Tuesday, 13 November 2012

हर अंधेरा गुम हो जाए दीपो की रोशनी में


श्रीगंगानगर-पांच दिन का निराला,अलबेला महापर्व दिवाली। एक ऐसा त्यौहार जिसके समकक्ष कोई और हो ही नहीं सकता। यूं तो हर त्यौहार की अपनी कथा  है। उसका धार्मिक,सामाजिक महत्व है। लेकिन दिवाली की बात ही अलग है। धरती का जर्रा जर्रा इसके उत्साह से सराबोर हो जाता है। राज हो या रंक सभी के दिलों में यह उमंग भर देता है। उत्साह का संचार करता है। बच्चे से लेकर बड़े तक के पैरों में जैसे घुंघरू बांध देती है प्रकृति। कई दिन पहले साफ सफाई। थोड़ी बहुत ख़रीदारी। जिसके पास दस रुपए वह दस रुपए खर्च करेगा । जिसके पास करोड़ों वह करोड़ों खर्च करता है। हर परिवार,इंसान दिवाली पर खर्च करता है अपनी जेब के हिसाब से। घर घर में पता ही नहीं कितने जाने अंजाने ऐसे काम,ख़रीदारी होती है जिसको दिवाली पर करेंगे और फिर किया जाता है। पांचों दिन का अलग धार्मिक,पौराणिक महत्व साथ में प्रकृति के स्वरूप को बनाए रखने का काम भी। दिवाली पर जो उत्साह,उमंग,खुशी का संचार हर दिल में हुआ है। वह हर पल हर क्षण आपके अंदर बना रहें। जीवन की हर खुशी,हर आनंद हर दिन आपके घर दिवाली बन के आती रहे। आपकी लाइफ का हर क्षण एक त्यौहार हो। गणपति देव आपकी हर विध्न,बाधा को हर ले। लक्ष्मी माँ की अपार  कृपा आप पर,आपके परिवार पर,आपके शुभचिंतकों और सगे संबंधियों पर हमेशा बनी रहे। किसी भी प्रकार के अभाव का भाव कभी किसी चेहरे पर महसूस ना हो। अंधेरा किसी भी प्रकार का हो वह दिवाली के दीपों की रोशनी में गुम हो जाए। हर इंसान के अंदर इतने दीप रोशन हों कि उसे कभी किसी अंधेरे का सामना ना करना पड़े। थोड़े में अधिक बरकत हो। घर से लेकर समाज में सभी के बीच आपसी भाईचारा हो। सबसे बढ़कर एक दूसरे के प्रति प्रेम की भावना हो। क्षेत्र में शांति और सौहार्द का वातावरण हो। क्योंकि शांति के अभाव में तो सब कुछ बेकार है। क्षेत्र का विकास हो। किसी को किसी प्रकार का अभाव ना रहे। पेट में रोटी हो। तन पर लंगोटी हो और रहने के लिए कोठी हो चाहे छोटी हो। रोटी,कपड़ा और मकान से कोई महरूम ना रहे। जैसी जिसकी जरूरत हो वह पूरी हो। बच्चों में संस्कार हों। बुजुर्गों का आदर मान हो।  उनके अनुभव का सम्मान हो। सभी की सभी बढ़िया कामना पूरी हो। किसी से किसी की दुश्मनी न हो। लेकिन यह सब केवल हमारे लिख देने और आपके पढ़ देने मात्र से नहीं होगा। इसके लिए प्रयास प्रयास करने पड़ते हैं। कर्म प्रधान है सब कुछ। वो तो करना ही पड़ेगा। दीपक में तेल डाल दिया। बाती लगा दी। वह अपने आप नहीं जलता। उसको जलाना  पड़ता है। ऐसी ही ये जीवन है। इसको चलाना है।कहते भी हैं कि जीवन चलने का नाम। बस, जिस तरफ चल रहें हैं वह दिशा सही हो तभी सभी की दशा शानदार,जानदार और दमदार होगी। दीपक अंधेरे में जले तभी उजियारा होगा। यही जीवन है। कदम सही दिशा में बढ़े तभी काम। वरना तो समय और मेहनत दोनों बेकार। यही करना है। दीपक बन कर जलना बहुत मुश्किल है। आज के दिन यही दुआ है कि अगर किसी के जीवन में थोड़ा सा भी अंधेरा किसी कोने में है तो वहाँ प्रकाश पहुंचे। अंधेरा समाप्त हो। उजियारा हो सब के दिलों में। सब के घरों में। याद रहे, अंधेरे का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता। अंधेरा तभी है जब रोशनी ना हो। जैसे ही दीपक जलता है अंधेरा समाप्त। इसलिए रोशन करना है सब कुछ। आज ही नहीं...हर क्षण। सभी को दिवाली की मंगलकामना।

