हर इन्सान हर पल किसी ना किसी उधेड़बुन में रहता है। सफलता के लिए कई प्रकार के ताने बुनता है। इसी तरह उसकी जिन्दगी पूरी हो जाती हैं। उसके पास अपने लिए वक्त ही नहीं । बस अपने लिए थोड़ा सा समय निकाल लो और जिंदगी को केवल अपने और अपने लिए ही जीओ।
Friday, 31 December 2010
कलेंडर के अलावा क्या बदला
---गोविंद गोयल
Tuesday, 28 December 2010
पहले दो थे अब जितने नेता उतने गुट

श्रीगंगानगर-किसी ज़माने में यहाँ कांग्रेस में दो गुट हुआ करते थे एक राधेश्याम गंगानगर का,दूसरा उनके विरोधियों का। विधानसभा चुनाव से पहले तक कांग्रेस में ऐसा रहा। जब तक ऐसा रहा तब तक राधेश्याम गंगानगर उर्फ़ बाऊ जी ने कांग्रेस में दूसरे की पार नहीं पड़ने दी। वो तो नियम थोड़ा सख्त हो गए इसलिए बाऊ जी के दिन कांग्रेस में खत्म हो गए वरना....... । जब से बाऊ जी का ह्रदय परिवर्तन हुआ है तब से कांग्रेस में दो गुटों वाली परम्परा बीते ज़माने की बात हो गई। कांग्रेस में जो जो नेता बाऊ जी का विरोधी था अब उन सब के अलग अलग गुट बन चुके हैं। राजशाही के अंदाज में कहें तो कांग्रेस के चक्रवर्ती नेता बाऊ जी के विदा होते ही उनके सब विरोधी स्वतन्त्र हो गए। जब किसी का राजनीतिक डर नहीं रहा तो सभी ने अपने गुट बना लिए। हर गुट का अपना नेता। पिरथी पाल सिंह, राज कुमार गौड़, शंकर पन्नू, संतोष सहारण, गंगाजल मील आदि आदि। पिरथी पाल सिंह ने जिलाध्यक्ष के नाते जयपुर दिल्ली के कांग्रेसी राजनीतिक गलियारों में पहचान बने। पद के साथ साथ सादुलशहर के जगदीश शर्मा ने इनके लिए दिल्ली में बड़े नेताओं से लोबिंग की। श्री शर्मा का वहां खुद का एक नेटवर्क है जो कांग्रेस राजनीति में पिरथी पाल सिंह के साथ खड़ा दिखाई देता है। विधान सभा चुनाव के बाद गौड़ की कांग्रेस में अप्रोच बढ़ी है। इसके बावजूद उनको भरोसा केवल अशोक गहलोत पर है। सांसद रहे पन्नू को दिल्ली - जयपुर में नेता जानते हैं मगर इन्होने ने भी अपनी डोर श्री गहलोत जी के हाथ में दे रखी है। संतोष सहारण को कांग्रेस में अपने रिश्तेदार परस राम मदेरणा/मही पाल मदेरणा का सहारा है। गंगाजल मील के पास राजस्थान जाट महासभा है। दो साल में ये दोनों नेता पार्टी की ना तो दिल्ली,जयपुर में किसी बड़ी लौबी से जुड़े दिखे ना इन्होने यहाँ मजबूत गुट दिखाया। जगतार सिंह कंग गत दो साल में कई चुनाव हारने के बाद कहीं के नहीं लगते। के सी बिश्नोई,विजय लक्ष्मी बिश्नोई, सोहन नायक,को वक्त ने पीछे कर दिया। दुलाराम तो ऐसे लगता है जैसे भूतकाल हो गए हों। वर्तमान तो उनका बेटा है। इन्दौरा परिवार के लिए यह सब गौण है। बात कांग्रेस की हो रही है इसलिए मंत्री गुरमीत सिंह कुनर,सभापति जगदीश जांदू के बारे में अधिक कुछ कहना ठीक नहीं । श्री कुनर तो मंत्री हैं इसलिए जयपुर से दिल्ली तक उनके सम्बन्ध पहले से बढे हैं। जांदू का भी एक ग्रुप है। बात फिर बाऊ जी की। पहले उन्होंने