Sunday, 31 October 2010

सरदार पटेल को याद करें


राजनेताओं के सरदार वल्लभ भाई पटेल को हमारा शत शत प्रणाम। हमारी राय में उनके जैसा राजनेता अब तो इस भारत में नहीं है। पता नहीं वो दिन कब आएगा जब हिन्दूस्तान में एक बार फिर कोई वल्लभ भाई पटेल जन्म लेगा। आज उनका जन्म दिन है।

Saturday, 30 October 2010

श्रीगंगानगर में पत्रकारिता

मोबाइल फोन की घंटी बजी...टू..न न,टू न न [ आपकी मर्जी चाहे जैसी बजा लो] । गोविंद गोयल! जी बोल रहा हूँ। गोयल जी ...बोल रहा हूँ। फलां फलां जगह पर छापा मारा है। आ जाओ। इस प्रकार के फोन हर मीडिया कर्मी के पास हर रोज आते हैं। सब पहुँच जाते हैं अफसर के बताए ठिकाने पर। एक साथ कई पत्रकार, प्रेस फोटोग्राफर,पुलिस, प्रशासन के अधिकारी को देख सामने वाला वैसे ही होश खो देता है। अब जो हो वही सही। श्रीगंगानगर में पत्रकार होना बहुत ही सुखद अहसास के साथ साथ भाग्यशाली बात है। यहाँ आपको अधिक भागादौड़ी करने की कोई जरुरत नहीं है। हर विभाग के अफसर कुछ भी करने से पहले अपने बड़े अधिकारी को बताए ना बताए पत्रकार को जरुर फोन करेगा। भई, जंगल में मोर नचा किस ने देखा। मीडिया आएगा तभी तो नाम होगा। एक साथ कई कैमरे में कैद हो जाती है उनकी फोटो। जो किसी अख़बार या टी वी पर जाकर आजाद हो जाती है आम जन को दिखाने के लिए। ये सब रोज का काम है। गलत सही की ऐसी की तैसी। एक बार तो हमने उसकी इज्जत को मिट्टी में मिला दिया । जिसके यहाँ इतना ताम झाम पहुँच गया। सबके अपने अपने विवेक, आइडिया। कोई कहीं से फोटो लेगा, कोई किसी के बाईट । कोई किसी को रोक नहीं पाता। आम जन कौनसा कानून की जानकारी रखता है। वह तो यही सोचता है कि मीडिया कहीं भी आ जा सकता है। किसी भी स्थान की फोटो अपने कैमरे में कैद करना उसका जन्म सिद्ध अधिकार है। उसकी अज्ञानता मीडिया के लिए बहुत अधिक सुविधा वाली बात है । वह क्यों परवाह करने लगा कि इस बात का फैसला कब होगा कि क्या सही है क्या गलत। जो अफसर कहे वही सही, आखिर ख़बरों का स्त्रोत तो हमारा वही है। अगर वे ना बताए तो हम कोई भगवान तो है नहीं। कोई आम जन फोन करे तो हम नहीं जाते। आम जन को तो यही कहते हैं कि जरुरत है तो ऑफिस आ जाओ। अफसर को मना नहीं कर पाते। सारे काम छोड़ कर उनकी गाड़ियों के