Tuesday, 25 August 2009

कटी पतंग की किस्मत

---- चुटकी----

कटी पतंग की किस्मत
या तो निरर्थक
हवा में उडेगी,
या किसी पेड़ पर
लटकी रहेगी
उलटी-सीधी,
या फ़िर एक साथ
कई लोग उस पर
झपट्टा मारेंगें
उसको अपने
कब्जे में करने के लिए,
छीना झपटी में
वह हमेशा की तरह
तार तार हो जायेगी,
अब बीजेपी नामक
नई कटी पतंग का
क्या होगा
यह उसकी
लीडरशीप बताएगी।

Monday, 24 August 2009

गोविन्द गोयल की चुटकी

---- चुटकी----

कंधार के अपने
सम्बन्धों का
फायदा उठाओ,
अपना टैलेंट यहाँ
क्यों बरबाद करते हो
जसवंत जी,
आप तो तुंरत
पाक चले जाओ।

Sunday, 23 August 2009

विदेशी लीडर का इंतजाम

---- चुटकी----

देसी लीडर तो
अब
नहीं आ रहे काम,
भाजपा को भी
करना चाहिए
एक
विदेशी लीडर का इंतजाम।

Saturday, 22 August 2009

गणपति बाबा जी


फ़िर से आए
हमारे द्वार
गणपति बाबा जी,
चरण पखारूँ
बारम्बार
गणपति बाबा जी,
आप आए तो
रौणक लागी
रोज मनाएं
त्यौहार
गणपति बाबा जी।

Friday, 21 August 2009

चुटकी

----- चुटकी-----

भाजपा कहो
या फ़िर कहो
कांग्रेस आई,
नाम के अलावा
दोनों में अब
कोई
फर्क नहीं है भाई।

Tuesday, 18 August 2009

बिग बी की धमकी,खान के नखरे

ब्लॉगर्स के लिए बड़ा मुश्किल समय आने वाला है। जलजला आ जाएगा। धरती समन्दर बन जायेगी और समन्दर धरती। ऐसा तूफान आने वाला है कि ब्लॉग, इतिहास के किसी कौने में बड़ा कुचला पड़ा होगा। कोई मजाक की बात नहीं है। बिल्कुल सौ प्रतिशत वैसी ही सच्ची जैसी बढती हुई महंगाई।भाजपा में कलह,माया को राहुल की टेंशन,न्यूज़ चैनल पर स्वाइन फ्लू। ऐसा इस लिए होने वाला है कि बिग बी ने ब्लॉग ना लिखने की धमकी दी है। शायद वो ब्लॉग नहीं लिखेंगें तो धरती उलट पलट जायेगी। बिग बी, आपको कहा किसने था ब्लॉग लिखने को। जैसे हमने लिखना शुरू किया आपने भी कर दिया। कर दो लिखना बंद, किसी की सेहत पर क्या फर्क पड़ने वाला है। हाँ, उन फिल्मी पत्र-पत्रिकाओं को थोडी ज्यादा मेहनत करनी पड़ेगी जो आपके ब्लॉग से कुछ लेकर अपना काम चला लिया करते थे। बिग बी कुछ टिप्पणियों से आहात हैं। भाई, फूलों से खेलोगे तो कांटे तो लगेंगें ही। फूलों से मस्ती तो बिग बी करे और कांटे चुभें शाहरुख़ खान के , ऐसे कैसे हो सकता है। मीठा मीठा अहा! कड़वा कड़वा थू। ऐसे तो नहीं चलेगा। आपकी मर्जी ब्लॉग लिखो ना लिखो। बिग बी जी आप ब्लॉग अपनी ठरक के लिए,अपने नाम के लिए लिखते हैं। इस से कोई देश का भला नहीं होने वाला। लिखो, लिखो । ना लिखो,ना लिखो। हमारी बला से।अब बात शाहरुख़ खान की। उनसे पूछ ताछ क्या हो गई जैसे उनकी दुनिया उजड़ गई। वो अमेरिका है। वहां इंसान की हैसियत देख कर कानून को काम में नहीं लिया जाता। कानून के हिसाब से आदमी से बरताव किया जाता है। भारत में आदमी की पोस्ट और हैसियत के अनुसार कानून काम करता है। जितना बड़ा आदमी का कद कानून की पालना में लगे लोग कानून को उतना ही छोटा कर देते हैं। विदेशों में ऐसा नहीं होता तो भारत वालों को तकलीफ होती है। कानून तो वही होता है जो सबके साथ बराबरी से पेश आए। शाहरुख़ खान को अमेरिकी कानून का सम्मान करते हुए सहयोग करना चाहिए था। इस से उनका सम्मान और बढता। बड़ा होना अच्छी बात है,बडापन दिखाना और भी अच्छा। सब जानते हैं कि बड़े तो बस दही में पड़े होते हैं।

