Friday 27 April 2012

गंगा सिंह जी के बाद अंबरीष कुमार जी का नगर भ्रमण



श्रीगंगानगर-बुजुर्गों ने बताया कि महाराजा गंगा सिंह वेश बदल कर प्रजा का दुख सुख जानने के लिए रात को निकला करते थे। कहीं कुछ गलत देखते सुनते तो उसको ठीक करते। कार्य प्रणाली में सुधार होता। पीड़ित को न्याय मिलता। हम परम सौभाग्यशाली है। बड़भागी है। जो महाराजा गंगा सिंह की इस क्षेत्र में अंबरीष कुमार जैसे महा पुरुष हमारे जिला कलेक्टर बन कर अवतरित हुए। गंगा सिंह जी रात को भ्रमण करते थे वेश बदल कर। अब जमाना खराब है। पुलिस का भी कोई यकीन नहीं। रात्रि नगर भ्रमण में खतरा हो सकता है।  इसलिए कलेक्टर जी दिन में भ्रमण करते हैं। पूरे लवाजमे के साथ। ताकि सब देख लें कि कलेक्टर साहब जी को कितनी चिंता है अपनी प्रजा की। कुछ माह के उनके कार्यकाल में वे कई बार नगर दर्शन कर चुके हैं। पहली बार तो हमने भी उनकी इस पहल के लिए शुक्रिया किया था। लगा था कि बहुत कुछ होगा।परंतु घोषणाओं के अतिरिक्त कुछ नहीं हुआ। जब भी नगर भ्रमण तब कोई नई घोषणा। केवल हवाई किले....ये कर दो....ऐसा होना चाहिए.....अफसरों के पास उनकी हां में हां मिलाने  के अलावा कोई रास्ता नहीं। कलेक्टर इस व्यवस्था में जिले का मालिक है कुछ भी कह सकते हैं...मिनी सचिवालय अबोहर रोड पर ले जा सकते हैं....बस अड्डा सूरतगढ़ रोड पर। ओवर ब्रिज बनने ही वाला है....सीवरेज का निर्माण इस दिन शुरू हो जाएगा। रवीन्द्र पथ  पर ट्रैफिक कम करने के लिए बसें ब्लॉक एरिया से आएंगी...जाएंगी..... बरसाती और गंदे पानी की निकासी के लिए पूंजीपतियों से मदद लेंगे। यह तो कुछ भी नहीं महाराज जी ने एक अधिकारी को इसके लिए टेंडर निकालने के आदेश दे दिये। अधिकारी था ठेठ हरियाणवी....उसने इस बारे में नोट शीट बनाकर महाराज जी के सामने रख दी। हस्ताक्षर कौन करे? जुबां हिलाने और नोट शीट पर स्वीकृति देने में बहुत अंतर है। सरकार भी जल्दी से मंजूरी नहीं देती...कलेक्टर जी कैसे देते। बात वहीं के वहीं। दो दिन चले अढ़ाई कोस.... । पता नहीं कलेक्टर जी ऐसा क्यों करते हैं। उनको कोई कुछ करने नहीं देता या उनको नगर भ्रमण कर घोषणाएँ करने का केवल शौक ही है। कलेक्टर जी से यह सब पूछने की हमारी तो हिम्मत नहीं...जिनकी हिम्मत है वे उनकी लल्ला लोरी करते हैं। इसलिए होने दो नगर भ्रमण...करने दो घोषणाएँ....अपना क्या बिगड़ता है...ऐसी तैसी  तो कांग्रेस की हो रही है, होने दो। बशीर फारुकी की लाइन हैं-इन्ही से हमको जबरन मुस्करा के मिलना पड़ता है,हमारे कत्ल की साजिश में जिन के दिन गुजरते हैं।




