Wednesday, 15 April 2009

पुलिस ने मचाया ग़दर

श्रीगंगानगर जिले में दो स्थानों पर पुलिस ने ग़दर मचाया। पहला ग़दर उसने रात के अंधेरे में एक किसान के घर मचाया। किसी मुलजिम की तलाश में गए इन पुलिस वालों ने घर वालों को इतना पीटा किउनको हॉस्पिटल में भरती करवाना पड़ा। घर के मुखिया ने बताया भी कि वह वो नहीं है जिसकी तलाश में छपा मारा गया। पुलिस ने नहीं सुनी। पुलिस ने महिलाओं के कपडे फाड़ डाले। पुलिस जानती थी कि जिस घर में छपा मारा गया वह मुलजिम का नहीं है। क्योंकि वह पहले भी आ चुकी थी। घटना के तीन दिन बाद तक एसपी को नहीं मालूम हुया। एसपी से इस बाबत जानकारी लेने के लिए बात कि तो उनका कहना था कि दो दिन बाद आना तब तक मैं सारी पड़ताल करवा लूँगा। इस परिवार ने अब गृह मंत्री से लेकर मानवाधिकार आयोग तक से न्याय की गुहार लगाई है। दूसरी घटना में पुलिस ने हिरासत में चार युवको को बुरी तरह पीटा। घायल युवकों के समर्थन में जिले का एक क़स्बा बंद रहा,मिनी सचिवालय को घेरा गया। उसके बाद कहीं जाकर थानाधिकारी और दो उप निरीक्षकों को ठाणे से हटाया गया। यह आन्दोलन किया कांग्रेस विधायक के पिता और पूर्व मंत्री ने। मतलब कांग्रेस की सरकार में कांग्रेस नेता को पुलिस के खिलाफ मैदान में आना पड़ा। इस जिले की हालत इस से अधिक और ख़राब क्या हो सकती है। जबकि यह जिला पाकिस्तान सीमा पर है। आजकल तो वैसे भी चुनाव का मौसम है। पुलिस का अंदाज अब यह है तो बाद में कैसा होगा?

Monday, 13 April 2009

खो गया है आम आदमी

देश में चुनाव की गहमा गहमी में आम आदमी गुम हो गया है। गाँव से लेकर देश की राजधानी तक इस बेचारे की कोई चर्चा ख़बर नही है। कोई पत्रिका,अखबार,न्यूज़ चैनल देख लो किसी में आम आदमी आपको नहीं मिलेगा। जब वह कहीं नहीं है तो इसका मतलब वह खो गया है। "गुम हो गया", "खो गया", ग़लत है, असल में तो उसको गुम कर दिया गया है। जब राजनीति कारोबार बन जाए,मुद्दे बेअदब चलती जुबान के नीचे दब कर दम तोड़ने लगे,जन हित की बजाये हर हाल में सत्ता को पाना ही लक्ष्य हो तो फ़िर आम आदमी की याद किसको और क्यों आने लगी। बड़े बड़े नेता हर रोज़ पता नहीं कहाँ कहाँ जाते हैं। उनके पीछे पीछे होता है मीडिया। लेकिन इनमे से कोई अगर बाजार जाए [ मॉल नहीं] तो इनको महंगाई से लड़ता फटे हाल में आम आदमी मिल जाता। किंतु किसको समय है आम आदमी के लिए! चीनी ३० रूपये के आस पास आने को है। गुड़ चीनी से आगे निकल गया है। दाल क्यों पीछे रहने लगी, उसने भी अपने आप को ऊपर और ऊपर ले जाना आरम्भ कर दिया। आम आदमी महंगाई से लड़ कर दम तोड़ रहा है, नेता आपस में लड़ रहें हैं। यह हैरानी की बात नहीं कि देश में जिस आम आदमी की संख्या सब से ज्यादा है वही चुनाव से गायब है। उसकी चिंता किसी को नहीं। कोई नेता एक बार बाजार जाकर रोजमर्रा की जरूरत वाले सामान के भाव तो पूछे! पूछ भी लेगा तो उसकी सेहत पर क्या असर पड़ेगा? उसकी जेब से कुछ जाना नहीं है। उसके पास तो आना ही है। उस से तो कोई ये भी नहीं पूछता कि भाई तुम ऐसा क्या काम करते हो जिस से तुम्हारी सम्पति हर पाँच साल में दोगुनी,तीन गुनी हो जाती है। क्या कोई ऐसा दल भी है जो आम आदमी को महंगाई के दल दल से निकल कर उसको थोडी बहुत राहत प्रदान कर सके। उम्मीद तो नहीं है, जिस देश में सरकार आई ऐ एस, आई पी एस के बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने का ऐलान करती हो वहां आम आदमी की क्या हैसियत है यह अनुमान लगाना कोई मुश्किल काम नहीं है। हैसियत है ही नहीं। कोई हैसियत होती तो उसको खोजने के लिए अब तक तो पता नही क्या क्या हो चुका होता। आम आदमी गुम ही रहे तो ठीक है उनकी बला से।

