Friday, 28 January 2011

कुनर का पत्र बोर्डर खोलने के लिए



जयपुर-राजस्थान के कृषि विपणन मंत्री गुरमीत सिंह कुनर ने केन्द्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री आनंद शर्मा को पत्र लिख कर श्रीगंगानगर जिले के हिन्दुमलकोट बोर्डर से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार आरम्भ करने की सुविधा प्रदान करने का आग्रह कियाहै। श्री कुनर ने अपने पत्र में श्री शर्मा को बताया है कि भारत-पाक सीमा पर स्थित हिन्दुमकोट ग्राम आजादी से पूर्व व्यापार का एक प्रमुख केंद्र था। कपास मंडी के रूप में इसकी दूर दूर तक पहचान थी। आजादी के बाद कारोबार जगत की प्रमुख मंडी एक ग्राम बन कर रह गई। श्री कुनर का कहना है कि श्रीगंगानगर जिले में नरमा,कपास,गेंहू,मुंग,मोठ,सरसों,मूंगफली आदि फसलों का उत्पादन बहुत बड़ी मात्रा में होता है। यहाँ की कृषि जिंसों का निर्यात पाकिस्तान को लगातार हो रहा है। लेकिन इनका निर्यात अन्य स्थानों से होता है इसलिए परिवहन व्यय की वजह से इनकी कीमत बढ़ जाती हैं। श्री कुनर ने केन्द्रीय मंत्री को बताया कि मुनाबाब-खोखरापार मार्ग व बाघा चौकी से दोनों देशों के बीच व्यापार आरम्भ होने के बाद से राजस्थान और पंजाब में कारोबार बढ़ा है। श्री कुनर ने पत्र में कहा है कि यदि हिन्दुमलकोट बोर्डर व्यापार के लिए खोल दिया जाये तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर श्रीगंगानगर में उत्पादित कृषि जिंसों का कारोबार बहुत अधिक बढ़ जायेगा। जिस से इलाके के किसान और व्यापारी लाभान्वित होंगे। श्री कुनर ने श्री शर्मा से इस बारे में जल्दी कार्यवाही करवाने का आग्रह किया है।

Thursday, 27 January 2011

अधिकारियों का समूह चित्र

श्रीगंगानगर--चार दशक पहले प्राइमरी स्कूल में पांचवी की अंतिम परीक्षा से पहले चौथी कक्षा के विद्यार्थियों ने पांचवी को विदाई पार्टी दी। उस दिन पांचवी के विद्यार्थियों ने मास्टरों के साथ समूह चित्र खिंचवाया। क्योंकि पांचवी के बाद सब यहाँ से चले जाने थे। कौन कहाँ जायेगा,फिर मिलेगा या नहीं? इसलिए चित्र के लिए सभी में उत्साह था। ताकि याद बनी रहे। ऐसा ही दृश्य गणतंत्र दिवस पर कलेक्टर की कोठी पर उस समय साकार हो गया जब सभी प्रशासनिक अधिकारियों ने कलेक्टर के साथ ग्रुप फोटो खिंचवाया। इसके लिए अधिकारियों को बुलाया गया। ज्याणी जी को आवाज लगाकर एक अधिकारी बोला, ज्याणी जी के बिना सब अधुरा है। इनमे फोटो के लिए ठीक वैसा ही जोश देखने को मिला जो पांचवी के बच्चों में था। ये तो फोटो खिंचवाने वाले जाने या सरकार कि कौन कौन विदा होने वाला है!

