हर इन्सान हर पल किसी ना किसी उधेड़बुन में रहता है। सफलता के लिए कई प्रकार के ताने बुनता है। इसी तरह उसकी जिन्दगी पूरी हो जाती हैं। उसके पास अपने लिए वक्त ही नहीं । बस अपने लिए थोड़ा सा समय निकाल लो और जिंदगी को केवल अपने और अपने लिए ही जीओ।
Saturday, 29 November 2008
बहादुरों को सलाम नमन शहीदों को
देश भर में जब मुंबई काण्ड पर राजनेता राजनीति कर रहें हैं वहीँ भारत-पाक सीमा से सटे श्रीगंगानगर में जागरूक लोगों ने अपने अंदाज में सुरक्षा बलों के बहादुरों को सलाम कर शहीदों को नमन किया। बिना किसी तामझाम के नगर के गणमान्य नागरिकों ने मौन शान्ति मार्च निकाला। इन नागरिकों ने अपने गलों में आतंकवाद के खिलाफ और देश में अमन चैन बनाये रखने की अपील करते पोस्टर लटका रखे थे। महात्मा गाँधी चौक पर इन लोगों ने " भारत माता की जय" "आतंकवाद मुर्दाबाद " के नारे लगाये और मोमबत्ती जलाकर शहीदों को नमन किया। बेशक शान्ति मार्च में शामिल लोगों की संख्या कम थी मगर उनका मकसद बहुत बढ़ा था। इस मार्च में श्रीराम तलवार, विजय अरोडा,अशोक नागपाल,निर्मल जैन,तेजेंदर पाल तिम्मा,मुकेश कुमार, निर्मल जैन,नरेश शर्मा,दर्शन कसेरा आदि प्रमुख लोग थे।
Friday, 28 November 2008
आडवानी आए पर भाए नहीं
श्रीगंगानगर जिले के एक कस्बे में आज लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवानी ने एक सभा को संबोधित किया। बीजेपी उम्मीदवार वर्तमान सांसद निहाल चंद के पक्ष में हुई इस सभा में उन्होंने एन डी ऐ सरकार की खूब तारीफ की। विकास के नाम पर वोट मांगे। आतंकवाद पर भी बोले। लेकिन वैसा नही जैसा लोग सुनना चाहते हैं। लोग तो वह सुनना पसंद करते हैं जो नरेंद्र मोदी बोलते हैं। उनकी सभा से निहाल चंद को कितने वोट मिलेंगें यह ८ तारीख को पता लगेगा। श्री आडवानी की सभा के लिए सुरक्षा क्या थी उसकी एक बानगी बतातें हैं। उनकी सभा के लिए प्रेस के पास एक बीजेपी कार्यकर्त्ता की जेब में थे। वह भी खाली। ना तो उस पर यह लिखा था कि ये पास किसने किस हैसियत से जारी किए हैं। पास के पीछे काम के बोझ के मारे वहां के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक ने ऐसे किए जैसे स्कूल में मास्टर करते हैं। ना कोई मोहर ना नाम,ना कोई पोस्ट का जिक्र। पास पर ख़ुद नाम लिखो और साहब से हस्ताक्षर करवा लो। यह हाल तो तब है जब मुंबई में आतंकवादियों से सेना लोहा ले रही है। जब कोई घटना हो जाती है तो फ़िर बलि का बकरा तलाश किया जाता है। समझ नहीं आता कि पुलिस के अधिकारी यह सब जानते नहीं या वे जिम्मेदारी से काम नही करना चाहते। बॉर्डर के साथ लगते इस जिले का तो भगवान ही मालिक है। ये तो उसी की कृपा है की सब ठीक से निपट जाता है।
Thursday, 27 November 2008
कब तक सोते रहेंगें
कभी अजमेर, कभी दिल्ली ,कभी जयपुर और अब मुंबई आतंक के साये में। घंटों चली मुठभेड़,प्रमुख अफसर मरे,विदेशी मरे, आम आदमी मरा। और हम हैं कि सो रहें हैं। देश में सांप्रदायिक सदभाव कम करने की कोशिश लगातार की जा रहीं हैं। आतंकवाद हमारी अर्थव्यवस्था को नेस्तनाबूद करने जा रहा है। हम घरों में बैठे अफ़सोस पर अफ़सोस जता रहें हैं। हमारी सरकार कुछ नहीं कर रही। नेता हिंदू मुस्लिम का नाम लेकर असली आतंकवाद को अनदेखा कर रहें हैं। इस देश में कोई ऐसा नहीं है जो उनसे इस बात का जवाब मांग सके कि यह सब क्यों और कब तक? पहली बार कोई यहाँ खेलनी आई विदेशी टीम दौरा अधुरा छोड़ कर वापिस जा रही है। शेयर बाज़ार बंद रखा गया। देश के कई महत्वपूर्ण राज्यों में चुनाव हो रहें हैं। अगले साल लोकसभा के चुनाव