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Monday, 9 February 2009

भिखारिन लगाती है भंडारा


आदमी थोड़ा देकर बहुत नाम कमाने की भावना दिल और दिमाग में रखता है। बहुत से ऐसे भी हैं जो सौ रुपल्ली का सामान अस्पताल में बाँट कर दो सौ रूपये उसके प्रचार में लगा देते हैं। मगर यह पोस्ट उनको समर्पित नहीं है। यह समर्पित है उस भिखारिन को जिसको भिखारिन कहना ही नही चाहिए। श्रीगंगानगर से प्रकाशित "प्रशांत ज्योति" दैनिक अखबार में एक ख़बर है। ख़बर यह बताती है कि एक भिखारिन ऐसे लोगों के लिए लंगर लगाती है जो असहाय है। इस भिखारिन के जज्बे को सलाम करते हुए यही कहना है कि हमें ऐसे लोगों से कुछ तो प्रेरणा लेनी ही चाहिए। "मजबूर" ने अपनी किताब "डुबकियां" में लिखा है---"कुछ देने से सब कुछ नहीं मिलता मजबूर,सब कुछ देने से कुछ मिलता है जरुर"। वे ये भी कहतें हैं--" हर जिंदगी है मुश्किल,हर जिंदगी है राज, मुझ से हजार होंगें,मुझ सी दास्ताँ नहीं"।