Saturday, 10 November 2012

वर्तमान ने बच्चों से छीन लिया उनका बचपन


श्रीगंगानगर-क्विज का सेमीफाइनल। दो बच्चों की इंटेलिजेंट टीम। आत्म विश्वास से भरपूर। बढ़िया अंकों से फाइनल में पहुंची। दूसरे  सेमीफाइनल से टीम उनसे भी अधिक अंक लेकर फाइनल में आई। फाइनल दिलचस्प होने की उम्मीद। परंतु पहले वाली टीम का एक बच्चा डिप्रेशन में आ गया। सिर दर्द,चक्कर। परिणाम जो मुक़ाबला दिलचस्प होना था वह एक तरफा रहा। ये क्या है? अभी से ये हाल! छोटे से कंपीटीशन में इतना अवसाद। हार से इतना डर,घबराहट। जीत हार किसी प्रतियोगिता का ही नहीं इस जीवन का भी प्रमुख हिस्सा है। जिंदगी के किसी मोड़  पर जीत और किसी राह पर हार। ये घटना कोई मामूली नहीं। ऐसा लगता है जैसे वर्तमान में बच्चों से उनका बचपन छीन लिया गया हो। ये सब खुद माता-पिता सबसे अधिक करते हैं। उसके बाद थोड़ा बहुत योगदान स्कूल वालों का भी है। पैरेंट्स भी बेचारे क्या करें! माहौल ही ऐसा है। इसके लिए चाहे अपने ही मासूम बच्चों की शिकायत स्कूल में क्यों ना करनी पड़े, हाय! ये शरारती बहुत है। कहना नहीं मानता। घर में दिमाग बहुत खाता है। हद हो गई! बच्चा शरारत तो करेगा ही। उसे नई से नई जानकारी भी चाहिए। हर किसी के बारे में जानने की उसकी जिज्ञासा उसकी बाल सुलभ प्रकृति है। बस! पैरेंट्स चिढ़ जाते हैं। कभी टीचर भी तंग आ जाते हैं। कारण! उनको पढ़ाई के अतिरिक्त कुछ भी तो पसंद नहीं। घर से पढ़ते हुए जाओ। स्कूल से पढ़ते हुए आओ और आते ही फिर पढ़ो। या फिर हर वह कंपीटीशन जीतो जिसमें भाग लेते हो। नबरों की हौड़ और रैंक की दौड़ ने बच्चों से उसकी भवनाएं,संवेदनाएं,लड़कपन,नटखटपन,खट्टी-मीठी शरारतें सब छीन  ली। उसे एक चलता फिरता गुड्डा/गुड्डी बना दिया गया। क्योंकि पैरेंट्स बच्चों में अपने अधूरे रहे सपने देखने लगते हैं। अपनी इच्छा,कामना बच्चों की मार्फत पूरा करना चाहते हैं। जो पैरेंट्स खुद ना बन सके वह बच्चों को बना अपनी कुंठा समाप्त करने की इच्छा पाल लेते हैं। गिनती के बच्चे होंगे जिनको अपनी पसंद का विषय चुनने की छूट होती है। बहुत कम बच्चे होते हैं जो अपनी मर्जी से रास्ते तय करते हैं। समाज की बदलती सोच ने बच्चों को उम्र से पहले ही बड़ा कर दिया। शिशु अवस्था से सीधे जवानी। बचपन! सॉरी,समय नहीं है। इसलिए नो ब्रेक!  ऐसा बड़ा भी किस काम का जो दही में ही पड़ा रहे। ऐसे बड़े होने वाले अपनी जिंदगी का कौनसा बोझ उठाएंगे! जिसमें समाज के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का तनाव होगा। पैकेज की चिंता होगी।  बॉस के नित नए टार्गेट होंगे।  पैरेंट्स की इच्छा और  पत्नी की अलबेली कामनाएँ होंगी। साथ में होगा सोशल स्टेटस का दवाब। ना गली में कोई खेल रहे ना घर में कोई बच्चे। दूध पीने वाले बच्चों की पीठ पर पिट्ठू बैग टांग स्कूल भेज कर समाज में अपने आप्क अग्रणी रखने का अहम  पुष्पित,पल्लवित किया जाता है। अब लौटना मुश्किल है। बहुत देर हो चुकी। जो बचे हैं वे भी इस हौड़ में शामिल होने की दौड़ में अपना सुख चैन गंवा चुके हैं। इसका अंत क्या होगा समय के अलावा कौन जानता है?