इस बार कलेक्टर के यहाँ कांग्रेस का कोई नेता,कार्यकर्त्ता नहीं पहुंचा। उनमे से भी कोई नहीं जो शादी के जश्न में इन्ही अधिकारियों की मेजबान के रूप में आव भगत में लगे थे। कांग्रेस का कोई धड़ा नहीं था। यूँ लगा जैसे समारोह का अघोषित बहिष्कार कर रखा हो। पूर्व,वर्तमान जिला प्रमुख को गिनती में शामिल ना करें तो बीजेपी का भी कोई बंदा नहीं था। यह अचरज की बात थी। निर्दलीय सभापति के साथ एक दो पार्षद आ गये थे बस। हर बार कलेक्टर ,वीआईपी सोफे पर बैठते हैं। जानकर लोग सोफे के आस पास वाली कुर्सियों पर कलेक्टर के आने से पूर्व ही बैठ जाते हैं। इस बार भी यही हुआ। किन्तु इस बार कलेक्टर उनसे अधिक चतुर है। वे सोफे पर बैठने की बजाये खड़े ही रहे। लोग अपने साथ लाये फोटोग्राफरों से कलेक्टर के निकट खड़े होकर फोटो उतरवाते रहे। एस पी साहब आये नहीं अभी इसलिए उनका ज़िक्र तब जब वे आ जायेंगें। फ़िलहाल तो डिप्टी राजेन्द्र सिंह कलेक्टर के लाडले बने हुए हैं। यूँ दीक्षा कामरा भी हैं। लो एस पी भी पहुँच गए। बदन पर पठानी सूट, पैरों में तिल्ले वाली पीली जूती। कोई कह ही नहीं सकता था कि ये इनोसेंट दिखने वाला सिख नौजवान श्रीगंगानगर जैसे जिले का एस पी है। उनके आने तक आधे से अधिक लोग जा चुके थे। कलेक्टर ने उनके साथ जलपान लिया। एक बात और अधिक हैरान कर देने वाली थी। वह यह कि इस बार कांडा बंधू नहीं आये। अशोक गहलोत के झटके का असर है या कोई जरुरी काम आन पड़ा। मनिन्द्र कौर नंदा यह बताना नहीं भूलती थी कि वे एक माह कि विदेश यात्रा करके आई हैं। श्री कृष्ण लीला एंड कंपनी को पहली बार देखा गया। वे दो अम्बुलेंस कलेक्टर की मार्फ़त जनता का समर्पित करवाने आये थे। कलेक्टर के झंडी दिखाते ही वे वहां से चले गए। कलेक्टर के साथ एक झंडी डीवाईएसपी राजेन्द्र सिंह के हाथ में भी थी। अचानक सभापति भी आ गए। राजेन्द्र सिंह ने अपनी झंडी उनको पकड़ा डी। इसके साथ ही फोटो में कई चेहरे बढ़ गए। गणतंत्र और स्वतन्त्र दिवस के मुख्य समारोह के बाद कलेक्टर निवास पर जलपान समारोह होता है। झंडा फहराने के लिए कोई मंत्री आया हो तो यहाँ आने वालों की संख्या अधिक होती है। समारोह में कौन आ सकता है,कौन नहीं? किसको किस कारण से निमंत्रण दिया जाता है। इस बारे में कुछ खास नहीं मालूम। हैं ये पता लगा है हर बार पुरानी लकीर पीटी जाती है।

Tuesday, 25 January 2011

सम्मान! मगर किस बात का

श्रीगंगानगर--प्रशासन के छोटे -बड़े वे बाबू इसे अपने दिल पर ना लें जो मन,कर्म,वचन से भ्रष्ट आचरण से बचने की कोशिश में लगे रहते हैं। भ्रष्टाचार कभी का शिष्टाचार बन कर सिस्टम का जरुरी हिस्सा मान लिया गया है। आज २६ जनवरी है। गणतंत्र दिवस है। वह संविधान लागु हुआ जो राजनेताओं की वोटों की लालसा के चलते बार बार संशोधित होता रहा है। इसी दिन प्रशासन उन लोगों को सम्मानित करता है जिन्होंने उल्लेखनीय कार्य किया हो। प्रशासन हर साल जिनको यह सम्मान देता है उनमे अधिकांश उसके अपने सरकारी कर्मचारी होते हैं। इस बार ३८ में से २१ प्रशासन के अपने हैं। कोई ये पूछने वाला नहीं कि इन्होने ऐसा क्या किया जिसके लिए इनको सम्मान के लायक समझा गया। सरकार का जो काम ये करते हैं उनकी तनख्वाह लेते हैं। जिसकी सेलरी लेते हैं उसका काम करना ही पड़ेगा। सरकारी काम के अलावा इन सम्मानित कर्मचारियों ने समाज,राज्य,देश के लिए क्या उल्लेखनीय,वन्दनीय,सराहनीय कर्म किया? अगर है तो फिर प्रशासन ही क्यों उसको तो हर स्थान पर सम्मान मिलना चाहिए।हर साल यही होता है। बारी बारी से सभी कर्मचारी सम्मानित हो जाने हैं। कितनी हैरानी की बात है कि इतने बड़े जिले में प्रशासन को केवल अपने कर्मचारी ही क्यों नजर आते हैं? जिले में अनेक प्रकल्प समाज के लिए चलाये जा रहे हैं। परिवार अपने परिजनों की मृत देह का संस्कार करने की बजाये शिक्षा के लिए उसको दान कर इस बात को झूठा साबित करने में लगे हैं की मरने के बाद आदमी किसी काम का नहीं रहता। मतलब पशु से भी गया बीता है। ये तो बस उदाहरण हैं। प्रशासन तो बहुत कुछ पता करवा सकता है। किन्तु वह अपने तालाब से बाहर निकले तभी ना।

निहाल हो गया-- गौड़ साहब के तीन ख्याल, बनवारी,जे पी ,शिवदयाल। शिवदयाल पहले निहाल हो चुका है।

