Thursday, 8 November 2012

भगवानों की बिक्री का सीजन है ये......सच्ची


श्रीगंगानगर-भगवान की बिक्री का सीजन है इन दिनों। भगवान इसका हो, उसका हो, किसी का हो, सब बिकेंगे। दुकान दुकान बिकेंगे। चौराहों पर सेल लगेगी। आवाज लगा लगा कर बेचे जाएंगे। गरीब का छोटा भगवान। अमीर का बड़ा भगवान। हर साइज का। हर कीमत का। सस्ते से सस्ता और महंगे से महंगा भगवान। जैसी जिसकी जेब उसी प्रकार का भगवान। कागज का भगवान। साधारण फ्रेम में लगा भगवान। महंगे डिजायन वाले फ्रेम में सजा भगवान। सोने -चाँदी का बड़े बड़े वैभव शाली शो रूम में बैठा  भगवान। सब के सब बिकाऊ। भांति भांति के भगवान। अलग अलग रूप धरे भगवान। कोई देवी के रूप में तो कोई गुरु के रूप में। जिसकी जैसी चाह वैसा भगवान उपलब्ध है इस बाजार में। गरीबों का भगवान हाथ ठेलों पर इधर उधर गलियों में आवाज लगाकर बेचा जाता है। अमीरों के भगवान सजे बैठे रहते हैं बड़े बड़े सौ रूम में,उनको खरीदने उनके पास जाना पड़ता है। दुकानों पर पैरों में पड़े हैं हमारे भगवान बिकने के लिए। जूते लगें या झूठे सच्चे हाथ,तब भी कोई फर्क नहीं पड़ता भगवान को। मन के काले व्यक्ति खरीदें या मन के उजले,कोई अंतर नहीं इस भगवान के। जिसने खरीदा उसके साथ उसे जाना ही है। जब तक नहीं बिकता तब तक उसे यहाँ वहाँ जहां मर्जी हो पटक दिया जाता है। उसके साथ कैसा भी व्यवहार हो कोई दंगा नहीं भड़कता। किसी की आस्था पर चोट नहीं लगती। धार्मिक से धार्मिक व्यक्ति की भावना आहात नहीं होती। कोई भगवान को खरीद हाथ में ले जाता है कोई बड़ी गाड़ी में। कोई रिक्शा में अपने पैरों के पास रख ले जाता है। किसी को कुछ नहीं कहता। ये भगवान होता ही ऐसा है। बिकाऊ जो है। जो बिकने के लिए बाजार में आ गया उसकी क्या तो आत्मा और क्या उसका स्वाभिमान। कीमत लग गई तो फिर काहे की शर्म। बस, जैसे ही यह भगवान,दुकान,फैक्ट्री,ऑफिस या धर्मस्थल में स्थापित हो जाता है। तब यह किसी के बस में नहीं रहता। तब यह भगवान हो जाता है। गुरु हो जाता है। सच्ची का भगवान। जीता जागता गुरु। उसके बाद किसी की मजाल नहीं कि कोई उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाए। उसका अपमान करे। निरादर करे। प्रलय हो जाएगी। धर्म पर हमला मान कत्ले आम भी हो जाए तो कोई बात नहीं। यही है इस भगवान की करामात। जब तक बाजार में बिकाऊ था, निर्जीव रहा। सभी के सभी बरताव सहन किए। जैसे ही उसे स्थापित किया वह सिर चढ़ कर बोलने लगा। यही है असली भगवान। जब बिका तब मिजाज कुछ और जब सजा तब कुछ और। इंसान का मिजाज भी तो ऐसा ही है। स्थापित होते ही स्वभाव बदल जाता है। फिर वह चाहे इंसान के द्वारा गढ़ा,बनाया भगवान हो या भगवान के द्वारा बनाया गया इंसान। सच कहता हूँ ....हमारे तराशे हुए पत्थर मंदिर में भगवान बने बैठे हैं।

