Friday, 11 May 2012

ये एसपी तो मस्त है यार


श्रीगंगानगर-जिले का एसपी हंसते हुए मिले तो मुलाकाती के मन को सुकून मिलता है। सुकून की यह सरिता यहां तब तक बहती रहेगी जब तक चालके संतोष कुमार तुकाराम यहां रहेंगे। यस, ऐसे ही हैं संतोष चालके....इस जिले के नए एसपी। सभी से दिल खोलकर...चेहरे पर एवरग्रीन स्माइल के साथ मिलते हैं एसपी। आओ....मिलो....बात करो और जाओ। गप्प बाजी के लिए समय नहीं। वेटिंग रूम खाली रहना चाहिए ताकि अन्य जरूरी काम होते रहें। वे कहते हैं.....सभी से मिलना...व्यवहार कुशलता....ऑफिसर का सम्मान....कोई काम नहीं तब भी मान देना इस जिले के लोगों की विरासत है। इस विरासत का मान रखना मेरा भी कर्तव्य है। इस रिपोर्टर से बात चीत में श्री चालके ने कहा...आम आदमी को 24 घंटे मोबाइल फोन पर उपलब्ध रहूँगा। उसको पुलिस के पास जाने के लिए किसी मिडल मेन को ढूँढने की जरूरत नहीं है। कोई मुझसे मिलने आया और मैं फोन पर बात करूँ...ये नहीं होगा। उनका  कहना था कि पांच छह साल पहले जब मैं यहां रहा जब प्राथमिकता अलग थी। तब से अब तक काफी बदलाव हुए हैं। इस लिए प्राथमिकता बदलती रहती हैं। देखुंगा अब क्या प्राथमिकता हो...उसी के अनुरूप बढ़िया काम करेंगे। बीट सिस्टम को प्रभावी बनाया जाएगा। इसकी बहुत उपयोगिता है इसलिए बीट कांस्टेबल को मोबाइल की सिम फ्री दी जाती है। खुद मुख्यमंत्री ने इसको लागू किया। बेशक कांस्टेबल की बदली हो जाए परंतु बीट कांस्टेबल का मोबाइल नंबर वही रहेगा। किसी और कांस्टेबल को यह सुविधा उपलब्ध नहीं है। बीट कांस्टेबल पहले से अधिक सजगता और कार्यक्षमता से काम करे यह प्रयास किया जाएगा। बातचीत हो रही थी कि संगठन ज्ञापन देने आ गया। कुछ लोगों को एसपी ने बुलाया...जो आए उनमे  महेश पेड़ीवाल भी थे। एसपी उनको देखते ही बोले.. कैसे हो महेश पेड़ीवाल जी।ज्ञापन देने वालों ने धर्मांतरण की बात की। एसपी ने इस विषय पर मुस्कराते हुए जो तर्क दिये उससे मुस्कराते चेहरे के पीछे विचारों की दृढ़ता भी दिखाई दी। उनके तर्कों से सभी निरुतर हो गए। बाहर आकर एक नेता बोला...एसपी मस्त है यार। सच में आज तो एसपी मस्त हैं.....कल इस क्षेत्र की हवा क्या करेगी...इसकी चर्चा मौका मिला तो फिर कभी। सज्जाद मिर्जा कहते हैं...मुझे देखा जो तुमने मुस्करा कर,मैं अपने आप को अच्छा लगा हूँ।

