श्रीगंगानगर- पहले एक किस्सा,उसके बाद खबर। आज के सिस्टम को सालों पहले समझ लेने वाले एक अधिकारी को ऐसी जगह लगा दिया गया जहाँ पीने को पूरा पानी तक नहीं था। अफसर करियर के बारे में सचेत था। लिहाजा हर ताले की कुंजी उसके पास थी। उसने अपनी अंटी से लाखों रूपये खर्च कर प्रोजेक्ट बनाया। जिसमे ये बताया गया था कि इलाके में बाँध बनाया जाये तो पानी की समस्या का समाधान हो सकता है। जमीन फसल के रूप में सोना उगलेगी। अफसर सिस्टम का हिस्सा था। ले देकर अरबों रुपयों का प्रोजेक्ट सरकार से मंजूर करवा लिया। सब हजम । बाँध के नाम पर पिल्ली ईंट भी नहीं लगी। तीन साल बाद उसका तबादला हुआ तो नया अफसर आया। फ़ाइलें देखी,बांध नहीं दिखा। माजरा समझ गया। वह कौनसा कम था। उसने बांध की मरम्मत का प्रोजेक्ट बना स्वीकृत करवा लिया। इसने भी क्या करना था। बजट आपस में बांटा,मौज मारी। समय पर ट्रांसफर हो गया। तीसरा ऑफिसर आया। वह भी इसी व्यवस्था में रचा बसा था।कमाल देखा, फाइल में बाँध बना, मरम्मत भी हुई। मौके पर मोडल भी नहीं। उसने नई तरकीब निकली। सरकार को प्रोजेक्ट भेजा। कई साल पहले जो बाँध बना था वह नकारा हो गया। उसको हटाया जाना जरुरी है। वरना इलाका तबाह हो सकता है। साथ में उसने बाँध वाली जगह पर कालोनी और कमर्शियल कोम्प्लेक्स बनाने का प्रस्ताव भी भेज दिया। प्रस्ताव पास होना ही था। लिहाजा इलाके को बचाने के लिए बाँध हटा दिया गया। मतलब सब कुछ वैसा ही जैसा था। अरबों रूपये सिस्टम में बंट गए। अब खबर। श्रीगंगानगर जिले में ईंट भट्ठा मालिकों को नोटिस दिए गए। उसके बाद निजी कालोनियों को नोटिस देकर रिसीवर नियुक्त करने की कार्यवाही करवाई गई। हंगामा तो मचना ही था। बचने के लिए लाखों रुपयों का फंड बनाया गया। अभी तक इनमे से कोई कार्यवाही नोटिस से आगे नहीं बढ़ी। बढती दिखती भी नहीं। इलाके के लोगों को रोजी रोटी से महरूम और घर से बेघर कर बरबाद थोड़ी करना है। राजकीय अस्पताल में मेडिकल की दुकानों को कुछ जमीन देने का भरोसा दिया गया। जिनको कुछ मिलना था उन्होंने सिस्टम में शामिल होने के लिए रूपये इकट्ठे किये। नियमानुसार उनको जगह मिलने का सवाल ही पैदा नहीं होता। कमेटी ने अडंगा लगाया तो बात बिगड़ गई। अब साहब ने सड़क की तरफ उनकी दुकानों के दरवाजे खुलवाने का आश्वासन दिया बताते हैं।
अब बात एस पी की कर लें। रुपिंदर सिंह बहुत अच्छे, धर्म परायण इन्सान हैं। लेकिन एस पी के रूप में उनका कोई रोब कहीं न तो दिखता है ना महसूस होता है।एसपी के रूप में उनकी पकड़ कहीं नजर नहीं आती। कोई कुछ भी करने को स्वतंत्र है। पुलिस वाले भी और नियम कानून को अपनी उँगलियों पर नचाने वाले भी। जो कोई भी एस पी से मिलने गया , उसकी बात उन्होंने तसल्ली से सुनी, मिलने वाले को भरोसा भी हुआ। किन्तु उसका परिणाम कुछ नहीं निकलता। कुछ दिन पहले कांग्रेस पार्टी के नेता अपने मुख्यमंत्री से इस बारे में मिले थे। ये कहा और सुना जा रहा है कि एसपी रुपिंदर सिंह का तबादला होने वाला है। एस पी साहेब से इतना ही कहना है कि आपके दफ्तर में लगे एक बोर्ड पर वो नाम हैं जो आपसे पहले यहाँ एसपी रहे हैं। लेकिन