Saturday, 3 November 2012

गुलाब की तरह थे करवा चौथ पर पतियों के चेहरे


श्रीगंगानगर-दोस्त की मैडम 24 घंटे में से कुछ घंटे ही बिना मेकअप के रहती है। सजी संवरी  गुड़िया सी  लगभग हर समय। दोस्त घर में हो या ना हो, उसने तो बनी ठनी रहना है। बीस सालों में आज तक दोस्त को ये नहीं पता कि वो अधिक सुंदर कैसे दिखती है। मेक अप के या बिना मेक अप के। हर रोज एक सा वातावरण। कल भी वैसी ही थी। करवा चौथ पर भी वैसी की वैसी। बस कपड़ों का रंग थाओड़ा बहुत बदला होगा। । कुछ तो डिफरेंट होना ही चाहिए। तो जनाब! बीबी किसी  की कैसी भी हो पति को सजी संवरी ही अच्छी लगती है। आँखों को लुभाती है। मन को भाती है। ये किसी  एक पति  की चाहत नहीं सभी की है। करवा चौथ पर सभी पतियों के चेहरे गुलाब के फूल की तरह खिले हुए थे। मन में उमंग और आँखों में शरारत थी। जैसे उल्लास टपक रहा हो।  साइकिल के कैरियर पर सिंगरी बैठी पत्नी करवा चौथ पर पति को जरा  भी भारी नहीं लगी। पत्नी को इस रूप में देख वह आनंदित था। पिंक कलर की ड्रेस में,हाथ पांव में मेहँदी लगाए कई बच्चों की माँ के बावजूद पत्नी के साथ पैदल जाते हुए भी पति की निगाह उसी की तरफ थी। यह उसका चाव था अपनी  पत्नी के लिए। उम्र अर्थ हीन  है। करवा चौथ पर बाइक पर बैठी चारमिंग पत्नी का कमर,कंधे और पैर पर रखा हाथ उसे बोझ लगने की बजाए सुकून प्रदान कर रहा था। महंगी- सस्ती गाड़ी में मेकअप से लक दक  ओवरवेट पत्नी को घुमाते हुए पति को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे शादी अभी अभी हुई हो। ये भाव है सभी पतियों के। सभी पति अपनी पत्नी को इसी प्रकर डॉल बनी हुई देखना पसंद करते हैं। बीबियों का यही रूप पतियों को प्रफुल्लित करता है। करवा चौथ पर तो सजना ही था सजना के लिए। वरना हर रोज वही नून तेल,रसोई,बच्चे साथ में चिक चिक। बेशक करवा चौथ पर पति की जेब ढीली हुई। इसके बावजूद सभी के चेहरों पर रंगत थी। इसकी वजह थी पत्नी का सजना संवरना। रोज तो ऐसा मुमकिन नहीं। इसलिए पत्नी का इस दिन का रूप आँखों में बसा दूसरी करवा चौथ का इंतजार करता है पति। ऐसा नहीं कि इस बीच पत्नी पूरा साल सूगली रहती है। सजती है कहीं जाना हो तो। संवरती भी है पीहर जाने के लिए और दूसरे वार त्योहार पर । परंतु जो करवा चौथ पर सजना होता है उससे सजना ऊपर से चाहे ना खुश हो अंदर खूब खुशी महसूस करता है। अब जो रोज ही सजी रहे वह अपने अपने पति को कैसी लगती है यह  दोस्त से पूछना पड़ेगा। करवा चौथ के उपलक्ष में दो लाइन पढ़ो....पहले मुझसे नजर उतरवाना,चांद देखने बाद में जाना।

Friday, 2 November 2012

करवा चौथ पर बेबस और मजबूर होता है पति


श्रीगंगानगर- शादी के बाद पहली करवा चौथ। हल्की मीठी ठंड। पत्नी तड़के उठी। बरतनों की खटर पटर हुई। अलसाए पति ने पूछ लिया,”क्या हुआ इतनी जल्दी?” पत्नी पंजबान थी। उसी स्टाइल में जवाब दिया, “तेरा ई मरना कड़ दी पई आं।“ पति  ऑफिस जाने के लिए तैयार हुआ। पत्नी को लुभाने वाली शर्ट पहन ली। देखा तो एक बटन टूटा हुआ। पत्नी से बटन लगाने को कहा। सोचा फिल्मी हीरोइन की तरह बटन लगाएगी। धागा मुंह से तोड़ेगी। रोमांस हो जाएगा। किन्तु ख्वाब पर करवा चौथ का व्रत गिर गया। पत्नी बोली,”आज मेरा व्रत है। सुई हाथ में नहीं लेनी। या तो खुद लगा लो या दूसरी शर्ट पहन लो। तुम भी ना मुझे तंग करने के बहाने ढूंढते हो। तुम्हें पता होना चाहिए मेरा व्रत है।“ करवा चौथ के व्रत के दिन सबसे अधिक दुर्दशा किसी प्राणी की होती है तो वह है पति। मीडिया चाहे किसी भी प्रकार का हो,इस दिन या इससे पहले केवल पत्नी के बारे में ही लिखता और दिखाता है। उनको खर्च करने के तरीके बताता है। ऐसे सजो। ये खरीदो। ये पहनो। पति कुछ चूँ चपर करे तो पत्नी बोल देती है,ये सब आपके लिए तो कर रही हूं। आपकी लंबी उम्र के लिए। आपकी सेहत के लिए। खुशहाली के वास्ते। सीधे नहीं कहती कि मुझे सारी उम्र सोलह सिंगार  करने है। सेहत इसलिए कि कहीं ये मुस्टंडा बीमार हो गया तो पैसे भी खर्च होंगे, सेवा करनी पड़ेगी वह अलग से। खुशहाली! पति खुशहाल तो पत्नी की पो  बारह पच्चीस। पति के नाम पर खुद के लिए सब कुछ।  यूं लगता है जैसे पति बलि का बकरा हो। तड़के पेट भरा। बाद में सिंगरी।  बनी-ठनी कभी उसकी पत्नी से बात की कभी इसकी। खूब उल्लास और उमंग होती है। रात तक भूखी! जैसे ही पति के घर आने का समय हुआ। चेहरे पर भूख के भाव आ गए। पत्नी की ऐसी सूरत देख पति को दया आएगी ही। क्योंकि पति तो  बचपन से ही दयालु किस्म का जीव होता है। वह भी तभी भोजन करेगा जब पत्नी करेगी। मेरा एक दोस्त तो पत्नी के लिए खुद भी करवा चौथ का व्रत रखता है। मजबूरी है। क्योंकि उस दिन वह खाना बनाने से इंकार कर देती है। सजावट बिगड़ने का डर  जो  होता है। दूसरा, शाम को पत्नी को उसकी हेल्प मिल जाती है। पति की इतनी कुर्बानी के बावजूद हर कोई पत्नियों की बल्ले बल्ले करता है। विश्व में शायद ही कोई उदाहरण हो जिसमें पति नामक जीव की आर्थिक,मानसिक प्रताड़ना के बावजूद उसे  ये कहा जाए कि मेरी जां, ये सब किसके लिए! आप ही के लिए तो है! वैरी गुड। वैरी नाइस! ये तो वही बात हुई, जो कुछ पड़ा,रखा ढका सब आपका,लेकिन हाथ किसी को नहीं लगाना। जिनकी पत्नियाँ कमाती हैं उनके बारे में कुछ नहीं। वे तो बस चुप चाप  देखते हैं। बोले तो यही जवाब मिलेगा,”आपसे तो कुछ नहीं मांगा। खुद कमाती हूं।“ हो गई करवा चौथ। इसे ठीक इस प्रकार समझा जा सकता है। पत्नी सरकार है और पति जनता। सरकार जनता के कल्याण के नाम से जनता को ही भांति भांति से लूटती है ना! बस तो! सेम टू सेम। दो लाइन पढ़ो... करवा चौथ की अकड़ दिखाएगा, तो बची खुची शान से भी जाएगा,इसलिए हे पति! शर्म ना कर, रोज की तरह आज भी पत्नी से डर।

