लब तू खोल दे
कुछ तो बोल दे,
मन की सारी
गाँठे प्यारी
एक दिन
मुझ संग खोल दे।
हर इन्सान हर पल किसी ना किसी उधेड़बुन में रहता है। सफलता के लिए कई प्रकार के ताने बुनता है। इसी तरह उसकी जिन्दगी पूरी हो जाती हैं। उसके पास अपने लिए वक्त ही नहीं । बस अपने लिए थोड़ा सा समय निकाल लो और जिंदगी को केवल अपने और अपने लिए ही जीओ।
श्रीगंगानगर-टोटकों,तंत्र विद्या का बेशक बहुत महत्व होता होगा। भूत प्रेत के बारे में भी सभी की अपनी अपनी मान्यता होगी। अश्लीलता भी पर्दे में गरिमामय होती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जिला कलेक्टर जाने अनजाने इस प्रकार की बात को बढ़ावा दें और ऐसी बातों को समाज के लिए लाभप्रद बताएं। क्षेत्र में सोने,चांदी,डायमंड के जाने माने व्यवसायी,अनेकानेक सामाजिक धार्मिक संस्थाओं से जुड़े हुए शामलाल जैन ने “अरोग्यता का रहस्य” नामक पुस्तक का लेखन व संकलन किया। कहने को तो इसमें आयुर्वेद से बीमारियों का इलाज की जानकारी है। परंतु इस पुस्तक में टोटकों के रूप में ऐसे ऐसे अश्लील वाक्य हैं कि उनको यहां लिखना भी संभव नहीं।ये टोटके आयुर्वेद से संबन्धित नहीं हो सकते। विज्ञान के इस युग में जब भूत,प्रेत जैसे अंधविश्वासों को दूर करने के प्रयास होते हैं, स्कूल से लेकर कॉलेज तक की शिक्षा में। ऐसे दौर में पुस्तक यह बताती है कि भूत प्रेत की बाधा कैसे बचा जा सकता है। तंत्र की जानकारी भी इस पुस्तक के कई पृष्ठों पर हैं। इस प्रकार की पुस्तक मेलों,बस अड्डे और रेलवे स्टेशन की स्टाल पर बिका करती हैं। किसी गर्ल्स कॉलेज के उत्सव में उसका विमोचन करवा खुले में वितरित करना उचित नहीं कहा जा सकता। मगर शाम लाल जी को कौन रोकता! वे कॉलेज के कोषाध्यक्ष जो हैं। इसलिए ऐसा हुआ। इसी पुस्तक के बारे में जिला कलेक्टर अंबरीष कुमार का संदेश भी है। जिसमें उन्होने कहा है कि यह पुस्तक समाज के लिए लाभप्रद सिद्ध होगी। पाठकों को इस पुस्तक के माध्यम से अपने जीवन में आने वाली परेशानियों से छुटकारा मिलेगा। समाज खुशहाल एवं निरोगी जीवन व्यतीत कर सकेगा.........आदि आदि। शायद जिला कलेक्टर ने पुस्तक की पाण्डुलिपि पढे बिना ही संदेश दे दिया। अगर वे पढ़ते तो उन वाक्यों को जरूर हटवाते जो अश्लील हैं। तंत्र और टोटकों को बढ़ावा देने वाले हैं। अन्यथा संभव है संदेश देने से मना कर देते। इसी प्रकार के संदेश नगर परिषद आयुक्त हितेश कुमार और नगर परिषद सभापति जगदीश जांदू के भी हैं। शामलाल जैन का इतना नाम तो है ही कि कोई उनको संदेश के लिए कोई नाराज क्यों करने लगा। शामलाल जैन का उद्देश्य भी कोई गलत नहीं हो सकता। वे गर्व से कहते हैं कि “जो कुछ लिखा है एकदम सही है....मैं दिखा सकता हूं कौनसी किताब से लिया।“ सही तो होगा....लेकिन उनके जैसे व्यक्ति के लिए ऐसे वाक्यों सार्वजनिक रूप से बांटी जाने वाली पुस्तक में लिखना ठीक है क्या?
