Tuesday 1 March 2011

पोतड़े भी मंत्री की नजर में

श्रीगंगानगर--देश भर में बजट प्रस्तावों पर बहस हो रही है सत्ता पक्ष बल्ले बल्ले और विरोधी थल्ले थल्ले कर रहा है आम आदमी से थोड़े ऊपर की हैसियत वाले से लेकर बड़े बड़े व्यापारी, अर्थशास्त्री,विश्लेषक बजट का पोस्टमार्टम कर रहे हैं यह आदत भी है और करना जरुरी भी या यूँ समझो कि यह सब भी बजट का ही एक हिस्सा है फिर भी डायपर्स इन सबकी नजर से बच गया डायपर्स! नहीं समझे! अरे! पोतड़ा वही पोतड़ा, जो दिन में कई कई बार बदला जाता था उसी को अब डायपर्स कहते है ऐसे भी समझ सकते है कि गरीब शिशु चड्डी की जगह जो लपेटता है वह पोतड़ा होताहै और पैसे वालों का शिशु जिसको पहनता है वह डायपर्स वित्त मंत्री ने जो बजट प्रस्ताव पेश किये हैं उसके अनुसार डायपर्स सस्ते हो जायेंगे अर्थात मंत्री जी को बजट बनाते समय पैसे वालों के वो शिशु भी याद रहे जो डायपर्स में हगनी,मूतनी करते हैं पोतड़ा तो सस्ता महंगा होता ही नहीं घर में जो बेकार, पुराने ,मजबूत कपडे होते हैं,वही पोतड़ा बनता है पोतड़ा डायपर्स नहीं जिसको यूज करके थ्रो किया जाये संभव है जो पोतड़ा बाप ने पहना हो वही उसके बेटे को भी मिल जाये इसलिए इसको बजट में किसी भी रूप में शामिल करने की कोई तरकीब थी ही नहीं संभव है यह सबको मजाक लगे लेकिन हम उतने ही गंभीर हैं जितने वित्त मंत्री जी हमें तो यह नहीं पता कि देश में कितने बच्चे डायपर्स का इस्तेमाल करते हैं उन्होंने तो हिसाब लगाया या लगवाया ही होगा कि डायपर्स सस्ते करने से कितने करोड़ परिवारों को राहत मिलेगी! ताकि उनके वोट तो अपने पाले में गिने जा सकें सवाल ये नहीं कि कितने घरों में इसका इस्तेमाल होता है प्रश्न ये कि आखिर ये हो क्या रहा है जिसकी जेब में पैसा है उसको कोई तकलीफ सरकार की किसी भी घोषणा से नहीं है उधर गरीब आदमी सरकार के हर बजट के समय अपनी जेब संभालने की कोशिश ही करता रह जाता है डायपर्स हो या पोतड़ा उतना जरुरी नहीं जितना पेट में रोटी,दूध। आज कुछ करोड़ लोगों को छोड़ कर अन्य रोटी,दूध के लिए किस प्रकार से सुबह से शाम तक खटते हैं यह किसी से पर्दा नहीं है। पोतड़े लायक मेम्बर के अलावा सभी इसी काम में लगते हैं, तब भी कभी पूरी रोटी नहीं तो कभी दूध नहीं। काले,सफ़ेद धन की बात से दूर एक साधारण परिवार किस तरह से अपना घर चलाता है ये किसी मंत्री को क्या पता! आज के दिन करोड़ों परिवारों में शिक्षा,स्वास्थ्य उतना महत्व नहीं रखता जितना रोटी। उनके दिमाग से रोटी की चिंता मिटेगी तब कुछ और सोचेंगें। वित्त मंत्री डायपर्स में अटक गए। जैसे इसके बिना जिंदगी बेकार है। ये ना हो तो पोतड़े से काम चल सकता है। जिनके पास पोतड़े तक का इंतजाम नहीं होता,उनके बच्चे भी जिंदा रहते हैं। किन्तु रोटी,दूध के बिना जीवन की गाड़ी अधिक दूर तक नहीं जा सकती। यह ईंधन है। भूखे पेट तो भजन भी नहीं हो सकते। इसलिए रोटी की चिंता थोड़ी आप भी करो सरकार। कुछ ऐसा करो ताकि जिंदगी महंगाई के सामने बौनी ना लगे। वरना तो ....... जैसा चल रहा है चलेगा ही। समर्थ का कौन कुछ बिगाड़ सकता है। जिसकी यहाँ बात हो रही है वह तो ना तीन में ना तेरह में। अंत में वर्तमान मौसम पर दो पंक्तियाँ--रिमझिम-रिमझिम बूंदे पड़ती,ठंडी चले बयार रे, आजा अब तो गले लग जा छोड़ सभी तकरार रे।

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