श्रीगंगानगर-इंसान हूं। दिल
कमजोर है। कई बातें अंदर को झकझोर देती हैं। दिलो दिमाग में हा-हा कार मच जाता है।
घटना सुनने से ही वो सब बाते कल्पना बन के सामने आ खड़ी होती हैं जो आँखों ने देखी नहीं होती। मन यह सोचने के सिवा कुछ नहीं
कर पाता की क्या ऐसा भी होता है। होता है तभी तो हुआ....फिर भी जिंदा हैं हम। क्योंकि मरे नहीं हैं। ये कहना बेमानी है कि ऐसी
जिंदगी का क्या मतलब....ऐसी जिंदगी का भी कोई अर्थ है। है, ऐसी ज़िंदगी
का मतलब भी और अर्थ भी। लेकिन ये सभी को कहाँ दिखता
है। आसान
ज़िंदगी तो सभी जी लेते हैं। ऐसे भी तो हों जो मुश्किलों में से ज़िंदगी को निकालते
और जीते हैं। बात ऐसे ही शुरू नहीं की। एक युवती है पूरे दिनों से। कई माह से पीहर
में।पता नहीं क्या हुआ उसके साथ पति से इस हद तक नफरत करती
है कि उसका नाम तक भी लेना नहीं चाहती। किन्तु
वाह रे भारतीय नारी....इसके बावजूद उसकी खुशी की दुआ करती है। बच्चे ने समय पर
होना ही है.....माँ की गोद तो होगी...पिता का दुलार कब मिलेगा, क्या पता। अच्छे घर की बहू
अपनी छोटी सी बेटी को ले पीहर जा बैठी। गई थी सामान्य रूप से अब आना नहीं चाहती। ससुराल में सुबह से लेकर शाम तक जो भी करना वह
फोन पर माँ से पूछ कर। कैसे रहना है ....यह उसको
माँ समझती। पति से कैसे बर्ताव करना है यह माँ सिखाती। ससुराल वालों ने समझाया तो बस.....ना
आती है....ना कुछ नक्की होता है। हो गई
मुश्किल, एक परिवार को नहीं,लड़का
–लड़की दोनों के परिवारों को। सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रश्न है। बच्चों की ज़िंदगी का सवाल है। नाव बीच में हैं। इस किनारे
लगे या उस किनारे। बीच में रहेगी तो सौ प्रकार की आशंका। कोई बड़ी भयानक लहर नाव को
उलट-पलट ना दे। समुद्री जीव जन्तु का ग्रास ना बन जाएं। किनारे पर पहुँचने की बजाए
कहीं रास्ता भटक कर ऐसे ही ज़िंदगी की शाम
हो जाए। इस प्रकार की स्थिति में सुखद कल्पना नहीं होती...आशंकाएं ही रह रह कर
दिमाग में आती हैं। सकारात्मक सोच की फिलोसफ़ी यहां फेल हो जाती है। तीसरी बात सुनो....सालों से पति-पत्नी परिवार के साथ
रहते हैं। विडम्बना,विवशता देखो कि दोनों के विचार पहले दिन
से नहीं मिले। पसंद
जुदा। सोच भिन्न। इसके बावजूद एक ही छत्त के नीचे घर में रहते हैं। सामाजिक
ज़िम्मेदारी भी निभाते हैं और घर भी चलाते हैं। रिश्ते कभी गुड से भी मीठे और कभी नीम से अधिक कड़वे। जिंदगी चल रही है। क्योंकि यह समाज है। सामाजिक बंधन निभाने पड़ते हैं। इसलिए नहीं कि हम मजबूर हैं। कोई और रास्ता भी नहीं।
इसलिए
भी कि हमारे साथ हमारे परिवार,रिश्तेदार को भी समाज में रहना है। जिंदगी को जीना है। रिश्तो को
बीच में तोड़ कर,छोड़ कर जी तो सकते हैं किन्तु वह
ज़िंदगी अधूरी होती है। एक से नाता तोड़ दूसरे से जोड़ कर भी जिंदगी को जिया जाता है किन्तु उसके साथ पुरानी ज़िंदगी का
