श्रीगंगानगर-धरती से प्रस्थान करने के बाद भी उसका नाम उसके गांव,शहर,देश में जिन्दा रहे. इसके लिए इंसान अनेक जतन करता है.सद कर्म में लगता है. . साधन हो तो धर्मशाला,मंदिर,स्कूल जैसी संस्थाएं बना समाज को अर्पित करता है. जैसा जिसका सामर्थ्य,सोच वह उसके अनुरूप कदम उठाता है. पीढ़ियों तक उनका नाम अमर रहता है. जमाना बदल रहा है. अनेक ऐसे हैं जिनके नाम रहेंगे पीढ़ियों तक तो बहुत सारे ऐसे भी जिनके नाम खुद उनके पुत्रों की वजह से मिट जाएगानहीं जी, पुत्र कुपात्र नहीं है. सुपात्र होने के बावजूद ऐसा होगा. कोई ईलाज नहीं है. सोच बदल गई जनाब. चाव से बेटा जना.लाड से पाला. उम्मीदों से बढ़ा किया. सपने देखे और दिखाए. समय इतनी जल्दी बीता कि पता ही नहीं चला कि कब पढाई पूरी हुई और कब बेटा विदेश में नौकरी जा अलग.घर परिवार में आनंद,उत्साह,उमंग की कोई कमी नहीं. हो भी कैसे बेटी की शादी बढ़िया घर में हुई और बेटा विदेश में नौकरी करता है. समय तो जैसे भागने लगा. माँ-बाप भी विदेश हो आए. बेटे के लिए बहु भी विदेश में ही मिल गई. बेटा विदेश में रहता है तो बहु इधर क्या करती! समय पंख लगा उड़ने लगा. दादा -दादी बनने के सपने आने लगे. पोत-पोती की तोतली बातें उनके बिना ही मन सोच कर खुश होने लगा.समय क्यों रुकने लगा. खबर मिली बहु उम्मीद से है. माँ ने फोन,फेसबुक के माध्यम से निर्देश,आदेश देने शुरू कर दिए. ये करना ये नहीं करना. समय तो भाग ही रहा था. जापे के समय बेटे ने माता-पिता दोनों को फिर विदेश बुला लिया.पोता हुआ तो ख़ुशी का ठिकाना ना रहा. तीन चार महीने रहे दोनों. जब पोता बड़ा हो गया तो उधर उनके लिए कोई काम नहीं था. अपने देश आ गए माँ-बाप. खुश विदेश घूम ली. पोता खिला लिया गोद में. वह पोता जो विदेश में पैदा हुआ.वहीं का होकर रहेगा. जिसे इधर देश के घर में पैदा किया वही इधर का नहीं हुआ तो वह कैसे संभव है जो विदेश का है. वह तो उधर का नागरिक है. जब से आए हैं तब से दोनों विदेश के गीत गाते हैं. पोते की बात करते हैं. बेटा ये. बहु वो. पोता के तो कहने ही क्या. गली,मोहल्ले रिश्तेदारों में बल्ले बल्ले कर दी बेटे बहु की. पर अंदर सन्नाटा. समय जैसे ठहर गया अब. ना आंगन में पोते की किलकारियां ना बहु की पायल की छम छम. बस दो बुढा चुके मियां बीवी.समय पास नहीं होता. उम्र बढ़ी तो दर्द बढ़ने लगा.रोएं भी तो किसके आगे! दर्द सुनाएं भी तो किसे! उनको जिनको चटकारे लेकर विदेश की बातें सुना चुके. बहु बेटे की दरिया दिली के किस्से बता चुके. उनको जिनको पोते की सूरत अंग्रेजों जैसी बता कर ख़ुशी प्रकट की थी. वो जुबां दर्द का बयां कैसे करे जिसने विदेश के कसीदे पढ़ें हों. मन के दर्द का तो ईलाज भी नहीं कोई. मन की बीमारी कैसे कटे! यह तो प्राणों के साथ ही जाएगी.प्राणों के साथ ही मिट जाएगा उनका नाम. कोई नहीं होगा उनका नाम लेने वाला. किया कराया सब मिट्टी. अब जब सोच यही है तो नाम रहे भी कैसे. एक बेटा ,एक बेटी. बेटी ससुराल है. इधर आए कैसे.जिन बेटे पोतों से नाम आगे चलते हैं वे हैं नहीं इधर. बस काम ख़त्म. एक दो पीढ़ी बाद कौन जानेगा कि कोई था जिसका बेटा विदेश में था. उसका पोते की सूरत अंग्रेजों जैसी थी.
