Saturday, 25 June 2011

एक रोटी और



श्रीगंगानगर—पति भोजन कर रहा है। पत्नी उसके पास बैठी हाथ से पंखा कर रही है। जो चाहिए खुद परोसती है मनुहार के साथ। “एक रोटी तो और लेनी पड़ेगी। आपको मेरी कसम।“ पति प्यार भरी इस कसम को कैसे व्यर्थ जाने देता। रोटी खाई। तारीफ की। काम पर चला गया। यह बात आज की नहीं। उस जमाने की है जब बिजली के पंखे तो क्या बिजली ही नहीं हुआ करती थी। संयुक्त परिवार का जमाना था। रसोई बनाता चाहे कोई किन्तु खिलाने का काम माँ का और शादी के बाद पत्नी का था। पति रोटी आज भी खा रहा है। मगर पत्नी घर के किसी दूसरे काम में व्यस्त है। रोटी,पानी,सब्जी,सलाद जो कुछ भी था ,लाकर रखा और काम में लग गई। पति ने कुछ मांगा। पत्नी ने वहीं से जवाब दिया... बस करो। और मत खाओ। खराब करेगी। “तुमको मेरी कसम। आधी रोटी तो देनी ही पड़ेगी। पति ने कहा।“ “ नहीं मानते तो मत मानो। कुछ हो गया तो मुझे मत कहना। यह कहती हुई वह आधी रोटी थाली में डालकर फिर काम में लग गई।“ पति कब पेट में रोटी डालकर चला गया उसे पता ही नहीं लगा । तब और आज में यही फर्क है। रिश्ता नहीं बदला बस उसमें से मिठास गायब हो गई। जो रिश्ता थोड़ी सी केयर से मीठा होकर और मजबूत हो जाता था अब वह औपचारिक होकर रह गया। यह किसी किताब में नहीं पढ़ा। सब देखा और सुना है। रिश्तों में खिंचाव की यह एक मात्र नहीं तो बड़ी वजह तो है ही। एक दंपती सुबह की चाय एक साथ पीते हैं। दूसरा अलग अलग। एक पत्नी अपने पति को पास बैठकर नाश्ता करवाती है। दूसरी रख कर चली जाती है। कोई भी बता सकता है कि पहले वाले दंपती के यहाँ ना केवल माहौल खुशनुमा होगा बल्कि उनके रिश्तों में मिठास और महक होगी जो घर को घर बनाए रखने में महत्वपूर्ण पार्ट निभाती है। क्योंकि सब जानते हैं कि घर ईंट,सीमेंट,मार्बल,बढ़िया फर्नीचर से नहीं आपसी प्यार से बनते हैं। आधुनिक सोच और दिखावे की ज़िंदगी ने यह सब पीछे कर दिया है। यही कारण है कि घरों में जितना बिखराव वर्तमान में है उतना उस समय नहीं था जब सब लोग एक साथ रहते थे। घर छोटे थे। ना तो इतनी कमाई थी ना सुविधा। हाँ तब दिल बड़े हुआ करते थे। आज घर बड़े होने लगे हैं। बड़े घरों में सुविधा तो बढ़ती जा रही है मगर एक दूसरे के प्रति प्यार कम हो रहा है। बस, निभाना है। यह सोच घर कर गई है। पहले सात जन्म का बंधन मानते थे। अब एक जन्म काटना लगता है।

कुंवर बेचैन कहते हैं—रहते हमारे पास तो ये टूटते जरूर, अच्छा किया जो आपने सपने चुरा लिए। एक एसएमएस...अच्छा दोस्त और सच्चा प्यार सौ बार भी मनाना पड़े तो मनाना चाहिए। क्योंकि कीमती मोतियों की माला भी तो टूटने पर बार बार पिरोते हैं।