Thursday, 1 November 2012

धर्म की चादर में लिपटा कुछ और ही है ये


श्रीगंगानगर- आधी रात का समय....दूर बहुत तेज आवाज में ईश्वर की आराधना । रात के सन्नाटे में यह आराधना मन को बजाए सुकून देने के दिमाग की नशों में झिंझोड़ रही हैं। बेशक धर्म के बारे में अधिक नहीं जानता। अध्यातम को बहुत कम समझता हूं। धर्म स्थल पर भी कभी कभार ही जाना होता है। इसके बावजूद सौ प्रतिशत धार्मिक हूं।  पूरी तरह आस्तिक हूं। हर स्थान पर ईश्वर की सत्ता को मानता हूं। ईश्वर के अस्तित्व को दिल से स्वीकार भी करते हैं। सभी कहते हैं कि कोई भी धर्म किसी को भी किंचित मात्र दर्द,परेशानी,तकलीफ नहीं देता। जो देता है, वह धर्म हो ही नहीं सकता। वह केवल और केवल धर्म की चादर ओढ़े कुछ और ही  होगा। धार्मिक अनुष्ठान परिवार की सुख शांति,खुशी,उपलब्धि के लिए ही करवाया जाता है। ईश्वर,चाहे उसका रूप कैसा भी हो, वह तभी प्रसन्न होगा, जब उस अनुष्ठान से किसी को भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कोई दिक्कत न हो। अब जो तेज आवाज दूर दूर तक गूंज गूँजती है, उससे कितने ही परिवारों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। कोई बच्चा सो नहीं पाता। किसी बुजुर्ग ने अभी ट्राइका की गोली ली थी, वह बेकार हो गई। किसी को पढ़ना है। कोई तीन घंटे नींद ले अपने काम पर जाएगा। कोई थक कर अभी लेटा ही था कि स्पीकर का शोर कानों से होता हुआ दिमाग को खट खट करने लगा।  सड़क पर टैंट लगा कर आने जाने का रास्ता बंद कर दिया गया। गली में छोटे बड़े वाहन खड़े हैं। किसी के घर का गेट रुक गया। एक परिवार की सुख शांति के लिए पूरे मोहल्ले की शांति जाती रही। आयोजक क्या सोचते हैं कि मोहल्ले वाले उनको दुआ दे रहें होंगे कि बहुत बढ़िया...क्या कहने....ईश्वर  हर रोज इस सड़क पर हर रात इस प्रकार के आयोजन करवाए। गलत...सौ प्रतिशत गलत। कोई दुआ नहीं देता। हर कोई अंदर ही अंदर परेशान होता है। किन्तु बोलता नहीं। डरता है, अपने आप से नहीं तो उससे जरूर जिसके यहां आयोजन है। उससे नहीं तो समाज से। समाज का डर नहीं भी लगता तो  शिकायत कर बुरा बनने का डर तो लगता ही है। इतना ही नहीं जो इस संबंध में बोले वही धर्म का दुश्मन। एक नंबर का नास्तिक। कोई उसकी भावना को नहीं समझेगा। कोई ये जानने की कोशिश नहीं करेगा कि असल में रात को इस प्रकार के आयोजन से सच में कितने ही लोगों को जबरदस्त मानसिक परेशानी से दो चार होना पड़ता है। अब जिससे किसी को परेशानी हो वह धर्म तो नहीं हो सकता। कोई माने चाहे ना माने। धर्म तो वह जो मन के संताप को हर ले। धर्म तो वह जो मानसिक शांति प्रदान करे। असली धर्म तो वही जो इंसान को दूसरों के प्रति दया करना सिखाए। उसकी परेशानी को कम करे। परंतु इससे किसी को क्या मतलब। हमने तो धर्म करना है। चाहे उसका तरीका कितना ही अधार्मिक,अनैतिक,दूसरों को पीड़ा दायक ही क्यों ना हो। आयोजन किसी को जान बूझकर  परेशान करने के लिए नहीं होते। बस, थोड़ी अनदेखी दूसरों के लिए परेशानी बन जाती है। कोई ये सोच ले कि अगर ऐसा दूसरा करता तो उसकी टिप्पणी क्या होती? इतने से ही सब ठीक हो जाए। क्योंकि उसके बाद वह लाउडस्पीकर की आवाज अधिक ऊंची नहीं करेगा। साथ में इस बात का भी ध्यान रखेगा कि वाहन से किसी के घर का गेट या सड़क ना रुके। इतना करने मात्र से ही आनंद अधिक जाता है।  सब की परेशानी भी समाप्त।  “कचरा” पुस्तक की लाइन है...लंगर हमने लगा दिये जीमे कई हजार, भूखे को रोटी नहीं ये कैसा धर्माचार।