हर इन्सान हर पल किसी ना किसी उधेड़बुन में रहता है। सफलता के लिए कई प्रकार के ताने बुनता है। इसी तरह उसकी जिन्दगी पूरी हो जाती हैं। उसके पास अपने लिए वक्त ही नहीं । बस अपने लिए थोड़ा सा समय निकाल लो और जिंदगी को केवल अपने और अपने लिए ही जीओ।
Saturday, 14 June 2014
Friday, 2 May 2014
मोहब्बत तो कभी मरने की बात नहीं करती
श्रीगंगानगर-किस्सा फेसबुक से. ढाई दशक बाद एक व्यक्ति को महिला का सन्देश मिला, आई लव यू.व्यक्ति हैरान ! महिला ने बताया कि वो तो उससे तभी से मोहब्बत करती है जब शादी नहीं हुई थी. बन्दे को क्या पता. न कभी मिले . ना कभी जिक्र ही आया. फिर अब अचानक,ढाई दशक बाद, जब दोनों के बच्चों तक की शादी हो चुकी है.इक तरफ़ा मोहब्बत चलती रही,पलती रही.है ना मोहब्बत का अनूठा अंदाज. दूसरा,. दोनों की कास्ट अलग. मोहब्बत बे हिसाब. परिवार राजी नहीं. कोशिश की.शादी नहीं हो सकी. अलग अलग हो गए. तीस सालों में एक दो बार जब कभी मिले वैसी ही आत्मीयता वही मोहब्बत. तीसरा, लड़का सवर्ण ,लड़की दूसरी कास्ट की. संयोग ऐसा हुआ कि दोनों परिवारों को शादी करनी पड़ी. लड़की ने अपने आप को उस परिवार में ऐसा ढाला कि क्या कहने. किसी को कोई शिकवा शिकायत नहीं. चौथा,लड़का अपने इधर का. लड़की साउथ की. लड़का शानदार पोस्ट पर. परिवार उस लड़की से शादी करने को राजी नहीं. लेकिन लड़का-लड़की ने शादी कर ली. धीरे धीरे परिवार वालों ने भी उसे बहु के रूप में स्वीकार कर लिया. बहु जब भी पति के साथ छुट्टियों में इधर आती है ,वह अपने संस्कार,काम और बोल चाल से ससुराल वालों का दिल जीतने की कोशिश करती है. ये किस्से कहानी नहीं हकीकत हैं.सब के सब जिन्दा और खुश हैं अपने अपने घर. परन्तु आजकल का तो प्रेम हो ही बड़ा अनोखा गया. इसमें मरने मारने की बात पता नहीं कहां से आ गई. आजकल कभी प्रेमी-प्रेमिका के एक साथ मरने की घटना होती है तो कभी प्रेमी द्वारा प्रेमिका को मार देनी की. बड़ा अजीब है उनका प्रेम! साथ मरने का ये मतलब नहीं कि वे मरने के बाद साथ रहेंगे. ये फ़िल्मी डायलॉग है कि नीचे मरेंगे तो ऊपर मिलेंगे. दुनिया ने हमें इधर नहीं मिलने दिया,मरकर उधर मिलेंगे,आदि आदि.इस धरती पर मिलन उसी का होता है जो जिन्दा है. मरने के बाद की तथाकथित दुनिया किसने देखी. जो दुनिया देखी नहीं उसमें मिलने के लिए उस दुनिया से चले जाना जिधर मिलने की संभावना रहती है, कौनसी मोहब्बत हुई. ये तो मोहब्बत नहीं कोई आकर्षण था. मोहब्बत में सराबोर नहीं थे,शारीरिक आकर्षण में डूबे थे. जिन्दा रहोगे तो मिलने की आस रहेगी.मरने के बाद तो कुछ भी इन्हीं. मरने वाले बता नहीं सकते कि लो देखो, हम मर कर मिल गए और सुखी हैं. भावुकता के अतिरेक में मर तो गए लेकिन उसके बाद! तुम तो मर गए लेकिन परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा तो मिट्टी कर गए.