Sunday, 12 June 2011

कलेक्टर बेटी के रूप में

श्रीगंगानगर--कलेक्टर के रुतबे का प्रभाव जनप्रतिनिधियों पर नहीं पड़ा तो मुग्धा सिन्हा बेटी बन कर सामने आ खड़ी हुई। भावनात्मक अपील के पीछे अपनी सफाई दी। सभी को मीठी चाय का ऑफर दिया। ताकि खिचे,खिजे रिश्तों में मिठास इस प्रकार से घुल जाए ताकि कड़वाहट का नाम निशान भी ना रहे। हुआ भी ऐसा ही। 30 मई को जिला परिषद की बैठक में जो रिश्ते बिगड़े थे,वह 10 जून को वहीं फिर बन गए। शुरू में तो जनप्रतिनिधियों ने मुग्धा सिन्हा को खूब खरी खरी कही। उनपर कर्मचारियों को जप्रतिनिधियों के खिलाफ भड़काने के आरोप भी लगे। बीच में अजयपाल ज्याणी ने कलेक्टर मुग्धा सिन्हा को कुछ कहा। मुग्धा सिन्हा ने ओंठ पर अंगुली रख कर उनको चुप रहने को कहा। काफी देर तक वातावरण में तनाव रहा। कलेक्टर मुग्धा सिन्हा को बोलना ही पड़ा। मुग्धा सिन्हा बोलीं, मैं बोलुंगी तो बोलेगे कि बोलती है। मुझे नहीं मालूम था कि इतने लोग मुझे सुनने को .......... । हम लोग नहीं जनप्रतिनिधि हैं। विधायक पवन दुग्गल बीच में बोले। मुग्धा सिन्हा ने बोलना जारी रखा। शब्दों पर मत जाइए। भावना को समझें। मैंने किसी कर्मचारी को कुछ नहीं कहा। मुझे यहाँ बेटी कहा गया है। भगवान कृष्ण ने द्रोपदी की लाज बचाई। यह वो जिला है जहां कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ वातावरण बना हुआ है। इसलिए मुझे उम्मीद है कि मुझे भी यहाँ सहयोग मिलेगा। भावपूर्ण शब्दों में अपील की आड़ में सफाई देते समय मुग्धा सिन्हा की आँखों में आँसू ने दिखें हों मगर ये तो महसूस हो ही रहा था कि उनका गला भरा हुआ है। कोई महिला भरे सदन में बेटी के रूप में सहयोग मांगे तो कौन ऐसा होगा जो सहयोग नहीं देगा। कलेक्टर मुग्धा सिन्हा के मीठी चाय के आग्रह के साथ ही तनाव समाप्त हो गया। इसके बाद श्री ज्याणी ने अपने विभाग के सवालों का जवाब देते हुए कहा, सारिका ने मुझे बताया था। सारिका चौधरी ने खड़े होकर ऐतराज जताया। इस पर ज्याणी ने कहा, ठीक है आइंदा फॉर्मल रिश्ते रहेंगे। इंफोरमल नहीं। हर किसी को किसी ना किसी रिश्ते से बांधने वाले विधायक राधेश्याम गंगानगर ने श्री ज्याणी को पोता कहा। सदन में इसी प्रकार से रिश्तों की डोर एक दूसरे को बांधती रही। इस प्रकार के सम्बोधन के समय कृषि मंत्री गुरमीत सिंह कुनर ने चुटकी ली। वे बोले, सदन में माँ, बहिन,बेटी, बेटा, पोता...कोई नहीं होता। एक दूसरे को सम्बोधन नाम और पद से किया जाता है। शारदा कृष्ण कहते हैं-अपनों बीच लूटी है लाज,तुम बिन किसे पुकारूँ आज। झूठे को सच मनवाता है, नगर अंधेरा चौपट राज। अब एक एसएमएसअच्छा दोस्त और सच्चा प्यार 100 बार भी रूठ जाए तो हर बार उसे मना लेना चाहिए। क्योंकि कीमती मोतियों की माला कितनी बार भी टूटे उसे हर बार पिरोया जाता है।