Sunday, 28 October 2012

रात को बीमार होने का हक नहीं तुझे....समझे!


श्रीगंगानगर- रात को लगभग सवा नौ बजे का समय होगा। डॉक्टर के पास रोगी को लाया गया। रोगी लंबे समय से इसी डॉक्टर से ईलाज करवा रहा था। डॉक्टर की मैडम ने दरवाजा खोलते ही कह दिया कि डॉक्टर साहब तो घर नहीं है। रोगी की हालत गंभीर...नर्सिंग होम पहुंचे...कोई फायदा नहीं....दूसरे हॉस्पिटल आए...नर्सिंग स्टाफ ने जांच कर डॉक्टर से बात की....डॉक्टर ने उसे दूसरे के पास जाने की सलाह दी। नर्सिंग स्टाफ क्या करता! उसने रोगी के परिजनों को बता दिया। गंभीर रोगी को फ़र्स्ट एड देने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था। वह कोई वीआईपी थोड़े था।  तीसरे डॉक्टर के पहुंचे। वह भी नहीं....आखिर किसी को फोन करके एक नर्सिंग होम संचालक से आग्रह  किया गया। उसने बहुत बड़ा अहसान करते हुए ईलाज शुरू किया। किसी डॉक्टर को इस बात का अंदाजा कि इस पूरी प्रक्रिया में रोगी के परिजनों के दिलों पर क्या बीती होगी? जीवन-मौत तो ईश्वर के हाथ है लेकिन डॉक्टर कुछ प्रयास तो करे। किसी ने कहा हमारे यहां ये सुविधा नहीं। किसी ने बोल दिया डॉक्टर नहीं। आदमी मरे तो मरे डॉक्टर का क्या जाता है! रात को किसी आम आदमी के लिए ना तो डॉक्टर आएगा। ना मरते हुए इंसान को कोई फर्स्ट एड देने की कोशिश होगी। क्योंकि साधारण परिवार के किसी व्यक्ति को रात को गंभीर बीमार होने का हक है ही नहीं।  किसने दिया उसे यह हक ? नहीं होना चाहिए उसे बीमार। वह ऐसी क्या चीज है जो वह रात को बीमार हो, वह भी गंभीर। उसे शर्म आनी चाहिए। इस नगर में रात को बीमारी की बजाए उसे शर्म से डूब मरना चाहिए। वह क्या समझता कि उसकी बीमारी से किसी डॉक्टर का दिल पसीजेगा! कोई उसके परिजनों के दर्द को समझेगा! नर्सिंग होम के दरवाजे उसके ईलाज  के लिए खोल दिये जाएंगे! रात को कोई क्यूँ करे उसका ईलाज । उसकी अहमियत ही क्या है इस क्षेत्र में। उसको जीने का हक ही किसने दिया....बीमार हो जाए रात को और मर जाए ईलाज के अभाव में। हमें क्या? हम तो नहीं करेंगे ईलाज। ईलाज! अरे! हम तो फ़र्स्ट एड भी नहीं देंगे। कौनसी इंसानियत?..दया...फर्ज.... । अजी छोड़ो जी, ये सब किताबी बातें हैं। हम केवल वही किताब पढ़ते हैं जिसकी जेब में दाम हो....खूब नाम हो....प्रतिष्ठित व्यक्ति हो.....बड़ा अफसर हो.... । आम आदमी....उस पर रात को गंभीर बीमार....उसको कहा किसने था रात को बीमार होने के लिए। रात को कोई नर्सिंग होम का डॉक्टर “रिस्क” नहीं लेता। कुछ हो गया तो तोड़ फोड़ का अंदेशा। बस यही एक तर्क है डॉक्टर के पास। सही भी है ये बात, किन्तु इसका यह मतलब तो नहीं कि हर मरीज के परिजन हाथों में पत्थर लिए नर्सिंग हॉस्पिटल आते हैं ईलाज करवाने। अफसोस तो ये कि इनसे पूछने की हिम्मत कौन करे? अभी ये हाल है।उसके बाद तो पता नहीं क्या होगा। जो भी हो किन्तु आम आदमी रात को गंभीर बीमार ना हो। उसे रात को बीमार होने का हक ही नहीं है। एक शायर ने कहा है....पस्त हौसले वाले तेरा साथ क्या देंगे,ज़िंदगी इधर आ तुझ को हम गुजारेंगे।