आम जन को वही नाम याद हैं जिन्होंने अपराधियों में डर पैदा कर आम आदमी का भरोसा जीता। आप केवल इस बोर्ड पर ही अपना नाम लिखा देखना चाहते हैं या लोगों के दिलो दिमाग पर भी,यह आप पर निर्भर है। हमें तो एस पी दूसरा मिल ही जायेगा। ना भी मिले तो भी क्या है! सहेल गाजीपुरी का शेर है---उस से उसके दोस्त भी नाराज होते जायेंगे, जिस को सच्ची बात कहने का हुनर आ जायेगा। अब साथी पत्रकार राकेश मितवा का मोबाइल सन्देश--श्वास का हर फूल अर्पण कर अमन को, प्यार का हर दीप पीड़ा के शमन को, है तू स्वयं परमात्मा का अंश भू पर, तू जहाँ भी है वहीँ महका चमन को।
---गोविंद गोयल
हर इन्सान हर पल किसी ना किसी उधेड़बुन में रहता है। सफलता के लिए कई प्रकार के ताने बुनता है। इसी तरह उसकी जिन्दगी पूरी हो जाती हैं। उसके पास अपने लिए वक्त ही नहीं । बस अपने लिए थोड़ा सा समय निकाल लो और जिंदगी को केवल अपने और अपने लिए ही जीओ।
Sunday, 28 November 2010
Monday, 22 November 2010
सवाल का जवाब ढूढ़ने के लिए चिंतन
की बोर्ड उँगलियों के नीचे हैं। उँगलियाँ कभी मन के भाव को शब्दों का रूप देती है और अगले ही पल उसी मन का आदेश मान उनको डीलिट कर ठहर जाती हैं की बोर्ड पर। सब्जेक्ट ही कुछ ऐसा है। कई देर की उलझन के बाद दिमाग ने मन को काबू में कर उँगलियों को स्वामी ब्रह्मदेव के बारे में लिखने का आदेश दिया। शनिवार को सुबह स्वामी जी से मिलने का अवसर मिला। क्षमा याचना के साथ स्वामी जी से सवाल किया, स्वामी जी आपके बाद संस्था को इसी प्रकार से कौन संभालेगा? स्वामी जी ने सवाल को बहुत सहज ढंग से लिया। कहने लगे, यही प्रश्न यहाँ भी गूंज रहा है। आजकल हम लोग इसी सवाल का जवाब खोजने में लागे हुए हैं। स्वामी जी बताने लगे, संस्था के सभी बावन सदस्य चिंतन कर रहे है कि ऐसी क्या व्यवस्था की जाये ताकि संस्था का संचालन,विकास,प्रतिष्ठा इसी प्रकार बनी रहे। उनका संकेत था कि जो भी होगा यहीं से होगा। संस्था के बाहर से कोई आकर इसकी जिम्मेदारी नहीं संभालेगा। एक ऐसा फंड बनाया जायेगा जिसके ब्याज से संस्था का बड़ा खर्च निकलता रहेगा। इस फंड को कोई भी कभी किसी भी हालत में प्रयोग नहीं कर सकेगा। बाकी जन सहयोग से चलेगा। वर्तमान में प्रतिमाह साढ़े अठारह लाख रूपये का खर्चा है संस्था को चलाने का। अभी सरकारी अनुदान भी। मगर इस प्रकार के इंतजाम करने की योजना है जिस से कि अनुदान बंद भी हो जाये तब भी संस्था को आर्थिक संकट से दो चार ना होना पड़े। एल के सी [ लालचंद कुलवंत राय चलाना] श्री जगदम्बा अंध विद्यालय समिति की नींव १३ दिसम्बर १९८० को रखी गई थी। लाल चंद कुलवंत राय चलाना समिति के पहले दानदाता थे। इन तीन दशकों में संस्था ने स्वामी ब्रह्मदेव के मार्गदर्शन में ऐसा विकास किया कि जिसकी मिसाल दूर दूर तक देखने सुनने को नहीं मिलती। श्रीगंगानगर इलाके में यह संस्था केवल दर्शनीय ही नहीं, इसके प्रति श्रद्धा भी है।