साया साथ चलता है। जो ना जीने देता है और ना मरने। अब पति-पत्नी के झगड़े निपटाए भी
कौन। खुद ही निपटा सकते हैं। देर कितनी लगती है। बस कोई एक कदम बढ़ा दे तो बात बन
जाए। यही एक कदम मुश्किल हो जाता है बढ़ाना। क्योंकि अहम बहुत दूर जो ले आया है। ये बेशक घर घर की कहानी नहीं होगी....लेकिन हमारे आस पास ऐसी अनेक कहानियां बिखरी हैं। जिनको समेटने वाला आज कोई मुखिया किसी गली में नहीं
रहता। “कचरा”पुस्तक
की लाइन है--- तुम करते रही दिल्लगी ,हम लुटाते रहे प्यार ,मैं तो नादां था चलो ,तुमने भी तो नहीं किया इंकार।
हर इन्सान हर पल किसी ना किसी उधेड़बुन में रहता है। सफलता के लिए कई प्रकार के ताने बुनता है। इसी तरह उसकी जिन्दगी पूरी हो जाती हैं। उसके पास अपने लिए वक्त ही नहीं । बस अपने लिए थोड़ा सा समय निकाल लो और जिंदगी को केवल अपने और अपने लिए ही जीओ।
Sunday, 9 September 2012
Friday, 7 September 2012
देवी के चमत्कार ने बनाया मनमोहन को दिव्य पुरुष
श्रीगंगानगर-ईमानदार
आदमी। ख्यातिप्राप्त अर्थशास्त्री।सज्जन
पुरुष। बेदाग इंसान। चरित्रवान नेता। ये सभी गुण प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह में हैं। इसमें किसी को कोई शंका नहीं हो सकती। इसके बावजूद यह भी सच है कि जितना अपमान, बेइज्जती, आलोचना और निंदा मनमोहन सिंह की हुई है या हो रही है आज तक राजनीति के इतिहास में
किसी की नहीं हुई होगी,वह भी
राष्ट्रीय स्तर से लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक। एक से एक आलोचनात्मक आलेख। मनमोहन की मनमोहिनी छवि
का मज़ाक उड़ाते कार्टून। भद्दे मज़ाक
वाले चित्र। कभी मुंह पर कीचड़ तो
कभी कालिख। ऐसा तो किसी छोटे मोटे नेता, भ्रष्ट से भ्रष्ट मंत्री, चरित्रहीन इंसान के
साथ भी नहीं हुआ जितना प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ हो रहा है। वर्तमान में सबसे बुरा किसी
के बारे में कहा जा रहा है तो वह है भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह। महान भारत
के अद्भुत प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह। अभूतपूर्व हिंदुस्तान के अभूतपूर्व प्रधान मंत्री
मनमोहन सिंह । अद्भुत और अभूतपूर्व इसलिए कि पूरा देश उनको जो कुछ कह सकता था कह
रहा है इसके बावजूद उन पर कोई असर नहीं। मान-अपमान से बिलकुल दूर स्थितप्रज्ञ। ऐसे
महापुरुष जिसे सुख-दुख,आलोचना-प्रशंसा,निंदा से कोई मतलब नहीं। जिस स्थिति में पहुँचने के लिए
ऋषि-मुनियों को सालों ताप करना पड़ता है। दशकों तक अपने आप को तपस्या में तपाना पड़ता है। वनों की खाक छाननी पड़ती है। कन्दराओं में निराहार रहना पड़ता है।
तब कहीं सैंकड़ों में कोई एक इस स्थिति तक पहुंचता है। मनमोहन सिंह कुछ साल राजनीति
में रहकर वहां पहुँच गए। हिंदुस्तान की जनता तो धन्य हो गई ऐसी महान आत्मा
को पाकर। ऐसे युग पुरुष को