पीछे अपनी गाड़िया लगा लेते है। कई बार तो भ्रम हो जाता है कि कौन किसको ले जा रहा है। मीडिया सरकारी तंत्र को ले जा रहा है या सरकारी तंत्र मीडिया को अपनी अंगुली पर नचा रहा है। जिसके यहाँ पहुँच गए उसकी एक बार तो खूब पब्लिसिटी हो जाती है। जाँच में चाहे कुछ भी न निकले वह एक बार तो अपराधी हो ही गया। पाठक सोचते होंगे कि पत्रकारों को हर बात कैसे पता लग जाती है। भाइयो, अपने आप पता नहीं लगती। जिसका खबर में कोई ना कोई इंटरेस्ट होता है वही हमको बताता है। श्रीगंगानगर में तो जब तक मीडिया में हर रोज अपनी फोटो छपाने के "लालची" अफसर कर्मचारी रहेंगे तब तक मीडिया से जुड़े लोगों को ख़बरों के पीछे भागने की जरुरत ही नहीं ,बस अफसरों,उनके कर्मचारियों से राम रमी रखो। इस लिए श्रीगंगानगर में पत्रकार होना गौरव की बात हो गया। बड़े बड़े अधिकारी के सानिध्य में रहने का मौका साथ में खबर , और चाहिए भी क्या पत्रकार को अपनी जिंदगी में। बड़े अफसरों के फोन आते है तो घर में, रिश्तेदारों में,समाज में रेपो तो बनती ही है। श्रीगंगानगर से दूर रहने वाला इस बात को समझाने में कोई दिक्कत महसूस करे तो कभी आकर यहाँ प्रकाशित अख़बारों का अवलोकन कर ले। अपनी तो यही राय है कि पत्रकारिता करो तो श्रीगंगानगर में । काम की कोई कमी नहीं है। अख़बार भी बहुत हैं और अब तो मैगजीन भी । तो कब आ रहें है आप श्रीगंगानगर से। अरे हमारे यहाँ तो लखनऊ ,भोपाल तक के पत्रकार आये हुए हैं । आप क्यों घबराते हो। आ जाओ। कुछ दिनों में सब सैट हो जायेगा। श्रीगंगानगर में पत्रकारिता नहीं की तो जिंदगी में रस नहीं आता। ये कोई व्यंग्य,कहानी, टिप्पणी या कटाक्ष नहीं व्यथा है। संभव है किसी को यह मेरी व्यथा लगे, मगर चिंतन मनन करने के बाद उसको अहसास होगा कि यह पत्रकारिता की व्यथा है। कैसी विडम्बना है कि हम सब सरकारी तंत्र को फोलो कर रहे है। जो वह दिखाना चाहता है वहीँ तक हमारी नजर जाती है। होना तो यह चाहिए कि सरकारी तंत्र वह करे जो पत्रकारिता चाहे। ओशो की लाइन पढो--- जो जीवन दुःख में पका नहीं ,कच्चे घट सा रह जाता है। जो दीप हवाओं से न लड़ा,वह जलना सीख न पाता है। इसलिए दुखों का स्वागत कर,दुःख ही मुक्ति का है आधार। अथ तप: हि शरणम गच्छामि, भज ओशो शरणम् गच्छामि ।