Monday, 6 June 2011

जूता फिर हुआ महत्वपूर्ण

काँग्रेस मुख्यालय में हुई प्रेस कोंफ्रेंस में एक कथित पत्रकार द्वारा जनार्दन द्विवेदी को जूता दिखाने की घटना की निंदा की जानी चाहिए। वास्तव में यह पत्रकार नहीं है। हैरानी उस बात की है कि वह आदमी एक पत्रकार के रूप में वहां आया कैसे? ये अचरज नहीं तो और क्या है कि कोई भी इंसान पत्रकार बनकर प्रेस कोंफ्रेंस में बैठ गया। किसी ने पूछा तक नहीं। देश को चलाने वाली पार्टी की पीसी में ऐसी गफलत! इसने तो केवल जूता ही दिखाया। ऐसे हालत में तो कोई कुछ भी कर सकता है। इसका मतलब तो ये हुआ कि सुरक्षा नाम की कोई बात ही नहीं।चलो कुछ भी हुआ। इस घटना से जनार्दन द्विवेदी को बहुत नुकसान हुआ। उनकी बात तो पीछे रह गई। सुनील कुमार और उसका जूता छा गया। इस बात की तो जांच काँग्रेस को खुद भी करनी चाहिए कि कोई आदमी पत्रकार बन कर कैसे वहां आ गया।गत तीन दिनों से इस देश में वह हो रहा है जो नहीं होना चाहिएइसके बावजूद वह नहीं बोल रहा जिनको बोलना चाहिएआप सब जानते हैं हम प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बात कर रहे हैंजो बोल रहे हैं वे ऐसा बोल रहे है कि ना ही कुछ कहें तो बेहतरजब पूरा देश किसी बात का विरोध कर रहा हो तो देश को चलाने वाले का यह फर्ज है जनता से संवाद करेपरन्तु पता नहीं प्रधानमंत्री किस कार्य में व्यस्त हैं? ये तो हो नहीं सकता कि उनको किसी बात का पता ना होइसके बावजूद उनकी चुप्पी से जनता हैरान हैदेश में कुछ भी होता रहे ,मुखिया को कोई चिंता नहींउसका कोई कर्तव्य नहींउसकी कोई जवाबदेही जनता के प्रति नहींना जाने ये किस मिजाज के लोग हैं जो इस प्रकार से तमाम घटनाओं से अपने आप को दूर रखे हुए है

Sunday, 5 June 2011

बाबा योग जानते थे राजनीति नहीं

श्रीगंगानगरसरकार कुछ भी कर सकती है। जो करना चाहिए वह करे ना करे लेकिन वह जरूर कर देगी जिसकी कल्पना करना मुश्किल होता है। बाबा रामदेव की अगवानी के लिए केंद्र के चार वरिष्ठ मंत्री दंडवत करते हुए हवाई अड्डे पहुंचे। यह पहली बार हुआ। बाबा ने तो क्या सोचना था, किसी राजनीतिज्ञ के ख्याल में भी ऐसा नहीं आ सकता कि चार बड़े मंत्री किसी के स्वागत के लिए हवाई अड्डे पर आ सकते हैं। चलो इसे बाबा के चरणों में सरकार का बड़ापन मान लेते हैं। विनम्रता कह सकते हैं। शराफत का दर्जा दे दो तो भी कोई हर्ज नहीं। किन्तु कुछ घंटे के बाद ऐसा क्या हुआ कि सरकार का बड़ापन बोना हो गया। विनम्रता बर्बरता में बदल गई। शराफत के पीछे घटियापन नजर आने लगा। जिस सरकार के मंत्री दिन में किसी सज्जन पुरुष का सा व्यवहार कर रहे थे, रात को उनकी प्रवृति राक्षसी हो गई। रामलीला मैदान में रावण लीला होने लगी। सात्विक स्थान पर तामसिक मनोस्थिति के सरकारी लोग उधम मचाने लगे। सब कुछ तहस नहस कर दिया गया। जिस सरकार को जनता ने अपनी सुरक्षा के लिए चुना, उसी के हाथों उनको पिटना पड़ा। जिस बाबा के चरणों मे सरकार लौटनी खा रही थी उनको नारी के वस्त्र पहन कर भागना पड़ा। इससे अधिक किसी की ज़लालत और क्या हो सकती है। लोकतन्त्र में सरकार का इस प्रकार का बरताव अगर होता है तो फिर तानाशाही में तो पता नहीं क्या कुछ हो जाए। असल में बाबा योग सीखे और फिर सिखाते रहे। राजनीति के गुणा,भाग का योग उनको करना नहीं आया। राजनीति का आसान उनको आता नहीं था। यहीं सब गड़बड़ हो गया। उनको चार मंत्री आए तभी समझ जाना चाहिए था कि सब कुछ ठीक नहीं है। यह सब प्रकृति के विपरीत था। प्रकृति के विपरीत आंखों को,मन को सुकून देने वाला भी हो तो समझो कि कहीं न कहीं कुछ ना कुछ ठीक नहीं है। यह संभल जाने का संकेत होता है। बाबा नहीं समझे। गलत फहमी में रहे। वे ये भूल गए कि