होने हैं। राजनीतिक दल एक दुसरे पर प्रहार कर रहें हैं। आतंकवाद चुनावी मुद्दा है,जिसके सहारे सब अपना वोट बैंक बढ़ाने में लगें हैं। इस मुद्दे पर बोलते तो सभी हैं लेकिन कोई भी करता कुछ नहीं। अगर हम सब इसी प्रकार सोते रहें तो आतंकवादियों के हौंसले बुलंद ही बुलंद होते चले जायेंगें। इसलिए बहुत हो चुका, बहुत सह चुके इस आतंकवाद को,अब हमें एक जुट होकर लडाई लड़नी होगी। शब्दों से नहीं उन्ही की तरह हथियारों से। कब तक सोये रहोगे अब तो जाग जाओ। ----स्वाति अग्रवाल
एक छोटी सी नाव
पानी का एक अनंत समंदर
उसमे उमड़ रहा भयंकर तूफान
आकाश से मिलने को आतुर
ऊपर ऊपर उठती लहरें
ऐसे मंजर को देख
बड़े बड़े जहाजों के कप्तान
हताश होकर एक बार तो
किनारे की आश छोड़ दें,
मगर एक छोटी सी नाव
इस भयंकर तूफान में
इधर उधर हिचकोले खाती हुई
किस्मत की लकीरों को मिटाती हुई
यह सोच रही है कि
कभी ना कभी तो
मुझे किनारा नसीब होगा
या बीच रस्ते में ही
इस समंदर की अथाह गहराइयों में
खो जाउंगी सदा के लिए।
नाव की कहानी मेरे जैसी है
वह समुंदरी तूफान में
किनारे की आस में है
चली जा रही हैं,
और मैं जिंदगी के तूफान में
जिंदगी की आस में
जिए जा रहा हूँ।
उसमे उमड़ रहा भयंकर तूफान
आकाश से मिलने को आतुर
ऊपर ऊपर उठती लहरें
ऐसे मंजर को देख
बड़े बड़े जहाजों के कप्तान
हताश होकर एक बार तो
किनारे की आश छोड़ दें,
मगर एक छोटी सी नाव
इस भयंकर तूफान में
इधर उधर हिचकोले खाती हुई
किस्मत की लकीरों को मिटाती हुई
यह सोच रही है कि
कभी ना कभी तो
मुझे किनारा नसीब होगा
या बीच रस्ते में ही
इस समंदर की अथाह गहराइयों में
खो जाउंगी सदा के लिए।
नाव की कहानी मेरे जैसी है
वह समुंदरी तूफान में
किनारे की आस में है
चली जा रही हैं,
और मैं जिंदगी के तूफान में
जिंदगी की आस में
जिए जा रहा हूँ।
Sunday, 23 November 2008
यूँ अचानक वो याद आए
चौंक चौंक उठता है आलम मेरी तन्हाई का
यूँ अचानक वो हर बात पे याद आतें हैं।
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दस्ताने इश्क में कुछ भी हकीकत हो तो फ़िर
एक अफ़साने के बन जाते हैं अफ़साने बहुत।
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आज दुनिया में वो ख़ुद अफसाना बन के रह गये
कल सुना करते थे जो दुनिया के अफ़साने बहुत।
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पीते पीते जब भी आया तेरी आंखों का ख्याल
मैंने अपने हाथों से तोडे हैं पैमाने बहुत।
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नहीं मालूम अब क्या चीज आंखों में रही बाकी
नजर तो उनके हुस्न पे जाकर जम गई अपनी।
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उन आंखों में भी अश्क भर्रा गए हैं
कभी हम जो भूले से याद आ गए हैं।
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खिजां अब नहीं आ सकेगी चमन में
बहारों से कह दो की हम आ गए हैं।
----सब कुछ संकलित है
यूँ अचानक वो हर बात पे याद आतें हैं।
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दस्ताने इश्क में कुछ भी हकीकत हो तो फ़िर
एक अफ़साने के बन जाते हैं अफ़साने बहुत।
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आज दुनिया में वो ख़ुद अफसाना बन के रह गये
कल सुना करते थे जो दुनिया के अफ़साने बहुत।
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पीते पीते जब भी आया तेरी आंखों का ख्याल
मैंने अपने हाथों से तोडे हैं पैमाने बहुत।
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नहीं मालूम अब क्या चीज आंखों में रही बाकी
नजर तो उनके हुस्न पे जाकर जम गई अपनी।