Thursday, 28 October 2010

श्रीगंगानगर में "गुंडे' की दहशत

हुजूर अहमद "शफक" की लाइन -चिंताजनक है आज जो हालात मेरी जां,हैं सब ये सियासत के कमालात मेरी जां, से आज बात की शुरुआत करते हैं।दीवाली अभी दूर है मगर लक्ष्मी का आगमन साफ दिखता है। देखना हो तो चले आओ चिकित्सा पेशे से जुड़े किसी भी आदमी या संस्था के यहाँ। आपको साफ दिखाई देगा कि किस प्रकार लक्ष्मी वहां अपनी मेहरबानी की बरसात कर रही है। नगर में चर्चा है कि इस बार लक्ष्मी इन्ही के घर विराजमान है। इसका कारण है "गुंडे" का आतंक। जल्दी में कुछ उल्टा हो गया। गुंडे नहीं डेंगू। बात तो एक ही है। श्रीगंगानगर में इन दिनों वो घर बहुत ही भाग्यशाली है जिसका कोई सदस्य बीमार नहीं है। सरकारी हो प्राइवेट ,तमाम हॉस्पिटल में बुखार से पीड़ित लोगों का आना लगा रहता है। प्रशासन पता नहीं क्या कहता है लेकिन निजी अस्पतालों के आंकड़े लोगों के दिलों में खौफ पैदा करने के लिए काफी हैं। एक बार बुखार होने का मतलब है कई हजार रूपये की चट्टी। मानसिक चिंता अलग से। जिनके यहाँ हर रोज या हर माह एक निश्चित राशि आनी है उसके यहाँ तो समस्या अधिक है। हमें इस बात की जलन नहीं है कि लक्ष्मी चिकित्सा से जुड़े व्यक्तियों के यहाँ क्यों डेरा लगाकर बैठी है। चिंता है कि इस बात की है कि अगर यही हाल रहा तो इस बार की दीवाली कैसी होगी? दीवाली, जो सबसे बड़े त्यौहार के रूप में आती है, कई प्रकार के सपने साथ लेकर आती है। घर घर में कुछ ना कुछ नया लाने के लिए बजट का इंतजाम रहता ही है। जैसी जिसकी जेब वैसे उसके सपने। मगर इस बार सभी के नहीं तो बहुतों के छोटे बड़े सभी सपने इस गुंडे के डर से किसी ओर के यहाँ चले जा रहे हैं। सामान्य बुखार ,जो कभी दादी नानी के नुस्खों से ठीक हो जाया करता था वह अब जिंदगी के लिए संकट बन कर आ खड़ा होता है। जिंदगी है तो सपने हैं, ये सोचकर सब अपना सब कुछ इस गुंडे पर लगाने को तैयार हो जाते हैं। कोई हिसार भागता है कोई जयपुर तो कोई लुधियाना। बस किसी प्रकार से जिन्दगी बच जाये,रोटी के लिए कौड़ी बचे ना बचे। कोई कर भी क्या सकता है। इससे पहले तो कभी यहाँ इस प्रकार के हालत पैदा नहीं हुए। नगर के उन व्यक्तियों को जो अपने आप को इस नगर की आन, बान, शान समझते हैं,इस बारे में चिंतन मनन जरुर करना चाहिए कि आखिर ऐसे हालत बने क्यों? अब तो जो होना था हो गया आइन्दा तो शहर को इस स्थिति से दो चार ना होना पड़े। ----कांग्रेस नेताओं को याद होगा कि १९७७ में करारी हार के बाद उनकी नेता इंदिरा गाँधी १९८० में फिर सत्ता में वापिस आ गई थी। क्योंकि हार के बावजूद श्रीमती गाँधी लगातार मिडिया की पहली खबर रहीं। इसका कारण वे खुद नहीं चरण सिंह बने , जो सरकार में उप प्रधानमंत्री के साथ साथ गृह मंत्री भी थे। वे उठते ,बैठते केवल श्रीमती गाँधी को कोसते। वे श्रीमती गाँधी को कोसते रहे, श्रीमती गाँधी लोगों की सहानुभूति बटोर कर सत्ता में लौट आई। इसी से मिलता जुलता यहाँ कांग्रेस की राजकुमार गौड़ एंड कम्पनी कर रही है। जांदू ये , जांदू वो। हाय जांदू,हे जांदू। मेरे मालिक ,आप कांग्रेस के नेता हो, जो राजस्थान की नहीं हिन्दूस्तान की भी सत्ता चला रही है। आपको लगता है कि नगर परिषद् शहर में ठीक या जनहित का काम नहीं कर रही तो अफसरों को बदल दो। जो स्थान खाली है उनको भरवा दो। यहाँ के कर्मचारी,अफसर आपको भाव नहीं देते तो उनके तबादले करवाओ । जांदू नहीं सुहाता तो उसको बर्खास्त करवा दो। ये क्या विपक्ष की तरह स्यापा करने लगे हो। शोर मचाना विपक्ष का काम होता है। सत्ता पक्ष तो चमत्कार दिखाता है। इस हाय तोबा से राजकुमार गौड़ एंड कंपनी को कब क्या मिलेगा पता नहीं, हाँ जांदू जरुर अख़बारों में छाये रहते हैं। अगर जांदू को जांदू को डाउन करना है तो उसका नाम ही लेना बंद कर दो। नहीं करोगे तो वह राजनीति का डौन बन जायेगा। ओशो ने कहा था--कौन सही है कौन गलत है, क्या रखा इस नादानी में,कौड़ी की चिंता करने में हीरा बह जाता पानी में। जब भी शिकवा शिकायत हो ,समझो तुम्ही खलनायक हो, अथ प्रमम शरणम् गच्छामि, भज ओशो शरणम् गच्छामि। अब आनंद मायासुत का भेजा एस एम एस --इस दुनिया में भगवान का संतुलन कितना अचरज भरा है। सौ किलो गेहूं का बोरा जो आदमी उठा सकता है वह उसे खरीद नहीं सकता। जो इसे खरीद सकता है वह इसे उठा नहीं सकता। ---