जो लोग इस राष्ट्र को अपनी ही संपति समझते हैं वे अपने काले धन को राष्ट्रीय संपति घोषित करने की मांग क्यों मानेंगे? यह तो डबल घाटा हुआ। अरे भाई, इनके यहाँ तो केवल इंकमिंग ही है, आउट गोइंग वाला सिस्टम तो इनके जीवन में है ही नहीं । ये केवल और केवल लेना जानते हैं देना नहीं। जब इनसे जनता मांग करती है तो इनको ऐसे लगता है जैसे कोई इनकी संपति में से हिस्सा मांग रहा हो। फिर वही होता है जो रामलीला मैदान में हुआ। मजबूर कहते हैंपूरी मैं दिल की छह करूँ या दुनिया की परवाह करूँ, तू बता मैं क्या करूँ। हक के लिए लड़ मरूँ या बैठा आह! भरा करूँ, तू बता मैं क्या करूँ।

Friday, 27 May 2011

सी एम भूल गए गंगानगर को

रीगंगानगर --हैलो! कौन? उधर से आवाज आई। गंगानगर से ......... । गंगानगर से। अजी साहब, क्या शहर है! क्या लोग है! अधिकारियों की खूब मौज रहती है..... । सीएमओ में फोन अटेण्ड करने वाला शायद और भी कुछ कहता। मगर हमें तो सीएम से बात करनी थी। सीएम साहब से बात करनी है। अधिकारी कहने लगा, क्यों नहीं! अभी करवाते हैं। गंगानगर ने तो ज़िंदगी बदल दी। क्या नहीं मिला? लो करो बात। हैलो! उधर से अशोक गहलोत की आवाज सुनाई दी। साहब मैं गंगानगर से बोल रहा हूं । गंगानगर! ये कहां है? अरे सर, आप गंगानगर को नहीं जानते! नाम तो सुना सुना सा लगता है। साहब वही गंगानगर जिसके कलेक्टर को आपने यह कहा था कि यहाँ करप्शन सबसे अधिक है। मैंने कहा था? याद नहीं आया, सीएम बोले। सर, राधेश्याम गंगानगर वाला गंगानगर। जिसने आपकी सरकार को पोंपा बाई का राज कहा था। फिर आपने उसको मंत्री बना दिया था। अच्छा! सीएम कहने लगे। कमाल है! ये सब कब हुआ? सर, मैं आपको बताता हूं। वही गंगानगर जिस जिले से आपके सभी उम्मीदवार 2003 मे बड़े अंतर से हारे थे। 2003 में भी आपकी पार्टी कोई बड़ा तीर नहीं मार सकी थी। कुछ देर सन्नाटा। फिर आवाज आई। ...अरे भाई कोई और पहचान बताओ। गंगानगर कौनसा हुआ, समझ नहीं आ रहा। सीएम साहब, वही गंगानगर जिस जिले से गुरमीत सिंह कुनर मंत्री हैं। कुनर जी। वे तो श्रीकरनपुर से हैं। कमाल हो गया। आपने इतना बताया फिर भी गंगानगर को पहचान नहीं पा रहा। मैंने अंतिम कोशिश की। सर, आपको कैसे बताऊँ? ............चलो कोई बात नहीं। मैं दिखवा लेता हूँ कि गंगानगर क्या है,और कहां है। आप बताओ क्या कहना है। सर, गंगानगर जिला मुख्यालय पर कई माह से कई अधिकारियों के पद खाली पड़े हैं। कानून व्यवस्था का बुरा हाल है। जनता बहुत अधिक परेशान हैं। आप कुछ करो........ । बस यही बात थी क्या? मैं पता करवाता हूं। अगर मुझे जानकारी हो गई कि गंगानगर कहां है तो जरूर इस तरफ ध्यान दूंगा। लेकिन समझ नहीं आ रहा कि आखिर ये गंगानगर कौनसा हुआ? अरे भाई,कहीं ऐसा तो नहीं कि आपसे कोई रोंग नंबर लग गया हो। मैंने कहा, नहीं साहब, मैंने राजस्थान के सीएमओ का ही नंबर मिलाया था। वही मिला और मैं राजस्थान के सीएम से ही बात कर रहा हूं! ... हां, बोल तो मैं राजस्थान का सीएम ही रहा हूं। लेकिन ये गंगानगर कहां है याद नहीं आ रहा। चलो मैं देखता हूं। यह कह कर उन्होने फोन रख दिया।


Friday, 20 May 2011

....आजा के अधूरा है अपना मिलन।!