Wednesday, 24 October 2012

सरकार से तो बिना शर्त प्यार करना पड़ता है


श्रीगंगानगर-सरकारी मेडिकल कॉलेज मिलेगा लेकिन सड़क पर नहीं मेज पर। धमकी से नहीं आग्रह से। मुख्यमंत्री सहित सभी जनप्रतिनिधियों से दूर रहकर नहीं उनसे मिल कर। उनको आँख दिखाकर नहीं आँख से आँख मिलाकर। किसी व्यक्ति विशेष या किसी संगठन की अपनी शर्तों पर नहीं,सरकारी नियम,कानून,कायदों के हिसाब से।किसी से कुछ लेने के कायदे होते हैं चाहे वह हमारा हक ही क्यों न हो। हक तो बाप का संतान पर और संतान का माँ-बाप पर भी होता है। पति-पत्नी का एक दूसरे पर जो हक होता है उससे अधिक तो कहीं कुछ हो ही नहीं सकता। इन रिश्तों में भी लेने-देने की मर्यादा है। दान देने की मर्यादा से तो शास्त्र भरे पड़ें हैं। दान तो ऐसे दिया जाए कि दूसरे हाथ को भी पता ना लगे....यह सतयुग की बात थी। अब दूसरा जमाना है...एक रुपया भी दो तो बजा के। सरकार लेने को तैयार भी है। वैसे ये जरूरी नहीं कि सरकार से मेडिकल कॉलेज मांगने के लिए उसे  सौ,दौ सौ,पांच सौ करोड़ रुपए का चैक दिखाना जरूरी है। खाली हाथ जनता भी सरकार से यह सब मांग सकती है। परंतु सरकार सरकार है। जनता के सामने झुक भी सकती है और किसी को झुकाने पर आए तो उसे दोहरा कर देती है। सरकार को कोई डराना चाहे तो गड़बड़ हो जाती है। सरकार कुछ देर डरने का नाटक तो कर सकती है लेकिन असल में वह डरती नहीं। ना तो किसी दानवीर से और ना बड़े से बड़े उद्योगपति अथवा बाबा से। सरकार किसी उद्योगपति से डरती तो टाटा को अपना कारख़ाना बंगाल से गुजरात में ना शिफ्ट करना पड़ता। कोई सरकार किसी बाबा से कांपती तो रामदेव पता नहीं क्या से क्या हो जाते। सरकार ने पहले  तो बाबा से मिलने कई मंत्री भेजे फिर उसी सरकार ने उसे महिलाओं के कपड़े पहन कर भागने के लिए मजबूर किया। दानवीर तो ना जाने कितने हैं जो दशकों से दिये जा रहे हैं।सरकार ना तो उनसे डरती है ना वे डराने की कोशिश करते हैं। दोनों एक दूसरे का यथा योग्य मान सम्मान करते हैं। सरकार होती ही ऐसी है। एक पल कुछ दूसरे ही पल और कुछ। सरकार कहीं भी चाहे किसी की भी हो वह किसी से नहीं डरती। हां अगर आपके पास उसे लूटने का गट्स है तो उसे लूट लो चाहे जितना।वह तैयार रहती है लुट जाने को। ये गट्स नहीं तो फिर उससे लेने की कोई तरकीब हो आपके पास। कोई दिक्कत नहीं। मिल जाएगा जो चाहोगे। परंतु बात फिर वही....यह सब होगा एक प्रक्रिया के तहत। सरकार के कायदे कानून से ना कि मेरे,उसके,इसके कहने या शर्त पर। सरकार के साथ बीमारी ये कि वह शर्तों के साथ प्यार नहीं करती। बस,बिना शर्त प्यार करो.....उसके बाद उसके पास जो है वह हमारा। यहां उलटा होता है।