मिल गया काम

----चुटकी----

सुषमा की
जुबां से
जैसे ही निकला
नरेंद्र मोदी का नाम,
चैनल वालों को
मिल गया
एक नया काम।

Tuesday, 26 October 2010

एक दिन की चांदनी

करवा चौथ की
हमको तो
समझ आती है
यही एक बात,
बस, एक
दिन की चांदनी
फिर अँधेरी रात।
----
एक दोस्त है, सालों से पत्नी के लिए करवा चौथ का व्रत रखता है। बड़ा प्रभावित रहा आज तक। कितना मान करता है पत्नी का। उसके साथ खुद भी भूखा रहता है। बहुत प्रशंसा करता उसकी। कल रात को भी की थी। असली कहानी आज समझ आई। वह व्रत अपनी मर्जी से या पत्नी की सहानुभूति के लिए नहीं रखता। व्रत रखना उसकी मज़बूरी है। क्योंकि पत्नी या तो सजने संवरने में लगी रहती है या व्रत भंग ना हो, इस वजह से कुछ काम नहीं करती। तब पति क्या करता। एक दो साल तो देखा। बाज़ार में कुछ खाया। लेकिन बात नहीं बनी । उसके बाद उसने भी व्रत रखना आरम्भ कर दिया। मैंने खुद देखा सुना। पति बोला, सुनो मेरी शर्ट में बटन लगा दो ऑफिस जाना है। पत्नी कहने लगी, मेरा तो आज करवा चौथ का व्रत है। सुई हाथ में नहीं लेनी या तो खुद लगा लो या फिर दूसरी शर्ट पहन लो। ऐसी स्थिति में कोई क्या करे! व्रत करे और क्या करे। पत्नी भी खुश शरीर को भी राहत।