Sunday, 16 August 2009

स्वाइन फ्लू हाय स्वाइन फ्लू

देश भर में मीडिया ने स्वाइन फ्लू का इस कद्र आतंक मचा रखा है कि लोग डरे और सहमे हुए हैं। देश के नामी गिरामी डॉक्टर भी चुप्पी साधे इन चैनलों के यस मैन बने हुए है। डॉक्टर जानते हैं कि यह स्वाइन फ्लू और कुछ नहीं केवल जुकाम का ही एक रूप है। लेकिन क्या मजाल कि कोई एन चैनल वालों के खिलाफ बोले। स्वाइन फ्लू की एक मौत से देश भर में हंगामा मचा देने वाले मीडिया ने कभी इस बात की पड़ताल कि है क्या कि निमोनिया से हर रोज कितने लोग मरते हैं। अगर डॉक्टर की माने तो स्वाइन फ्लू से अधिक मौत तो निमोनिया से होती है। निमोनिया ही क्यूँ ,कैंसर की बात कर लो। श्रीगंगानगर इलाके में ना जाने कितने लोग कैंसर से दम तोड़ चुके हैं और कितने ही अपनी बारी का इंतजार कर रहें हैं। मेरे ससुराल में दो साल में तीन मौत कैंसर से हुई हैं। न्यूज़ चैनल्स को या खबरें नहीं मिलती,या उनकी नजर खबरों पर हैं नहीं,या फ़िर वे खबरे देना नहीं चाहते। ऐसा लगता है कि किसी ना किसी प्रकार से मल्टी नेशनल कंपनियों ने ऐसा जाल बुना है कि सब चैनल स्वाइन फ्लू की चपेट में आ गये। मल्टी नेशनल वालों को इस से भोले भाले चैनल और कहाँ मिलेंगें। कुछ ही दिनों में अरबों खरबों का कारोबार करके अपने घर बैठ जायेंगें। उसके बाद ना तो स्वाइन होगा न फ्लू। कितने अफ़सोस की बात है कि इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, जो चिकित्सकों की सबसे बड़ी और जानी मानी संस्था है, वह भी इस बारे में कुछ नहीं बोल रही। जबकि उनके पास तो प्रमाण सहित सब कुछ होगा। नेताओं की तो कुछ ना पूछो, उनको तो वोट बैंक से मतलब है। किंतु डॉक्टर तो सच्चाई का बयान कर ही सकते हैंशायद उनको लगता होगा कि नक्कार खाने में उनकी बात सुनेगा कौन। इस स्वाइन फ्लू ने ना कितने लोगों का धंधा एक दम से चमका दिया होगा।यूँ तो हम अपने आपको इक्कीसवीं सदी में बतातें है और काम करते हैं ऐसे जैसे हमने अपना दिमाग किसी मल्टी नेशनल कंपनी के यहाँ गिरवी रख दिया हो। उसके बाद वही देखेंगे,सुनेंगें,करेंगें जो वे कहेंगें। क्योंकि उनकी हाँ में हाँ मिलने में ही वारे न्यारे है। जय हो स्वाइन फ्लू की। भाड़ में जाए अन्य बीमारी, उनसे तो हर रोज़ लोग मरते हैं।