श्रीगंगानगर—“कई जन्मों से,कई सदियों से तेरे प्यार को तरसे मेरा मन.....आ जा ,आजा के अधूरा है अपना मिलन..।“मधुर गीत की अपने प्रेमी को पुकारती ये पंक्तियाँ, कानों से होते हुए दिल तक पहुंच कर तन मन की तड़फ बढ़ा देती है। आज ये पंक्तियाँ वियोगिनी,एकाकिनी,विरहन वसुंधरा के मुख से फूट रहीं हैं। वह कह रही है , कई वर्षों से अधूरा है अपना मिलन। वसुधा,सुरभि,धरा का डायरेक्ट मिलन न तो आसमान से है ना मेघों से। हां,मतंग अपने स्नेह की वर्षा से इस धरती की प्यास बुझाकर इसकी वियोगानल को ठंडा करते रहें हैं। परंतु कई सालों से इस इलाके की पृथ्वी विलगाव,विछोह,वियोग और विरह वेदना की पीड़ा झेल रही है। उसका रॉम रॉम तड़फ रहा है। भभक रहा है। तन मन झुलस रहा है प्रियतम से मिलन को। प्रीतम भी कैसा, जो उससे बरसात के रूप में आलिंगनबद्ध होकर उसको तृप्त करता है। इन शब्दों के मर्म को वही ठीक से समझ सकता है जिसने प्रीत का संग किया हो। प्रीत गुरु,ईश्वर,पत्नी, बच्चे,माता,बहिन,मित्र, प्रेयसी ...किसी से भी हो सकती है। आज हमारी वसुंधरा की प्रीत है बादलों से। जो उससे वर्षा के रूप मे मिलन कर,सब कुछ अपनी प्रेयसी को अर्पित कर,खाली होकर लौट जाते हैं। अर्पण,समर्पण,और लुटना प्रेम की पहली और अंतिम अलिखित,अघोषित शर्त है। आज वसुंधरा अनुरागी है वर्षाधरों की। मौका मिलता है चौमासे में। किन्तु कई साल से ऐसा नहीं हो सका। मेघ अपने प्रियतमा को तृप्त नहीं कर सके। धरा छकी नहीं। अमिलन ,विलगाव उसे हर पल जलाता और तड़फाता रहा। आग बढ़ती रही। मेघ लापरवाह रहे। इस बार वसुंधरा की कसक,जुस्तजू इस कदर बलवती हुई कि मेघों ने अपना प्यार उस पर उड़ेलना शुरू कर दिया। परंतु जुदाई के दावानल से पीड़ित धरा के तन मन पर बरसात गरम तवे पर चंद बूंद साबित हुई। परिणामस्वरूप विरह की आग और भड़क गई। मिलन की लालसा,इच्छा,आकांक्षा अधिक तीव्र हो गई। बदरा ने फिर बरसात कर धरती को सहलाया। पर यह क्या! आग बढ़ती गई। बादल बरसते रहे। काले घने मेघ एक बार नहीं अनेक बार झोली भरकर आए और सब कुछ धरती पर