Sunday, 24 October 2010

मियां बीबी का रिश्ता मतलब वीणा की तार


बात बहुत पुरानी है। पति के मना करने के बावजूद पत्नी सत्संग में चली गई। वापिस आई तो पति ने नाराजगी दिखाई। बात इतनी बढ़ी कि बोलना तो दूर दोनों ने मरने तक एक दूसरे की सूरत नहीं देखी। वह भी एक घर में रहते हुए। पति ने बाहर वाले कमरे में डेरा जमा लिया। दोनों ऐसे विरागी हुए कि गठजोड़ा फिर बंधा ही नहीं। एक पति ऐसा था कि पत्नी के अचानक हुई मौत के बाद उसके प्रति अनुराग ने उसके दिमागी संतुलन को बिगाड़ दिया। बच्चे परेशान हुए। दोनों बात एक दम सच्ची। मियां बीबी का रिश्ता है ही कुछ ऐसा। करवा चौथ आ गई, इसी बहाने मियां-बीबी लिखने का बहाना बन गए। एक अनूठा रिश्ता जो कभी कभी रिसता भी रहता है इसके बावजूद सब रिश्तों में यह नाजुक,गरिमामय,आभायुक्त और मर्यादित के साथ साथ बेशर्मी से ओत प्रोत होता है। दोनों में लाज,शर्म का आवरण है भी और जब नहीं होता तो बिलकुल भी नहीं होता। फिर भी पाक। दोनों ही स्थिति में प्रगाढ़ता होती है। जब से रिश्तों का महत्व समझ आने लगा तब से आज तक जिन घरों तक अप्रोच रही ,उनमे एक दम्पती ऐसे मिले जिनकी आपसी समझ का कोई मुकाबला नहीं। दो जवान बेटे हैं फिर भी इस प्रकार रहतेहैं जैसे मियां बीबी नहीं प्रेमी प्रेमिका हो। मजाल है जो कभी किसी के चेहरे पर खीज दिखाई दी हो। बेशक यह बात साधारण सी है लेकिन है बड़ी व्यावहारिक। पत्नी अगर अपने पति की प्रेमिका बनकर रहे तो घर आनंद प्रदान करता है। रिश्ते हर समय गर्माहट लिए रहते हैं। तब पति को भी प्रेमी होना होगा। असली गड़बड़ वहां होती है जहाँ पत्नी केवल और केवल गृहणी बनी रहना चाहती है। तब इस रिश्ते में रिसाव कुछ अधिक होने लगता है। रिश्ते बेशक टूटने की कगार पर ना पहुंचे मगर आनंद का अभाव जरुर जीवन में आ जाता है। पति पत्नी के प्रेमी -प्रेमिका होने का यह मतलब नहीं कि वे हाथों में हाथ डाले पार्कों में गीत गाते हुए घूमे। प्रेम की भी अपनी मर्यादा होती है। या यूँ कहें कि मर्यादित प्रेम ही असली प्रेम कहलाने का हक़ रखता है तो गलत नहीं होगा। एक बार क्या अनेक बार देखा होगा। सत्संग,कथा में किसी प्रसंग के समय महिलाएं किसी के कहे बिना ही नृत्य करना शुरू कर देती हैं। भाव विभोर हो ऐसे नाचती हैं कि उनको इस बात से भी कोई मतलब नहीं रहता कि यहाँ कितने नर नारी हैं। मगर ऐसी ही किसी महिला से घर में उसका पति दो ठुमके लगाने की फरमाईस कर दे या घरेलू उत्सव में नाचने के लिए कह दे तो क्या मजाल कि महिला अपनी कला दिखाने को तैयार हो जाये। संभव है पति को कुछ सुन कर अपने शब्द वापिस लेने पड़ें। बहुत मुश्किल होता है भई,अपनों के आनंद के लिए नाचना। कितना खटती है गृहणी। देर रात तक। दोनों एक साथ सोयेंगें। पति देर तक सोता रहे तो चलेगा, पत्नी को उठना ही पड़ेगा ,पौ फटने से पहले। कोई कानून नहीं है। ये तो मर्यादा है,कायदा है,संस्कार है। दो,चार ऐसी भी होगीं जो नहीं भी उठती। फिर भी घर चलते हैं। चलते रहेगें। मतलब ये कि ये सम्बन्ध वीणा की तारों की तरह है। अधिक कसोगे तो टूट जाते हैं और ढीला छोड़ दिया तो उनमे स्वर नहीं निकलते। इसलिए करवा चौथ भी तभी सार्थक होगी जब दोनों के दिलों में एक दूसरे के लिए अनुराग और विराग दोनों होंगे। ऐसा न हो कि ये कहना पड़े--" करवा चौथ का रखा व्रत, कई सौ रूपये कर दिए खर्च,श्रृंगार में उलझी रही, घर से भूखा चला गया मर्द।" शारदा कृष्ण की लाइन हैं--जेठ दुपहरी सा जीवन ये, तुम होते तो सावन होता। इन ठिठुरती सी रातों में ,थोडा बहुत जलावन होता। ---गोविंद गोयल