प्रधानमंत्री बनाकर। चरण रज माथे पर लगानी चाहिए
ऐसे दिव्य पुरुष की। क्योंकि ऐसी आत्मा हजारों सालों में भारत की भूमि पर ही जन्म
लेती हैं। पूजा करनी चाहिए ऐसे अलौकिक आत्मा की जिसने इस भारत की इस धरती को अपने
कर्मों से पुष्पित और पल्लवित किया। मनमोहन सिंह जैसे देवता पुरुष को मोटी चमड़ी का
कहना तो शब्दों को विकृत करना है। भला वे कैसे ऐसे हो सकते हैं। वे तो साधु हैं।
संत हैं। महात्मा हैं। दिव्य आत्मा हैं। जो एक देवी के आशीर्वाद से इस मुकाम पर
पहुंचे हैं। यह सब देवी का चमत्कार है। जिसने एक इंसान को ऐसा ज्ञान दिया कि वह मान
–अपमान से ऊपर उठ गया। ऐसा मंत्र दिया कि उन पर
आलोचना-प्रशंसा भी प्रभावहीन हो जाती हैं। मौन को साधने में कितनी साधना करनी पड़ती
है। लेकिन देखों मनमोहनसिंह का कमाल,देवी के दर्शन मात्र से मौन
उनका गुलाम बन गया। युगों युगों तक इस मौन की गाथा गई जाएगी।
Monday, 3 September 2012
बेटी बचाओ,.ताकि लड़के उनको छेड़ सकें !
श्रीगंगानगर-“कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ अभियान”। “बेटी बचाओ आंदोलन”। “नारी शक्ति के लिए रैली”। और भी बहुत कुछ....ये....वो..... । किसलिए
ताकि जब हमारी बेटी,बहिन,भतीजी...बड़ी हो जाए तो उनको समाज के बिगड़ैल लड़के
छेड़े। उनको आते जाते रास्ते में रोक कर परेशान करें। और उसकी मजबूरी देखो
ना तो वह यह बात घर में बता सकती है और ना खुद कुछ करने में सक्षम। घर बताए तो
माता,पिता,भाई,चाचा...को टेंशन। कुछ करें तो मुश्किल....काम धंधा रुक जाएगा...कोर्ट
कचहरी के चक्कर....लड़की की बदनामी...लड़ाई झगड़ा। परिवार कुछ ना
करे तो और मुश्किल,,,लड़की को टेंशन...या तो लड़कों की अच्छी बुरी बातें सुने.......या घर से निकलना छोड़
दे। महिला सशक्तिकरण को लगे गोली। इज्जत है तो
सब कुछ है। वह दौर कुछ अलग था जब लड़कियों को घर बैठे काम चल जाता था। अच्छे रिश्ते मिल जाते थे। अब तो लड़कियों को समय के
साथ चलना जरूरी है। इसके लिए घर से और शहर से भी बाहर निकालना ही होगा...तो सुरक्षा? फिर वही सवाल...हैरानी इस बात की है कि
लड़कियों को बचाने के आंदोलन चलाने वाले संगठन,नारी आंदोलन के लीडर कभी दिखाई नहीं देते इनकी रक्षा
के लिए। लड़कियों को छेड़ने वाले लड़कों के खिलाफ कभी खड़े नहीं होते ऐसे संगठन। इनको शर्म तो अब भी
नहीं आती। कांता सिंह लगा है ऐसे लड़कों से
निपटने के लिए। किन्तु लड़की और नारी की रक्षा,उनको बचाने की बड़ी बड़ी बात करने वाला। बड़ी बड़ी रैली
निकालने वाला। बड़े बड़े आयोजन कर लड़की के महत्व को समझने वाला कोई संगठन कांता सिंह
के साथ खड़ा नहीं हुआ। किसी ने ये नहीं कहा...कांता सिंह हम तुम्हारे
साथ है। कोई तो आए और ये कहे कांता सिंह तुम प्रशंसा के पात्र हो। इन संगठनों ने तो क्या
आना था कुछ लड़के विरोध में जरूर आ गए। फिर ऐसे नारी वादी संगठनों का क्या मतलब।
