Thursday 8 November 2012

भगवानों की बिक्री का सीजन है ये......सच्ची


श्रीगंगानगर-भगवान की बिक्री का सीजन है इन दिनों। भगवान इसका हो, उसका हो, किसी का हो, सब बिकेंगे। दुकान दुकान बिकेंगे। चौराहों पर सेल लगेगी। आवाज लगा लगा कर बेचे जाएंगे। गरीब का छोटा भगवान। अमीर का बड़ा भगवान। हर साइज का। हर कीमत का। सस्ते से सस्ता और महंगे से महंगा भगवान। जैसी जिसकी जेब उसी प्रकार का भगवान। कागज का भगवान। साधारण फ्रेम में लगा भगवान। महंगे डिजायन वाले फ्रेम में सजा भगवान। सोने -चाँदी का बड़े बड़े वैभव शाली शो रूम में बैठा  भगवान। सब के सब बिकाऊ। भांति भांति के भगवान। अलग अलग रूप धरे भगवान। कोई देवी के रूप में तो कोई गुरु के रूप में। जिसकी जैसी चाह वैसा भगवान उपलब्ध है इस बाजार में। गरीबों का भगवान हाथ ठेलों पर इधर उधर गलियों में आवाज लगाकर बेचा जाता है। अमीरों के भगवान सजे बैठे रहते हैं बड़े बड़े सौ रूम में,उनको खरीदने उनके पास जाना पड़ता है। दुकानों पर पैरों में पड़े हैं हमारे भगवान बिकने के लिए। जूते लगें या झूठे सच्चे हाथ,तब भी कोई फर्क नहीं पड़ता भगवान को। मन के काले व्यक्ति खरीदें या मन के उजले,कोई अंतर नहीं इस भगवान के। जिसने खरीदा उसके साथ उसे जाना ही है। जब तक नहीं बिकता तब तक उसे यहाँ वहाँ जहां मर्जी हो पटक दिया जाता है। उसके साथ कैसा भी व्यवहार हो कोई दंगा नहीं भड़कता। किसी की आस्था पर चोट नहीं लगती। धार्मिक से धार्मिक व्यक्ति की भावना आहात नहीं होती। कोई भगवान को खरीद हाथ में ले जाता है कोई बड़ी गाड़ी में। कोई रिक्शा में अपने पैरों के पास रख ले जाता है। किसी को कुछ नहीं कहता। ये भगवान होता ही ऐसा है। बिकाऊ जो है। जो बिकने के लिए बाजार में आ गया उसकी क्या तो आत्मा और क्या उसका स्वाभिमान। कीमत लग गई तो फिर काहे की शर्म। बस, जैसे ही यह भगवान,दुकान,फैक्ट्री,ऑफिस या धर्मस्थल में स्थापित हो जाता है। तब यह किसी के बस में नहीं रहता। तब यह भगवान हो जाता है। गुरु हो जाता है। सच्ची का भगवान। जीता जागता गुरु। उसके बाद किसी की मजाल नहीं कि कोई उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाए। उसका अपमान करे। निरादर करे। प्रलय हो जाएगी। धर्म पर हमला मान कत्ले आम भी हो जाए तो कोई बात नहीं। यही है इस भगवान की करामात। जब तक बाजार में बिकाऊ था, निर्जीव रहा। सभी के सभी बरताव सहन किए। जैसे ही उसे स्थापित किया वह सिर चढ़ कर बोलने लगा। यही है असली भगवान। जब बिका तब मिजाज कुछ और जब सजा तब कुछ और। इंसान का मिजाज भी तो ऐसा ही है। स्थापित होते ही स्वभाव बदल जाता है। फिर वह चाहे इंसान के द्वारा गढ़ा,बनाया भगवान हो या भगवान के द्वारा बनाया गया इंसान। सच कहता हूँ ....हमारे तराशे हुए पत्थर मंदिर में भगवान बने बैठे हैं।

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