Saturday, 23 October 2010

रस्सी से घिस जाता पत्थर

बहती हो प्रतिकूल हवा, तुम शांत बैठ जाओ कुछ पल।
जब हवा थमे आगे चल दो,तेरी मुट्ठी में होगा कल।
तुम डटे रहो अपने पथ पर,रस्सी से घिस जाता पत्थर।
अथ धैर्यम शरणम् गच्छामि, भज ओशो शरणम् गच्छामि।
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लगता होगा बहुत बार,कुछ लोग नहीं सुनते तुमको।
घायल हो जाता अहंकार,दुःख पागल कर देता मन को।
मत कथा गढ़ो या चिल्लाओ,नूतन अनुरोध किये जाओ।
अनुरोधम शरणम् गच्छामि,भज ओशो शरणम् गच्छामि।
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ये पंक्तियाँ ओशो की है। मेरे मित्र नरेंद्र शर्मा ने मुझे दी। हम इनको जन जन पहुँचाने से अपने आप को नहीं रोक सके। उम्मीद है ओशो के अनुयायी इसे अन्यथा नहीं लेंगे।

Friday, 22 October 2010

छोड़ गया वह साथ

जब जब
जिस जिस को
रखना चाहा
अपने
दिल के पास,
तब तब
अकेला रहा
छोड़ गया
वह साथ।

Wednesday, 20 October 2010

साधू,संत,सैनिक कहाँ से आयेंगें

श्रीगंगानगर-- जोधपुर के राधाकृष्ण महाराज यहाँ आये तो नानी बाई का मायरा सुनाने थे। परन्तु इसके साथ साथ उन्होंने वो कह दिया जिसकी ओर अभी तक शायद ही किसी का ध्यान गया हो। राधाकृष्ण ने "हम दो हमारे दो" नारे पर बहुत अधिक क्षोभ प्रकट किया। उन्होंने मायरा सुनने आये नर नारियों की मार्फ़त देश से ये प्रश्न किया कि अगर ऐसा ही रहा तो हिन्दूस्तान में साधू,सैनिक और विद्वान् कहाँ से आयेंगे? अपने एक ही बेटे को कौन से माता पिता साधू या सैनिक बनना चाहेंगे। राधाकृष्ण के शब्दों में--हम दो हमारे दो और कोई आये तो धक्के दो। पति पत्नी और दो बच्चे, माता पिता से भी कुछ लेना देना नहीं। उनका कहना था कि हम बहुसंख्यक नहीं अल्पसंख्यक हो रहे हैं।लेकिन कोई इस बारे में सोचने को तैयार नहीं। उनके अनुसार परिवार नियोजन की नीति सबसे ख़राब नीति है।
राधाकृष्ण ने कहा कि नारी स्वतंत्रता की बातें बहुत होती हैं। बड़े बड़े सम्मलेन होते है। किन्तु कपड़ों के अलावा नारी की स्वतंत्रता कहीं दिखाई नहीं देती। एकता,स्वतंत्रता के नाम पर नारी को प्रदर्शन की वस्तु बना दिया गया है। घर में देवरानी-जेठानी एक नहीं होती। उन्होंने घूंघट को सौन्दर्य का संकोच बताया। उनका कहना था कि दायरे में रहने से कद बढ़ता है। आज कल पता ही नहीं लगता कि सास कौनसी है बहु कौनसी। उन्होंने कहा कि घर की बहू जेठ को देख कर घूंघट करती और जेठ उसको देख दूर से निकल जाता। ये था कायदा। इस से दोनों का कद