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उन आंखों में भी अश्क भर्रा गए हैं
कभी हम जो भूले से याद आ गए हैं।
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खिजां अब नहीं आ सकेगी चमन में
बहारों से कह दो की हम आ गए हैं।
----सब कुछ संकलित है
Friday, 21 November 2008
बीजेपी बचाव की मुद्रा में
श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ में विधानसभा की ११ सीट हैं। गत चुनाव में बीजेपी ने सात,कांग्रेस,लोकदल[चौटाला] ने एक एक सीट जीती। दो निर्दलीय भी विजयी हुए थे। इस बार देखते हैं कि कहाँ क्या हो सकता है।श्रीगंगानगर- यहाँ से कांग्रेस के राज कुमारगौड़,बीजेपी के राधेश्याम गंगानगर मुख्य उम्मीदवार हैं। गजेंद्र सिंह भाटी बीजेपी का बागी है। बीएसपी का सत्यवान है। इनके अलावा 9 उम्मीदवार और हैं। जिनके नाम हैं-ईश्वर चंद अग्रवाल,केवल मदान,पूर्ण राम, भजन लाल, मनिन्द्र सिंह मान, राजेश भारत,संजय ,सत्य पाल और सुभाष चन्द्र। बीजेपी के राधेश्याम गंगानगर गत चुनाव में कांग्रेस की टिकट पर ३६००० वोट सर हारे। उन्होंने कुछ दिन पहले ही बीजेपी का दामन थामा और बीजेपी ने टिकट उनको थमा दी। बस यह बात जन जन को हजम नहीं हो रही। जिसको जनता ने ३६०० मतों से हराया वह चौला बदल कर फ़िर सामने है। जिस कारण राजकुमार गौड़ भारी पड़ रहें हैं। बीजेपी के दिमाग में यह बात फिट करदी कि श्रीगंगानगर से केवल अरोडा बिरादरी का उम्मीदवार ही चुनाव जीत सकता है। राधेश्याम गंगानगर इसी बिरादरी से है। जैसे ही कांग्रेस ने इनको नकारा बीजेपी ने लपक लिया। मगर ये बात याद नही आई कि इसी अरोडा बिरादरी के राधेश्याम गंगानगर ने सात चुनाव में से केवल तीन चुनाव ही जीते। जो जीते वह कम अन्तर से जो हारे वह भारी अन्तर से। बीजेपी कार्यकर्त्ता क्या आम वोटर को राधेश्याम का चौला बदलना हजम नहीं हो रहा। राधेश्याम अभी तक बीजेपी के नेताओं को अपने पक्ष में नहीं कर पाए। एक को मना भी नहीं पाते कि दूसरा कोप भवन में चला जाता है। सब जानते हैं कि राधेश्याम गंगानगर ने कांग्रेस में किसी को आगे नहीं आने दिया, इसलिए अगर यह बीजेपी में जम गया तो उनका भविस्य बिगड़ जाएगा। लोग सट्टा बाजार और अखबारों में छपी ख़बरों की बात करतें हैं। लेकिन इनका भरोसा करना अपने आप को विचलित करना है। १९९३ में सट्टा बाजार और सभी अखबार श्रीगंगानगर से बीजेपी के दिग्गज नेता भैरों सिंह शेखावत की जीत डंके की चोट पर दिखा रहे थे। सब जानतें हैं कि तब श्री शेखावत तीसरे स्थान पर रहे थे।
Thursday, 20 November 2008
हौंसला देंगी ये चिठ्ठियाँ
फाड़ मत इनको कि जब अपनों से दिल घबराएगा
हौंसला देंगी ये चिठ्ठियाँ रहने भी दे।
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तेरा दीवाना गुजरा है जिधर से
खुलीं हैं खिड़कियाँ सारे घरों की।
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सौ बार बिगाड़ी हैं बनाकर तेरी तस्वीरें
रंग उसमे मोहब्बत के उभर के नहीं आए।
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लिख रखा है आंखों में मिले वक्त तो पढ़ना
वो लफ्ज जो तहरीर से बहार नहीं आए।
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घर से निकला तो सोचा कि किधर जाओगे
हर तरफ़ तेज हवाएं हैं बिखर जाओगे।
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सब पंक्तियाँ संकलित हैं।
हौंसला देंगी ये चिठ्ठियाँ रहने भी दे।
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तेरा दीवाना गुजरा है जिधर से
खुलीं हैं खिड़कियाँ सारे घरों की।