कांग्रेस में अपने पर अपने विरोधियों की पार नहीं पड़ने दी अब बीजेपी में। यूँ राजनीति में कभी भी किसी भी सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता। सन्नी सिंह ने एसएमएस से भेजा है परीक्षा का नया पैट्रन --जनरल वर्ग -सभी प्रश्न करो। ओ बी सी --कोई एक प्रश्न करो। एस सी--केवल प्रश्न पत्र पढो। एस टी--परीक्षा में आने का शुक्रिया। गुर्जर--दूसरों को परीक्षा देने की अनुमति प्रदान करने के लिए थैंक्स। अब एक संत से सुनी बात, भारत की राष्ट्रपति हिन्दू,उप राष्ट्रपति मुसलमान,प्रधानमंत्री सिख और सोनिया गाँधी पारसी/ईसाई।
---गोविंद गोयल
Saturday, 25 December 2010
सी एम के मोहल्ले का आदमी
Monday, 20 December 2010
Tuesday, 14 December 2010
ऐसी भी हो सकती है सी एम की प्रेस वार्ता
श्रीगंगानगर--जयपुर का पिंक सिटी प्रेस क्लब। दोपहर का समय। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत आ चुके है। गले में बेतरतीब सा मफलर ऐसे पड़ा है जैसे उनका मंत्री मंडल। खुश हैं। पत्रकारों की भरमार है। सबसे मिलते हुए उस ओर कदम बढ़ा रहे हैं जहाँ प्रेस वार्ता होनी है।उन्होंने जिस पत्रकार को नाम लेकर पुकारा उसने अपनी कॉलर ऊँची की। जिसका हाथ मिलाते हुए हाल चाल पूछा उसकी चाल बदल गई। जिस पत्रकार ने अपना परिचय खुद दिया उससे केवल यही कहा, अच्छा अच्छा और चलते रहे। कई मिनट के बाद मुख्यमंत्री जी और प्रेस दोनों आमने सामने थे। गहलोत जी ने एक नजर चारों तरफ दौड़ाई और कहा, पूछो क्या पूछना है। प्रेस बोली ,सर आप बताइए। हमारे पास बताने के लिए कुछ होता तो कब का बता चुके होते। हँसते हुए कहने लगे, बोलो तो सही। प्रेस को और तो कुछ सुझा नहीं, उपलब्धियां बताने को कहा। सी एम का चेहरा चमक गया। उपलब्धियां! सी एम बोलने लगे, उपलब्धियां बहुत है। सबसे बड़ी उपलब्धि तो ये कि हम ९६ से १०५ हो गए। हमारे व्यवहार, नीति, सदभाव और राज्य के प्रति प्रेम को देख पांच विधायकों ने कांग्रेस का झंडा पकड़ कर संख्या १०५ तक पहुंचा दी। कई निर्दलीय विधायकों को मंत्री बना कर समर्थन जुटाया। वर्तमान में जब भाई भाई का दुश्मन है, ऐसे में किसी को अपना बनाना कोई कम उपलब्धि नहीं है। आते समय जिसको गहलोत ने ज्यादा भाव नहीं दिया था उसने प्रश्न करने की कोशिश की तो वह पत्रकार बीच में आ गया जिसका हाल चाल मुख्यमंत्री ने पूछा था। कहने लगा,यार पहले गहलोत जी को बात तो पूरी कर लेने दो। हाँ सर आप क्या कह रहे थे। सी एम अपनी उपलब्धियां बता रहे थे। गोलमा को अपने साथ रखना, उसके नखरे सहना केवल हम ही जानते हैं। विपक्ष करके दिखाए ये सब। कितने ही मंत्री अपनी मन मर्जी करते हैं। ये हमारी उपेक्षा नहीं उनको दी गई स्वायतता है। करप्शन.... भीड़ में से दबी सी आवाज आई। वैरी गुड प्रश्न। सी एम ने कहा । वे बोले, आजकल तो बड़े पत्रकारों के नाम भी इसमें शामिल हो गए हैं। ये ख़ुशी की बात है। करप्शन का दायरा