Wednesday, 19 January 2011

प्याज की तकदीर

--- चुटकी---

देश में
कैसे कैसे
वजीर,
प्याज की भी
बदल गई
तकदीर।

Friday, 7 January 2011

"सुलट" जाने के ख्वाब पर मुस्कान की बर्फ
जयपुर--सचिवालय,मीडिया , राजनीतिक गलियारों के साथ चाय की थडियों पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की मुस्कान के चर्चे हैं। एक पखवाड़े से जिस गुर्जर आन्दोलन ने सरकार के अस्तित्व को लगभग नकार दिया था वह समाप्त हो गया। विरोधी श्री गहलोत के सुलट जाने के सपने देख रहे थे। उनके सपने हकीकत का रूप नहीं ले सके। मुख्यमंत्री की बल्ले बल्ले हो गई। जयपुर से दिल्ली तक आशंका थी कि ये हो जायेगा। वो हो जायेगा। गहलोत विरोधी इसी ये हो जाये,वो हो जाये की इंतजार में थे। दिल्ली में बैठे गहलोत के राजनीतिक विरोधी आलाकमान के कान भरने को उतावले थे। वो नहीं हुआ जो गहलोत के विरोधी चाहते थे। वह हुआ जो मुख्यमंत्री गहलोत चाहते थे। कड़ाके की ठण्ड के बावजूद सचिवालय में गुर्जर नेता और सरकार गर्मजोशी से मिल रहे थे। जैसे जैसे सूरज अस्त होने लगा। सर्दी का प्रकोप बढ़ा। समझौते की गर्मी बाहर महसूस होने लागी थी। मीडिया कर्मियों ने सुलह पर दोनों पक्षों के दस्तखत होने से पहले ही सब कुछ शांति से निपट गया कहना आरम्भ कर दिया था। जैसे ही सुलह की अधिकृत घोषणा हुई। मुख्यमंत्री को बधाई मिलनी आरम्भ हो गई। श्री गहलोत हलकी मुस्कान के साथ बधाई स्वीकार करते रहे लगातार। कहीं कोई अहंकार नहीं। ना वाणी में ना चलने,उठाने,बैठने में। जो राजनीतिक आन्दोलन में गहलोत के निपट जाने के चर्चे चुपके चुपके करते थे, वे चुप हो गए। लाठी,गोली चलाये बिना आन्दोलन समाप्त करवा कर गहलोत आलाकमान की नजर में हीरो बन गए। उनको बैकफुट पर जाना पड़ा जो फ्रंटफुट पर आने की तैयारी में लग गए थे। हालाँकि श्री गहलोत कब क्या करेंगे कहना मुश्किल है किन्तु अब वे मंत्री परिषद् में फेरबदल, राजनीतिक नियुक्तियां अधिक ताकत से करने में सक्षम होंगे। ऐसा राजनीतिक हलकों में माना भी जा रहा है और लग भी ऐसा ही रहा है। कांग्रेस में अशोक गहलोत मजबूत थे। अब आन्दोलन को शांति पूर्ण तरीके से निपटा कर वे और अधिक मजबूत हुए हैं इसमें कहीं किसी का किन्तु परन्तु नहीं है। बिल्ली को देखकर कबूतर आँख बूंद ले तो अलग बात है।

जयपुर के श्री गहलोत की चर्चा के बाद श्रीगंगानगर के "गहलोत" का ज़िक्र ना करें तो ठीक नहीं। एक कार्यकर्त्ता के बेटे का पुलिस वाले ने चालान क्या किया कि गौड़ साहेब पहुँच गए मौके पर। गौड़ साहेब ने तो अपने बन्दे के लिए ठीक किया। राजनीतिक,प्रशासनिक गलियारों में इसको गलत कदम कहा जा रहा है। एक बड़े पुलिस अधिकारी की तो ये टिप्पणी थी " अरे! गौड़ साहेब तो हर जगह पहुँच जाते हैं"। कहने वाले कहते हैं कि गौड़ साहेब को जाने की जरुरत नहीं थी। एस पी को फोन करके पुलिस वाले को वहां से हटवा देते, बात ख़तम। चालान का क्या। वह तो सौ,दो सौ में नक्की हो जाता। पब्लिक रोज ही करवाती है। एक दिन उनका कार्यकर्त्ता करवा लेता तो क्या हो जाता। यूँ भी गौड़ साहेब, उनका चेयरमान कार्यकर्त्ता किसी पुलिस अधिकारी को फोन कर देते तो वह खुद रसीद कटवा कर घर भेज देता। ज़िक्र चल ही निकला तो एक और कर लेते हैं। गौड़ साहेब ने केसरी चाँद जांदू को सी ओ सिटी लगवाने के लिए डिजायर दी। गंगाजल मील ने श्री जांदू की डिजायर सूरतगढ़ के लिए दी। श्री जांदू की नियुक्ति सूरतगढ़ के लिए हो गई। अशोक मीणा की तो कोई डिजायर गई ही नहीं।