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Wednesday, 12 May 2010

साथी तू बिछड़ गया,तोड़ी दोस्ती

आज एक ऐसा काम करना पड़ा जो मैं समझता था कि मुझे नहीं करना पड़ेगा।तीस साल पुराने मित्र को अपने कंधे पर वहां सदा के लिए छोड़ आया जहाँ जाना कोई नहीं चाहता लेकिन जाना सबको पड़ेगा। बात १९८० के आस पास की है।हरी किशन अग्रवाल उम्र में मुझसे कोई पांच साल छोटा था। दोस्ती हुई, ना जाने कैसे हमारे ग्रुप में उसका नाम एक्स्ट्रा प्लयेर हो गया। इंजीनियर बनना चाहता था, मगर सफलतम कारोबारी बन गया। बीज के कारोबार में उसने वह तरक्की की जो लोग कई दशक तक नहीं कर सकते। तीस साल में कभी उसको गुस्सा करते नहीं देखा। कोई दोस्त नाराज होता तो बस मुस्कुरा कर उसकी नाराजगी दूर कर देता।१०-११ मई की रात को पंजाब में एक सड़क दुर्घटना ने उसकी जान ले ली। आज उसके दस साल के लड़के ने सफ़ेद धोती बांध कर अंतिम क्रिया करवाई तो दिल के जैसे टुकड़े टुकड़े हो गए। आँख से आंसू तो नहीं निकले लेकिन रोम रोम अन्दर से रो रहा था। इसकी तो कल्पना ही नहीं की थी कि ऐसा देखना पड़ेगा। उम्र तो मेरी अधिक थी चला वह गया। उसकी मौत के समाचार से लेकर अब तक आँखों में बस उसी और उसीके साथ बिताये पलों का स्लाइड शो चल रहा है। हालाँकि वह हमारे ग्रुप का एक्स्ट्रा प्लयेर था, इसके बावजूद वह अपनी इनिंग खेल कर चला गया। इनिंग भी शानदार,जानदार दमदार।
एक बार मैंने उसके घर फोन किया, उसकी मम्मी ने फ़ोन उठाया। मैंने कहा,आंटी हरी से बात करवाना। आंटी ने कहा-हरी तो गोविंद के साथ फिल्म देखने गया है। मैंने बताया कि मैं गोविंद ही बोल रहा हूँ। तब आंटी को गुस्सा आया और मुझे हंसी। शाम को जनाब मिले, उससे कहा भई तूने फिल्म जाना था तो मुझे बता तो देता ताकि तेरा झूठ सच बना रहता। आज भी यह बात हम लोग भूले नहीं हैं। मगर अब वह नहीं जिसके साथ इस बात को लेकर चुहल बाजी किया करते थे। उसके दो मासूम लड़कों को देखने की हिम्मत नहीं हुई, उनसे बात करने का हौसला तो होते होते ही होगा।