बढ़ा है। एक पत्रकार बोला, सर आपके राज में करप्शन की बात। बेकार के प्रश्न क्यों पूछते हो। वह पत्रकार बोला जिसे नाम लेकर सी एम ने बुलाया था। सी एम जारी थे, विपक्ष ने बहुत अधिक करप्शन किया। सबकी जांच चाल रही है। देखना नतीजा आएगा। सर कोई और उपलब्धि । कोई धीरे से बोला। हाँ हैं ना। सी एम ने कहा, हमें जैसे ही कहीं से किसी अधिकारी की शिकायत मिलती है हम उसका तबादला दूसरी जगह कर देते हैं। दूसरी से तीसरी जगह, इसी प्रकार चौथी,पांचवी.... । ऐसा किसी सरकार ने नहीं किया होगा। और कभी नहीं भी करते, एक पत्रकार दूसरे के कान में फुसफुसाया। गहलोत जी ने वातावरण अपने पक्ष में देख थोडा खुलना शुरू किया। कहने लगे, हमने सी पी जोशी की नजर के बावजूद अपनी कुर्सी बचाए रखी ताकि प्रदेश की सेवा कर सकूँ। आपको डर लगता है क्या जोशी से? एक पत्रकार ने हिम्मत दिखाई। गहलोत बोले, वे दिल्ली की बजाये राजस्थान में अधिक रहते हैं। इसके बाद भी हमने अपनी कुर्सी पर आंच नहीं आने दी। वैसे डर सबको लगता है गला सबका सूखता है....सी एम थोडा मुस्कराए। गला सबका सूखता है कि बात से सबको कुछ याद आ गया। प्रेस वार्ता समाप्त। जैसे जिसके सी एम से सम्बन्ध वैसी उसकी टिप्पणी। पिंक सिटी में उसके बाद क्या हुआ जरुर बताता। मगर इस बीच फोन की घंटी ने कल्पनाओं की प्रेस वार्ता की इतिश्री कर दी। हम तो यही सोचते रहे कि क्या ऐसा हो सकता है!
ओशो ने कहा है -आप बच्चे की सारी आवश्कताएं पूरी कर दें। उसे दुनियां की सभी आरामदायक चीजें दें। लेकिन यदि आप उसे आलिंगन नहीं करते तो उसका कभी सम्पूर्ण विकास नहीं हो पायेगा। अब एक एस एम एस नरेन् का--एक बच्चा चोकलेट खा रहा था। एक आदमी ने उसे टोका, बोला इतनी चोकलेट खाना ठीक नहीं। बच्चा बोला, मेरे दादा जी १०५ साल जिए। आदमी--वो चोकलेट खाते थे? बच्चा--नहीं, वो केवल अपने काम से काम रखते थे बस।
--- गोविंद गोयल
Monday, 6 December 2010
सी एम यूँ ही तो नहीं कहते
Friday, 3 December 2010
आज रोने का मन किया
रोने को मन किया,
मां के आँचल में सर
छुपा के सोने का मन किया,
दुनिया की भाग दौड़ में
खो चुके रिश्ते सब,
आज उन रिश्तों को सिरे से
संजोने का मन किया,
किसी दिन भीड़ में
देखी थी किसी की आँखें ,
ना जाने क्यूँ आज उन आखों में
खो जाने का मन किया,
रोज सपनों से बातें
करता था मैं,
आज ना जाने क्यूँ उनसे
मुंह मोड़ने का मन किया,
झूठ बोलता हूँ
अपने आप से रोज मैं,
आज ना जाने क्यूँ खुद से
एक सच बोलने का मन किया,
दिल तोड़ता हूँ सबका
अपनी बातों से मैं,
आज एक टूटा हुआ दिल
जोड़ने का मन किया।
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यह कविता मेरे मित्र और साहित्यप्रेमी आनंद मयसुत ने भेजी थी एस एम एस के द्वारा। खुद शिक्षक हैं। इनके पिता श्री मोहन आलोक राजस्थानी के जाने माने साहित्यकार हैं।
Sunday, 28 November 2010
किस्से में खबर, खबर में किस्सा