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सौ बार बिगाड़ी हैं बनाकर तेरी तस्वीरें
रंग उसमे मोहब्बत के उभर के नहीं आए।
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लिख रखा है आंखों में मिले वक्त तो पढ़ना
वो लफ्ज जो तहरीर से बहार नहीं आए।
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घर से निकला तो सोचा कि किधर जाओगे
हर तरफ़ तेज हवाएं हैं बिखर जाओगे।
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सब पंक्तियाँ संकलित हैं।
Tuesday, 18 November 2008
तन्हा ना अपने आप को पाइए
दुआ करो कि ये पौधा सदा हरा ही लगे
उदासियों में भी चेहरा खिला खिला लगे।
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तन्हा ना अपने आप को पाइए जनाब
मेरी गजल को साथ लिए जाइये जनाब।
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मैं इस उम्मीद पे डूबा कि तू बचा लेगा
अब इसके बाद मेरा इम्तिहान क्या लेगा।
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मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊंगा
कोई चराग नहीं हूँ जो फ़िर जला लेगा।
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मैं उसका हो नहीं सकता बता ना देना उसे
लकीरें हाथ की अपनी वो सब जला लेगा।
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मेरे बारे में हवाओं से कब पूछेगा
खाक जब खाक में मिल जायेगी तब पूछेगा।
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घर बसाने में ये खतरा है कि घर का मालिक
रात को देर से आने का सबब पूछेगा।
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लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।
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ये सब लाइन संकलित की हुई हैं।
उदासियों में भी चेहरा खिला खिला लगे।
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तन्हा ना अपने आप को पाइए जनाब
मेरी गजल को साथ लिए जाइये जनाब।
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मैं इस उम्मीद पे डूबा कि तू बचा लेगा
अब इसके बाद मेरा इम्तिहान क्या लेगा।
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मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊंगा
कोई चराग नहीं हूँ जो फ़िर जला लेगा।
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मैं उसका हो नहीं सकता बता ना देना उसे
लकीरें हाथ की अपनी वो सब जला लेगा।
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मेरे बारे में हवाओं से कब पूछेगा
खाक जब खाक में मिल जायेगी तब पूछेगा।
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घर बसाने में ये खतरा है कि घर का मालिक
रात को देर से आने का सबब पूछेगा।
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लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।
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ये सब लाइन संकलित की हुई हैं।
Monday, 17 November 2008
जनता का उम्मीदवार कुन्नर