Thursday, 8 November 2012

भगवानों की बिक्री का सीजन है ये......सच्ची


श्रीगंगानगर-भगवान की बिक्री का सीजन है इन दिनों। भगवान इसका हो, उसका हो, किसी का हो, सब बिकेंगे। दुकान दुकान बिकेंगे। चौराहों पर सेल लगेगी। आवाज लगा लगा कर बेचे जाएंगे। गरीब का छोटा भगवान। अमीर का बड़ा भगवान। हर साइज का। हर कीमत का। सस्ते से सस्ता और महंगे से महंगा भगवान। जैसी जिसकी जेब उसी प्रकार का भगवान। कागज का भगवान। साधारण फ्रेम में लगा भगवान। महंगे डिजायन वाले फ्रेम में सजा भगवान। सोने -चाँदी का बड़े बड़े वैभव शाली शो रूम में बैठा  भगवान। सब के सब बिकाऊ। भांति भांति के भगवान। अलग अलग रूप धरे भगवान। कोई देवी के रूप में तो कोई गुरु के रूप में। जिसकी जैसी चाह वैसा भगवान उपलब्ध है इस बाजार में। गरीबों का भगवान हाथ ठेलों पर इधर उधर गलियों में आवाज लगाकर बेचा जाता है। अमीरों के भगवान सजे बैठे रहते हैं बड़े बड़े सौ रूम में,उनको खरीदने उनके पास जाना पड़ता है। दुकानों पर पैरों में पड़े हैं हमारे भगवान बिकने के लिए। जूते लगें या झूठे सच्चे हाथ,तब भी कोई फर्क नहीं पड़ता भगवान को। मन के काले व्यक्ति खरीदें या मन के उजले,कोई अंतर नहीं इस भगवान के। जिसने खरीदा उसके साथ उसे जाना ही है। जब तक नहीं बिकता तब तक उसे यहाँ वहाँ जहां मर्जी हो पटक दिया जाता है। उसके साथ कैसा भी व्यवहार हो कोई दंगा नहीं भड़कता। किसी की आस्था पर चोट नहीं लगती। धार्मिक से धार्मिक व्यक्ति की भावना आहात नहीं होती। कोई भगवान को खरीद हाथ में ले जाता है कोई बड़ी गाड़ी में। कोई रिक्शा में अपने पैरों के पास रख ले जाता है। किसी को कुछ नहीं कहता। ये भगवान होता ही ऐसा है। बिकाऊ जो है। जो बिकने के लिए बाजार में आ गया उसकी क्या तो आत्मा और क्या उसका स्वाभिमान। कीमत लग गई तो फिर काहे की शर्म। बस, जैसे ही यह भगवान,दुकान,फैक्ट्री,ऑफिस या धर्मस्थल में स्थापित हो जाता है। तब यह किसी के बस में नहीं रहता। तब यह भगवान हो जाता है। गुरु हो जाता है। सच्ची का भगवान। जीता जागता गुरु। उसके बाद किसी की मजाल नहीं कि कोई उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाए। उसका अपमान करे। निरादर करे। प्रलय हो जाएगी। धर्म पर हमला मान कत्ले आम भी हो जाए तो कोई बात नहीं। यही है इस भगवान की करामात। जब तक बाजार में बिकाऊ था, निर्जीव रहा। सभी के सभी बरताव सहन किए। जैसे ही उसे स्थापित किया वह सिर चढ़ कर बोलने लगा। यही है असली भगवान। जब बिका तब मिजाज कुछ और जब सजा तब कुछ और। इंसान का मिजाज भी तो ऐसा ही है। स्थापित होते ही स्वभाव बदल जाता है। फिर वह चाहे इंसान के द्वारा गढ़ा,बनाया भगवान हो या भगवान के द्वारा बनाया गया इंसान। सच कहता हूँ ....हमारे तराशे हुए पत्थर मंदिर में भगवान बने बैठे हैं।

Saturday, 3 November 2012

गुलाब की तरह थे करवा चौथ पर पतियों के चेहरे


श्रीगंगानगर-दोस्त की मैडम 24 घंटे में से कुछ घंटे ही बिना मेकअप के रहती है। सजी संवरी  गुड़िया सी  लगभग हर समय। दोस्त घर में हो या ना हो, उसने तो बनी ठनी रहना है। बीस सालों में आज तक दोस्त को ये नहीं पता कि वो अधिक सुंदर कैसे दिखती है। मेक अप के या बिना मेक अप के। हर रोज एक सा वातावरण। कल भी वैसी ही थी। करवा चौथ पर भी वैसी की वैसी। बस कपड़ों का रंग थाओड़ा बहुत बदला होगा। । कुछ तो डिफरेंट होना ही चाहिए। तो जनाब! बीबी किसी  की कैसी भी हो पति को सजी संवरी ही अच्छी लगती है। आँखों को लुभाती है। मन को भाती है। ये किसी  एक पति  की चाहत नहीं सभी की है। करवा चौथ पर सभी पतियों के चेहरे गुलाब के फूल की तरह खिले हुए थे। मन में उमंग और आँखों में शरारत थी। जैसे उल्लास टपक रहा हो।  साइकिल के कैरियर पर सिंगरी बैठी पत्नी करवा चौथ पर पति को जरा  भी भारी नहीं लगी। पत्नी को इस रूप में देख वह आनंदित था। पिंक कलर की ड्रेस में,हाथ पांव में मेहँदी लगाए कई बच्चों की माँ के बावजूद पत्नी के साथ पैदल जाते हुए भी पति की निगाह उसी की तरफ थी। यह उसका चाव था अपनी  पत्नी के लिए। उम्र अर्थ हीन  है। करवा चौथ पर बाइक पर बैठी चारमिंग पत्नी का कमर,कंधे और पैर पर रखा हाथ उसे बोझ लगने की बजाए सुकून प्रदान कर रहा था। महंगी- सस्ती गाड़ी में मेकअप से लक दक  ओवरवेट पत्नी को घुमाते हुए पति को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे शादी अभी अभी हुई हो। ये भाव है सभी पतियों के। सभी पति अपनी पत्नी को इसी प्रकर डॉल बनी हुई देखना पसंद करते हैं। बीबियों का यही रूप पतियों को प्रफुल्लित करता है। करवा चौथ पर तो सजना ही था सजना के लिए। वरना हर रोज वही नून तेल,रसोई,बच्चे साथ में चिक चिक। बेशक करवा चौथ पर पति की जेब ढीली हुई। इसके बावजूद सभी के चेहरों पर रंगत थी। इसकी वजह थी पत्नी का सजना संवरना। रोज तो ऐसा मुमकिन नहीं। इसलिए पत्नी का इस दिन का रूप आँखों में बसा दूसरी करवा चौथ का इंतजार करता है पति। ऐसा नहीं कि इस बीच पत्नी पूरा साल सूगली रहती है। सजती है कहीं जाना हो तो। संवरती भी है पीहर जाने के लिए और दूसरे वार त्योहार पर । परंतु जो करवा चौथ पर सजना होता है उससे सजना ऊपर से चाहे ना खुश हो अंदर खूब खुशी महसूस करता है। अब जो रोज ही सजी रहे वह अपने अपने पति को कैसी लगती है यह  दोस्त से पूछना पड़ेगा। करवा चौथ के उपलक्ष में दो लाइन पढ़ो....पहले मुझसे नजर उतरवाना,चांद देखने बाद में जाना।