नजर उठे तो कजा होती है,
नजर झुके तो हया होती है।
नजर तिरछी हो तो अदा होती है,
नजर सीधी हो तो फिदा होती है।
श्रीगंगानगर-सनातन धर्म,संस्कृति में पुत्र की चाहना इसीलिए की जाती है ताकि पिता उसके कंधे पर अंतिम सफर पूरा करे। शायद यही मोक्ष होता होगा। दोनों का। लेकिन तब कोई क्या करे जब पुत्र के होते भी ऐसा ना हो। पुत्र भी कैसा। पूरी तरह सक्षम। खुद भी चिकित्सक पत्नी भी। खुद शिक्षक था। तीन बेटी,एक बेटा। सभी खूब पढे लिखे। ईश्वर जाने किसका कसूर था? माता-पिता बेटी के यहाँ रहने लगे। पुत्र,उसके परिवार से कोई संवाद नहीं। उसने बहिनों से भी कोई संपर्क नहीं रखा। बुजुर्ग पिता ने बेटी के घर अंतिम सांस ली। बेटा नहीं आया। उसी के शहर से वह व्यक्ति आ पहुंचा जो उनको पिता तुल्य मानता था। सूचना मिलने के बावजूद बेटा कंधा देने नहीं आया।किसको अभागा कहेंगे?पिता को या इकलौते पुत्र को! पुत्र वधू को क्या कहें!जो इस मौके पर सास को धीरज बंधाने के लिए उसके पास ना बैठी हो। कैसी विडम्बना है समाज की। जिस बेटी के घर का पानी भी माता पिता पर बोझ समझा जाता है उसी बेटी के घर सभी अंतिम कर्म पूरे हुए। सालों पहले क्या गुजरी होगी माता पिता पर जब उन्होने बेटी के घर रहने का फैसला किया होगा! हैरानी है इतने सालों में बेटा-बहू को कभी समाज में शर्म महसूस नहीं हुई।समाज ने टोका नहीं। बच्चों ने दादा-दादी के बारे में पूछा नहीं या बताया नहीं। रिश्तेदारों ने समझाया नहीं। खून के रिश्ते ऐसे टूटे कि पड़ोसियों जैसे संबंध भी नहीं रहे,बाप-बेटे में। भाई बहिन में। कोई बात ही ऐसी होगी जो अपनों से बड़ी हो गई और पिता को बेटे के बजाए बेटी के घर रहना अधिक सुकून देने वाला लगा। समझ से परे है कि किसको पत्थर दिल कहें।संवेदना शून्य कौन है? माता-पिता या संतान। धन्य है वो माता पिता जिसने ऐसे बेटे को जन्म दिया। जिसने अपने सास ससुर की अपने माता-पिता की तरह सेवा की। आज के दौर में जब बड़े से बड़े मकान भी माता-पिता के लिए छोटा पड़ जाता है। फर्नीचर से लक दक कमरे खाली पड़े रहेंगे, परंतु माता पिता को अपने पास रखने में शान बिगड़ जाती है। अडजस्टमेंट खराब हो जाता है। कुत्ते को चिकित्सक के पास ले जाने में गौरव का अनुभव किया जाता है। बुजुर्ग माता-पिता के साथ जाने में शर्म आती है। उस समाज में कोई सास ससुर के लिए सालों कुछ करता है। उनको ठाठ से रखता है।तो यह कोई छोटी बात नहीं है। ये तो वक्त ही तय करेगा कि समाज ऐसे बेटे,दामाद को क्या नाम देगा! किसी की पहचान उजागर करना गरिमापूर्ण नहीं है।मगर बात एकदम सच। लेखक भी शामिल था अंतिम यात्रा में। किसी ने कहा है-सारी उम्र गुजारी यों ही,रिश्तों की तुरपाई में,दिल का रिश्ता सच्चा रिश्ता,बाकी सब बेमानी लिख।