बरसा कर चले गए। प्यासी वसुंधरा की प्यास और बढ़ गई। तड़फ गहरी हो गई। उसके तन मन से तपत के भभाके उठने लगे। उसका मन अभी भी बरसात रूपी सेतु के माध्यम से अपने प्रिय से मिलने को आतुर है। लालायित है। क्योंकि वर्षों से पूरी वर्षा का इंतजार कर रही धरती को मामूली बरसात तो सुखानुभूति प्रदान नहीं कर सकती। यही वजह है कि बरसात दर बरसात उमस और गर्मी का प्रकोप बढ़ता जा रहा है। जीव जंतुओं के लिए जिसका नाम उमस है वह प्रेम की भाषा मे तड़फ है, आग है। अपने प्रेमी से मिलने की। मतलब यह की अभी धरती की प्यास बुझी नहीं है।वह बारास्ता वर्षा,बादलों से कई बार और मिलन का अनुराग दिल मे लिए है। उसे उम्मीद है कि काले मेघ आएंगे और उसकी आसक्ति को समझ कर अपना तमाम प्यार उसपर उड़ेलकर उसे शीतलता प्रदान कर देंगे। धरती से बादलों का मिलन जरूरी है। जिस से उसकी विरह वेदना पर कुछ माह के लिए विराम लग जाए और वह प्रीतम से मिलन की खुशी में आह्लादित होकर नाचने लगे।

Wednesday, 11 May 2011

मिट्टी हुई गौरवान्वित सेना से


सेना के युद्धाभ्यास से राजस्थान का रेगिस्तान गौरवान्वित हो गया। अपने देश की सेना का युद्ध कौशल देख रेगिस्तानी मिट्टी का कण कण उत्साहित है। वह अपने सैनिकों का माथा चूम रहा है। माथे पर तिलक लगा रहा है। हजारों सैनिक इस रेगिस्तानी मिट्टी तो अपने पैरो से रोंद रहे है। मगर मिट्टी है कि इसको अपना अहोभाग जान हर सैनिक के चरण स्पर्श कर रही है। क्योंकि जो मिट्टी आज वहाँ है उसको फिर मौका नहीं मिलेगा अपने इन जांबाजों के चरण छूने का। उसे तो उड़ जाना है। आँधी बनकर। मीडिया इस अभ्यास से रेगिस्तान के थर्राने की बात करता है। कोई थर्राए तो तब ना जब कोई दुश्मन हो। यहाँ तो अपनी सेना अपना क्षमता दिखा रही है। बता रही है, चिंता मत करो, किसी से मत डरो। सेना देश की सुरक्षा बहुत अच्छी तरह से कर सकती है। तो फिर यह थर्राने की नहीं गौरवान्वित होने की बात है। आओ रेगिस्तान की मिट्टी के साथ हमभी गर्व करे अपनी सेना पर। उनको बधाई दें,उनके रण कौशल के लिए। जयहिंद ।