अब बात एस पी की कर लें। रुपिंदर सिंह बहुत अच्छे, धर्म परायण इन्सान हैं। लेकिन एस पी के रूप में उनका कोई रोब कहीं न तो दिखता है ना महसूस होता है।एसपी के रूप में उनकी पकड़ कहीं नजर नहीं आती। कोई कुछ भी करने को स्वतंत्र है। पुलिस वाले भी और नियम कानून को अपनी उँगलियों पर नचाने वाले भी। जो कोई भी एस पी से मिलने गया , उसकी बात उन्होंने तसल्ली से सुनी, मिलने वाले को भरोसा भी हुआ। किन्तु उसका परिणाम कुछ नहीं निकलता। कुछ दिन पहले कांग्रेस पार्टी के नेता अपने मुख्यमंत्री से इस बारे में मिले थे। ये कहा और सुना जा रहा है कि एसपी रुपिंदर सिंह का तबादला होने वाला है। एस पी साहेब से इतना ही कहना है कि आपके दफ्तर में लगे एक बोर्ड पर वो नाम हैं जो आपसे पहले यहाँ एसपी रहे हैं। लेकिन आम जन को वही नाम याद हैं जिन्होंने अपराधियों में डर पैदा कर आम आदमी का भरोसा जीता। आप केवल इस बोर्ड पर ही अपना नाम लिखा देखना चाहते हैं या लोगों के दिलो दिमाग पर भी,यह आप पर निर्भर है। हमें तो एस पी दूसरा मिल ही जायेगा। ना भी मिले तो भी क्या है! सहेल गाजीपुरी का शेर है---उस से उसके दोस्त भी नाराज होते जायेंगे, जिस को सच्ची बात कहने का हुनर आ जायेगा। अब साथी पत्रकार राकेश मितवा का मोबाइल सन्देश--श्वास का हर फूल अर्पण कर अमन को, प्यार का हर दीप पीड़ा के शमन को, है तू स्वयं परमात्मा का अंश भू पर, तू जहाँ भी है वहीँ महका चमन को।
---गोविंद गोयल
Monday, 22 November 2010
सवाल का जवाब ढूढ़ने के लिए चिंतन
जुबां फिसली तो फिसलती ही गई--अग्रवाल सम्मलेन कीराष्ट्रीय कार्यकारिणी के स्वागत समारोह में नेताओं की जुबां फिसली तो स्वागत का स्वाद रात तक कडवा रहा। छोटे बड़े अग्रजन हर कार्यक्रम में इस कड़वाहट को एक दूसरे के सामने बाहर निकालते दिखे। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जुबां इस लिए फिसली कि उनको वक्ताओं को बुलाने,उनके स्वागत का क्रम गरिमा के अनुकूल नहीं लगा। उपाध्यक्ष श्याम सुन्दर अग्रवाल को इसमें अपना अपमान महसूस हुआ। बी डी अग्रवाल को उपाध्यक्ष का बर्ताव सहन नहीं हुआ। लिहाजा उनकी जुबां भी फिसलने नहीं बच सकी। मामला अधिक बिगड़ गया। इसी वजह से दो पदाधिकारी प्रेस कांफ्रेंस में नहीं बैठे। उसके बाद हुए हर कार्यकर्म में यही समीक्षा होती रही कि कौन सही था कौन गलत। जिला कार्यकारिणी का स्वागत समारोह तो छोटा था बात बड़ी हो गई। संभव तय बड़ी बात मुश्किल से ही छोटी होगी। बेचारी आयोजक संस्था ये सोच सोच कर परेशान है कि आखिर यह सब कैसे और क्यों हुआ। वाली आसी का शेर है--आ मेरे यार एक बार गले लग जा, फिर कभी देखेंगे क्या लेना है क्या देना है। आर ए एस अधिकारी का मोबाइल सन्देश--दसना तुसी वी नी ते कहना असी वी नी। सदना तुसी वी नी ते आना असी वी नी। बोलना तुसी वी नी ते बुलाना असी वी नी। पर एक गल पक्की है के भुलना तुसी वी नी ते भुलाना असी वी नी।