जयपुर के राजनीतिक और सत्ता के गलियारों की खबर



श्रीगंगानगर-बीजेपी और कांग्रेस  के नेताओं में वर्चस्व की लड़ाई चल रही है।एक दूसरे को निपटाने के फेर में खुद निपट रहें हैं। वसुंधरा राजे 60-65 विधायकों के इस्तीफे आ जाने से खुश हैं। विरोधी ये सोच कर प्रसन्न हैं कि प्रदेश में सीट  तो दो सौ हैं...मैडम के साथ तो इतने ही हैं। कार्यकर्ताओं का भी जोड़ बाकी किया जा रहा है। लाखों कार्यकर्ताओं में से हजारों ने मैडम का समर्थन किया....बाकी किसके साथ है?जीत अपने आप चल कर मैडम की ओर आ रही थी। मैडम पीछे हो ली। सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस को आज भी सामंतशाही आँख दिखाती है। विश्वेन्द्र सिंह का अभी तो कुछ बिगड़ा नहीं। खुले आम चुनौती दे रहा है....कर लो जिसने जो करना है। अब डॉ चंद्रभान से कौन पूछे की फिर भरतपुर कब जाना है। इन सब घटनाओं के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का चेहरा अधिक खिला खिला रहता है। रहेगा ही...इस लड़ाई से राजनीतिक लाभ तो उन्ही को मिलेगा।
तबादले खुल गए। मंत्रियों के मेला लगा है। विधायकों का...पुलिस और नागरिक प्रशासन के छोटे बड़े अधिकारियों का। विधायक लगभग सभी मंत्रियों के पास डिजायर लेकर नमस्कार करने पहुँच रहें हैं वे साफ कहते हैं विधायक का बेड़ा पार तो मंत्री ही लगाएंगे। मंत्री दूसरे मंत्री को डिजायर भेज रहा है। किसी सीनियर के पास खुद भी जाना पड़ता है। खास डिजायर सीधे सीएम तक पहुंचाई जाती है। हर मंत्री का लगभग पूरा स्टाफ इसी काम में लगा है। क्योंकि अगले साल चुनाव है...इसलिए विधायक,मंत्री सभी कार्यकर्ताओं को राजी रखने की कोशिश में हैं। बड़े बीजेपी के नेता भी चुपके से किसी मंत्री को फोन कर किसी अधिकारी/कर्मचारी को अपने क्षेत्र में लगाने का आग्रह कर देता है। राजनीति में ये चलता है।
बुधवार की शाम मुख्यमंत्री निवास पर आमिर खान और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की संयुक्त प्रेस कान्फ्रेंस थी। आमिर ने शुरुआत की....अशोक जी का धन्यवाद....अशोक जी ने ये किया....अशोक जी ने वो किया। कान्फ्रेंस के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने आमिर खान के कंधे पे हाथ रखा और आगे बढ़े...उन्होने आमिर खान से शायद यही कहा होगा...कम से कम मुख्यमंत्री अशोक गहलोत तो कहते यार...और फिर मुस्कुराहट।

Friday, 4 May 2012

पांच करोड़ का कमाल कलेक्टर पहुंचे बी डी की सभा में



श्रीगंगानगर- विकास डब्ल्यू एसपी के सीएमडी  बी डी अग्रवाल द्वारा प्रशासन को नगर के विकास हेतु दिये गए पांच करोड़ रुपए ने धान मंडी के नेताओं को हासिए पर डाल दिया....उनको कागजी नेता बना दिया। पांच करोड़ रुपए का ही कमाल है कि जिला कलेक्टर अंबरीष कुमार खुद धान मंडी पहुंचे। बी डी अग्रवाल की ओर से आयोजित किसानों,व्यापारियों की सभा को संबोधित किया। यह पहला मौका है जब जिला कलेक्टर किसी ऐसे व्यक्ति की सभा में गए जो उद्योगपति होने के साथ साथ जमींदारा पार्टी नामक राजनीतिक दल और एक किसान संगठन के कार्यकारी अध्यक्ष भी हैं। नगर में किसान,मजदूर, आम आदमी से जुड़ी समस्याओं पर छोटी बड़ी सभाएं होती रहती हैं। राजनीतिक भी और गैर राजनीतिक भी। किसी भी जिला कलेक्टर द्वारा कभी इस प्रकार की सभा में जाने की जानकारी नहीं है।  यह बी डी अग्रवाल के पांच करोड़ रुपए ही थे जिन्होने वर्तमान कलेक्टर अंबरीष कुमार को  परंपरा तोड़ सभा में जाने के लिए प्रेरित किया। वरना धान मंडी में बारदाने की समस्या हर बार होती है। व्यापारी,किसान,मजदूर आंदोलन करते हैं। इस बार भी हुआ। सबसे पुरानी व्यापारिक संस्था दी गंगानगर ट्रेडर्स असोसियेशन और कच्चा आढ़तिया संघ के पदाधिकारियों ने किसानों के साथ मंडी ऑफिस में अधिकारी का घेराव किया। दूसरे दिन बी डी अग्रवाल ने मोर्चा संभाला। वे जिला प्रशासन से मिले। प्रशासन के मुखिया जिला कलेक्टर ने बुधवार को मंडी आने का वादा किया। वादा निभाते हुये कलेक्टर ने  बी डी अग्रवाल की सभा में पहुँच कर नई शुरुआत की। बी डी अग्रवाल की बल्ले बल्ले हुई। सालों से मंडी में राजनीति करने वाले व्यापारियों को बी डी अग्रवाल के झंडे के नीचे आना पड़ा। जिला कलेक्टर ने सभा में क्या वादा किया....क्या कहा....बारदाना आएगा या नहीं...यहअलग बात है। बात तो ये कि इससे पहले जिला कलेक्टर कभी इस प्रकार की सभाओं में नहीं जाते थे। कानून व्यवस्था के लिए बहुत जरूरी हुआ तो किसी एडीएम को भेज दिया....वह भी सभा में नहीं...आजू-बाजू। नेताओं से बात की...लौट गए....जैसा चमत्कार बी डी अग्रवाल ने दिखाया ऐसा कभी देखने को नहीं मिला। कहीं पढ़ा था....सब पूछेंगे आप कैसे हैं,जब तक आपके पास पैसे हैं।




