने का तेरा
बारिशों को भी घटाओं की जरुरत होती है।
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तू गया था मेरे घर से मेरे दिल से तो नही
क्या तुझे भी बुलावे की जरुरत होती है।

Tuesday, 4 November, 2008

ये कलाम किसका था

वफ़ा करेंगें, निबाहेंगें,बात मानेगें,
तुम्हे कुछ याद है ये कलाम किसका था।
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शख्स वो मामूली सा था
दुनिया जेब में थी हाथ में पैसा न था।
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मंजिल मिले न मिले इसका गम नहीं
मंजिल की जुस्तजू में मेरा कारवां तो है।
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रस्ते को भी दोष दे आँखे भी कर लाल
चप्पल में जो कील है पहले उसे निकाल।
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तुम जो सोचो वह तुम जानो
हम तो अपनी कहते हैं
देर न करना घर जाने में
वरना घर खो जायेंगें।

Monday, 3 November, 2008

खवाब बेहतर है हकीकत से

ख्वाब बेहतर है हकीकत से
शर्त ये है की नींद न टूटे।
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सियासत की अपनी अलग एक जुबां है
लिखा हो जो इकरार तो इंकार पढ़ना।
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बस्ती बस्ती भय के साये
कहाँ मुसाफिर रात बिताये।
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जो काँटों के पथ पर आया
फूलों का उपहार उसी को
जिसने मरना सीख लिया
जीने का अधिकार उसी को।
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चाह गई चिंता मिटी मनवा बेपरवाह
जिसको कुछ न चाहिए वही शहंशाह।

Sunday, 2 November, 2008

काजल की कोठरी में भी झकाझक

हम बुद्धिजीवी हर वक्त यही शोर मचाते हैं हैं की हाय!हाय! राजनीति में साफ छवि और ईमानदार आदमी नही आते। लेकिन देखने लायक जो हैं उनकी क्या स्थिति इस राजनीति में है,उसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। श्रीगंगानगर जिले में है एक गाँव है २५ बी बी। वहां के गुरमीत सिंह कुन्नर पंच से लेकर लेकर विधायक तक रहे। लेकिन किसी के पास उनके खिलाफ कुछ कहने को नही है। कितने ही चुनाव लड़े मगर आज तक एक पैसे का भी चंदा उन्होंने नहीं लिया। किसी का काम करवाने के लिए उन्होंने अपने गाड़ी घोडे इस्तेमाल किए। राजस्थान में जब वे विधायक चुने गए तो उन्हें सबसे ईमानदार और साफ छवि के विधायक के रूप में जाना जाता था। कांग्रेस को समर्पित यह आदमी आज कांग्रेस की टिकट के लिए कांग्रेस के बड़े लीडर्स की चौखट पर हाजिरी लगाने को मजबूर है। जिस करनपुर विधानसभा से गुरमीत कुन्नर टिकट मांग रहा है वहां की हर दिवार पर लिखा हुआ है किगुरमीत सिंह कुन्नर जिताऊ और टिकाऊ नेता है किंतु यह कहानी कांग्रेस के लीडर्स को समझ नहीं आ रही। गत दिवस हजारों लोगों ने गुरमीत सिंह कुन्नर के यहाँ जाकर उनके प्रति समर्थन जताया, उनको अपना नेता और विधायक माना। ऐसी हालातों मेंकोई सोच सकता है कि ईमानदार और साफ छवि के लोग राजनीति में आयेंगें। पूरे इलाके में कोई भी एजेंसी सर्वे करे या करवाए, एक आदमी भी यह कहने वाला नहीं मिलेगा कि गुरमीत सिंह कुन्नर ने किसी को सताया है या अपनी पहुँच का नाजायज इस्तेमाल उसके खिलाफ किया। जब राजनीति का ये हाल है तो कोई क्या करेगा। यहाँ तो छल प्रपंच करने वालों का बोलबाला है। राजनीति को काजल की कोठरी कहना ग़लत नहीं है। जिसमे हर पल कालिख लगने की सम्भावना बनी रहती है। अगर ऐसे में कोई अपने आप को बेदाग रख जन जन के साथ है तो उसकी तारीफ की ही जानी चाहिए। जागरूक ब्लोगर्स,इस पोस्ट को पढ़ने वाले बताएं कि आख़िर वह क्या करे? राजनीति से सन्यास लेकर घर बैठ जाए या फ़िर लडाई लड़े जनता के लिए जो उसको मानती है।

छठी का दूध याद आ गया

---- चुटकी----

राज ठाकरे तो
एक दम से
पलटी खा गया,
शायद उसको
छठी का दूध
याद आ गया।

---गोविन्द गोयल

Saturday, 1 November, 2008

दीपावली की सजावट प्रतियोगिता

श्रीगंगानगर में दिवाली पर बाज़ार में सजावट पतियोगिता का आयोजन किया गया। यह आयोजन पब्लिक पार्क दुकानदार यूनियन ने करवाई थी। दिवाली की रात को श्रीराम तलवार,विधायक ओ पी महेन्द्रा,व्यापार मंडल के अध्यक्ष नरेश शर्मा,राकेश शर्मा, संजय कालड़ा और न्यूज़ चैनल की रिपोर्टर स्वाति अग्रवाल आदि के निर्णायक मंडल ने बाज़ार में दुकानों का अवलोकन कर विजेताओं को ईनाम दिए। उसी समय के दो चित्र ।


हिरणी की आंख में काजल

हुस्न को जरुरत क्या है सजने और संवरने की
हिरणी की आँख में काजल नहीं होता।
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बुरा ना मानो अगर यार कुछ बुरा कह दे
दिलों के खेल में खुद्दारियां नहीं चलती।
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झूठी काया झूठी माया आख़िर मौत निशान
कहत कबीर सुनो भाई साधो, दो दिन का मेहमान।
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अलग ही मजा है फकीरी का अपना
न पाने की चिंता है न खोने का डर है।
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मैं नदी हूँ यही है मुकद्दर मेरा
एक दिन समन्दर में खो जाउंगी।