एनजीओ किस काम की। केवल प्रचार के लिए।सम्मानित होने के वास्ते। यूं तो लड़की बचाओ
की बात करते है और जब कोई लड़कियों को बुरी नजरों से बचा रहा है तो ये आँख,कान,मुंह बंद किए हुए हैं। शर्म की बात है....जिस कांता सिंह का काम नहीं
है वह लगा है और जो सारा दिन “लड़की
बचाओ””कन्या भ्रूण हत्या बंद करो” चिल्लाते हैं वे चुप है। खामोश हैं। मौन धारण
किए हैं। फिर ऐसे संगठन किस काम के। काहे के नारी बचाने के आंदोलन। क्या बेटी
इसलिए बचाएं कि लड़के उनको छेड़े। जलील करें। अपमानित करें। कन्या भ्रूण हत्या
रोकें....ताकि लड़की पैदा हो.....बड़ी हो और फिर लड़कों के
भद्दे कमेन्ट को सुन कर प्रताड़ित हों। शायद नारीवादी संगठनों को पता लग गया होगा
कि कन्या भ्रूण हत्या क्यों होती थी.....किसी जमाने में लड़की के पैदा होते ही उसे क्यों मार
दिया जाता था। क्योंकि हर रोज मरने से अच्छा है एक बार मरना। अब भी चेतो मौका है।
कांता सिंह है। उसके पास हौसला है। काम करने का जुनून है। बस उसे अच्छे काम के लिए
साथ चाहिए। कुछ ऐसा होना चाहिए ताकि लड़कियों की राह में कोई रोड़ा ना हो...॥ वरना तो फिर शहर में
बिगड़ैल लड़कों का ही राज होगा। वे लड़के भी हमारे ही हैं। बस किसी कारण से बिगड़ गए।
Friday, 17 August 2012
बहुत मुश्किल है उलझी फूल मालाओं को सुलझाना
श्रीगंगानगर-एक समारोह में फूलों की मालाएँ उलझ गईं। मन में विचार आया कि रिश्तों और मालाओं में कोई फर्क नहीं है। माला ने जैसे एक संदेश दिया कि रिश्तों को फूल मालाओं की तरह रखो, तभी ये हर किसी के गले की शोभा बनेंगे वरना तो उलझ कर टूट जाएंगे। जैसे माला एक दूसरे में उलझ कर टूट जाती हैं। ऐसा इसलिए हुआ कि मालाएँ गड-मड हो गई। ऊपर नीचे हो गई। बस उलझ गई। जब उलझ गई तो उनको जल्दबाज़ी में नहीं सुलझाया जा सकता। उलझी मालाओं को सुलझाने के लिए धैर्य और समझदारी की आवश्यकता होती है। जल्दबाज़ी और झुंझलाने के नहीं। कौनसी माला का धागा किसमें उलझ गया....किस माला का फूल किस माला के फूल में अटक गया। फिर उनको इधर उधर से सहजता से निकालना...कभी किस धागे पकड़ना कभी किसी को। किसी को ज़ोर से,खीजे अंदाज में खींचा तो माला टूट जाएगी....फूल बिखर जाएंगे। टूटी माला किस काम की। रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं। एक एक फूल से माला बनती है तो एक एक मेम्बर से घर । एक माला एक घर। कई घर तो परिवार हो गए। सभी का अपना महत्व...खास महक...अलग रंग रूप...जुदा मिजाज। ठीक फूलों की तरह। माला की भांति। रिश्ते भी जब उलझते हैं तो उनको सुलझाना बड़ी ही मुश्किल का काम होता है। एक घर को खींच के इधर उधर करते हैं हैं तो वह किसी और में उलझ जाता है। कभी कोई धागा अटका कभी कोई फूल उलझा। ......बहुत समय लगता है उलझे रिश्ते सुलझाने में। कई बार तो उलझन ऐसी होती है कि कोई ना कोई “माला” तोड़नी पड़ती है। तोड़ा किसको जाता है जो सभी से उलझी हो...