Friday, 2 November 2012

करवा चौथ पर बेबस और मजबूर होता है पति


श्रीगंगानगर- शादी के बाद पहली करवा चौथ। हल्की मीठी ठंड। पत्नी तड़के उठी। बरतनों की खटर पटर हुई। अलसाए पति ने पूछ लिया,क्या हुआ इतनी जल्दी? पत्नी पंजबान थी। उसी स्टाइल में जवाब दिया, तेरा ई मरना कड़ दी पई आं। पति  ऑफिस जाने के लिए तैयार हुआ। पत्नी को लुभाने वाली शर्ट पहन ली। देखा तो एक बटन टूटा हुआ। पत्नी से बटन लगाने को कहा। सोचा फिल्मी हीरोइन की तरह बटन लगाएगी। धागा मुंह से तोड़ेगी। रोमांस हो जाएगा। किन्तु ख्वाब पर करवा चौथ का व्रत गिर गया। पत्नी बोली,आज मेरा व्रत है। सुई हाथ में नहीं लेनी। या तो खुद लगा लो या दूसरी शर्ट पहन लो। तुम भी ना मुझे तंग करने के बहाने ढूंढते हो। तुम्हें पता होना चाहिए मेरा व्रत है। करवा चौथ के व्रत के दिन सबसे अधिक दुर्दशा किसी प्राणी की होती है तो वह है पति। मीडिया चाहे किसी भी प्रकार का हो,इस दिन या इससे पहले केवल पत्नी के बारे में ही लिखता और दिखाता है। उनको खर्च करने के तरीके बताता है। ऐसे सजो। ये खरीदो। ये पहनो। पति कुछ चूँ चपर करे तो पत्नी बोल देती है,ये सब आपके लिए तो कर रही हूं। आपकी लंबी उम्र के लिए। आपकी सेहत के लिए। खुशहाली के वास्ते। सीधे नहीं कहती कि मुझे सारी उम्र सोलह सिंगार  करने है। सेहत इसलिए कि कहीं ये मुस्टंडा बीमार हो गया तो पैसे भी खर्च होंगे, सेवा करनी पड़ेगी वह अलग से। खुशहाली! पति खुशहाल तो पत्नी की पो  बारह पच्चीस। पति के नाम पर खुद के लिए सब कुछ।  यूं लगता है जैसे पति बलि का बकरा हो। तड़के पेट भरा। बाद में सिंगरी।  बनी-ठनी कभी उसकी पत्नी से बात की कभी इसकी। खूब उल्लास और उमंग होती है। रात तक भूखी! जैसे ही पति के घर आने का समय हुआ। चेहरे पर भूख के भाव आ गए। पत्नी की ऐसी सूरत देख पति को दया आएगी ही। क्योंकि पति तो  बचपन से ही दयालु किस्म का जीव होता है। वह भी तभी भोजन करेगा जब पत्नी करेगी। मेरा एक दोस्त तो पत्नी के लिए खुद भी करवा चौथ का व्रत रखता है। मजबूरी है। क्योंकि उस दिन वह खाना बनाने से इंकार कर देती है। सजावट बिगड़ने का डर  जो  होता है। दूसरा, शाम को पत्नी को उसकी हेल्प मिल जाती है। पति की इतनी कुर्बानी के बावजूद हर कोई पत्नियों की बल्ले बल्ले करता है। विश्व में शायद ही कोई उदाहरण हो जिसमें पति नामक जीव की आर्थिक,मानसिक प्रताड़ना के बावजूद उसे  ये कहा जाए कि मेरी जां, ये सब किसके लिए! आप ही के लिए तो है! वैरी गुड। वैरी नाइस! ये तो वही बात हुई, जो कुछ पड़ा,रखा ढका सब आपका,लेकिन हाथ किसी को नहीं लगाना। जिनकी पत्नियाँ कमाती हैं उनके बारे में कुछ नहीं। वे तो बस चुप चाप  देखते हैं। बोले तो यही जवाब मिलेगा,”आपसे तो कुछ नहीं मांगा। खुद कमाती हूं। हो गई करवा चौथ। इसे ठीक इस प्रकार समझा जा सकता है। पत्नी सरकार है और पति जनता। सरकार जनता के कल्याण के नाम से जनता को ही भांति भांति से लूटती है ना! बस तो! सेम टू सेम। दो लाइन पढ़ो... करवा चौथ की अकड़ दिखाएगा, तो बची खुची शान से भी जाएगा,इसलिए हे पति! शर्म ना कर, रोज की तरह आज भी पत्नी से डर।

