Friday 22 April 2011


श्रीगंगानगर
--घर लौटने के बाद जगदीश जांदू एंड कंपनी राजनीति गणित के एक उत्तर से उलझन में हैंइस उलझन ने घर आने की ख़ुशी के मीठे में कसेला डाल दियाराजनीति के गणितज्ञ रेखा,बीज,अंक गणित के सभी सूत्र लगाकर देख चुकेउत्तर एक ही आता है, जीरोये क्या हो गया? सभी फारमूले अप्लाई कर दिएइनको,उनको,सबको अलग अलग प्रकार से जोड़,गुणा,भाग,माइनस,वर्गमूल करके देख लियाउत्तर बार बार ,हर बार जीरो का जीरोइस जीरो ने जगदीश जांदू के दिलो दिमाग से घर वापसी के जश्न का खुमार उतार दियाइलाके की राजनीति के गुरु राधेश्याम गंगानगर ने अपने चेले को भले ही सब कुछ सिखाया,पढायापरन्तु राजनीति में पलटी कब मारनी चाहिए, ये गुर नहीं दियायह नहीं सीखा तभी तो उत्तर जीरो रहा हैचेले ने यह पाठ समझा होता तो वह इस वक्त अपने घर नहीं लौटता जांदू ने घर आकर राजनीतिक सौदे बाजी का अवसर ख़तम कर लियायह कोई छिपा हुआ एजेंडा नहीं है कि जांदू विधायक बनना चाहते हैंश्रीगंगानगर से टिकट उनको मिलनी नहींसादुलशहर में संतोष सहारण की टिकट कटनी नहींतो जांदू जी क्या करेंगे? अब इनके पास तो कोई विकल्प है नहींया तो फिर से बगावत करो, या किसी और के लिए वोट मांगोदोनों ही परिस्थितियों में कोई उनपर विश्वास नहीं करेगाजांदू जी अपने गुरु को याद करो! ठाकर को देखो! क्या मौके पर पलटी मारी थीबल्ले बल्ले हो गईघर आने के बाद जांदू जी का स्टेटस तो बढ़ा नहींहाँ जिम्मेदारी जरुर बढ़ गईपार्टी के कई प्रकार के प्रोटोकोल अलग सेपार्टी के नियम,कायदे तो हैं हीचंदा चिटठा भी देना ही पड़ता है, पार्टी चलाने,उसके कार्यक्रम के लिएनिर्दलीय थे तो कोई चिंता नहींकाम हुआ, हुआ, नहीं हुआ तो नहीं हुआकह देते सरकार नहीं करतीबयान ही तो देना था कि गौड़ -जसूजा अड़चन डालते हैंसभापति का पद कोई छीन नहीं सकता थाअब ऐसा नहीं हो सकताचाहे सरकार ना करेगौड़- जसूजा सच में अडंगा लगायेंजांदू जी सारे आम कुछ नहीं कह सकतेकाम नहीं हुआ तो कार्यकर्त्ता नाराजबात ऊपर तक जाएगीचुनाव आते आते कई नए विरोधी पैदा होने का अंदेशाराजनीतिक विश्लेषक बेशक सार्वजानिक रूप से कुछ ना कहें लेकिन उनकी चर्चा से लगता है कि श्रीगंगानगर में राजकुमार गौड़ को राजनीतिक रूप से कमजोर करने के लिए जगदीश जांदू को इस्तेमाल किया गया हैजांदू जी इस्तेमाल हो भी गए। इस समय जब चारों तरफ लोग कांग्रेस से नाराज हैं। बीजेपी के सत्ता में आने की खबर आम है। जगदीश जांदू का घर आना उनकी राजनीति अपरिपक्वता को दर्शाता है। संभव है यह बात भीड़ में उनको ठीक ना लगे। किन्तु चिंतन मनन करेंगे तो समझ आ जायेगा कि उन्होंने घर आकर क्या खोया,क्या पाया? पहले एक शेर-इस अंजान शहर में पत्थर कहाँ से आ लगा, लोगों की इस भीड़ में कोई अपना जरुर है। एस एम एस पत्रकार साथी राकेश मितवा का ,जो उस दिन मिला जिस दिन जांदू जी घर लौटे थे। एस एम एस पढ़े--जांदू जयंती पर शुभकामनाएं।

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