अब या तो वह “माला” छोटी हो जाएगी या टूट कर बिखर जाएगी। माली को देखो....वह कितनी ही मालाओं को सहेज कर रखता है...बंधी होती हैं सबकी सब एक धागे में। कहीं कोई उलझन नहीं। वह जानता है मालाओं का मिजाज...उनको बिना उलझाए रखने का ढंग। बस, बड़े परिवारों में पहले कोई ना कोई मुखिया होता जो अपने सभी घरों को इसी प्रकार रखता था। अपने अनुभव और धैर्य से वह या तो रिश्तों को उलझने देता ही नहीं था अगर उलझ भी जाते थे तो उसे उनको सुलझाना आता था बिना कोई “माला” को तोड़े। अब तो सब कुछ नहीं तो बहुत कुछ बदल गया। ना बड़े परिवार है ना कोई मुखिया। छोटे छोटे घर हैं..और एक एक घर के कई मुखिया। जब इन घरों के रिश्ते उलझते हैं तो फिर...फिर मामला बिगड़ जाता है। लोग बात बनाते हैं। जैसे किसी समारोह में.....अरे मालाएँ तो उलझ गई....टूट गई...ठीक से नहीं रखा....क्यों होता है ना ऐसा ही। “कचरा” पुस्तक की लाइन है---लबों कों खोल दे,तू कुछ तो बोल दे....मन की सारी, गाँठे प्यारी....इक दिन मुझ संग खोल दे.....तू मुझ से बोल रे...... ।
Friday, 10 August 2012
मजबूरी,बेबसी,लाचारी,विवशता ने ममता से देखो क्या करवा दिया
श्रीगंगानगर- ममता की ये कैसी लाचारी है!विवशता है!बेबसी है!मजबूरी है! वह भी उस शहर में जहां एक जागरण पर कई कई हजार रुपए खर्च कर दिये जाते हैं। उस नगर में जहां धार्मिक आयोजन पर लाखों रुपयों का प्रसाद बांट कर गौरवान्वित होने की हौड़ लगती है। उस क्षेत्र में जहां दान,धर्म की कोई कमी नहीं है। वहां, जहां सेठ बी डी अग्रवाल करोड़ो रुपए की छात्रवृति देते हैं, उन परिवारों को भी जिनके बच्चे महंगे अंग्रेजी स्कूल में पढ़ते हैं, गंदे पानी की निकासी के लिए दस करोड़ ऐसे देते हैं जैसे कोई दस रुपए, एक माँ को, जिसे देवी,देवताओं और गुरु से भी ऊंचा स्थान दिया गया है अपने एक बच्चे का इलाज करवाने के लिए नवजात को नकद उपहार के बदले गोद देना पड़ता है। माता कुमाता नहीं हो सकती। इस मामले में इस “सौदे” को पाप भी कहना पाप होगा। क्योंकि यह सब माँ-बाप ने लालच के लिए नहीं किया। ऐसा करना उनकी विवशता हो गई थी। मजबूरी बन गई थी। एक बेटे को नकद उपहार के बदले देकर दूसरे बेटे का इलाज करवाने की मजबूरी। छोटे को “बेचकर” बड़े को अपने पैरों पर खड़ा करने की चाह। घर का पुराना सामान बेचते समय भी इंसान थोड़ा उदास होता है। यह तो कोख से जन्म बेटा था। वह बेटा जिसने अपनी जननी की सूरत भी आँखों में नहीं होगी। उसे बड़े बेटे के इलाज के लिए दूसरे की गोद में दे दिया। कलेजा चाहिए ऐसा करने के लिए। ममता को मारा होगा ऐसा करने से पहले इस माँ ने। कोतवाली में मैंने देखा उस माँ की जिसकी गोद में उसका नवजात था। पिता के कंधे पर वह बेटा जो विकलांग है। कोई चेहरे पढ़ने का विशेषज्ञ होता तो माँ-बाप के चेहरे पढ़ कर बताता कि उन