Saturday, 11 April 2009

धर्मनिरपेक्ष राजनीति की सच्चाई

---- चुटकी----

हिन्दुओं को
जितनी अधिक गालियाँ,
आपकी झोली में
उतनी अधिक तालियाँ,
दूसरों को पुचकारो
करो लाड-प्यार,
आपके गले में होंगे
ढेर सारे फूलों के हार,
यहाँ जो बात हमने
आपको बताई है,
यह कोई मजाक नहीं
धर्मनिरपेक्ष भारतीय
राजनीति की सच्चाई है।

Friday, 10 April 2009

यही है डेमोक्रेसी


----- चुटकी----

जूता फेंका

हुआ बवाल

सज्जन,टाईटलर गए

अपने घर जी,

इसी को

कहतें हैं डेमोक्रेसी

व्हाट एन

आइडिया सर जी।

Thursday, 9 April 2009

जय जय हनुमान गोसाई


बुद्धि हीन तनु जानिके
सुमिरो पवन कुमार,
बल,बुद्धि,विद्या देहु मोहिं
हरहु कलेस विकार।

Wednesday, 8 April 2009

सिख समाज ने लड्डू बांटे

भारत के गृह मंत्री पी चिदंबरम पर जूता फेंकने वाले जरनैल सिंह के समर्थन में सिख समाज आगे आने लगा है। श्रीगंगानगर में इस समाज के अनेक व्यक्तियों ने गाँधी चौक पर लड्डू बांटे। "उन्होंने कहा, इस देश में सिखों के लिए इंसाफ ना मुमकिन है। सिख इस देश की अदालतों से भी नाउम्मीद हो गए हैं। ...........जमीर की आवाज पर सिख जो भी फैसला लेंगे विश्व जनमत उसकी अनदेखी नहीं कर पायेगा।" आगामी रणनीति तय करने के लिए सिख समाज की १२ अप्रैल को बैठक होगी। शाम को सोनिया गाँधी,जगदीश टाईटलर, सज्जन कुमार के पुतले जलाये जायेंगें। यहाँ की सिख संगत ने जरनैल सिंह को इक्यावन हजार रूपये का ईनाम देने का ऐलान किया है। इन सबके बीच यह सवाल जरुर जहाँ में आता है कि जरनैल सिंह के स्थान पर कोई गोविन्द,मोहन,राम लाल,लालू राम, छैला मल.........जैसा कोई आम आदमी होता तो क्या गृह मंत्री उसको माफ़ कर देते? चलो माफ़ करना और माफ़ी मांगना तो बडापन है, मगर क्या पुलिस और खुफिया विभाग उसको आधे घंटे में घर जाने देते? ये तो जरनैल सिंह सिख समाज का और पत्रकार था,ऊपर से चुनाव। बात वोटों की हो तो फ़िर क्या कहने।