तुम तो अपने ख्याल में मर कर मिल गए ,मगर परिवार को तो किसी से मिलने-मिलाने लायक नहीं छोड़ा. उन मां-बाप का क्या जो जिन्दा लाश बन गए.घरमें रहो तो की दीवारें खाने को आती हैं और बाहर लोगों की बातें तीर की तरह बींधती हैं. तुम तो चले गए,लेकिन बाकी भाई बहिन के रिश्तों पर ग्रहण लग जाता है. रिश्ते तो होंगे लेकिन उनमें समझौता अधिक होता होगा. जिसके किसी भाई-बहिन ने इस प्रकार मोहब्बत में जान दी हो,उनसे रिश्ते जोड़ने वाले मुश्किल से ही मिलते हैं. इसके लिए कसूरवार कौन है,ईश्वर जाने. लेकिन ये बड़ी अजीब बात है कि दशकों पहले जब इतना खुलापन नहीं था तब तो लोग मोहब्बत में जीने की बात करते थे. अब जब इण्टर कास्ट शादी आम होने लगी है. तब लड़का-लड़की का मरना हैरानी पैदा करता है. मोहब्बत तो जिंदगी में आनंद भरती है.लोग निराश,हताश,उदास होकर मरने क्यों लगे. ऊपर के किस्सों में दो रस्ते हैं.पहला , परिवार की इच्छा को मान देकर रस्ते बदल लो.मोहब्बत में त्याग को महत्व दो. दूसरा, अपनी परिवार की इच्छा को नजर अंदाज कर अपनी मर्जी करो. होता है जो हो जाने दो. समय की राह देखो, जो सब कुछ ठीक कर देता है. मरने की बात तो मोहब्बत में होनी ही नहीं चाहिए. शायद पहले मोहब्बत बाजरे की खिचड़ी की तरह होती थी जो धीमी आंच पर धीरे धीरे सीज कर स्वादिष्ट बनती थी. अब तो मोहब्बत दो मिनट की मैगी स्टाइल हो गई है.बनाओ,खाओ और भूल जाओ. दो लाइन पढ़ो--जीने की नहीं मरने की बात करता है हर वक्त, बड़ा कमजोर हो गया है ये नए दौर का इश्क .
Thursday, 27 February 2014
खुशियां छोटी हो गई और पैकेज बहुत बड़े बड़े
श्रीगंगानगर-पहला
सीन-सुबह सुबह एक परिचित मिल गए। बाइक
पर आगे लगभग डेढ़ साल का क्यूट बेबी
था। साथ में उसके पहनने,खाने,पीने और खेलने के सामान का बैग। दुआ सलाम के
बाद बोला,बच्चे को क्रैच छोड़ने जा रहा हूं । बीवी नौकरी पर
जाएगी। मुझे भी जाना है। क्या करें! अकेले से आजकल घर ही चल सकता है और कुछ नहीं। बीवी
ड्यूटी से आएगी तो इसे लेती आएगी। दूसरा सीन-बड़े पैलेस में बड़ों की शादी का बड़ा समारोह। पीठ की साइड में
दो व्यक्ति बात कर रहे थे। एक, मेरा बेटा फलां कंपनी में है
और इतने लाख का पैकेज ले रहा है। दूसरे ने अपने बेटे की कंपनी और पैकेज बताया।
दोनों खुश। कुछ क्षण यही पैकेज की बात करते रहे। फिर उनकी आवाज में दर्द आने लगा। दोनों
में से कोई कहा रहा था,बेटे को बिलकुल भी समय नहीं मिलता। छुट्टी
के दिन भी फुरसत नहीं। ऑफिस जाने का समय तो है लेकिन आने का नहीं। दूसरे ने उसकी
हां में हां मिलाई। कुछ क्षण पहले जो पैकेज की बात कर खुश हो रहे थे वे अचानक
गंभीर हो गए। जबकि ना तो उनके बच्चों के पैकेज कम हुए थे और ना ही ऐसी कोई उम्मीद
थी। लेकिन मन की पीड़ा कब तक रोकी जाती। जब एक ही किश्ती में सवार थे तो बात होनी
ही थी, पैकेज की भी जिंदगी की भी। ये बेशक दो सीन हों लेकिन