पर क्या लिखा था। उनकी आंखें जैसे पूछ रही थी कि हमारा कसूर क्या है? मेरे जैसा जड़बुद्धि तो उनसे आँख मिला कर बात तक नहीं कर सका। उनकी बेबस,लाचार,मजबूर नजरों का सामना करना बड़ा मुश्किल था। यह खबर तो थी लेकिन इतनी दर्दनाक और मन को पीड़ा देने वाली,दिलो दिमाग को झकझोर देने वाली। इस शहर,सामाजिक संस्थाओं,दानवीरों,बड़े बड़े धार्मिक आयोजन करने वाली संस्थाओं,सरकार की योजनाओं के लिए इससे अधिक शर्म और लानत की बात क्या होगी कि ऐसे शहर में एक माँ को अपने एक बेटे के इलाज के लिए दूसरे को अपने से दूर करना पड़ा। समाज ये पूछ सकता है कि वह किसी के पास मदद मांगने गया क्या? शायद या तो गया नहीं होगा या उसका स्वाभिमान ने उसको कहीं जाने नहीं दिया होगा। यह तो मानना हे होगा कि उसके पास कोई विकल्प नहीं होगा तभी तो उसे ऐसा कदम उठाना पड़ा जिसकी कल्पना तक मुश्किल है।
Monday, 6 August 2012
दुनिया थी मगर सहोदर नहीं था
श्रीगंगानगर-विकास डब्ल्यूएसपी लिमिटेड
के सर्वे सर्वा बी डी जिंदल के सर्व समाज छात्रवृति समारोह में वह तमाम
ठाठ-बाठ थे जिसकी कामना हर इंसान करता है। प्रशंसा के खूब सारे शब्द थे।
उनके काफी भक्त थे। एक से बढ़कर एक मीठे बोल थे। ढम ढमा ढम करते ढ़ोल थे।
उनके लिए ताली बजाते अनगिनत हाथ थे। क्षेत्र के जाने माने व्यक्ति उनके साथ
थे। मालाएँ थी। बड़ी मात्र में फूल थे। अनेकानेक अलंकार थे। ग्रीवा में मान
सम्मान के हार थे। कई हजार इंसान थे। बी डी जिनके भगवान थे। लिखने के लिए
शब्द कम हैं। कोई राजनीतिक देखे तो समझ जाए कि बी डी में कितना दम है।
आन,बान,शान.....सब कुछ बी डी अग्रवाल को दिखाई दे रहा था। दुनिया बी डी को
देख रही थी। बी डी की एक नजर को लालायित थी। मगर इसे विडम्बना कहें या
बेबसी, समय का कोई चक्र कहें या अहंकार। जिसके लिए दुनिया आई थी। जिसका
गुणगान हो रहा था। शॉल ओढ़ाकर सम्मान हो रहा था... इसके बावजूद सब का सब
जीरो.....बेशक बी डी अग्रवाल हीरो......किन्तु सब कुछ जीरो.....शून्य।
क्यों? क्योंकि उसका सहोदर जयदेव जिंदल नहीं था वहां। बाल मुक्न्द जिंदल का
परिवार भी नहीं था जिसकी एक दशक पहले हत्या हो गई थी। तालियाँ तो थी मगर
उनमें बड़े भाई जयदेव जिंदल के आशीर्वाद की ताली नहीं थी। मान सम्मान तो खूब
था, नहीं था तो जयदेव जिंदल का आशीर्वाद। ऐसा नहीं हो सकता कि बी डी
अग्रवाल को इसका अहसास नहीं होगा। होगा...तालियों की गड़गड़ाहट उनके कानों
में चुभी होंगी। ढ़ोल की ढम ढमा ढम के बावजूद पैर नहीं उठे होंगे थिरकने को।
अलंकार सहोदर की अनुपस्थिति में मन को भाए नहीं होंगे। मीठे बोल रस नहीं
घोल पाए क्योंकि बड़ा भाई साथ नहीं था। जब हर वर्ग की पीड़ा उनके दिल में है
तो यह संभव नहीं कि भाई के साथ ना होने की पीड़ा उनके मन में न हो। लेकिन वे
अपनी पीड़ा डिकहये,बताए किसको?खुद ही पी रहें हैं इसे। ये कैसी विवशता है!
