Friday 20 May 2011

....आजा के अधूरा है अपना मिलन।!

श्रीगंगानगर—“कई जन्मों से,कई सदियों से तेरे प्यार को तरसे मेरा मन.....आ जा ,आजा के अधूरा है अपना मिलन..।“मधुर गीत की अपने प्रेमी को पुकारती ये पंक्तियाँ, कानों से होते हुए दिल तक पहुंच कर तन मन की तड़फ बढ़ा देती है। आज ये पंक्तियाँ वियोगिनी,एकाकिनी,विरहन वसुंधरा के मुख से फूट रहीं हैं। वह कह रही है , कई वर्षों से अधूरा है अपना मिलन। वसुधा,सुरभि,धरा का डायरेक्ट मिलन न तो आसमान से है ना मेघों से। हां,मतंग अपने स्नेह की वर्षा से इस धरती की प्यास बुझाकर इसकी वियोगानल को ठंडा करते रहें हैं। परंतु कई सालों से इस इलाके की पृथ्वी विलगाव,विछोह,वियोग और विरह वेदना की पीड़ा झेल रही है। उसका रॉम रॉम तड़फ रहा है। भभक रहा है। तन मन झुलस रहा है प्रियतम से मिलन को। प्रीतम भी कैसा, जो उससे बरसात के रूप में आलिंगनबद्ध होकर उसको तृप्त करता है। इन शब्दों के मर्म को वही ठीक से समझ सकता है जिसने प्रीत का संग किया हो। प्रीत गुरु,ईश्वर,पत्नी, बच्चे,माता,बहिन,मित्र, प्रेयसी ...किसी से भी हो सकती है। आज हमारी वसुंधरा की प्रीत है बादलों से। जो उससे वर्षा के रूप मे मिलन कर,सब कुछ अपनी प्रेयसी को अर्पित कर,खाली होकर लौट जाते हैं। अर्पण,समर्पण,और लुटना प्रेम की पहली और अंतिम अलिखित,अघोषित शर्त है। आज वसुंधरा अनुरागी है वर्षाधरों की। मौका मिलता है चौमासे में। किन्तु कई साल से ऐसा नहीं हो सका। मेघ अपने प्रियतमा को तृप्त नहीं कर सके। धरा छकी नहीं। अमिलन ,विलगाव उसे हर पल जलाता और तड़फाता रहा। आग बढ़ती रही। मेघ लापरवाह रहे। इस बार वसुंधरा की कसक,जुस्तजू इस कदर बलवती हुई कि मेघों ने अपना प्यार उस पर उड़ेलना शुरू कर दिया। परंतु जुदाई के दावानल से पीड़ित धरा के तन मन पर बरसात गरम तवे पर चंद बूंद साबित हुई। परिणामस्वरूप विरह की आग और भड़क गई। मिलन की लालसा,इच्छा,आकांक्षा अधिक तीव्र हो गई। बदरा ने फिर बरसात कर धरती को सहलाया। पर यह क्या! आग बढ़ती गई। बादल बरसते रहे। काले घने मेघ एक बार नहीं अनेक बार झोली भरकर आए और सब कुछ धरती पर बरसा कर चले गए। प्यासी वसुंधरा की प्यास और बढ़ गई। तड़फ गहरी हो गई। उसके तन मन से तपत के भभाके उठने लगे। उसका मन अभी भी बरसात रूपी सेतु के माध्यम से अपने प्रिय से मिलने को आतुर है। लालायित है। क्योंकि वर्षों से पूरी वर्षा का इंतजार कर रही धरती को मामूली बरसात तो सुखानुभूति प्रदान नहीं कर सकती। यही वजह है कि बरसात दर बरसात उमस और गर्मी का प्रकोप बढ़ता जा रहा है। जीव जंतुओं के लिए जिसका नाम उमस है वह प्रेम की भाषा मे तड़फ है, आग है। अपने प्रेमी से मिलने की। मतलब यह की अभी धरती की प्यास बुझी नहीं है।वह बारास्ता वर्षा,बादलों से कई बार और मिलन का अनुराग दिल मे लिए है। उसे उम्मीद है कि काले मेघ आएंगे और उसकी आसक्ति को समझ कर अपना तमाम प्यार उसपर उड़ेलकर उसे शीतलता प्रदान कर देंगे। धरती से बादलों का मिलन जरूरी है। जिस से उसकी विरह वेदना पर कुछ माह के लिए विराम लग जाए और वह प्रीतम से मिलन की खुशी में आह्लादित होकर नाचने लगे।

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