ऐसे दृश्यों की कोई कमी नहीं है इस शहर
में। बच्चे की तरक्की की खुशी अपनी जगह और उसकी जुदाई की पीड़ा अपनी जगह। दोनों को
मन में आने से कोई नहीं रोक सकता। जिस स्टेज पर ऐसे बच्चे पहुँच गए वे इस शहर से
तो गए ही साथ साथ गए अपने घर –परिवार,रिश्तेदारों और
परिचितों से। क्योंकि उनके लिए इधर कोई स्टेटस नहीं है। उनके लायक कोई काम नहीं।
कोई कंपनी नहीं जो उनको लाखों के पैकेज दे सके। जब इनका आना इधर होगा ही नहीं तो
कौन रिश्तेदार,मित्र इनको याद रखेगा। धीरे धीरे सामाजिक
रिश्ते भी समाप्त होने ही हैं। ऐसे पैकेज वाले बच्चों को छुट्टी मिलेगी तभी तो ये
अपने दादा,नाना,दोस्त के परिवार में
होने वाले विभिन्न समारोह में आ सकेंगे। आएंगे तभी तो रिश्ते और समाजिकता का नवीनीकरण
होगा। वरना कौन उनको जानेगा और कौन पहचानेगा। लेता होगा किसी का बच्चा लाखों का
पैकेज ! किसी को इससे क्या ! माता-पिता के पास पैसा तो लाखों करोड़ों में आ गया,मगर वह उनकी आंखों से दूर हो गया जिसकी खुशी और आनंद के लिए उन्होने दिन रात
एक की। ये अपने घर,समाज,गली,मोहल्ले को छोड़ कर जा नहीं सकते। इनमें इनकी रूह बसती है।इनके संबंध इधर
हैं। भाई चारा है। बच्चे इधर आ नहीं सकते। बुढ़ापे को अकेला,खामोश
होना ही है। जब बच्चों को हमारी जरूरत थी तब हमने उनको अलग कर दिया । जब हमें उनकी
आवश्यकता होगी तो वे आ नहीं सकेंगे। जब
सबसे अधिक बच्चों की जरूरत होती है तब अकेलापन! वह भी सब कुछ होते हुए। यही
विडम्बना है इस पैकेज की। दो लाइन पढ़ो—मेरी तन्हाई को वो यूं तोड़ गया, मेरे
पास अपने रिश्ते के निशां छोड़ गया।
Friday, 14 February 2014
प्यार को मैगी मत बनाओ
श्रीगंगानगर। प्यार,
प्रीत, स्नेह,
मोहब्बत दो मिनट में तैयार होने
वाली मैगी नहीं है। यह तो वो बाजरे की खिचड़ी है जो धीमी-धीमी आंच पर सीजती है तभी खाने वाले और बनाने वाले को तृप्ति होती है। भूख बेशक मिट जाए लेकिन चाह नहीं मिटती। इस निगोड़े वेलेंटाइन डे ने सात्विक ,गरिमापूर्ण और मर्यादित प्रेम को मात्र जवां होते या हो चुके लड़का-लड़की के प्रेम में बांध दिया। इस अज्ञानी वेलेंटाइन डे को इनके अलावा और कोई दूसरा प्यार ना तो दिखाई देता है और ना उसमें इस प्यार
को महसूस करने की क्षमता है। केवल लड़का -लड़की के मैगी स्टाइल प्यार को ही प्यार समझने वाले या तो ये जानते ही नहीं कि प्यार इससे भी बहुत आगे है या फिर उन्होंने यह जानने की कोशिश ही नहीं की। प्यार तो इतना आगे है कि इसके अन्दर डूब जाने वाले व्यक्ति के लिए दुनिया अलौकिक हो जाती है। अलबेली बन जाती है। प्रीत से सराबोर व्यक्ति सहजता और सरलता की ओर बढ़ता है। घुंघरू होते तो उसके पांव में हैं और नृत्य उसका मन करता रहता है, हर क्षण। उसकी आखों में मस्ती दिखाई देती है। सबको अपने प्रेम में समाहित कर देने की चाहत नजर आती है। उसकी आंख को हर कोई