Tuesday, 7 April 2009

जरनैल सिंह बने हीरो,पत्रकारिता हुई शर्मसार

दैनिक जागरण के जरनैल सिंह नामक पत्रकार को आज सारी दुनिया जान गई। उनका समाज उनको मान गया होगा। इन सबके बीच पत्रकारिता पर ऐसा दाग लग गया जो कभी नही मिट सकता। पत्रकारिता कोई आसान और गैरजिम्मेदारी वाला पेशा नहीं है। ये तो वो काम है जिसके दम पर इतिहास बने और बनाये गये हैं। देश में यही वो स्तम्भ है जिस पर आम जनता आज भी विश्वास करती है। जिसकी कहीं सुनवाई नहीं होती वह मीडिया के पास आता है। वह इसलिए कि उसको विश्वास है कि मीडिया निष्पक्ष,संयमी और गरिमा युक्त होता है। मगर जरनैल सिंह ने इन सब बातों को झूठा साबित करने की शुरुआत कर दी। वह पत्रकारिता से ख़ुद विश्वास खो बैठा। पत्रकार की बजाए एक ऐसा आदमी बन गया जिसके अन्दर किसी बदले की आग लगी हुई थी। इस घटना से वह पत्रकारिता तो शर्मसार हो गई जिसके कारण जरनैल सिंह को पी चिदंबरम के पत्रकार सम्मलेन में जाने का मौका मिला। हाँ, जरनैल सिंह अपने समाज का नया लीडर जरुर बन गया। पत्रकार के रूप में जो वह नहीं पा सका होगा सम्भव है वह अब लीडर बन कर पा ले। हो सकता है कोई पार्टी उसको विधानसभा या लोकसभा के चुनाव में टिकट दे दे। ऐसे लोग पत्रकारिता के काबिल भी नहीं हो सकते जो इस प्रकार का आचरण करते हों। इस प्रकार का आचरण तो नेता करते हैं। शायद अब यही जरनैल सिंह किया करेंगें। जरनैल सिंह ने पत्रकारिता के साथ साथ "जागरण" ग्रुप की भी साख पर बट्टा लगाया है जिसका वह प्रेस कांफ्रेंस में प्रतिनिधित्व कर रहे थे। जरनैल सिंह को "हीरो" बनने पर बधाई और उनके आचरण पर शेम शेम।

ना घर ना कार

---- चुटकी----

ना घर
ना कार,
ये कैसी
"सरकार"।

Monday, 6 April 2009

नारदमुनि को वापिस भेजा

धर्मराज के दरबार के अन्दर की कार्यवाही शुरू हो चुकी थी। उसके बाहर भीड़ के साथ मीडिया के लोग बड़ी संख्या में जमे हुए थे। कल की तरह यम् के दूत नारदमुनि को लेकर दरबार में हाजिर हुए। चित्रगुप्त ने कहा, महाराज फैसले से पहले कुछ पूछना चाहते हैं। इसका मुकदमे से कोई सम्बन्ध नहीं है। महाराज अपनी जिज्ञासा शांत करना चाहते हैं।धर्मराज ने पूछा--ये राहुल कौन है? नारदमुनि--हिंदुस्तान के युवराज हैं महाराज। धर्मराज--तुम्हारा युवराज तो कमाल का है। उसके पास कार तक नहीं है। नारदमुनि--महाराज हिंदुस्तान में तो लाखों परिवार ऐसे हैं जिनके पास घर बार और रोटी तक नही है। फ़िर राहुल के पास तो सरकार है,उसको कार क्या करनी है। धर्मराज--लोगों के पास घर बार और रोटी नहीं है! ये तो भारत के न्यूज़ चैनल नहीं दिखा रहे। वे तो बार बार यही बता रहें है कि राहुल के पास कर नहीं है। नारदमुनि--महाराज आम आदमी के अभाव,दर्द,प्रताड़ना,उसके साथ होने वाला अन्याय ,जुल्म हिंदुस्तान में कोई ख़बर नहीं मानी जाती है। वहां का मीडिया तो बड़ों के लिए है।धर्मराज--तो फ़िर.......... नारदमुनि--महाराज क्या क्या पूछोगे,मैं जानता हूँ मैं वहां कैसे रहता हूँ। एक जरा से झूठ की वजह से मुझे पकड़ कर यहाँ लाया गया। हिंदुस्तान में तो केवल और केवल झूठ की चलता है। सच तो इधर उधर झूठ के डर से दुबका रहता है। महाराज आप अपना फैसला सुनाओ। धर्मराज--तुमको आरोप मुक्त किया जाता है। दूत नारदमुनि को वापिस हिंदुस्तान भेज दिया जाए। दरबार में बैठे सभी देवी देवताओं के चेहरों पर मुस्कान दिखाई दी। चित्रगुप्त ने आकर मीडिया को फैसले की जानकारी दी। फ़िर वे शुरू हो गए अपने अपने अंदाज में।