बढ़ता। इसके बाद वे कहने लगे मैं कितना भी कहूँ रहना तो आपने वैसा ही है। राधाकृष्ण ने खेती के लिए बैल को सबसे उपयोगी बताया। उनका कहना था कि बैल से जुताई करने से खेत उपजाऊ होते हैं। उन्होंने अपने मायरे के दौरान प्लास्टिक की थैलियों का उपयोग ना करने का सन्देश दिया। राधाकृष्ण ने कहा कि कथा में आना तभी सार्थक होता है जब कोई उसे समझे,सीखे और माने। उन्होंने ने कहा कि रसोई में जो कुछ बनता है वह सब को मिलना चाहिए। परोसने में भेद भाव हो तो अन्नपूर्णा का अपराधी बन जाता है परोसने वाला। राधाकृष्ण ने यह सब किसी न किसी प्रसंग के समय कहा। हालाँकि कई बार उनकी बात विनोद के अंदाज में थी ,किन्तु निरर्थक नहीं। कथा कहने का उनका अंदाज जितना अनूठा है उतना ही निराला है उनका नृत्य। कथा के बाद जब नर नारी घरों को लौटने की जल्दी में होते हैं तब शुरू होता है उनका नाच। उनकी लम्बी छोटी से लेकर उनके पैरों का ऐसा नृत्य कि कोई भी कुछ क्षण के लिए अपने आप को भूल जाये। भक्ति भाव का नृत्य कैसा होता है उनसे सीखा जा सकता है। उनसे मुलाकात करने से पहले उनका नृत्य देखा होता तो ये जरुर पूछता कि महाराज आपने नृत्य किस से सीखा?
सहज,सरल और आडम्बर से दूर राधाकृष्ण की कथा में भी यह साबित हो गया कि मां के आँचल के अलावा सब जगह सब बराबर नहीं होते। इसका अहसास आयोजन से जुड़े व्यक्तियों को उन्होंने कई बार करवाया मगर भीड़ देखकर बोराए वे लोग बार बार वही करते रहे जो राधाकृष्ण महाराज को पसंद नहीं आ रहा था। उन्होंने कथा आरम्भ होने के कुछ मिनट बाद उनसे कहा, चलो आपके नए कुर्ते देख लिए बहुत अच्छे हैं, अब गैलरी से हट जाओ, जहाँ हो वहीँ बैठ जाओ। बाद में मंच पर चढ़ते हुए इनको कई बार रोका। नीचे उतारा। एक कार्यकर्त्ता को तो यहाँ तक कह दिया कि जब मैंने मायरे के लिए सामान ना लेने के लिए कह दिया था तो क्यों इकट्ठा कर रहे हो, वापिस करो। एक महिला को उन्होंने आवाज देकर उसका सामान वापिस किया। उन्होंने इशारों इशारों में कार्यकर्ताओं से विशिष्टता न दिखाने को कहा, संकेत दिया। इसके बावजूद कोई खास असर देखने को नहीं मिला। आयोजन जबरदस्त था। पुरुषो की संख्या नारियों से एक चौथाई रही। ये आश्चर्यजनक था कि महिलाओं ने कथा के दौरान आपस में बात चीत नहीं की। सबका ध्यान व्यास गद्दी की ओर ही रहा।
कृपा शंकर शर्मा "अचूक" की लाइन हैं --मंजिले हैं कहाँ यह पता कुछ नहीं,सिर्फ आदी हुए लोग रफ़्तार के। जिंदगी एक पल में संभाल जाएगी, गर समझ लें सलीके जो व्यवहार के। ---