Friday, 27 April 2012

गंगा सिंह जी के बाद अंबरीष कुमार जी का नगर भ्रमण



श्रीगंगानगर-बुजुर्गों ने बताया कि महाराजा गंगा सिंह वेश बदल कर प्रजा का दुख सुख जानने के लिए रात को निकला करते थे। कहीं कुछ गलत देखते सुनते तो उसको ठीक करते। कार्य प्रणाली में सुधार होता। पीड़ित को न्याय मिलता। हम परम सौभाग्यशाली है। बड़भागी है। जो महाराजा गंगा सिंह की इस क्षेत्र में अंबरीष कुमार जैसे महा पुरुष हमारे जिला कलेक्टर बन कर अवतरित हुए। गंगा सिंह जी रात को भ्रमण करते थे वेश बदल कर। अब जमाना खराब है। पुलिस का भी कोई यकीन नहीं। रात्रि नगर भ्रमण में खतरा हो सकता है।  इसलिए कलेक्टर जी दिन में भ्रमण करते हैं। पूरे लवाजमे के साथ। ताकि सब देख लें कि कलेक्टर साहब जी को कितनी चिंता है अपनी प्रजा की। कुछ माह के उनके कार्यकाल में वे कई बार नगर दर्शन कर चुके हैं। पहली बार तो हमने भी उनकी इस पहल के लिए शुक्रिया किया था। लगा था कि बहुत कुछ होगा।परंतु घोषणाओं के अतिरिक्त कुछ नहीं हुआ। जब भी नगर भ्रमण तब कोई नई घोषणा। केवल हवाई किले....ये कर दो....ऐसा होना चाहिए.....अफसरों के पास उनकी हां में हां मिलाने  के अलावा कोई रास्ता नहीं। कलेक्टर इस व्यवस्था में जिले का मालिक है कुछ भी कह सकते हैं...मिनी सचिवालय अबोहर रोड पर ले जा सकते हैं....बस अड्डा सूरतगढ़ रोड पर। ओवर ब्रिज बनने ही वाला है....सीवरेज का निर्माण इस दिन शुरू हो जाएगा। रवीन्द्र पथ  पर ट्रैफिक कम करने के लिए बसें ब्लॉक एरिया से आएंगी...जाएंगी..... बरसाती और गंदे पानी की निकासी के लिए पूंजीपतियों से मदद लेंगे। यह तो कुछ भी नहीं महाराज जी ने एक अधिकारी को इसके लिए टेंडर निकालने के आदेश दे दिये। अधिकारी था ठेठ हरियाणवी....उसने इस बारे में नोट शीट बनाकर महाराज जी के सामने रख दी। हस्ताक्षर कौन करे? जुबां हिलाने और नोट शीट पर स्वीकृति देने में बहुत अंतर है। सरकार भी जल्दी से मंजूरी नहीं देती...कलेक्टर जी कैसे देते। बात वहीं के वहीं। दो दिन चले अढ़ाई कोस.... । पता नहीं कलेक्टर जी ऐसा क्यों करते हैं। उनको कोई कुछ करने नहीं देता या उनको नगर भ्रमण कर घोषणाएँ करने का केवल शौक ही है। कलेक्टर जी से यह सब पूछने की हमारी तो हिम्मत नहीं...जिनकी हिम्मत है वे उनकी लल्ला लोरी करते हैं। इसलिए होने दो नगर भ्रमण...करने दो घोषणाएँ....अपना क्या बिगड़ता है...ऐसी तैसी  तो कांग्रेस की हो रही है, होने दो। बशीर फारुकी की लाइन हैं-इन्ही से हमको जबरन मुस्करा के मिलना पड़ता है,हमारे कत्ल की साजिश में जिन के दिन गुजरते हैं।




