Wednesday 19 December 2012

सुनो!चलने के लिए सड़क तो खाली छोड़ दो....



श्रीगंगानगर-ढाई दशक बाद के दो काल्पनिक दृश्यों का जिक्र, उसके बाद आगे बढ़ेंगे। पहला सीन-लड़का घर से निकला। पड़ौसी को मन ही मन कोसा और आवाज दी,अंकल,गाड़ी थोड़ा इधर उधर करो। मुझे ऑफिस जाना है। अंकल को  भी गाड़ी निकालनी थी। दोनों गाड़ियां गली मे रहने वाले दूसरे लोगों की गाड़ियों के साथ ही सड़क पर खड़ी थीं। दूसरा सीन-बीमार व्यक्ति को गाड़ी में हॉस्पिटल ले जाया जा रहा है। कोई ऐसी सड़क नहीं जहां दोनों तरफ गाड़ियां पार्क ना हों। सड़क पर वाहन जगह मिलती तो कभी चलते जगह नहीं होती तो रुकना भी पड़ता। जैसे तैसे गाड़ी किसी तरह आगे बढ़ी तो बीमार की नब्ज रुक गई। अभी हंसी में उड़ा देंगे इस कल्पना को। किन्तु ऐसा ही होगा। कारण? कारण यही कि  नगर की सड़कों की चौड़ाई तो बढ़ी नहीं सकती हमारी इच्छा बढ़ रही है, सरकारी सड़क को अपना बना लेनी की। उसे अपने घर,दुकान में समाहित कर लेने की। यह सिलसिला ऐसे ही चला तो जो आज कल्पना है वह सालों बाद हकीकत होगी। सालों पहले लोगों के पास ना तो इतनी गाड़ियां थी और ना मकानों के चारदीवारी। बाइक,साइकिल होती थी जो सुबह आँगन से चबूतरे पर आ जाती। कार-वार होती तो उसके लिए गैराज होता था। समय बदल गया। घर में गैराज हो ना हो छोटी बड़ी कार जरूर होगी। एक घर में एक से अधिक वाहन। जो रात भर तो चबूतरे पर रहती है।  सुबह होते ही उनको सड़क पर पार्क कर दिया जाता है। इसकी चिंता नहीं कि सड़क पर आने जाने वालों को परेशानी होगी। पूरे शहर में ऐसा होता है।सड़क कोई भी हो घर घर के सामने यही दृश्य दिखाई देंगे। ये दृश्य कभी समाप्त नहीं होने वाले। हो भी नहीं सकते। क्योंकि सड़क, सड़क रहने वाली नहीं। या तो वह हमारे लालच की भेंट चढ़ जाएगी या उसे पूरी तरह  पार्किंग पैलेस में बदल जाना है। चबूतरे की जगह तो कभी से हमारी हो चुकी। नाली को भी किसी ना किसी बहाने कवर कर ही रहे हैं। वोट और नोट की राजनीति के कारण कोई किसी को रोकने वाला है नहीं। जिसने ऐसा कर लिया वह सुखी। जो नहीं कर सका वह या तो पछताता है या कुढ़ता है व्यवस्था पर। अपने आप पर। जो सुखी हो जाते हैं उन्हे  इस बात की चिंता नहीं कि जब सड़क पर जगह ही नहीं होगी तो हम चलेंगे कहां? इस बात की फिक्र भी कोई क्यों करने लगा  कि हमारे बच्चे हमें क्या कहेंगे? जब हमें इन बातों से ही कोई सरोकार नहीं तो शहर के लिए क्यों सोचने लगे! संभव है जो आज ऐसा कर रहे हैं वो उक्त काल्पनिक दृश्यों को हकीकत बनते देखने के लिए हो ही ना।

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