Monday, 9 May 2011

भारतीय सेना का अभ्यास


JODHPUR: 09 MAY 2011

Exercise ‘VIJAYEE BHAVA’ (BLESSED TO WIN), the first amongst a series of Western Command routine annual summer exercises is underway in the South Western Sector. The manoeuvres are being conducted in North Rajasthan to test the operational & transformational effectiveness of the Ambala based Kharga Corps as also validate new concepts which have emerged during the transformation studies undertaken by the Army. The Pivot Corps manoeuvres are scheduled to take place later this month. The Command HQ synergises the operations of the Pivot and Strike Corps.

This Exercise envisages sustained massed mechanized manoeuvres, in a simulated environment, by composite combat entities, ably supported by air and complemented by a wide array of weapon systems and enabling combat logistics.

The Indian Army, which is working towards a ‘capability based approach’, has embarked on a series of transformational initiatives spanning concepts, organisational structures and absorption of new age technologies, particularly in the fields of precision munitions, advance surveillance systems , space and network-centricity. These will be fielded and trial evaluated by nominated test bed formations and units participating in the exercise. The thrust of the transformational initiative is for the Army to emerge as a modern, lean , agile and enabled force.

While, the acquisition of hi-tech weaponry and combat support systems is an essential pre-requisite for a capability based approach, honing of human skills to harness technological advancements in military hardware is a never ending challenge. During the conduct of the exercise, combat decisions taken at each level of command will be analysed for their ability to synergise the application of state-of-the-art weapon platforms, to achieve optimum results. Such routine exercises with troops are conducted during the training cycles of formations.

Friday, 6 May 2011

किसानों को मुफ्त मिलेंगे गवार के बीज



श्रीगंगानगर -शत प्रतिशत निर्यातक इकाई विकास डब्लयू एसपी लिमिटेड किसानों को ग्वार की फसल के लिए बीज निःशुल्क उपलब्ध करवाएगी। यह जानकारी कंपनी के प्रबंध निदेशक बी डी अग्रवाल ने दी। उन्होंने बताया कि किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने ,ग्वार की उन्नत किस्म की फसल को बढ़ावा देने के लिए हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय द्वारा उत्पादित ग्वार के बीज किसानों को मुफ्त दिए जायेंगे। इसके लिए बीज वितरण समारोह १५ मई को सुबह ८.३० बजे उद्योग विहार श्रीगंगानगर स्थित कंपनी परिसर में आयोजित होगा। श्री अग्रवाल के अनुसार समारोह के विशिष्ट अतिथि वाल्टर व्हाइट [ वाईस प्रेसिडेंट इकोनोमी पालिमर्स एंड कैमिकल्स अमेरिका] होंगे। अध्यक्षता बीकानेर के सांसद अर्जुन मेघवाल करेंगे। श्री अग्रवाल ने बताया कि जो किसान बढ़िया किस्म के बीज लेने के इच्छुक हों ,वे ८ से १० मई तक कंपनी के नई धान मंडी श्रीगंगानगर में दुकान नम्बर १२९ में स्थित ऑफिस से टोकन ले सकते हैं। समारोह में २०११ के लिए ग्वार के न्यूनतम समर्थन मूल्य के बारे में विचार विमर्श होगा। इसी मौके पर किसान सेवा केंद्र प्रयोगशाला का शिलान्यास भी किया जायेगा। बी डी अग्रवाल लम्बे समय से किसानों के हितेषी बनकर उभरे हैं। वे कृषि उपज मंडी समिति में एक प्रयोगशाला की स्थापना करने की कोशिश में भी लागे हैं। ताकि किसानों को उसका लाभ मिल सके। इसके लिए उन्होंने सरकार को आवेदन भी कर रखा है।