Thursday, 4 October 2012

कपड़ों और सूरत से नहीं होती इंसान की पहचान


श्रीगंगानगर-एक परिचित विप्रवर को घर छोड़  गया। विप्रवर भी क्या! आज के सुदामा से कुछ बीस लगे। बुजुर्ग पतले दुबले । दांत थे भी और नहीं भी। हल्की सफ़ेद दाड़ी। बाल बिखरे हुए। कलाई पर घड़ी। जिसका फीता इससे पहले पता नहीं कब बदला होगा। उसका वास्तविक रंग फीका पड़ बे रंग का हो चुका था। धागे निकले हुए थे।  कमीज-धोती थी तो साफ लेकिन झीनी ।गज़ब की फुर्ती। आते ही  नंगे पैर बाथरूम में गए। वापिस आए, हाथ पैर धोए। आसन बिछा था बैठ गए। मन में  भाव उमड़े  कि ये किस पंडित को छोड़ गए वो.....। इससे पहले कि सोच आगे बढ़ती...विप्रवर ने अपने  अनुभव से मेरे चेहरे  और मन के भाव पढ़ लिए। विप्रवर बोले,रिटायर्ड टीचर हूँ। 1960-61 में लगा था नौकरी। मन के भाव,विचार सब बदल गए साथ में चेहरे का रंग भी । वे बताने लगे...1300 रुपए  पेंशन मिलती है।क्योंकि हमारे जमाने में तनख़ाह कम ही हुआ करती थी। जिस चेहरे पर  कुछ देर पहले दीन-हीन जान तरस आ रहा था उसके प्रति अब श्रद्धा हो गई। उनकी बातों में रस आने लगा। भोजन करते हुए वे बोले,हिन्दी और गणित पढ़ाया करता था। अब तो गणित बहुत मुश्किल हो गया। बच्चों को ना तो हिन्दी की ग्रामर आती है ना अंग्रेजी की। इसी वजह से उनके नंबर कम आते हैं। भोजन की तारीफ के साथ उनके अनुभव का ज्ञान भी मिल रहा था। वे बताने लगे, सिरसा के एक सेठ की सिफ़ारिश पर श्रीकरनपुर गया नौकरी लेने। तहसीलदार पटवारी लगाना चाहता था। लेकिन मेरी इच्छा मास्टर लगने की थी। तहसीलदार ने बहुत कहा,पर मैं मास्टर ही लगा। कुछ समय पहले जो दीन हीन लग रहा था वह ज्ञान और अनुभव से घनवान था।अपने अंदर आशीर्वादों का भंडार लिए हुए था वह बुजुर्ग विप्रवर। यह सब लिखने का अर्थ केवल उस विप्रवर की तारीफ करना नहीं है। बल्कि इस बात का जिक्र करना है कि इंसान की सूरत,कपड़े और उसके साधन देख कर  ही समाज उसके बारे में अपनी राय कायम कर लेता है। जैसा पहनावा और सूरत वैसी ही उसको तवज्जो मिलती है। यह कोई आज नहीं हो रहा। सदियों से ऐसा ही है। हर युग में इन्सानों ने सूरत, कपड़ों और धन को केंद्र में रख दूसरे इंसान को महत्व दिया। इंसान की सूरत कैसी भी हो, कपड़े चाहे जैसे हों, धन है या नहीं लेकिन उसने अपनी मधुर वाणी, अपने ज्ञान और अनुभव से, अपनी बड़ी सोच से, किसी के व्यक्तित्व को पहचाने के इस माप दंड को हर बार गलत भी साबित किया। जैसे आज इस विप्रवर ने किया। जाते हुए पंडित जी ने संस्कृत में एक श्लोक बोला...जिसका अर्थ था कि पद और पैसा तो ठीक  है किन्तु हर बार फलित तो भाग्य ही होता है। ये कह वे अपनी साइकिल पर सवार हो चले गए। ये संकेत उन्होने अपने लिए दिया या हमारे लिए वही जानें। शायर मजबूर कहते हैं...दिल है पत्थर,दिल है मोम भी मजबूर,दिल पर हर चोट के निशां होते हैं। 

Tuesday, 2 October 2012

मेहमान हैं टेम्प्रेरी कलेक्टर के रूप में


श्रीगंगानगर-जब शब्दों का महत्व ही ना रहे तब खामोशी ठीक है और जब शब्दों की जरूरत ही ना हो समझने समझाने में तब होता है मौन। खामोशी!मतलब कुछ भी कहो,सुनो,लिखो किसी पर कोई असर नहीं होने वाला। मौन! अर्थात जब सब बिना बोले,कहे,लिखे ही एक दूसरे की बात समझ जाएं। श्रीगंगानगर के संदर्भ में दोनों  स्थिति थोड़ी थोड़ी है। शब्दों का महत्व भी है और इनकी जरूरत नहीं भी। इसलिए कुछ लिखा जाएगा और कुछ बिना लिखे समझना होगा। यही ठीक रहेगा। मेहमान के सामने। मेहमान! अपने नए जिला कलेक्टर श्री राम चोरडिया। टेम्प्रेरी कलेक्टर। मेहमान कलेक्टर। कुछ माह बाद रिटायर हो जाएंगे। जो मेहमान है उसके सामने परिवार वाले कुछ बोलते हैं और कुछ इशारों में एक दूसरे को समझाते हैं। क्योंकि मेहमान को घर की समस्या बताई नहीं जाती।  सभी बातें उनके सामने कहना संस्कार नहीं है न हमारे। अब उनको ये कैसे कह दें कि हमारा सीवरेज अभी तक नहीं बना। चार साल से लगे हैं नेता और प्रशासन। कान पक गए सुनते सुनते। ओवरब्रिज का क्या होगा! मिनी सचिवालय का भी प्रस्ताव है...ऐसे  कितने ही मुद्दे हैं। किन्तु मेहमान को ये सब कैसे बताएं। अच्छा नहीं होता ना मेहमान को घर की समस्या बताना। आपसी विवाद को दर्शाना । हमें तो मेहमान की तो आवभगत करनी है। “अतिथि देवो भव:।“ बस नो दस महीने अब हमारा यही काम है कि अपने काम भूलकर मेहमान कलेक्टर की सेवा करें। हमारा फर्ज है ये ,मेहमान कलेक्टर पर कोई अहसान नहीं। मेहमान लंबे समय तक रुके तब  भी उससे ये उम्मीद तो नहीं कर सकते कि वह कोई बड़ी सहायता करेगा हमारी....हां आते जाते कोई सब्जी ले आया या बच्चे को उसकी जरूरत की चीज दिला लाया तो अलग बात है। इससे अधिक उम्मीद करेंगे तो रंज और अफसोस का कारण होगा। मेहमान भी कैसे कलेक्टर जैसे। अब मेहमान तो टेम्प्रेरी ही होते है। वैसे सरकार ने  टेम्प्रेरी कलेक्टर लगा दिया। ना भी लगाती  तो क्या तो यहां के लीडर कर लेते और क्या विपक्ष। अब ये कलेक्टर कुछ महीने शहर को समझने में लगाएंगे। जब तक समझेंगे तब विदाई की वेला निकट आ जाएगी। विदाई समारोह होंगे। उपहार  दिये जाएंगे। कार्य  की तारीफ होगी। व्यक्तित्व की सराहना की जाएगी। बस उसके बाद चुनाव आ ही जाएंगे।  वैसे भी जब प्रस्थान का समय हो तो इंसान ‘राम-राम” करके समय पास करता है। जो मिल जाए वही अपना। श्रीराम चोरडिया को तो कलेक्टर का पद तो मिल ही गया। और जो कुछ मेहमान के रूप में उनको मिलेगा वह अलग से होगा।  कलेक्टर के रूप में उनकी पहली और अंतिम पोस्टिंग शायद यही होगी। इस शहर का क्या होगा? जो अब तक होता आया है वही होगा।