Thursday, 1 November 2012

धर्म की चादर में लिपटा कुछ और ही है ये


श्रीगंगानगर- आधी रात का समय....दूर बहुत तेज आवाज में ईश्वर की आराधना । रात के सन्नाटे में यह आराधना मन को बजाए सुकून देने के दिमाग की नशों में झिंझोड़ रही हैं। बेशक धर्म के बारे में अधिक नहीं जानता। अध्यातम को बहुत कम समझता हूं। धर्म स्थल पर भी कभी कभार ही जाना होता है। इसके बावजूद सौ प्रतिशत धार्मिक हूं।  पूरी तरह आस्तिक हूं। हर स्थान पर ईश्वर की सत्ता को मानता हूं। ईश्वर के अस्तित्व को दिल से स्वीकार भी करते हैं। सभी कहते हैं कि कोई भी धर्म किसी को भी किंचित मात्र दर्द,परेशानी,तकलीफ नहीं देता। जो देता है, वह धर्म हो ही नहीं सकता। वह केवल और केवल धर्म की चादर ओढ़े कुछ और ही  होगा। धार्मिक अनुष्ठान परिवार की सुख शांति,खुशी,उपलब्धि के लिए ही करवाया जाता है। ईश्वर,चाहे उसका रूप कैसा भी हो, वह तभी प्रसन्न होगा, जब उस अनुष्ठान से किसी को भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कोई दिक्कत न हो। अब जो तेज आवाज दूर दूर तक गूंज गूँजती है, उससे कितने ही परिवारों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। कोई बच्चा सो नहीं पाता। किसी बुजुर्ग ने अभी ट्राइका की गोली ली थी, वह बेकार हो गई। किसी को पढ़ना है। कोई तीन घंटे नींद ले अपने काम पर जाएगा। कोई थक कर अभी लेटा ही था कि स्पीकर का शोर कानों से होता हुआ दिमाग को खट खट करने लगा।  सड़क पर टैंट लगा कर आने जाने का रास्ता बंद कर दिया गया। गली में छोटे बड़े वाहन खड़े हैं। किसी के घर का गेट रुक गया। एक परिवार की सुख शांति के लिए पूरे मोहल्ले की शांति जाती रही। आयोजक क्या सोचते हैं कि मोहल्ले वाले उनको दुआ दे रहें होंगे कि बहुत बढ़िया...क्या कहने....ईश्वर  हर रोज इस सड़क पर हर रात इस प्रकार के आयोजन करवाए। गलत...सौ प्रतिशत गलत। कोई दुआ नहीं देता। हर कोई अंदर ही अंदर परेशान होता है। किन्तु बोलता नहीं। डरता है, अपने आप से नहीं तो उससे जरूर जिसके यहां आयोजन है। उससे नहीं तो समाज से। समाज का डर नहीं भी लगता तो  शिकायत कर बुरा बनने का डर तो लगता ही है। इतना ही नहीं जो इस संबंध में बोले वही धर्म का दुश्मन। एक नंबर का नास्तिक। कोई उसकी भावना को नहीं समझेगा। कोई ये जानने की कोशिश नहीं करेगा कि असल में रात को इस प्रकार के आयोजन से सच में कितने ही लोगों को जबरदस्त मानसिक परेशानी से दो चार होना पड़ता है। अब जिससे किसी को परेशानी हो वह धर्म तो नहीं हो सकता। कोई माने चाहे ना माने। धर्म तो वह जो मन के संताप को हर ले। धर्म तो वह जो मानसिक शांति प्रदान करे। असली धर्म तो वही जो इंसान को दूसरों के प्रति दया करना सिखाए। उसकी परेशानी को कम करे। परंतु इससे किसी को क्या मतलब। हमने तो धर्म करना है। चाहे उसका तरीका कितना ही अधार्मिक,अनैतिक,दूसरों को पीड़ा दायक ही क्यों ना हो। आयोजन किसी को जान बूझकर  परेशान करने के लिए नहीं होते। बस, थोड़ी अनदेखी दूसरों के लिए परेशानी बन जाती है। कोई ये सोच ले कि अगर ऐसा दूसरा करता तो उसकी टिप्पणी क्या होती? इतने से ही सब ठीक हो जाए। क्योंकि उसके बाद वह लाउडस्पीकर की आवाज अधिक ऊंची नहीं करेगा। साथ में इस बात का भी ध्यान रखेगा कि वाहन से किसी के घर का गेट या सड़क ना रुके। इतना करने मात्र से ही आनंद अधिक जाता है।  सब की परेशानी भी समाप्त।  कचरा पुस्तक की लाइन है...लंगर हमने लगा दिये जीमे कई हजार, भूखे को रोटी नहीं ये कैसा धर्माचार।



Sunday, 28 October 2012

रात को बीमार होने का हक नहीं तुझे....समझे!