जिसने क्षेत्र को अपनी मुट्ठी में कर लिया हो। अपना बना लिया हो। अपने साथ
खड़ा कर लिया हो वह भाई को अपने साथ नहीं ला पाया। वह अपने दिवंगत अनुज के
परिवार को इस खुशी में शामिल नहीं कर सका। दूसरों को अपना बना लिया सगा भाई
दूर ही रहा। अपने अनुज की शान देख के किस भाई का सीना गर्व से चौड़ा ना
होता। कौन ऐसा भाई है जो अपने भाई का इतना मान सम्मान देख आत्म विभोर होकर
उसके गले लगकर भावुक ना हो। परंतु सच्चाई यही है कि सब कुछ था लेकिन भाई
के बिना कुछ नहीं जैसा था।
Saturday, 4 August 2012
सम्मान का यह ढंग तो गरिमामय नहीं हो सकता
श्रीगंगानगर-वर्तमान
समय ने कुछ सौ रुपए के शॉल और कुछ सौ रुपए के ही स्मृति चिन्ह को बहुत बड़े सम्मान
का पर्याय बना दिया गया है। यह शुरू तो किया था क्लब संस्कृति ने ...अब इसे अपना लिया सभी
ने। सम्मान भी इस प्रकार से करते हैं जैसे मजबूरी हो या चापलूसी करना जरूरी हो।
सम्मान की अपनी गरिमा है। किसी का सम्मान, सम्मान जनक तरीके से गरिमामय माहौल में होना चाहिए ना कि केवल दिखावे के लिए। अब देखो, कुछ संस्थाएं सेठ बी डी अग्रवाल का सम्मान
करेंगी। सम्मान भी कहां करेंगी जहां बी डी अग्रवाल करोड़ों रुपए के छात्रवृति
देंगे। समारोह बी डी अग्रवाल का और सम्मानित करेंगे वे लोग व्यक्ति जो उन्हीं की समिति के हिस्से या पधाधिकारी हैं। । एक
है मंदिर समिति। दूसरा सम्मान करेगी स्वर्णआभा विद्यार्थी शिक्षा सहयोग समिति,तीसरा सम्मान होगा बाला जी अन्नपूर्णा समिति
की ओर से। और इन सबके बीच शिक्षा जगत में इस क्षेत्र की बहुत बड़ी संस्था टान्टिया
हायर एज्यूकेशन इंस्टीट्यूट कैंपस की ओर से बी डी अग्रवाल को शॉल ओढ़ाया जाएगा। भीड़
बी डी की। समारोह बी डी का। खर्चा बी डी का। और उसी में सम्मान उस बी डी अग्रवाल
का जो करोड़ों रुपया लोगों की शिक्षा पर खर्च कर रहा है। उस बी डी का जिसने करोड़ों
रुपए के बीज किसानों को इस लिए बांट दिये ताकि किसान कर्ज मुक्त हो सके। उस बी डी
अग्रवाल को जो कई अरब रुपए से मेडिकल कॉलेज खोलना चाहते हैं। उनके प्रोग्राम में
उनको स्मृति चिन्ह देकर,शॉल
ओढ़ाकर सम्मान। यह सम्मान करने का कोई सम्मान जनक और गरिमापूर्ण ढंग नहीं है। यह बी
डी अग्रवाल का सम्मान नहीं....सम्मान तो तब हो जब ये संस्थाएं अपने यहां प्रोग्राम
करें। ऐसा प्रोग्राम जिसमें हर जाति,धर्म,वर्ग,राजनीति,प्रशासन के खास व्यक्ति हों। आम जनता हो। वहां बी डी अग्रवाल की सेवाओं की जानकारी देकर
संस्थाओं को उनके सम्मान के लिए प्रेरित क्या जाए। और
उसके बाद बड़े आदर,विनम्रता,सरलता के साथ फूलों की,तुलसी की,चन्दन की माला भी पहना दी जाए
तो वह होगा असली सम्मान। सम्मान कोई मंहगा
समान देने से नहीं होता। सम्मान तो
गरिमा चाहता है। सम्मान की भी और
जिसका सम्मान हो रहा है उसकी भी। फिर बी डी अग्रवाल का सम्मान तो वह करे जो बी डी