Saturday, 22 September 2012

जाने क्या ढूंढती रहती हैं ये आंखे.....


श्रीगंगानगर-अद्भुत। आश्चर्यजनक। अकल्पनातीत। वंडरफुल। अहा! क्या बात है। वाह! क्या संस्कार है,सोच है। मतलब परस्त,अविश्वास से भरी और भौतिकवादी सोच से लबरेज समझे जाने वाले इस समाज में ऐसा भी संभव है। पढ़ा हो तो कहानी समझ कर भूल जाएं। कोई सुनाए  तो विश्वास ही ना हो। लेकिन यह सब हुआ जो यहाँ लिखा गया है।  दोपहर 12 बजे का समय। पॉश क्षेत्र। एक बुजुर्ग साइकिल पर एक बैग टांगे किसी का घर पूछ रहा था। मुझसे भी पूछा,लेकिन मैं खुद उसका घर फोन पर पूछ रहा था जिसके पास जाना था। मुझे घर मिल गया क्योंकि वह बंदा बाहर आ गया, जिससे मिलना था। बुजुर्ग ने उससे भी “...” का घर पूछा। बंदे ने बता दिया....लेकिन एक क्षण बाद ही वह बोला,बाबा आप धूप में हैं अंदर आ जाओ.... । आया तो मैं था मिलने...अब साथ में वह बुजुर्ग भी हो गया। थका सा। उदास चेहरा। निढाल। सजे धजे शानदार ड्राइंग रूम में बैठ गए। मुझसे बात शुरू होती इससे पहले उस बंदे ने बुजुर्ग का हाथ अपने हाथ लिया और बोला...आप उदास क्यों हो...क्या बात है...क्या परेशानी है...सब कुछ बताओ.....दिल खोल कर कहो....सब ठीक होगा। इतना बोल बंदा काम वाली को ठंडा दूध लाने की आवाज लगाता  हुआ कमरे से बाहर चला गया। बुजुर्ग की आँख भर आई। दिल रोने लगा..... मैंने पूछा....आप इसको कभी मिले। बुजुर्ग बोला नही,कभी नहीं। मेरा दूसरा सवाल था...आपको कैसा लगा जब उसने आपका हाथ अपने हाथ में लेकर परेशानी पूछी ? बुजुर्ग ने जेब से रुमाल निकाला। आँख में आए स्नेह और खुशी के आंसुओं को उसमें सहेजा और फिर बोला... आज तक मेरे किसी बच्चे ने इस प्रकार से मुझसे प्यार,अपनापन नहीं दिखाया। इसने बिना जान पहचान के यह किया। घर का मालिक वह बंदा वापिस ड्राइंग रूम में आया।  साथ में दो गिलास दूध लिए काम वाली भी थी। ठंडे दूध का गिलास उसको देकर  बंदा फिर बुजुर्ग से कहने लगा लगा....खोल दो मन की सारी गांठ....आज हँसना है...पिकनिक मनानी है। हालांकि बुजुर्ग ने बताया कि उसके तीन बच्चे हैं...सब सैट हैं। किन्तु उस बंदे ने बुजुर्ग का हाथ अपने हाथ में लेकर उसके चेहरे की उदासी में जैसे  कुछ पढ़ना शुरू किया।बंदा बोला,मेरी आँख में आँख डाल कर कहो सब ठीक है। बुजुर्ग की आँख फिर भीग गई...शब्द गले में रुक गए....उसने कुछ कहने की बजाए उस बंदे का हाथ स्नेह,लाड़,दुलार से चूम लिया। बंदे के स्नेह से लबरेज अपनेपन ने  बुजुर्ग का पीछा नहीं छोड़ा....आपका मोबाइल नंबर दो आपसे बात करूंगा....घर आऊंगा। यह सब कुछ मिनट में ही हो गया। जो कुछ मिनट पहले एक दूसरे से अंजान थे वे परिचित हो गए। दोनों की उम्र का फासला...स्टेटस में फर्क...किन्तु सब मिटा दिया उस बंदे ने। अपने शब्दों से। अपनेपन से।  ऐसा लगा जैसे कोई मासूम बालक अपने घर के किसी बुजुर्ग से जिद कर रहा है कुछ देने की,बड़ी ही मासूमियत के साथ। पता नहीं वह कौन है....कोई फ़ैमिली काउन्सलर या कोई टीचर। पथ  प्रदर्शक या फिर अपने मालिक (ईश्वर) की धुन में खोया कोई दीवाना। या इंसान के रूप में किसी मालिक का कोई दूत। मैंने कभी इस प्रकार से दो अंजान व्यक्तियों को परिचित होते नहीं देखा। मुझे तो उससे पहली बार मिलने का मौका मिला था। मिला क्या था! मिलना तो उनका ही था। मुझे तो बस साक्षी की भूमिका मिली थी यह सब लिखने के लिए।  उसी बंदे की दो लाइन से बात को विराम देंगे.... साड्डी दोस्ती है दोस्तो सवेरैयां दे नाल,कोई साड्डा कम्म नई अंधेरैयां दे नाल।
 