जुबां फिसली तो फिसलती ही गई--अग्रवाल सम्मलेन कीराष्ट्रीय कार्यकारिणी के स्वागत समारोह में नेताओं की जुबां फिसली तो स्वागत का स्वाद रात तक कडवा रहा। छोटे बड़े अग्रजन हर कार्यक्रम में इस कड़वाहट को एक दूसरे के सामने बाहर निकालते दिखे। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जुबां इस लिए फिसली कि उनको वक्ताओं को बुलाने,उनके स्वागत का क्रम गरिमा के अनुकूल नहीं लगा। उपाध्यक्ष श्याम सुन्दर अग्रवाल को इसमें अपना अपमान महसूस हुआ। बी डी अग्रवाल को उपाध्यक्ष का बर्ताव सहन नहीं हुआ। लिहाजा उनकी जुबां भी फिसलने नहीं बच सकी। मामला अधिक बिगड़ गया। इसी वजह से दो पदाधिकारी प्रेस कांफ्रेंस में नहीं बैठे। उसके बाद हुए हर कार्यकर्म में यही समीक्षा होती रही कि कौन सही था कौन गलत। जिला कार्यकारिणी का स्वागत समारोह तो छोटा था बात बड़ी हो गई। संभव तय बड़ी बात मुश्किल से ही छोटी होगी। बेचारी आयोजक संस्था ये सोच सोच कर परेशान है कि आखिर यह सब कैसे और क्यों हुआ। वाली आसी का शेर है--आ मेरे यार एक बार गले लग जा, फिर कभी देखेंगे क्या लेना है क्या देना है। आर ए एस अधिकारी का मोबाइल सन्देश--दसना तुसी वी नी ते कहना असी वी नी। सदना तुसी वी नी ते आना असी वी नी। बोलना तुसी वी नी ते बुलाना असी वी नी। पर एक गल पक्की है के भुलना तुसी वी नी ते भुलाना असी वी नी।
जुबां फिसली तो फिसलती ही गई--अग्रवाल सम्मलेन कीराष्ट्रीय कार्यकारिणी के स्वागत समारोह में नेताओं की जुबां फिसली तो स्वागत का स्वाद रात तक कडवा रहा। छोटे बड़े अग्रजन हर कार्यक्रम में इस कड़वाहट को एक दूसरे के सामने बाहर निकालते दिखे। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जुबां इस लिए फिसली कि उनको वक्ताओं को बुलाने,उनके स्वागत का क्रम गरिमा के अनुकूल नहीं लगा। उपाध्यक्ष श्याम सुन्दर अग्रवाल को इसमें अपना अपमान महसूस हुआ। बी डी अग्रवाल को उपाध्यक्ष का बर्ताव सहन नहीं हुआ। लिहाजा उनकी जुबां भी फिसलने नहीं बच सकी। मामला अधिक बिगड़ गया। इसी वजह से दो पदाधिकारी प्रेस कांफ्रेंस में नहीं बैठे। उसके बाद हुए हर कार्यकर्म में यही समीक्षा होती रही कि कौन सही था कौन गलत। जिला कार्यकारिणी का स्वागत समारोह तो छोटा था बात बड़ी हो गई। संभव तय बड़ी बात मुश्किल से ही छोटी होगी। बेचारी आयोजक संस्था ये सोच सोच कर परेशान है कि आखिर यह सब कैसे और क्यों हुआ। वाली आसी का शेर है--आ मेरे यार एक बार गले लग जा, फिर कभी देखेंगे क्या लेना है क्या देना है। आर ए एस अधिकारी का मोबाइल सन्देश--दसना तुसी वी नी ते कहना असी वी नी। सदना तुसी वी नी ते आना असी वी नी। बोलना तुसी वी नी ते बुलाना असी वी नी। पर एक गल पक्की है के भुलना तुसी वी नी ते भुलाना असी वी नी।
Sunday, 21 November 2010
चार बेटियों सहित आत्महत्या
आज सुबह की शुरुआत इस खबर से हुई कि एक दम्पती ने चार बच्चों सहित आत्महत्या कर ली। जानकारी को अधिकृत रूप मिला तो खबर ये थी। एक दम्पती ने अपनी चार लड़कियों के साथ आत्म हत्या कर ली। सबसे छोटी लड़की की उम्र मात्र एक माह थी। सबसे बड़ी लड़की अपने ससुराल गई हुई थी। फिलहाल यही पता चला है कि यह सब आर्थिक तंगी के कारण हुआ। पुलिस हर नजरिये से इस मामले की तहकीकात कर रही है। घटना हनुमानगढ़ जिले के रोड़ावाली गाँव की है। यह गाँव हनुमानगढ़ से अबोहर जाने वाली सड़क पर है।