श्रीगंगानगर- रात को लगभग सवा नौ बजे का समय होगा। डॉक्टर के पास रोगी को लाया गया। रोगी लंबे समय से इसी डॉक्टर से ईलाज करवा रहा था। डॉक्टर की मैडम ने दरवाजा खोलते ही कह दिया कि डॉक्टर साहब तो घर नहीं है। रोगी की हालत गंभीर...नर्सिंग होम पहुंचे...कोई फायदा नहीं....दूसरे हॉस्पिटल आए...नर्सिंग स्टाफ ने जांच कर डॉक्टर से बात की....डॉक्टर ने उसे दूसरे के पास जाने की सलाह दी। नर्सिंग स्टाफ क्या करता! उसने रोगी के परिजनों को बता दिया। गंभीर रोगी को फ़र्स्ट एड देने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था। वह कोई वीआईपी थोड़े था।  तीसरे डॉक्टर के पहुंचे। वह भी नहीं....आखिर किसी को फोन करके एक नर्सिंग होम संचालक से आग्रह  किया गया। उसने बहुत बड़ा अहसान करते हुए ईलाज शुरू किया। किसी डॉक्टर को इस बात का अंदाजा कि इस पूरी प्रक्रिया में रोगी के परिजनों के दिलों पर क्या बीती होगी? जीवन-मौत तो ईश्वर के हाथ है लेकिन डॉक्टर कुछ प्रयास तो करे। किसी ने कहा हमारे यहां ये सुविधा नहीं। किसी ने बोल दिया डॉक्टर नहीं। आदमी मरे तो मरे डॉक्टर का क्या जाता है! रात को किसी आम आदमी के लिए ना तो डॉक्टर आएगा। ना मरते हुए इंसान को कोई फर्स्ट एड देने की कोशिश होगी। क्योंकि साधारण परिवार के किसी व्यक्ति को रात को गंभीर बीमार होने का हक है ही नहीं।  किसने दिया उसे यह हक ? नहीं होना चाहिए उसे बीमार। वह ऐसी क्या चीज है जो वह रात को बीमार हो, वह भी गंभीर। उसे शर्म आनी चाहिए। इस नगर में रात को बीमारी की बजाए उसे शर्म से डूब मरना चाहिए। वह क्या समझता कि उसकी बीमारी से किसी डॉक्टर का दिल पसीजेगा! कोई उसके परिजनों के दर्द को समझेगा! नर्सिंग होम के दरवाजे उसके ईलाज  के लिए खोल दिये जाएंगे! रात को कोई क्यूँ करे उसका ईलाज । उसकी अहमियत ही क्या है इस क्षेत्र में। उसको जीने का हक ही किसने दिया....बीमार हो जाए रात को और मर जाए ईलाज के अभाव में। हमें क्या? हम तो नहीं करेंगे ईलाज। ईलाज! अरे! हम तो फ़र्स्ट एड भी नहीं देंगे। कौनसी इंसानियत?..दया...फर्ज.... । अजी छोड़ो जी, ये सब किताबी बातें हैं। हम केवल वही किताब पढ़ते हैं जिसकी जेब में दाम हो....खूब नाम हो....प्रतिष्ठित व्यक्ति हो.....बड़ा अफसर हो.... । आम आदमी....उस पर रात को गंभीर बीमार....उसको कहा किसने था रात को बीमार होने के लिए। रात को कोई नर्सिंग होम का डॉक्टर रिस्क नहीं लेता। कुछ हो गया तो तोड़ फोड़ का अंदेशा। बस यही एक तर्क है डॉक्टर के पास। सही भी है ये बात, किन्तु इसका यह मतलब तो नहीं कि हर मरीज के परिजन हाथों में पत्थर लिए नर्सिंग हॉस्पिटल आते हैं ईलाज करवाने। अफसोस तो ये कि इनसे पूछने की हिम्मत कौन करे? अभी ये हाल है।उसके बाद तो पता नहीं क्या होगा। जो भी हो किन्तु आम आदमी रात को गंभीर बीमार ना हो। उसे रात को बीमार होने का हक ही नहीं है। एक शायर ने कहा है....पस्त हौसले वाले तेरा साथ क्या देंगे,ज़िंदगी इधर आ तुझ को हम गुजारेंगे।