Sunday 22 April 2012

आज लोग मल्टी क्लर्ड हो गए हैं-एसपी रूपीन्द्र सिंह


श्रीगंगानगर- आईपीएस रूपीन्द्र सिंह कहते हैं कि श्रीगंगानगर की धरती पर दो साल का कार्यकाल लक्की पीरियड रहा। कारण नहीं पता। लोग मल्टी क्लर्ड  हो गए। पोलिटिकल व्यक्ति मुझ से नहीं सिस्टम से नाराज रहे। मुझे इस क्षेत्र में हरियाली,नहरें,पानी,कल्चर,लोगों का मिलने जुलने का स्वभाव बहुत पसंद आए। बहुत काम किया...पास भी हुए फेल भी। एसपी रूपीन्द्र सिंह से तबादले के बाद उनके निवास पर बात चीत हुई। रूपीन्द्र सिंह ने कहा कि यहां मुझे कोई खास परेशानी नहीं हुई। कभी हुई तो वह शॉर्ट आउट हो गई। किसका सहयोग रहा....किसने साथ दिया? रूपीन्द्र सिंह थोड़े दार्शनिक हो गए। कहने लगे...आज लोग मल्टी क्लर्ड हो गए। कहने में कुछ करने में कुछ।मुंह पर दोस्त बनकर आएंगे। असल में दोस्ती निभाएंगे नहीं। उनसे परेशानी हुई....मुझे क्या ऐसे लोगों से सिस्टम को परेशानी है। ये दो चेहरे वाले लोग प्रभावशाली और पहुंचवाले हैं। श्री सिंह के अनुसार उन्हे आमजन का बहुत अधिक सहयोग मिला। वे कहते हैं आम जन के ऐसे काम हुए जिनका कोई रिकॉर्ड किसी थाना या कोर्ट में नहीं है।ऐसे लोगों ने आकर जब काम होने की बात कही तो सुकून मिला। धार्मिक व्यक्ति होने के सवाल पर रूपीन्द्र सिंह ने कहा.. मेरा धर्म से नाता उतना ही है जितना एक व्यक्ति का उसके धर्म से।मुझे समझ नहीं आ रहा मुझे धार्मिक क्यों कहा जाता है। जाति का पक्ष करने संबंधी विवाद के बारे में रूपीन्द्र सिंह बोले कि इसका जवाब तो वहीं देंगे जिन्होने ये विवाद पैदा किया। अपने आप को जज करना मुझे अच्छा नहीं लगता...लोग करे विश्लेषण मेरे बारे।पोलिटिकल लोगों की नाराजगी के संबंध में उनका कहना था कि मुझसे किसी ने नाराजगी व्यक्त नहीं की। वैसे मुझ से कोई नाराज नहीं। नाराजगी थी तो सिस्टम से जिसका मैं हिस्सा हूं। चार कलेक्टर्स के साथ काम किया। बहुत काम करने का मौका मिला। ऐसा कोई समय नहीं आया कि बहुत दुखी या टेंशन में रहा। कभी कोई वक्त आया भी तो निकल गया। फिर सब ठीक हो गया। दो साल में कानून व्यवस्था की वजह से कोई दिक्कत नहीं आई। कोई घटना हुई तो उसका खुलासा भी हुआ।अच्छा भी हुआ तो बुरा भी किन्तु अंत में बैलेंस शीट में रिजल्ट  बढ़िया ही आया। बातचीत के समय घर की बिल्ली आस पास म्याऊँ-म्याऊँ करती रही। रूपीन्द्र सिंह जी बिल्ली को  मिठाई खिलाते हुए बोले...अपने ननिहाल में है ये... मैं पता नहीं इसका मामा लगता हूं या नाना। एसपी रूपीन्द्र सिंह कई दिनों से अवकाश पर हैं। उनके चनक पड़ गई। उनसे मिलने लगातार विभाग के अधिकारी आ रहे थे। शुभकामनाओं का आदान प्रदान हुआ और बात चीत समाप्त। चंद्रभान की लाइन हैवक्त ने कितनी बदल डाली है सूरत आपकी,आईने में अपनी तस्वीर पुरानी देखना।

Wednesday 18 April 2012

सबके अपने अपने दुख: अपने अपने सुख:


श्रीगंगानगर-हम, हम क्या गली का हर बच्चा डॉ गुरदास जी से बहुत डरता था। उनको आते देख बच्चे कंचे खेलना भूल जाते। कंचों की चिंता की बजाए कान खिंचाई की फिक्र अधिक होती। वे कोई डॉन या आज की पुलिस नहीं थे। वे ना तो परिवार के सदस्य थे ना रिश्ते में कुछ लगते थे। डॉ साहब तो गजसिंहपुर में हमारे पड़ौसी थे। उनको किसी भी बच्चे को डांटने का अधिकार था। किसकी मजाल जो घर जाकर डॉ साहब से खाई डांट का जिक्र भी करता...जिक्र किया तो फिर और डांट। 35-40 साल पहले इसी प्रकार का अधिकार सभी पड़ौसियों के पास होता था।

घरों की छतों पर कपड़े सुखाती ,मसालों,अनाज के धूप लगाती हुई औरतें पड़ौसी महिलाओं से बात कर लिया करती थी। नई दुल्हन इसी प्रकार पड़ौस की बहुओं से इसी माध्यम से जान पहचान करती। बात बात में नए रिश्ते बन जाते। किसी यहां जंवाई आता तो गली की कई लड़कियां जीजा-जीजा कहती हुई पहुँच जाती ठिठोली करने। किशोर वय तक हम उम्र लड़के लड़कियां खेलते रहते गली में,एक दूसरे के घर। रिश्तों की सुचिता,प्रेम और भाईचारे की महक से गली मौहल्ला महका करता था। एक का सुख सभी का होकर कई गुणा बढ़ जाता और एक का दुख दर्द बंट कर कम हो जाता।

अपनेपन की वो मिठास,स्नेह और विश्वास अब कहां है। क्या मजाल की आप पड़ौसी के किसी बच्चे को उसकी किसी गलत हरकत पर डांट सको! अब तो अपने बच्चों को डांटने की हिम्मत नहीं होती। अपने बच्चे की गलती पर भी मन मसोस कर रहना पड़ता है पड़ौसी के बच्चे की तरफ तो देखने का रिवाज ही नहीं रहा। घर की बहू अब पड़ौसी की बहू को आते जाते देख सकती है। घर की छत पर उससे मिलना असंभव है। छतों की दीवारें बहुत बड़ी हो गई और हमारी सोच छोटी...हमारे कद से भी छोटी। आज दूसरे की छत की ओर झाँकने में भी शंका आती है...कोई देख ना ले...कोई हुआ तो क्या सोचेगा?जंवाई के आने पर गली की लड़कियों का आना अब नामुमकिन है। गली में लड़के लड़कियों का साथ खेलना......तौबा तौबा...क्या बात करते हो। अब तो बात करते ही बतंगड़ बनते ,बनाते देर नहीं लगती। वातावरण दूषित हो गया किसी को दोष देने का क्या मतलब।

यह कोई किसी एक परिवार,गली,मौहल्ले या शहर की बात नहीं है। सभी स्थानों पर सभी के साथ ऐसा ही होता है। पता नहीं हवा में कुछ ऐसा घुल गया या खान पान का असर है। या फिर प्रकृति की कोई नई लीला। कहते हैं अब गन्ने में पहले जैसी मिठास नहीं रही और ना सब्जियों में वो ताजगी भरा,तृप्त कर देने वाला स्वाद।लेकिन क्या हमारे आपसी रिश्तों में हैं ये सब....जब रिश्तों में नहीं तो हम फिर इनमें क्यों खोजते हैं।

प्यार की बात

तुझसे प्यार की बात बहुत मुश्किल है
वक्त तो तुझे देखने में ही गुजर जाता है।


Wednesday 11 April 2012

टूट गए हैं रिश्ते

टूट गए हैं रिश्ते
किस्से खतम हुए
तुम क्या जानो बात
कितने जतन हुए।
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गली मोहल्ले प्यारे प्यारे
पूछ रहें हैं मिल के सारे
रहते थे जो साथ
वो क्यों बिछड़ गए।