Friday, 19 November 2010
Monday, 15 November 2010
Tuesday, 9 November 2010
मुश्किल डगर पर पहला कदम
इन्सान के सामाजिक होने का प्रमाण है उसके यहाँ आने वाले निमंत्रण पत्र। शादी,सगाई,जन्म,विवाह की वर्षगांठ,जन्म और शादी की सिल्वर और गोल्डन जुबली सहित अनेक अवसरों पर निमंत्रण पत्र आना भिजवाना एक सामान्य बात है। ऐसे आयोजनों में जाना-आना रिश्तों को निभाने के लिए जरुरी भी है। कहीं कहीं सामाजिक शिष्टाचार के लिए हाजिरी लगवानी होती है। जाना है तो खाली हाथ जाने का सवाल ही पैदा नहीं होता। जैसा जिसके साथ रिश्ता वैसा ही उपहार या लिफाफे के अन्दर शगुन के नाम पर नकदी। किसी के यहाँ अकेले गए तो कहीं कहीं परिवार के साथ। कार्ड आने का सीधा सा मतलब होता है कि खर्चा आ गया। भोजन करो, लिफाफा दो और लौट जाओ घर। कई बार तो भोजन भी जरुरी नहीं होता। लिफाफे से ही हाजिरी लगवाई जाती है। सब चलता है। रिवाज ही ऐसा हो गया। हर कोई चर्चा करता है। इस रिवाज की बातचीत में खिल्ली उड़ाने वालों की कमी नहीं है।। दशकों पहले जो एक सामान्य रिवाज था वह विकृति के रूप में समाज के सामने आ खड़ा हुआ। पहली बार एक ऐसा निमंत्रण मिला जिसने ध्यान अपनी तरफ खींचा। वैसे तो यह लक्ष्मी ट्रेडिंग कंपनी के संचालक निर्मल कुमार बंसल के सुपौत्र के जन्मोपलक्ष में आयोजित होने वाले भोज में आने का निमंत्रण है, लेकिन इस पर आने के आग्रह के साथ ये लिखा है" नोट--आपसे करबद्ध अनुरोध है कि किसी प्रकार का गिफ्ट स्वीकार्य नहीं होगा। केवल आपका आशीर्वाद ही चाहिए। " किसी निमंत्रण पत्र में इस प्रकार अनुरोध पहली बार देखने का अनुभव हुआ। अच्छा लगा। सुखद अहसास हुआ। लाइन बेशक छोटी है, इनका सन्देश बहुत और बहुत बड़ा है। वर्तमान में कहें तो बराक ओबामा की भारत यात्रा से भी बड़ा। शुरुआत छोटी के साथ साथ मुश्किल भरी होती है। आयोजन में इसका कोई अर्थ रहे या ना रहे। मेहमान चाहे गिफ्ट,लिफाफा लाएं, मनुहार करके जबरदस्ती मेजबान को दे भी जाएं। उनको मज़बूरी में,शिष्टाचार में ,रिश्तों की गरिमा रखने हेतु संभव है कुछ स्वीकार करना पड़े। इसके बावजूद निमंत्रण पत्र पर छपी लाइन की भावना दूर दूर तक जाएगी। जानी ही चाहिए।आज के परिवेश में जब लिफाफा हमारी संस्कृति बन चुका है तब आमंत्रित मेहमान को आने से पहले ही यह अनुरोध कर देना कि प्लीज़ कुछ लाना मत, कम महत्व पूर्ण नहीं है। घर घर में घर कर चुके ऐसे रिवाजों के खिलाफ किसी ना किसी को तो बोलना ही था। कोई अकेला चलने की हिम्मत करेगा तभी कारवां बनने का रास्ता बनेगा। ये जरुर है कि पहले पहल यह आड़ी,टेढ़ी, धुंधली सी पगडंडी हो उसके बाद एक आम रास्ता बन जाये। किसी के आना जाना बोझ,खर्च महसूस होने की बजाय आनंद और उत्साह की बात लगे। संभव है रास्ता कई साल गुजरने के बाद भी न बने, ये भी हो सकता है कि इस रास्ते की आवश्यकता जल्दी ही सबको होने लगे। फिलहाल तो निर्मल कुमार बंसल परिवार की भावना,सोच,हिम्मत को सलाम। जिसने एक नई परम्परा की ओर अपने कदम बढ़ाये हैं। हस्ती मल हस्ती की लाइन हैं---रास्ता किस जगह नहीं होता,सिर्फ हमको पता नहीं होता। बरसों रुत के मिज़ाज सहता है, पेड़ यूँ ही बड़ा नहीं होता। अब एक एस एम एस जो हनुमानगढ़ के राजेश अरोड़ा का है--अक्सर लोग कहते हैं कि जिंदगी रही तो फिर मिलेगें। मगर हम लोगों से ये कहते हैं कि मिलते रहे तो जिंदगी रहेगी।