Sunday, 5 April 2009

धर्मराज के दरबार में नारदमुनि

धर्मराज का दरबार। महामहिम धर्मराज अपने सिंहासन पर विराजमान थे। देवी देवता,यक्ष,सहित सभी अपने अपने स्थान पर मौजूद थे। धर्मराज का चेहरा भाव हीन था। देवी-देवताओं के मुखमंडल पर चिंता की लकीरें देखी जा रही थी। इन्द्रलोक,स्वर्ग ,नरक के टीवी न्यूज़ चैनल और अखबारों के बड़े बड़े रिपोर्टर अपने अपने हथियारों के साथ अपना अपना स्थान पहले ही रोक चुके थे। टीवी वाले तो चिल्ला चिल्ला कर लाइव दिखा रहे थे। अचानक सब लोग एक ओरदौड़े। यम के दूत नारदमुनि को ला रहे थे। नारदमुनि के हाथ में हथकड़ी पैरों में बेड़ियाँ थी। जुबान पर वही एक मात्र नारायण नारायण का नाम। जैसे ही दूत नारदमुनि को लेकर धर्मराज के सामने हुए,चित्रगुप्त बोले, नारदमुनि को लाने में इतना समय कैसे लगा? ये हिंदुस्तान की संसद नहीं जहाँ समय की कीमत नहीं समझी जाती। दूत ने कांपते हुए बताया कि इन दिनों इस रोड पर ट्रैफिक बहुत अधिक था इसलिए देर हुई। धर्मराज के संतुष्ट होने के बाद नारदमुनि को बताया गया कि उनको इस प्रकार से क्यों लाया गया था। उन पर अपनी मौत की झूठी ख़बर लिखने का आरोप है। धर्मराज ने कहा- अगर नारदमुनि ऐसा करेगा तो फ़िर विश्वास किस पर किया जाएगा। नारदमुनि को अपनी बात कहने का अवसर दिया गया। नारदमुनि बोले-- महाराज जिस लोक में मैं आजकल रहता हूँ वहां बच्चे से लेकर बूढे तक के चेहरे से मुस्कान गायब हो चुकी है। हँसी ठट्ठा भी संता बंता के नाम से किया जाता है। लोग किसी कि खुशी में खुश नही होते। लोग एक दूसरे को जिन्दा ओर खुशहाल देखकर अन्दर ही अन्दर मरते रहते हैं। इस लिए मैंने अपनी मौत की बात की। वह भी पहली अप्रैल को।आप मेरा ब्लॉग देख लो इसी झूठ पर कई जने मुस्कुराये। महाराज मैंने किसी ओर को हंसने-हँसाने का पात्र नहीं। इसके लिए मैंने अपने आप को प्रस्तुत किया। महाराज किसी ओर पर हंसना गुनाह हो सकता है अपने आप पर नहीं।नारदमुनि की बात पर दरबार में काना फूसी शुरू हो गई। कुछ टिप्पणियां भी धीमे धीमे आने लगी। भारत की तरह न्यूज़ वालों को यहाँ कहीं भी आने की आजादी नही थी। इसलिए वे दरबार से बाहर अपनी अपनी तरह से इस ख़बर का प्रसारण कर रहे थे।नारदमुनि ने अपनी बात ख़तम कर धर्मराज की ओर देखा। धर्मराज ने कुछ क्षण चित्रगुप्त से बात की। उसके बाद उन्होंने फैसला कल सुनाने की बात कह कर कार्यवाही समाप्त कर दी। उनके प्रवक्ता ने आकर मीडिया को यह जानकारी दी। उसके बाद भी टीवी वाले अपने अपने अनुमान फैसले के बारे में बताते और सुनाते रहे। जो तेज थे उन्होंने एक्सपर्ट अपने स्टूडियो में बुला लिए और बहस आरम्भ कर दी। बेले दर्शकों से राय मांगी जाने लगी। सारा दिन इसी में निकल गया।