Wednesday, 24 October 2012

सरकार से तो बिना शर्त प्यार करना पड़ता है


श्रीगंगानगर-सरकारी मेडिकल कॉलेज मिलेगा लेकिन सड़क पर नहीं मेज पर। धमकी से नहीं आग्रह से। मुख्यमंत्री सहित सभी जनप्रतिनिधियों से दूर रहकर नहीं उनसे मिल कर। उनको आँख दिखाकर नहीं आँख से आँख मिलाकर। किसी व्यक्ति विशेष या किसी संगठन की अपनी शर्तों पर नहीं,सरकारी नियम,कानून,कायदों के हिसाब से।किसी से कुछ लेने के कायदे होते हैं चाहे वह हमारा हक ही क्यों न हो। हक तो बाप का संतान पर और संतान का माँ-बाप पर भी होता है। पति-पत्नी का एक दूसरे पर जो हक होता है उससे अधिक तो कहीं कुछ हो ही नहीं सकता। इन रिश्तों में भी लेने-देने की मर्यादा है। दान देने की मर्यादा से तो शास्त्र भरे पड़ें हैं। दान तो ऐसे दिया जाए कि दूसरे हाथ को भी पता ना लगे....यह सतयुग की बात थी। अब दूसरा जमाना है...एक रुपया भी दो तो बजा के। सरकार लेने को तैयार भी है। वैसे ये जरूरी नहीं कि सरकार से मेडिकल कॉलेज मांगने के लिए उसे  सौ,दौ सौ,पांच सौ करोड़ रुपए का चैक दिखाना जरूरी है। खाली हाथ जनता भी सरकार से यह सब मांग सकती है। परंतु सरकार सरकार है। जनता के सामने झुक भी सकती है और किसी को झुकाने पर आए तो उसे दोहरा कर देती है। सरकार को कोई डराना चाहे तो गड़बड़ हो जाती है। सरकार कुछ देर डरने का नाटक तो कर सकती है लेकिन असल में वह डरती नहीं। ना तो किसी दानवीर से और ना बड़े से बड़े उद्योगपति अथवा बाबा से। सरकार किसी उद्योगपति से डरती तो टाटा को अपना कारख़ाना बंगाल से गुजरात में ना शिफ्ट करना पड़ता। कोई सरकार किसी बाबा से कांपती तो रामदेव पता नहीं क्या से क्या हो जाते। सरकार ने पहले  तो बाबा से मिलने कई मंत्री भेजे फिर उसी सरकार ने उसे महिलाओं के कपड़े पहन कर भागने के लिए मजबूर किया। दानवीर तो ना जाने कितने हैं जो दशकों से दिये जा रहे हैं।सरकार ना तो उनसे डरती है ना वे डराने की कोशिश करते हैं। दोनों एक दूसरे का यथा योग्य मान सम्मान करते हैं। सरकार होती ही ऐसी है। एक पल कुछ दूसरे ही पल और कुछ। सरकार कहीं भी चाहे किसी की भी हो वह किसी से नहीं डरती। हां अगर आपके पास उसे लूटने का गट्स है तो उसे लूट लो चाहे जितना।वह तैयार रहती है लुट जाने को। ये गट्स नहीं तो फिर उससे लेने की कोई तरकीब हो आपके पास। कोई दिक्कत नहीं। मिल जाएगा जो चाहोगे। परंतु बात फिर वही....यह सब होगा एक प्रक्रिया के तहत। सरकार के कायदे कानून से ना कि मेरे,उसके,इसके कहने या शर्त पर। सरकार के साथ बीमारी ये कि वह शर्तों के साथ प्यार नहीं करती। बस,बिना शर्त प्यार करो.....उसके बाद उसके पास जो है वह हमारा। यहां उलटा होता है।

Thursday, 4 October 2012

कपड़ों और सूरत से नहीं होती इंसान की पहचान


श्रीगंगानगर-एक परिचित विप्रवर को घर छोड़  गया। विप्रवर भी क्या! आज के सुदामा से कुछ बीस लगे। बुजुर्ग पतले दुबले । दांत थे भी और नहीं भी। हल्की सफ़ेद दाड़ी। बाल बिखरे हुए। कलाई पर घड़ी। जिसका फीता इससे पहले पता नहीं कब बदला होगा। उसका वास्तविक रंग फीका पड़ बे रंग का हो चुका था। धागे निकले हुए थे।  कमीज-धोती थी तो साफ लेकिन झीनी ।गज़ब की फुर्ती। आते ही  नंगे पैर बाथरूम में गए। वापिस आए, हाथ पैर धोए। आसन बिछा था बैठ गए। मन में  भाव उमड़े  कि ये किस पंडित को छोड़ गए वो.....। इससे पहले कि सोच आगे बढ़ती...विप्रवर ने अपने  अनुभव से मेरे चेहरे  और मन के भाव पढ़ लिए। विप्रवर बोले,रिटायर्ड टीचर हूँ। 1960-61 में लगा था नौकरी। मन के भाव,विचार सब बदल गए साथ में चेहरे का रंग भी । वे बताने लगे...1300 रुपए  पेंशन मिलती है।क्योंकि हमारे जमाने में तनख़ाह कम ही हुआ करती थी। जिस चेहरे पर  कुछ देर पहले दीन-हीन जान तरस आ रहा था उसके प्रति अब श्रद्धा हो गई। उनकी बातों में रस आने लगा। भोजन करते हुए वे बोले,हिन्दी और गणित पढ़ाया करता था। अब तो गणित बहुत मुश्किल हो गया। बच्चों को ना तो हिन्दी की ग्रामर आती है ना अंग्रेजी की। इसी वजह से उनके नंबर कम आते हैं। भोजन की तारीफ के साथ उनके अनुभव का ज्ञान भी मिल रहा था। वे बताने लगे, सिरसा के एक सेठ की सिफ़ारिश पर श्रीकरनपुर गया नौकरी लेने। तहसीलदार पटवारी लगाना चाहता था। लेकिन मेरी इच्छा मास्टर लगने की थी। तहसीलदार ने बहुत कहा,पर मैं मास्टर ही लगा। कुछ समय पहले जो दीन हीन लग रहा था वह ज्ञान और अनुभव से घनवान था।अपने अंदर आशीर्वादों का भंडार लिए हुए था वह बुजुर्ग विप्रवर। यह सब लिखने का अर्थ केवल उस विप्रवर की तारीफ करना नहीं है। बल्कि इस बात का जिक्र करना है कि इंसान की सूरत,कपड़े और उसके साधन देख कर  ही समाज उसके बारे में अपनी राय कायम कर लेता है। जैसा पहनावा और सूरत वैसी ही उसको तवज्जो मिलती है। यह कोई आज नहीं हो रहा। सदियों से ऐसा ही है। हर युग में इन्सानों ने सूरत, कपड़ों और धन को केंद्र में रख दूसरे इंसान को महत्व दिया। इंसान की सूरत कैसी भी हो, कपड़े चाहे जैसे हों, धन है या नहीं लेकिन उसने अपनी मधुर वाणी, अपने ज्ञान और अनुभव से, अपनी बड़ी सोच से, किसी के व्यक्तित्व को पहचाने के इस माप दंड को हर बार गलत भी साबित किया। जैसे आज इस विप्रवर ने किया। जाते हुए पंडित जी ने संस्कृत में एक श्लोक बोला...जिसका अर्थ था कि पद और पैसा तो ठीक  है किन्तु हर बार फलित तो भाग्य ही होता है। ये कह वे अपनी साइकिल पर सवार हो चले गए। ये संकेत उन्होने अपने लिए दिया या हमारे लिए वही जानें। शायर मजबूर कहते हैं...दिल है पत्थर,दिल है मोम भी मजबूर,दिल पर हर चोट के निशां होते हैं। 