अपना दिखाई देता है। जुबां पर
मिठास और गुनगुनाहट रहती है। झूमता रहता है,
गाता रहता है। कोई साथ है तब भी कोई फ्रिक नहीं
नहीं है तब भी कोई चिन्ता नहीं। हर वक्त प्रेम के सुरूर में वह मदमस्त रहता है। लेकिन कितने अफसोस की बात है कि वेलेंटाइन डे ने प्यार को बाजार बना दिया। जो मन के अन्दर,
आत्मा में, आखों में छिपाने की अधिक है दिखाने
की कम,
उसे सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने को मजबूर कर दिया। यह मोहब्बत नहीं बाजारूपन है। यह प्रीत नहीं, प्रीत का कारोबार है। स्नेह नहीं,
स्नेह के रूपमें उपहारों की अदला-बदली है। इनको सुदामा की भक्ति में कृष्ण के लिए छिपा दोस्ती का प्यार दिखाई नहीं दे सकता। इनको यह भी याद नहीं होगा कि कभी किसी करमावती ने एक मुसलमान शासक को राखी
भेजी और उस शासक ने भाई-बहिन के प्यार की एक नई परिभाषा लिखी। श्रवण कुमार का अपने माता-पिता के प्रति प्यार किसी वेलेंटाइन डे का मोहताज नहीं है। मां-बाप के बीमार होने की खबर सुन ससुराल से दौड़ी चली आने वाली लड़कियां
वेलेंटाइन डे के
किस्से पढ़कर बड़ी नहीं हुई थी। कृष्ण और राधा के प्रेम के समय तो इस कारोबारी वेलेंटाइन डे का अता-पता नहीं था। रावण ने कौनसा वेलेंटाइन डे पाठ पढ़ा था जो उसने अपनी बहिन सरूपनखा के लिए अपना सर्वस्य निछावर कर दिया। उर्मिला का लक्ष्मण के प्रति प्यार वेलेंटाइन डे पर निर्भर नहीं था। ये चंद उदाहरण वो हैं, जिन्होंने प्यार के रूप में रिश्तों के नए आयाम दिए। बहिन का भाई के
प्रति प्यार और बाप का बेटी के प्रति प्यार बहुत बड़ा होता है। समाज में कौनसा ऐसा रिश्ता है जो प्यार के बिना एक क्षण के
लिए भी कायम रह सके । परन्तु
हमने कारोबार के
लालच में प्यार, मोहब्बत,
प्रीत, इश्क जैसे शब्दों को बहुत छोटा बना दिया जबकि ये समन्दर से भी अधिक
विशाल है। इसकी गहराई भी समन्दर की तरह नापी नहीं जा सकती थी। बस, महसूस की जा सकती है और महसूस वही कर सकता है जिस के दिल में प्यार, प्रीत,
स्नेह और मोहब्बत बसी हो।
Saturday, 19 October 2013
कई बातें भी विदा हो रहीं है बुजुर्गों के साथ
श्रीगंगानगर-भाभी जी को पूजा की डलिया लेकर सीधी गली से आते देखा. रुक गया. पास आए तो पूछ लिया,आज इधर किधर से? आज कार्तिक शुरू हो गया ना,इसलिए दुर्गा मंदिर में गई थी. क्योंकि भवन में [गली के छोटे मंदिर] पथवारी नहीं है सींचने के लिए,भाभी ने बताया. भाभी रोज गली के मंदिर में ही जाया करती थी. आज दूसरे मंदिर में गई थी. बात तो मामूली थी. लेकिन मां की स्मृतियां दिलो दिमाग में चली आईं. पीछे लौट गया अपने आप. मां होती तो दो तीन दिन पहले ही पता लग जाना था कि कार्तिक शुरू होने वाला है. हालांकि अपने लिए तो सब एक से ही हैं. लेकिन मां के लिए कार्तिक का बहुत महत्व था. सुबह जल्दी उठाना. ठन्डे पानी से स्नान कर अँधेरे ही घर से मंदिर चले जाना.