Friday, 7 August 2009

हिंदुस्तान मजबूर है

---- चुटकी----

पहले किसी
लाचार बूढे को
पी एम बनाते हैं,
फ़िर, अपने सहारे से
उसको चलाते हैं,
हिंदुस्तान मजबूर है
क्योंकि,
राजनीतिक दलों का
यही दस्तूर है।

Thursday, 6 August 2009

चुटकी


सरकार नींद में
जनता अचेत,
सब्जी,दाल,चीनी
हाथ से
ऐसे निकल गई,
जैसे
बंद मुट्ठी से रेत।

Tuesday, 4 August 2009

नींव कमजोर,कंगूरे खुबसूरत

आज अचानक एक गौशाला के निर्माणाधीन भव्य गेट पर निगाह थम गई। कई फुट ऊँचे उस गेट पर हजारों हजार रूपये लगेंगे। पता नहीं उस पर किस किस प्रकार की सजावट कर उसके दर्शनीय बनाया जाएगा। उसके पत्थर पर उनका नाम खुदेगा,जो धन देंगे। ताकि समाज में उनका रुतबा हो,नाम हो,लोग उनको धर्म प्रेमी,गोसेवक के रूप में जने,माने,उनका आदर करें। गौशाला प्रबंध समिति के पास करोडों की नहीं तो लाखों रुपयों की एफडी भी होगी। ऐसे ही शानदार आपको धर्मस्थल नजर आयेंगें। एक से एक देखने लायक। कीमती से कीमती सामान उस मन्दिर की शोभा बढ़ा रहा होता है। घर में पानी का गिलास ना लेने वाले लोग-लुगाई वहां सेवा करते दिखेंगें। सब कुछ होगा फ़िर भी भिखारियों की तरह भगवान से और मांगेगें। पता नहीं इनकी कामनाओं का अनत कब होगा? हम कहतें हैं ना हो इनकी कामनाओं का अंत। भगवान और दे इनको और देता ही रहे। इसके साथ थोड़ा सा दिमाग इनका जरुर बदल दे। ताकि ये जो कुछ गौशालाओं और धर्मस्थलों पर खर्च करतें हैं उसका कुछ अंश विद्या के मंदिरों पर भी खर्च करनेलग जायें। क्योंकि प्राइवेट स्कूल तो एक दुकान की तरह चलते हैं, इसलिए वहां तो सब सुविधा मालिक जुटाता है।लेकिन सरकारी स्कूल ऐसे नहीं होते। वहां स्टाफ तो ट्रेंड होता है मगर वह सब नहीं होता जिसकी जरुरत होती है। अब आप को ले चलते हैं एक सरकारी स्कूल के निकट। स्कूल का भव्य गेट तो क्या होना था, जो है उसका दरवाजा ऐसा कि कोई लात मार के तोड़ दे। स्कूल में सुविधा के नाम पर दुविधा ही दुविधा। सरकार ने वोट बैंक बढ़ाने के लिए मास्टर/मास्टरनी तो रख लीं, लेकिन स्कूल गौशाला जैसा भी नहीं है। समस्त काम सरकार नहीं कर सकती। नगर नगर में गौशालाएं सरकार तो नहीं बनवाती। यह सब नगर के वे लोग करते हैं जिनके पास धन और उसको समाज सेवा में लगाने का जज्बा होता है। क्या ही अच्छा हो कि गौशालाएं और धर्मस्थल बनाने वाले लोग स्कूलों पर भी ध्यान दे। इसके लिए सरकार को भी बहुत कुछ करना होगा। हर कोई अपने नाम और ख्याति के लिए धन लगाता है,समय देता है। सरकार ऐसे लोगों को खास तव्वजो दे जिस से ये लोग भारत के उस भवन कोशानदार,जानदार बनायें जहाँ नींव बने जाती है।