Tuesday, 19 October 2010

मुलाकात महाराज राधाकृष्ण से


शायर मजबूर की पंक्तियाँ हैं--"सीधे आये थे मेरी जां, औन्धे जाना, कुछ घड़ी दीदार और कर लूँ।" उन्होंने ये संभव तय किसी प्रेम करने वाले के लिए लिखी हों। हम तो इनको "नानी बाई रो मायरो "सुनाने आये राधा कृष्ण महाराज के साथ जोड़ रहे हैं। श्रीगंगानगर में पहली बार मायरा हो रहा है। छोटे बड़े कथा वाचक महंगी गाड़ियों में आते हैं या उनको लाना पड़ता है। परन्तु राधाकृष्ण जी तो खुद ही पैसेंजर गाड़ी से यहाँ पहुँच गए, बिना किसी आडम्बर और दिखावे के।नगर भर में लगे पोस्टर,होर्डिंग में क्यूट से दिखने वाले महाराज जी से मिलने की इच्छा हुई। बिना किसी मध्यस्थ के उनसे मिला,बात की। वे केवल २७ साल के अविवाहित युवक हैं। वे कहते हैं कि शादी की इच्छा नहीं है, अगर ठाकुर जी की मर्जी हुई तो बात अलग है। उनका मानना है कि अगर बचपन में ही सत्संग मिल जाये तो देश की किशोर और युवा पीढ़ी पथभ्रष्ट नहीं हो सकती। महाराज जी जोधपुर के हैं और इनके पिता अनाज का कारोबार करते हैं। जिसमे इनका छोटा भाई सहयोग करता है। तीन बहिन हैं जो अपने अपने ससुराल में सुखी हैं। राधाकृष्ण कहते हैं कि घर में मैं महाराज नहीं होता। पुत्र और भाई होता हूँ। जैसे आप रहते हैं मैं भी वैसे ही रहता हूँ। कथा में माता-पिता आये हों और वे व्यास गद्दी पर आकर आपकी चरण वंदना करें तो ! ऐसा नहीं होता। मैं उनको प्रणाम करके कथा शुरू करता हूँ। फिर भी ऐसा हो तो वे उनके भाव हैं। मेरे भाव तो यहीं हैं कि ऐसा ना करें। उन्होंने बताया, स्कूल कॉलेज की शिक्षा तो कोई खास नहीं है। साधू संतों के श्रीमुख से जो सुना वही सुनाता हूँ। एक पुस्तक भी लिखी है। श्रीमदभागवत और मायरा करते हुए सालों बीत गए। पहली बार तीन व्यक्तियों के सामने कथा की। अब यह संख्या हजारों में होती है।
महाराज जी ने कहा कि नानी बाई कोई काल्पनिक पात्र नहीं है। यह सच्ची कथा है। इसे आम बोल चाल की भाषा में सुनाता हूँ तो सबके मन में बस जाती है, रस और भाव आते हैं। कथा में कोई चुटकुले,टोटके किसी प्रसंग को समझाने के लिए इस्तेमाल हों तो ठीक। केवल हंसाने के लिए हो तो अच्छा नहीं माना जाता।
राधाकृष्ण ने कहा कि मैं तो एक आम आदमी ही बना रहना चाहता हूँ। विशिष्ट नहीं बनना मुझे। विशिष्ट होने के बाद कई झंझट गले पड़ जाते हैं। राधाकृष्ण गौड़ ब्राहम्ण परिवार से हैं। खानदान में इनके अलावा कोई और इस लाइन में नहीं है। घर के पास मंदिर था, वहां जाया करता था। मन कृष्ण में ऐसा लगा कि बस इसी में राम गया। वे कहते हैं , यह मेरा व्यवसाय नहीं सेवा है। कथा करने का कुछ भी नहीं लिया जाता। अगर कोई देता भी है तो वह जन और गाय की सेवा में लगा देते हैं। मुलाकात के लिए उन्होंने काफी लम्बा समय दिया मगर उनका मोबाइल फोन इसमें से कुछ भाग ले गया। उनकी फोन पर बात चीत से ऐसा लगा कि अप्रैल तक उनके सभी दिन बुक हैं। कहीं श्रीमदभागवत है कहीं नानी बाई का मायरा। जोधपुर में २१-२२ अक्टूबर को कोई बड़ा कार्यकर्म करने की योजना भी है। राधाकृष्ण पहली बार श्रीगंगानगर आये हैं। उनका कहना था कि श्रीगंगानगर में मायरा करने में आनंद ही आनंद होगा ऐसा पहले दिन की भीड़ से लगता है। नर नारी कथा को भाव से सुनने के लिए आये थे। बातें बहुत थी। मगर यहाँ इतना काफी है। रमा सिंह की लाइन है--मैं तुझमे ऐसी रमी, ज्यों चन्दन में तीर, तेरे-मेरे बीच में, खुशबू की जंजीर। किसी कवि की दो लाइन महाराज जी के लिए--" शख्स तो मामूली सा था, दुनिया जेब में थी, हाथ में पैसा न था। ----गोविंद गोयल