Thursday, 5 May 2011

दरकते रिशों की कहानी

श्रीगंगानगर—“मेरी नेल पालिश कहाँ है? मेरा मेकअप का सामान दो। रज़ाई का एक गिलाफ भी कम है। सूट........... । ये शब्द एक विवाहिता के हैं। जो ससुराल मे अपनी माँ के साथ अपना सामान वापिस लेने आई है। क्योंकि कुछ सप्ताह बाद ही पति से उसक अलगाव हो गया । आज पंचायत ने दोनों पक्षों को उनका सोना,नकदी,सामान का निपटारा किया था। लेकिन लड़की उक्त वस्तुओं के लिए अड़ गई। चिंतन की बात है कि जहां तू दुल्हन बन कर आई। वहाँ तू दुल्हन रह ही नहीं सकी या वो रख नहीं सके। तो नेल पालिश …….. मिले ना मिले क्या हो जाएगा।

लड़का लड़की के परिवारों ने ठाठ से शादी की। पाँच छह महीने मे ही दोनों ऊब गए। पंचायत बैठी। दोनों को अलग अलग कर दिया। तलाक होने तक सामान की ज़िम्मेदारी पंचायती के हवाले कर दी। बच्चे ऐसे हो गए जैसे शादी हुई ही नहीं । चेहरे से मुस्कुराहट जाती रही।

शादी को अभी एक पखवाड़ा भी नहीं हुआ था कि दुल्हन ने पति की कमाई पर हक जताना शुरू कर दिया। एक ही डिमांड , वेतन उसके हाथ मे आना चाहिए। क्योंकि उसके माता पिता मोबाइल पर हर रोज उसको यही शिक्षा देते हैं। रिश्ते वह नहीं रहे जैस होने चाहिए।

वकीलों से मिलो। पंचायती लोगों से बात करो। ऐसे कितने ही सच्चे किस्से घर घर की कहानी बने हुए है। कोई जल्दी निपट जाता है,कोई लटकते रहते हैं। स्थिति दिनो दिन विकट हो रही है। किसी का घर खुल गया। किसी ने इज्जत की खातिर ढ़क रखा है। लेकिन कब तक। लड़के वाले अधिक मुश्किल मे है। क्योंकि थाना,कोर्ट सब लड़की वालों के साथ है। कानून ही ऐसा है। लड़की ने कुछ कर लिया तो टंग गए लड़के वाले तो। बेचारे डरते ही रहते हैं।

शादी से पहले, लड़का-लड़की के परिवार एक दूसरे के बारे मे सब कुछ नहीं तो बहुत कुछ पता करते,करवाते हैं। तब दोनों मे कोई कमी नहीं दिखती। आदर्श परिवार संबंधी बन जाते हैं। नव विवाहित जोड़े मे विचारों की भिन्नता होते ही सब गुड गोबर। जो आदर्श परिवार थे वही एक दूसरे के लिए समाज मे सबसे घटिया हो जाते हैं। शुरू मे जोड़े को आपस मे एडजस्ट होने मे कुछ समय लगता है। तब किसी ना किसी ना किसी बात पर, या बे बात पर खटपट, झिकझिक,बोलचाल,रिश्तों मे खिंचाव हो जाता है। उस समय लड़का,लड़की के परिवार वाले बड़प्पन दिखाएँ तो कुछ दिनो मे ही सब ठीक हो सकता है। ऐसा ना हो कि लड़की की माँ घंटो बात करे मोबाइल पर अपनी बेटी से। जिस घर मे लड़की माँ,मौसी,दीदी,बहनोई का दखल हुआ समझो रिश्तों की गर्माहट कम होना तय है। ननद ने अधिक हाथ पैर मारे तो भी समझो ठीक नहीं। आज केवल एक एसएमएसज़िंदगी की उलझने शरारतों को कम कर देती है, लोग समझते हैं कि हम बहुत बदल गए हैं।