यह ध्यान रखते हुए कि दरवाजा खुलने बंद होने से कोई आवाज न हो ताकि किसी की नींद में खलल ना पड़े. बस, जाते हुए यह बोलना, मैं जा रहीं हूं. एक कार्तिक ही क्यों मां के रहते हर छोटा बड़ा त्यौहार,वार, अच्छा,बुरा ग्रह नक्षत्र सब कुछ मालूम हो जाता था. कल फलां दिन है सेव मत करना. परसों ये दिन है इसलिए वो नहीं करना. आज ही कर लो. बहु,बेटी को भी बता देना कि इस सप्ताह में क्या बार त्यौहार आने है. छोटे से लेकर बड़े सब को ज्ञात हो जाता था. वैसे भी उनके काम से संकेत मिल जाते थे. कभी कोई धागा रंगते हुए. कभी किसी कागज पर कोई आकृति उकेरते हुए. कभी किसी लाल-पीले कपड़े की तह जमाते समय. किसी आले में कोई दीपक जलना. बाहर देहरी पर पानी डालना. लेकिन अब वो बात कहाँ! बुजुर्गों के साथ ही ये सब विदा हो रहा है. अच्छे,बुरे वार,घडी,नक्षत्र कितनी ही ऐसी परम्पराएं उनके साथ चली गईं. जो सदियों तक बुजुर्गों से अगली पीढ़ी तक पहुंचती रहीं हैं. बच्चे के जन्म से लेकर उसकी शादी तक की सभी रस्में. नवजात बच्चे की छोटी छोटी बिमारियों को दूर करने के आसान नुस्खे.बच्चे के अधिक रोने का टोटका तो उसकी नजर उतारने का टोना. सब के सब घरों से गायब हो गए. अगर कहीं किन्ही परिवारों में ये सब हैं तो वे बहुत अमीर हैं.लेकिन उनको भी विदा होना है. क्योंकि आज की पीढ़ी को मतलब ही नहीं इन सब बातों से. वे आधुनिक हो चुके हैं. उनको ये सब नहीं भाता, लेकिन मज़बूरी तब सामने आती है जब कोई बार,त्यौहार घर में आता है. कोई सामाजिक प्रोग्राम करना होता है. तब याद आती है मां जी की. फिर ननद,बड़ी से बड़ी जेठानी,खानदान की बुजुर्ग महिला से पूछेंगे?जी,ये कैसे होगा? कैसे करते हैं अपने घर में?बात केवल कार्तिक की नहीं. असल में तो आजकल बहु,बेटी,युवा दादा,दादी,नाना,नानी के पास बैठना तक पसंद नहीं करते. जबकि उनके पास सुबह से रात तक और जागने से लेकर सोने तक की बहुत सी काम की बात हैं. किस बार,त्यौहार पर क्या क्यों किया जाता है,उसका जवाब है. बहुत से घरों में बहु बेटियों ने अपने बुजुर्गों से पूछ कर लिख लिया सब कुछ. ताकि एक पीढ़ी का ज्ञान दूसरी पीढ़ी तक पहुंचे. बेशक जमाना कितना भी आधुनिक हो गया हो लेकिन आज भी घरों में हर प्रकार की सामाजिक रस्मों रिवाज निभाई जातीं हैं. बस फर्क इतना है कि आज इधर उधर से पूछ कर,इन्टरनेट पर तलाश कर यह सब किया जाता है. बुजुर्गों के रहते तो पूछना ही नहीं पड़ता था. सब अपने आप हो जाता. अब बुजुर्गों की संख्या कम हो रही हैं. जो अब बुजुर्ग होंगे उनको गूगल,फेसबुक,ट्विटर के बारे में तो बहुत ज्ञान होगा लेकिन उन बातों का नहीं जो हमें जड़ों से जोड़े रखती थी किसी ना किसी बार त्यौहार के बहाने. परिवार को इकठ्ठा कर लिया करती थी कभी किसी बहाने तो कभी किसी बहाने. हम बहुत दूर आ गए. बुजुर्गों से भी और अपनी परम्पराओं से भी.