Sunday, 22 April 2012

आज लोग मल्टी क्लर्ड हो गए हैं-एसपी रूपीन्द्र सिंह


श्रीगंगानगर- आईपीएस रूपीन्द्र सिंह कहते हैं कि श्रीगंगानगर की धरती पर दो साल का कार्यकाल लक्की पीरियड रहा। कारण नहीं पता। लोग मल्टी क्लर्ड  हो गए। पोलिटिकल व्यक्ति मुझ से नहीं सिस्टम से नाराज रहे। मुझे इस क्षेत्र में हरियाली,नहरें,पानी,कल्चर,लोगों का मिलने जुलने का स्वभाव बहुत पसंद आए। बहुत काम किया...पास भी हुए फेल भी। एसपी रूपीन्द्र सिंह से तबादले के बाद उनके निवास पर बात चीत हुई। रूपीन्द्र सिंह ने कहा कि यहां मुझे कोई खास परेशानी नहीं हुई। कभी हुई तो वह शॉर्ट आउट हो गई। किसका सहयोग रहा....किसने साथ दिया? रूपीन्द्र सिंह थोड़े दार्शनिक हो गए। कहने लगे...आज लोग मल्टी क्लर्ड हो गए। कहने में कुछ करने में कुछ।मुंह पर दोस्त बनकर आएंगे। असल में दोस्ती निभाएंगे नहीं। उनसे परेशानी हुई....मुझे क्या ऐसे लोगों से सिस्टम को परेशानी है। ये दो चेहरे वाले लोग प्रभावशाली और पहुंचवाले हैं। श्री सिंह के अनुसार उन्हे आमजन का बहुत अधिक सहयोग मिला। वे कहते हैं आम जन के ऐसे काम हुए जिनका कोई रिकॉर्ड किसी थाना या कोर्ट में नहीं है।ऐसे लोगों ने आकर जब काम होने की बात कही तो सुकून मिला। धार्मिक व्यक्ति होने के सवाल पर रूपीन्द्र सिंह ने कहा.. मेरा धर्म से नाता उतना ही है जितना एक व्यक्ति का उसके धर्म से।मुझे समझ नहीं आ रहा मुझे धार्मिक क्यों कहा जाता है। जाति का पक्ष करने संबंधी विवाद के बारे में रूपीन्द्र सिंह बोले कि इसका जवाब तो वहीं देंगे जिन्होने ये विवाद पैदा किया। अपने आप को जज करना मुझे अच्छा नहीं लगता...लोग करे विश्लेषण मेरे बारे।पोलिटिकल लोगों की नाराजगी के संबंध में उनका कहना था कि मुझसे किसी ने नाराजगी व्यक्त नहीं की। वैसे मुझ से कोई नाराज नहीं। नाराजगी थी तो सिस्टम से जिसका मैं हिस्सा हूं। चार कलेक्टर्स के साथ काम किया। बहुत काम करने का मौका मिला। ऐसा कोई समय नहीं आया कि बहुत दुखी या टेंशन में रहा। कभी कोई वक्त आया भी तो निकल गया। फिर सब ठीक हो गया। दो साल में कानून व्यवस्था की वजह से कोई दिक्कत नहीं आई। कोई घटना हुई तो उसका खुलासा भी हुआ।अच्छा भी हुआ तो बुरा भी किन्तु अंत में बैलेंस शीट में रिजल्ट  बढ़िया ही आया। बातचीत के समय घर की बिल्ली आस पास म्याऊँ-म्याऊँ करती रही। रूपीन्द्र सिंह जी बिल्ली को  मिठाई खिलाते हुए बोले...अपने ननिहाल में है ये... मैं पता नहीं इसका मामा लगता हूं या नाना। एसपी रूपीन्द्र सिंह कई दिनों से अवकाश पर हैं। उनके चनक पड़ गई। उनसे मिलने लगातार विभाग के अधिकारी आ रहे थे। शुभकामनाओं का आदान प्रदान हुआ और बात चीत समाप्त। चंद्रभान की लाइन हैवक्त ने कितनी बदल डाली है सूरत आपकी,आईने में अपनी तस्वीर पुरानी देखना।

