Wednesday 18 February 2009

चैन दिल को समझाने में है

दिल्ली के निकट बहादुरगढ़ और रोहतक के बीच एक क़स्बा है सांपला। इस कस्बे या मंडी में यूँ तो हजारों लोग रहते हैं लेकिन जिक्र केवल नत्थू राम बंसल का। इसकी वजह तो है ही। वजह उनकी और उनके परिवार वालों की हिम्मत। सालों पहले नत्थू राम दो तीन दुर्घटनाओं का ऐसा शिकार हुआ कि उसकी कमर के नीचे का हिस्सा एक प्रकार से पत्थर का हो गया। बस, यह आदमी खड़ा और पड़ा रहता है। बिस्तर पर पड़ा रहेगा या बैसाखी लेकर खड़ा रहेगा। पैर मुड़ते नहीं,कमर झुकती नहीं। घर में ऐसे चलता है जैसे कीड़ी। कहीं जाना हो तो सामान ढोने वाले रिक्शा में "लाद" कर ले जाया जाता है। इसके बावजूद इनको ना तो जिंदगी से कोई शिकायत है ना भगवान से। इनका पूरा परिवार है, समाज में रुतबा है। इनकी पत्नी हो या बेटे किसी ने आज तक उनको ये अहसास नही होने दिया कि वे "पत्थर" हो चुके। उनकी एक आवाज से उनके परिवार वाले उनके पास पहुँच जाते है। ऐसे आदमी उन लोगों के लिए प्रेरणा होतें है जो थोड़ा बहुत चला जाने के गम में ज़िन्दगी से हार मान कर बैठ जाते हैं। इनके घर वालों ने इनका इलाज तो बहुत करवाया मगर जब कुछ बात नहीं बनी तो इसी को प्रसाद मान कर स्वीकार कर लिया। इनको इन दो लाइनों के साथ सलाम-- ना मजा मौज उड़ाने में है,ना मजा गम उठाने में है,गर है चैन "मजबूर", तो दिल को समझाने में है।"

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