Thursday 1 November 2012

धर्म की चादर में लिपटा कुछ और ही है ये


श्रीगंगानगर- आधी रात का समय....दूर बहुत तेज आवाज में ईश्वर की आराधना । रात के सन्नाटे में यह आराधना मन को बजाए सुकून देने के दिमाग की नशों में झिंझोड़ रही हैं। बेशक धर्म के बारे में अधिक नहीं जानता। अध्यातम को बहुत कम समझता हूं। धर्म स्थल पर भी कभी कभार ही जाना होता है। इसके बावजूद सौ प्रतिशत धार्मिक हूं।  पूरी तरह आस्तिक हूं। हर स्थान पर ईश्वर की सत्ता को मानता हूं। ईश्वर के अस्तित्व को दिल से स्वीकार भी करते हैं। सभी कहते हैं कि कोई भी धर्म किसी को भी किंचित मात्र दर्द,परेशानी,तकलीफ नहीं देता। जो देता है, वह धर्म हो ही नहीं सकता। वह केवल और केवल धर्म की चादर ओढ़े कुछ और ही  होगा। धार्मिक अनुष्ठान परिवार की सुख शांति,खुशी,उपलब्धि के लिए ही करवाया जाता है। ईश्वर,चाहे उसका रूप कैसा भी हो, वह तभी प्रसन्न होगा, जब उस अनुष्ठान से किसी को भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कोई दिक्कत न हो। अब जो तेज आवाज दूर दूर तक गूंज गूँजती है, उससे कितने ही परिवारों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। कोई बच्चा सो नहीं पाता। किसी बुजुर्ग ने अभी ट्राइका की गोली ली थी, वह बेकार हो गई। किसी को पढ़ना है। कोई तीन घंटे नींद ले अपने काम पर जाएगा। कोई थक कर अभी लेटा ही था कि स्पीकर का शोर कानों से होता हुआ दिमाग को खट खट करने लगा।  सड़क पर टैंट लगा कर आने जाने का रास्ता बंद कर दिया गया। गली में छोटे बड़े वाहन खड़े हैं। किसी के घर का गेट रुक गया। एक परिवार की सुख शांति के लिए पूरे मोहल्ले की शांति जाती रही। आयोजक क्या सोचते हैं कि मोहल्ले वाले उनको दुआ दे रहें होंगे कि बहुत बढ़िया...क्या कहने....ईश्वर  हर रोज इस सड़क पर हर रात इस प्रकार के आयोजन करवाए। गलत...सौ प्रतिशत गलत। कोई दुआ नहीं देता। हर कोई अंदर ही अंदर परेशान होता है। किन्तु बोलता नहीं। डरता है, अपने आप से नहीं तो उससे जरूर जिसके यहां आयोजन है। उससे नहीं तो समाज से। समाज का डर नहीं भी लगता तो  शिकायत कर बुरा बनने का डर तो लगता ही है। इतना ही नहीं जो इस संबंध में बोले वही धर्म का दुश्मन। एक नंबर का नास्तिक। कोई उसकी भावना को नहीं समझेगा। कोई ये जानने की कोशिश नहीं करेगा कि असल में रात को इस प्रकार के आयोजन से सच में कितने ही लोगों को जबरदस्त मानसिक परेशानी से दो चार होना पड़ता है। अब जिससे किसी को परेशानी हो वह धर्म तो नहीं हो सकता। कोई माने चाहे ना माने। धर्म तो वह जो मन के संताप को हर ले। धर्म तो वह जो मानसिक शांति प्रदान करे। असली धर्म तो वही जो इंसान को दूसरों के प्रति दया करना सिखाए। उसकी परेशानी को कम करे। परंतु इससे किसी को क्या मतलब। हमने तो धर्म करना है। चाहे उसका तरीका कितना ही अधार्मिक,अनैतिक,दूसरों को पीड़ा दायक ही क्यों ना हो। आयोजन किसी को जान बूझकर  परेशान करने के लिए नहीं होते। बस, थोड़ी अनदेखी दूसरों के लिए परेशानी बन जाती है। कोई ये सोच ले कि अगर ऐसा दूसरा करता तो उसकी टिप्पणी क्या होती? इतने से ही सब ठीक हो जाए। क्योंकि उसके बाद वह लाउडस्पीकर की आवाज अधिक ऊंची नहीं करेगा। साथ में इस बात का भी ध्यान रखेगा कि वाहन से किसी के घर का गेट या सड़क ना रुके। इतना करने मात्र से ही आनंद अधिक जाता है।  सब की परेशानी भी समाप्त।  कचरा पुस्तक की लाइन है...लंगर हमने लगा दिये जीमे कई हजार, भूखे को रोटी नहीं ये कैसा धर्माचार।



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