Wednesday, 18 April 2012

सबके अपने अपने दुख: अपने अपने सुख:


श्रीगंगानगर-हम, हम क्या गली का हर बच्चा डॉ गुरदास जी से बहुत डरता था। उनको आते देख बच्चे कंचे खेलना भूल जाते। कंचों की चिंता की बजाए कान खिंचाई की फिक्र अधिक होती। वे कोई डॉन या आज की पुलिस नहीं थे। वे ना तो परिवार के सदस्य थे ना रिश्ते में कुछ लगते थे। डॉ साहब तो गजसिंहपुर में हमारे पड़ौसी थे। उनको किसी भी बच्चे को डांटने का अधिकार था। किसकी मजाल जो घर जाकर डॉ साहब से खाई डांट का जिक्र भी करता...जिक्र किया तो फिर और डांट। 35-40 साल पहले इसी प्रकार का अधिकार सभी पड़ौसियों के पास होता था।

घरों की छतों पर कपड़े सुखाती ,मसालों,अनाज के धूप लगाती हुई औरतें पड़ौसी महिलाओं से बात कर लिया करती थी। नई दुल्हन इसी प्रकार पड़ौस की बहुओं से इसी माध्यम से जान पहचान करती। बात बात में नए रिश्ते बन जाते। किसी यहां जंवाई आता तो गली की कई लड़कियां जीजा-जीजा कहती हुई पहुँच जाती ठिठोली करने। किशोर वय तक हम उम्र लड़के लड़कियां खेलते रहते गली में,एक दूसरे के घर। रिश्तों की सुचिता,प्रेम और भाईचारे की महक से गली मौहल्ला महका करता था। एक का सुख सभी का होकर कई गुणा बढ़ जाता और एक का दुख दर्द बंट कर कम हो जाता।

अपनेपन की वो मिठास,स्नेह और विश्वास अब कहां है। क्या मजाल की आप पड़ौसी के किसी बच्चे को उसकी किसी गलत हरकत पर डांट सको! अब तो अपने बच्चों को डांटने की हिम्मत नहीं होती। अपने बच्चे की गलती पर भी मन मसोस कर रहना पड़ता है पड़ौसी के बच्चे की तरफ तो देखने का रिवाज ही नहीं रहा। घर की बहू अब पड़ौसी की बहू को आते जाते देख सकती है। घर की छत पर उससे मिलना असंभव है। छतों की दीवारें बहुत बड़ी हो गई और हमारी सोच छोटी...हमारे कद से भी छोटी। आज दूसरे की छत की ओर झाँकने में भी शंका आती है...कोई देख ना ले...कोई हुआ तो क्या सोचेगा?जंवाई के आने पर गली की लड़कियों का आना अब नामुमकिन है। गली में लड़के लड़कियों का साथ खेलना......तौबा तौबा...क्या बात करते हो। अब तो बात करते ही बतंगड़ बनते ,बनाते देर नहीं लगती। वातावरण दूषित हो गया किसी को दोष देने का क्या मतलब।

यह कोई किसी एक परिवार,गली,मौहल्ले या शहर की बात नहीं है। सभी स्थानों पर सभी के साथ ऐसा ही होता है। पता नहीं हवा में कुछ ऐसा घुल गया या खान पान का असर है। या फिर प्रकृति की कोई नई लीला। कहते हैं अब गन्ने में पहले जैसी मिठास नहीं रही और ना सब्जियों में वो ताजगी भरा,तृप्त कर देने वाला स्वाद।लेकिन क्या हमारे आपसी रिश्तों में हैं ये सब....जब रिश्तों में नहीं तो हम फिर इनमें क्यों खोजते हैं।