Thursday, 4 November 2010
करोड़ों कृषि शरणार्थी होंगे इस देश में
विकास डब्ल्यू एस पी लिमिटेड के चेयरमैन बी डी अग्रवाल, जिन्होंने ये लेख लिखा है, का कहना है कि इस लेख को पढ़कर बीजेपी के विधायक अभिषेक मटोरिया सहित कई जनप्रतिनिधियों ने उनसे मुलाकात की। हर किसी ने इस बात पर अचरज जताया कि देश में किसानों के साथ ऐसा हो रहा है और कोई भी राजनीतिक दल बोलता नहीं। श्री अग्रवाल का दावा है कि वे जो कुछ इस लेख में कह रहे हैं वह तथ्यों पर आधारित है। तथ्यों को कोई झुठला नहीं सकता हाँ कोई आँख मूंद ले तो कोई क्या कर सकता है।
Wednesday, 3 November 2010
कौन देता मेरा साथ
---
मेरे मासूम
सवालों के
झूठे थे तेरे
सभी जवाब,
तेरी चाहत की
दीवानगी में
गुम हो गए
मेरे सभी ख्वाब।
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अमावस का हूँ
अँधेरा, जो था
पूनम की रात,
दीप की भांति
जलो तो
बन जाये बात।
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तुम्हारी तुला
तोलने वाले भी
तुम्हारे ही हाथ,
ऐसे में कोई
क्यूँ देने लगा
मेरा साथ।
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***गोविंद गोयल
मेरे मासूम
सवालों के
झूठे थे तेरे
सभी जवाब,
तेरी चाहत की
दीवानगी में
गुम हो गए
मेरे सभी ख्वाब।
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अमावस का हूँ
अँधेरा, जो था
पूनम की रात,
दीप की भांति
जलो तो
बन जाये बात।
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तुम्हारी तुला
तोलने वाले भी
तुम्हारे ही हाथ,
ऐसे में कोई
क्यूँ देने लगा
मेरा साथ।
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***गोविंद गोयल
Sunday, 31 October 2010
परम्पराओं से भरा जीवन
हम सबका जीवन परम्पराओं के मामले में बहुत अमीर है। परम्परा कोई भी कहीं भी हो सबकी अपनी अलग कहानी,दास्ताँ है। कोई चाहे इसकी खिल्ली उड़ाए तो उड़ाए ,परम्परा का निर्वहन जारी रहता है। ऐसी ही एक परम्परा है, लंकेश रावण के कुल का बारहवां । श्रीगंगानगर में दशहरे का आयोजन श्रीसनातन धर्म महावीर दल करता है। रावण,मेघनाथ और कुम्भकर्ण के पुतलों के दहन के बाद किसी दिन लंकेश के कुल का बारहवां यही संस्था करती है। इस दिन विधि विधान से ब्राह्मणों को भोजन करवाया जाता है। नगर के गणमान्य नागरिक, दशहरा आयोजन से जुड़े सभी व्यक्ति इसमें शामिल होते हैं। कुछ व्यक्तियों की राय में यह महान पंडित रावण के पुतले जलाने के कथित पाप से मुक्ति हेतु किया जाता है। कई सज्जनों का मत है कि यह प्रायश्चित है ,उनके द्वारा जो रावण,कुम्भकर्ण और मेघनाथ के पुतले जलाते हैं। वजह जो भी हो परन्तु यह आयोजन गत छ:दशक से हो रहा है। संस्था के पदाधिकारी चाहे कोई रहा ,यह आयोजन अवश्य हुआ और होता रहेगा।
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