Wednesday, 19 September 2012

श्रीगंगानगर की ओफिसियल वेबसाइट में महाराजा गंगा सिंह का जिक्र तक नहीं


श्रीगंगानगर-श्रीगंगानगर की ओफिसियल वेबसाइट “श्रीगंगानगर डॉट निक डॉट इन” में महाराजा गंगा सिंह  का जिक्र तक नहीं है। हिन्दी,अंग्रेजी,पंजाबी और राजस्थानी में श्रीगंगानगर क्षेत्र के बारे में जो थोड़ी बहुत जानकारी दी गई है वह भी अलग अलग है। जो अंग्रेजी में है वह पंजाबी में नहीं। जो राजस्थानी में है वह हिन्दी में नहीं।अंग्रेजी में  एक दर्जन लाइन में श्रीगंगानगर की जानकारी है तो हिन्दी में केवल साढ़े छः लाइन। ऐसा लगता है कि या भिन्न भिन्न विचारों वाले व्यक्तियों से लिखाया गया है। जिसको श्रीगंगानगर जैसा दिखा,लगा वैसा लिख दिया श्रीगंगानगर के बारे में। सरकारी वेबसाइट ही तो है....क्या फर्क पड़ता है।  वेबसाइट में लिखा है कि श्रीगंगानगर दो भागों में है...एक व्यावसायिक क्षेत्र दूसरा रिहायशी। लिखने वाले ने शायद सालों से श्रीगंगानगर शहर का भ्रमण नहीं किया। या फिर वे समझ नहीं सके नगर के मिजाज को।  क्योंकि अब तो रिहायशी क्षेत्रों में भी बड़े बड़े बाजार बन चुके हैं। दो भागों वाली बात दशकों पुरानी हो सकती है। इस बात का जिक्र राजस्थानी में है कि श्रीगंगानगर कभी रामनगर हुआ करता था। पंजाबी,अंग्रेजी और हिन्दी में इसका उल्लेख नहीं है। इस वेबसाइट में 16 चित्र भी चिपकाए गए हैं। चित्रों में सूरतगढ़ का थर्मल स्टेशन है। अंध विद्यालय को अनेक चित्रों के माध्यम से दर्शाया गया है। इस नगर से अंजान व्यक्ति उन चित्रों को देखे तो उसको मालूम ही ना हो कि वे किसके चित्र हैं। उनका क्या महत्व है। क्योंकि इन चित्रों के नीचे ऊपर कुछ लिखा ही नहीं। बस चित्र लगा दिये। सबसे हैरानी की बात तो ये कि इन चित्रों में दर्शन कोडा चौक का चित्र तो है। केदार जी भी हैं।  लेकिन महाराजा गंगा सिंह का नाम कहीं नहीं है। जिनके नाम पर श्रीगंगानगर की स्थापना की गई थी। जब नगर को बसाने वाले का चित्र ही नहीं तो फिर महात्मा गांधी,भगत सिंह,बी आर अंबेडकर,बीरबल चौक, लाल बहादुर शास्त्री की अलग अलग स्थानों पर लगी प्रतिमाओं के चित्र वेबसाइट पर लगाए जाने की कल्पना करना ही मूर्खता है। दर्शन कोडा का इतिहास बताओ....कौन रोकता है?लेकिन महाराजा गंगा सिंह,भगत सिंह,महात्मा गांधी....के बारे में जानकारी देने में कोई हर्ज है क्या! राजस्थान की सबसे बड़ी निर्यातक इकाई विकास डब्ल्यूएसपी का कहीं नाम नहीं है। होटल की लिस्ट बहुत पुरानी है। श्रीगंगानगर में लगातार क्या बदलाव हुए या हो रहें हैं। इसके बारे में दो चार पांच लाइन होती तो थोड़ी जान पड़ती वेबसाइट में। इसकी वजह भी है...वह यह कि नगर के दक्षिण और पूर्व में प्राइवेट कालोनियों का विकास। जिनको लोग देखने जाते हैं।  वेबसाइट होती ही इसीलिए है कि हजारों मील दूर रहने वाला भी किसी भी विषय के बारे में सब कुछ नहीं तो बहुत कुछ जान सके। इस सरकारी वेबसाइट की तो बात ही निराली है। कई भागों में विभाजित इस वेबसाइट के माध्यम से लोग प्रशासन के बारे में तो संभव है बहुत कुछ जा सकें लेकिन श्रीगंगानगर के बारे में नहीं। शायद इसको अप डेट करने वालों को या तो फुर्सत नहीं। फुर्सत है तो कोई बताने वाला नहीं। या फिर किसी को प्रशासन से अधिक किसी में रुचि नहीं। हां,अब समाचार प्रकाशित होने के बाद इस और कोई गंभीरता दिखाई जाए तो बात अलग है।