प्यार की बात

तुझसे प्यार की बात बहुत मुश्किल है
वक्त तो तुझे देखने में ही गुजर जाता है।


Wednesday, 11 April 2012

टूट गए हैं रिश्ते

टूट गए हैं रिश्ते
किस्से खतम हुए
तुम क्या जानो बात
कितने जतन हुए।
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गली मोहल्ले प्यारे प्यारे
पूछ रहें हैं मिल के सारे
रहते थे जो साथ
वो क्यों बिछड़ गए।

Tuesday, 28 February 2012

लब तू खोल दे
कुछ तो बोल दे,
मन की सारी
गाँठे प्यारी
एक दिन
मुझ संग खोल दे।

Sunday, 19 February 2012

तंत्र,टोटके,अश्लील वाक्यों की पुस्तक को कलेक्टर ने बताया लाभप्रद

श्रीगंगानगर-टोटकों,तंत्र विद्या का बेशक बहुत महत्व होता होगा। भूत प्रेत के बारे में भी सभी की अपनी अपनी मान्यता होगी। अश्लीलता भी पर्दे में गरिमामय होती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जिला कलेक्टर जाने अनजाने इस प्रकार की बात को बढ़ावा दें और ऐसी बातों को समाज के लिए लाभप्रद बताएं। क्षेत्र में सोने,चांदी,डायमंड के जाने माने व्यवसायी,अनेकानेक सामाजिक धार्मिक संस्थाओं से जुड़े हुए शामलाल जैन ने अरोग्यता का रहस्य नामक पुस्तक का लेखन व संकलन किया। कहने को तो इसमें आयुर्वेद से बीमारियों का इलाज की जानकारी है। परंतु इस पुस्तक में टोटकों के रूप में ऐसे ऐसे अश्लील वाक्य हैं कि उनको यहां लिखना भी संभव नहीं।ये टोटके आयुर्वेद से संबन्धित नहीं हो सकते। विज्ञान के इस युग में जब भूत,प्रेत जैसे अंधविश्वासों को दूर करने के प्रयास होते हैं, स्कूल से लेकर कॉलेज तक की शिक्षा में। ऐसे दौर में पुस्तक यह बताती है कि भूत प्रेत की बाधा कैसे बचा जा सकता है। तंत्र की जानकारी भी इस पुस्तक के कई पृष्ठों पर हैं। इस प्रकार की पुस्तक मेलों,बस अड्डे और रेलवे स्टेशन की स्टाल पर बिका करती हैं। किसी गर्ल्स कॉलेज के उत्सव में उसका विमोचन करवा खुले में वितरित करना उचित नहीं कहा जा सकता। मगर शाम लाल जी को कौन रोकता! वे कॉलेज के कोषाध्यक्ष जो हैं। इसलिए ऐसा हुआ। इसी पुस्तक के बारे में जिला कलेक्टर अंबरीष कुमार का संदेश भी है। जिसमें उन्होने कहा है कि यह पुस्तक समाज के लिए लाभप्रद सिद्ध होगी। पाठकों को इस पुस्तक के माध्यम से अपने जीवन में आने वाली परेशानियों से छुटकारा मिलेगा। समाज खुशहाल एवं निरोगी जीवन व्यतीत कर सकेगा.........आदि आदि। शायद जिला कलेक्टर ने पुस्तक की पाण्डुलिपि पढे बिना ही संदेश दे दिया। अगर वे पढ़ते तो उन वाक्यों को जरूर हटवाते जो अश्लील हैं। तंत्र और टोटकों को बढ़ावा देने वाले हैं। अन्यथा संभव है संदेश देने से मना कर देते। इसी प्रकार के संदेश नगर परिषद आयुक्त हितेश कुमार और नगर परिषद सभापति जगदीश जांदू के भी हैं। शामलाल जैन का इतना नाम तो है ही कि कोई उनको संदेश के लिए कोई नाराज क्यों करने लगा। शामलाल जैन का उद्देश्य भी कोई गलत नहीं हो सकता। वे गर्व से कहते हैं कि जो कुछ लिखा है एकदम सही है....मैं दिखा सकता हूं कौनसी किताब से लिया। सही तो होगा....लेकिन उनके जैसे व्यक्ति के लिए ऐसे वाक्यों सार्वजनिक रूप से बांटी जाने वाली पुस्तक में लिखना ठीक है क्या?