Tuesday, 2 October 2012

मेहमान हैं टेम्प्रेरी कलेक्टर के रूप में


श्रीगंगानगर-जब शब्दों का महत्व ही ना रहे तब खामोशी ठीक है और जब शब्दों की जरूरत ही ना हो समझने समझाने में तब होता है मौन। खामोशी!मतलब कुछ भी कहो,सुनो,लिखो किसी पर कोई असर नहीं होने वाला। मौन! अर्थात जब सब बिना बोले,कहे,लिखे ही एक दूसरे की बात समझ जाएं। श्रीगंगानगर के संदर्भ में दोनों  स्थिति थोड़ी थोड़ी है। शब्दों का महत्व भी है और इनकी जरूरत नहीं भी। इसलिए कुछ लिखा जाएगा और कुछ बिना लिखे समझना होगा। यही ठीक रहेगा। मेहमान के सामने। मेहमान! अपने नए जिला कलेक्टर श्री राम चोरडिया। टेम्प्रेरी कलेक्टर। मेहमान कलेक्टर। कुछ माह बाद रिटायर हो जाएंगे। जो मेहमान है उसके सामने परिवार वाले कुछ बोलते हैं और कुछ इशारों में एक दूसरे को समझाते हैं। क्योंकि मेहमान को घर की समस्या बताई नहीं जाती।  सभी बातें उनके सामने कहना संस्कार नहीं है न हमारे। अब उनको ये कैसे कह दें कि हमारा सीवरेज अभी तक नहीं बना। चार साल से लगे हैं नेता और प्रशासन। कान पक गए सुनते सुनते। ओवरब्रिज का क्या होगा! मिनी सचिवालय का भी प्रस्ताव है...ऐसे  कितने ही मुद्दे हैं। किन्तु मेहमान को ये सब कैसे बताएं। अच्छा नहीं होता ना मेहमान को घर की समस्या बताना। आपसी विवाद को दर्शाना । हमें तो मेहमान की तो आवभगत करनी है। अतिथि देवो भव:। बस नो दस महीने अब हमारा यही काम है कि अपने काम भूलकर मेहमान कलेक्टर की सेवा करें। हमारा फर्ज है ये ,मेहमान कलेक्टर पर कोई अहसान नहीं। मेहमान लंबे समय तक रुके तब  भी उससे ये उम्मीद तो नहीं कर सकते कि वह कोई बड़ी सहायता करेगा हमारी....हां आते जाते कोई सब्जी ले आया या बच्चे को उसकी जरूरत की चीज दिला लाया तो अलग बात है। इससे अधिक उम्मीद करेंगे तो रंज और अफसोस का कारण होगा। मेहमान भी कैसे कलेक्टर जैसे। अब मेहमान तो टेम्प्रेरी ही होते है। वैसे सरकार ने  टेम्प्रेरी कलेक्टर लगा दिया। ना भी लगाती  तो क्या तो यहां के लीडर कर लेते और क्या विपक्ष। अब ये कलेक्टर कुछ महीने शहर को समझने में लगाएंगे। जब तक समझेंगे तब विदाई की वेला निकट आ जाएगी। विदाई समारोह होंगे। उपहार  दिये जाएंगे। कार्य  की तारीफ होगी। व्यक्तित्व की सराहना की जाएगी। बस उसके बाद चुनाव आ ही जाएंगे।  वैसे भी जब प्रस्थान का समय हो तो इंसान राम-राम करके समय पास करता है। जो मिल जाए वही अपना। श्रीराम चोरडिया को तो कलेक्टर का पद तो मिल ही गया। और जो कुछ मेहमान के रूप में उनको मिलेगा वह अलग से होगा।  कलेक्टर के रूप में उनकी पहली और अंतिम पोस्टिंग शायद यही होगी। इस शहर का क्या होगा? जो अब तक होता आया है वही होगा।