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Monday, 22 November 2010

सवाल का जवाब ढूढ़ने के लिए चिंतन

की बोर्ड उँगलियों के नीचे हैं। उँगलियाँ कभी मन के भाव को शब्दों का रूप देती है और अगले ही पल उसी मन का आदेश मान उनको डीलिट कर ठहर जाती हैं की बोर्ड पर। सब्जेक्ट ही कुछ ऐसा है। कई देर की उलझन के बाद दिमाग ने मन को काबू में कर उँगलियों को स्वामी ब्रह्मदेव के बारे में लिखने का आदेश दिया। शनिवार को सुबह स्वामी जी से मिलने का अवसर मिला। क्षमा याचना के साथ स्वामी जी से सवाल किया, स्वामी जी आपके बाद संस्था को इसी प्रकार से कौन संभालेगा? स्वामी जी ने सवाल को बहुत सहज ढंग से लिया। कहने लगे, यही प्रश्न यहाँ भी गूंज रहा है। आजकल हम लोग इसी सवाल का जवाब खोजने में लागे हुए हैं। स्वामी जी बताने लगे, संस्था के सभी बावन सदस्य चिंतन कर रहे है कि ऐसी क्या व्यवस्था की जाये ताकि संस्था का संचालन,विकास,प्रतिष्ठा इसी प्रकार बनी रहे। उनका संकेत था कि जो भी होगा यहीं से होगा। संस्था के बाहर से कोई आकर इसकी जिम्मेदारी नहीं संभालेगा। एक ऐसा फंड बनाया जायेगा जिसके ब्याज से संस्था का बड़ा खर्च निकलता रहेगा। इस फंड को कोई भी कभी किसी भी हालत में प्रयोग नहीं कर सकेगा। बाकी जन सहयोग से चलेगा। वर्तमान में प्रतिमाह साढ़े अठारह लाख रूपये का खर्चा है संस्था को चलाने का। अभी सरकारी अनुदान भी। मगर इस प्रकार के इंतजाम करने की योजना है जिस से कि अनुदान बंद भी हो जाये तब भी संस्था को आर्थिक संकट से दो चार ना होना पड़े। एल के सी [ लालचंद कुलवंत राय चलाना] श्री जगदम्बा अंध विद्यालय समिति की नींव १३ दिसम्बर १९८० को रखी गई थी। लाल चंद कुलवंत राय चलाना समिति के पहले दानदाता थे। इन तीन दशकों में संस्था ने स्वामी ब्रह्मदेव के मार्गदर्शन में ऐसा विकास किया कि जिसकी मिसाल दूर दूर तक देखने सुनने को नहीं मिलती। श्रीगंगानगर इलाके में यह संस्था केवल दर्शनीय ही नहीं, इसके प्रति श्रद्धा भी है।
जुबां फिसली तो फिसलती ही गई--अग्रवाल सम्मलेन कीराष्ट्रीय कार्यकारिणी के स्वागत समारोह में नेताओं की जुबां फिसली तो स्वागत का स्वाद रात तक कडवा रहा। छोटे बड़े अग्रजन हर कार्यक्रम में इस कड़वाहट को एक दूसरे के सामने बाहर निकालते दिखे। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जुबां इस लिए फिसली कि उनको वक्ताओं को बुलाने,उनके स्वागत का क्रम गरिमा के अनुकूल नहीं लगा। उपाध्यक्ष श्याम सुन्दर अग्रवाल को इसमें अपना अपमान महसूस हुआ। बी डी अग्रवाल को उपाध्यक्ष का बर्ताव सहन नहीं हुआ। लिहाजा उनकी जुबां भी फिसलने नहीं बच सकी। मामला अधिक बिगड़ गया। इसी वजह से दो पदाधिकारी प्रेस कांफ्रेंस में नहीं बैठे। उसके बाद हुए हर कार्यकर्म में यही समीक्षा होती रही कि कौन सही था कौन गलत। जिला कार्यकारिणी का स्वागत समारोह तो छोटा था बात बड़ी हो गई। संभव तय बड़ी बात मुश्किल से ही छोटी होगी। बेचारी आयोजक संस्था ये सोच सोच कर परेशान है कि आखिर यह सब कैसे और क्यों हुआ। वाली आसी का शेर है--आ मेरे यार एक बार गले लग जा, फिर कभी देखेंगे क्या लेना है क्या देना है। आर ए एस अधिकारी का मोबाइल सन्देश--दसना तुसी वी नी ते कहना असी वी नी। सदना तुसी वी नी ते आना असी वी नी। बोलना तुसी वी नी ते बुलाना असी वी नी। पर एक गल पक्की है के भुलना तुसी वी नी ते भुलाना असी वी नी।