Tuesday, 13 August 2013
अपनी दुनिया में किसी और के लिए जगह नहीं
श्रीगंगानगर-इंटरनेट ने दुनिया को बहुत छोटा कर दिया। एक डिब्बे में समेट दिया। सब कुछ कितना पास है हमारे। जिस से चाहो बात करो। जो चाहे प्रश्न पूछो। आपके प्रश्न समाप्त हो जाएंगे,यहा बताना बंद नहीं करेगा। बेशक दुनिया के नजदीक आए हैं हम सब। लेकिन पड़ौसी से कितने दूर हो गए यह किसी ने नहीं सोचा। जिसका रिश्तों में सबसे अधिक महत्व था। जो सबसे निकट था। वह बहुत दूर हो गया और हमें पता भी नहीं चला। दुनिया के बड़े से बड़े व्यक्ति के फोन नंबर हमारे मोबाइल फोन में होंगे।परंतु पड़ौसी के शायद ही हों। वो भी जमाना था जब पड़ौसी से एक कटोरी चीनी,एक चम्मच चाय पत्ती मांगना सामान्य बात थी। सब्जी का आदान प्रदान तो बड़ी आत्मीयता से होता था। “जा मोनु सरसों का साग रश्मि की माँ को दे आ उसे बड़ा चाव है सरसों के साग का।“ उधर से भी ऐसे ही भाव थे। कोई तड़के वाली दाल दे जाता तो कोई बाजरे की रोटी ले जाता। पड़ौसी भी रिश्ते की अनदेखी डोर से बंधे होते। चाची,मामी,ताई,दादी,नानी,भाभी,बुआ कौनसा रिश्ता था जो नहीं होता। अपने आप बन जाते ये रिश्ते। सात्विक प्रेम,अपनेपन से निभाए भी जाते थे ये रिश्ते। घर की बहिन,बेटी,बहू छत पर कपड़े सुखाने के समय ही पड़ौस की बहिन,बेटी,बहू खूब बात करतीं। बड़ी,पापड़,सेंवी बनाने के लिए बुला लेते एक दूसरे को। छत से ही एक दूसरे के आना जाना हो जाता। अब तो दो घरों के बीच दीवारें इतनी ऊंची हो गई कि दूसरे की छत पर क्या हो रहा है पता ही नहीं लगता। ऊंची एड़ी करके कोई देखने की कोशिश भी करे तो हँगामा तय है। ये कोई अधिक पुरानी बात नहीं जब घरों के बाहर चार दीवारी का रिवाज नहीं था। किसी भी स्थान पर एक खाट बिछी होती और फुरसत में मोहल्ले की औरतें की महफिल शुरू हो जाती। सर्दी में एक घर की धूप सबकी धूप थी। सूरज के छिपने तक जमघट। अब तो सबकी अपनी अपनी धूप छांव हो चुकी है। ना तो कोई किसी के जाता है नो कोई पसंद करे कि कोई आकर प्राइवेसी भंग करे। अब तो घर घर में सबके अलग अलग कमरे हैं। काम किया,चल कमरे में। सभी के अपने नाटक टीवी पर। सब के सब सिमटे हैं अपने आप में। समय ही नहीं है एक साथ बैठने का। बात करने का। चर्चा कर चेहरे पर मुस्कुराहट लाने का। मुखड़ा बताता है कई झंझट है दिमाग में। तनाव है दिल में। परंतु रिश्ते तो रह गए केवल नाम के इसलिए दिल की बात कहें किस से और किस जुबान से। सच में नए जमाने ने दुनिया छोटी कर दी लेकिन उस दुनिया में इंसान दिनों दिन अकेला होता जा रहा है। इस दुनिया में खुद के अलावा किसी और के लिए ना तो कोई स्थान है और ना अपनापन। कितनी दूर आ गए हम अपने आप से।
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