जब राजनीतिक दलों के नेता बिना समझे टिकट की बन्दर बाँट करतें हैं तो जनता को सामने आना पड़ता है। ऐसा ही कुछ हुआ श्रीगंगानगर जिले के श्री करनपुर में , यहाँ एक नेता हैं गुरमीत सिंह कुन्नर। इनको पार्टी ने टिकट नहीं दिया, नहीं दिया तो नहीं दिया। कुन्नर ने चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया। बस उसके बाद इलाके की जनता कुन्नर के यहाँ पहुँच गई। कोई सौ दो सौ नहीं। कई हजार। श्री कुन्नर ने चुनाव ना लड़ने की बात कही। लेकिन जनता कुछ भी सुनाने को तैयार नहीं हुई। आख़िर श्री कुन्नर को यह कहना पड़ा, जो आपकी इच्छा हो, मैं आपके साथ हूँ। लो साहब, इलाके में जनता का उम्मीदवार बन गया कुन्नर। कांग्रेस और बीजेपी की टिकट पाने वाले जनता को तरस गए और श्री कुन्नर के यहाँ अपने आप कई हजार लोग आ पहुंचे। इस भीड़ ने कुन्नर का पर्चा दाखिल करवाया। भीड़ ने कुन्नर को भरोसा दिलाया है कि वे उनके लिए दिन रात एक कर देंगे। हिंदुस्तान में बहुत कम जगह ऐसा होता होगा जब जनता किसी को जबरदस्ती चुनाव लड़ने को मजबूर करती है। जब जन जन साथ हो तो फ़िर विजय कैसे दूर रह सकती है।
Sunday, 16 November 2008
गिरगिट समाज के सामने संकट
श्रीगंगानगर की सड़कों पर बहुत ही अलग नजारा था। चारों तरफ़ जिधर देखो उधर गिरगिटों के झुंड के झुंड दिखाई दे रहे थे। गिरगिट के ये झुंड नारेलगा रहे थे " नेताओं को समझाओ, गिरगिट बचाओ", "गिरगिटों के दुश्मन नेता मुर्दाबाद", " रंग बदलने वाले नेता हाय हाय"," गिरगिट समाज का अपमान नही सहेगा हिंदुस्तान"। ये नजारा देख एक बार तो जो जहाँ था वही रुक गया। ट्रैफिक पुलिस को उनके कारन काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था। गिरगिटों के ये सभी झुंड जा रहे थे राम लीला मैदान। वहां गिरगिट बचाओ मंच ने सभा का आयोजन किया था। रामलीला मैदान का नजारा, वह क्या कहने। लो जी सभा शुरू हो गई। जवान गिरगिट का नाम पुकारा गया। उसने कहा- यहाँ सभा करना कायरों का काम है। हमें तो उस नेता के घर के सामने प्रदर्शन करना चाहिए जिसने रंग बदल कर हमारी जात को गाली दी है। बस फ़िर क्या था सभा में सही है, सही है, के नारों के साथ जवान गिरगिट खड़े हो गए। एक बुजुर्ग गिरगिट ने उनको समझा कर शांत किया। गिरगिट समाज के मुखिया ने कहा, इन नेताओं ने हमें बदनाम कर दिया। ये लोग इतनी जल्दी रंग बदलते हैं कि हम लोगों को शर्म आने लगती है। जब भी कोई नेता रंग बदलता है , ये कहा जाता है कि देखो गिरगिट कि तरह रंग बदल लिया। हम पूछतें हैं कि नेता के साथ हमारा नाम क्यों जोड़ा जाता है। नेता लोग तो इतनी जल्दी रंग बदलते हैं कि गिरगिट समाज अचरज में पड़ जाता है। मुखिया ने कहा, हम ये साफ कर देना चाहतें है कि नेता को रंग बदलना हमने नहीं सिखाया। उल्टा हमारे घर कि महिला अपने बच्चों को ये कहती है कि -मुर्ख देख फलां नेता ने गिरगिट ना होते हुए भी कितनी जल्दी रंग बदल लिया, और तूं गिरगिट होकर ऐसा नहीं कर सकता,लानत है तुझ पर ... इतना कहने के बाद तडाक और बच्चे के रोने की आवाज आती है।मुखिया ने कहा हमारे बच्चे हमें आँख दिखातें हैं कहतें हैं तुमको रंग बदलना आता कहाँ है जो हमको सिखाओगे, किसी नेता के फार्म हाउस या बगीचे में होते तो हम पता नहीं कहाँ के कहाँ पहुँच चुके होते। मुखिया ने कहा बस अब बहुत हो चुका, हमारी सहनशक्ति समाप्त होने को है। अगर ऐसे नेताओं को सबक नहीं सिखाया गया तो लोग "गिरगिट की तरह रंग बदलना" मुहावरे को भूल जायेंगे। लम्बी बहस के बाद सभा में गिरगिटों ने प्रस्ताव पास किया। इस प्रस्ताव में सभी दलों के संचालकों से कहा गया कि अगर उन्होंने रंग बदलने वाले नेता को महत्व दिया तो गिरगिट समाज के पाँच जीव हर रोज उनके घर के सामने नारे बाजी करेंगे। मुन्ना गिरी से उनको समझायेंगे। इन पर असर नही हुआ तो सरकार से "गिरगिट की तरह रंग बदलना" मुहावरे को किताबों से हटाने के लिए आन्दोलन चलाया जाएगा। ताकि ये लिखवाया जा सके "नेता की तरह रंग बदलना"। सभा के बाद सभी गिरगिट जोश खरोश के साथ वापिस लौट गए।
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