अग्रवाल से बड़ा हो...सोच में। दानवीरता में। लोगों की भलाई करने में । समाज हित की सोच रखने में। किसी का घर
जाकर सम्मान तो तब किया जाता है जब वह कहीं जाने में असमर्थ हो....बी डी अग्रवाल तो देश
दुनिया घूमते हैं। उनका सम्मान तो एक भव्य समारोह में हो तभी बात हो....वरना तो वह सम्मान बी डी
अग्रवाल के लिए तो नहीं। हां उनके खुद के लिए जरूर हो जाएगा।
Thursday, 26 July 2012
जनता को बना रहें हैं सोनिया और मनमोहन सिंह
श्रीगंगानगर-
दोनों बेहद खुश हैं। दोनों के यहां रोज दीवाली,होली,ईद
है। इससे अधिक और क्या खुशी होगी कि एक सरकार में नहीं है फिर भी सरकार उसके
इशारों पर चलती,बैठती,उठती है। दूसरा प्रधानमंत्री पद के काबिल नहीं
फिर भी प्रधानमंत्री हैं। दोनों में से कोई राजनीतिक नहीं फिर भी हिंदुस्तान की
राजनीति के सिरमौर हैं। एक दम सही आइडिया है सभी का...एक सोनिया गांधी...दूसरा मनमोहन सिंह। जिस
काल में खुद की संतान माँ-बाप का कहा नहीं मानती उस दौर में हिंदुस्तान जैसे देश
का प्रधानमंत्री सोनिया गांधी के कहे
से बैठता,उठता और बोलता है। संभव
है कि किसी समय राहुल गांधी अपनी मम्मी का कोई कहा टाल दे लेकिन मनमोहन सिंह
बिलकुल ऐसा नहीं करेंगे। बेटा बेशक आँख दिखा दे किन्तु
मनमोहन सिंह कभी नजर नहीं उठाते सोनिया जी के सामने। देश का बंटाधार हो तो हो,सोनिया गांधी की बला से। क्यों बदले सोनिया मनमोहन सिंह को।कलयुग में इस भाव में आज्ञाकारी,सुशील,ईमानदार,कर्तव्यनिष्ठ,मौन रहने वाला कर्मचारी मिलता कहां है। नरेगा के कारण
तो और भी मुश्किल है।आप मनमोहन सिंह को कम मत समझो। पढे लिखे हैं। बड़े बड़े पद पर
रहें हैं। वे भी समझते हैं सब बात। क्या हुआ जो कमरे में सोनिया गांधी को दंडवत
करना पड़ता है। क्या खास बात है जो पर्दे के पीछे सोनिया जी किसी गलती पर दो चार
पाँच दंड बैठक लगवा लेती हैं। उनकी डांट सुननी पड़ती है। मंच पर तो मनमोहन सिंह ही हीरो
हैं। बंद कमरे में कान पकड़ने से कौनसी शान घटती है। बाहर दो दुनिया मनमोहन सिंह के
कदमों में लाल कालीन बिछाती हैं। इस बात
का भी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए कि लोग कठपुतली,गुड्डा कहते हैं। मनमोहन सिंह तो बस ये ध्यान रखते हैं...”कुछ तो लोग
कहेंगे....लोगों का काम है कहना।“ फिर हमारे यहां तो कहावत है कि दूध देने वाली गाय की तो लात
भी सहनी ही पड़ती है। दूध के लिए पशु की लात सहने वाले लोगों के इस देश में प्रधानमंत्री
पद के लिए किसी भद्र महिला से डांट फटकार सुननी पड़े तो कौनसा पहाड़ टूटता है।
इस देश में तो ऐसे ऐसे सेवक हुए हैं जिन्होने
अपने नेता के कहने पर झाड़ू लगाने तक की बात कही। रसोई में काम करके इंसान कहां से
कहां पहुँच गया। मनमोहन सिंह इसी श्रेणी के प्रधानमंत्री हैं तो क्या खास बात है। दोनों
ज्ञानवान हैं। पढे लिखे हैं। सूझवान हैं। अच्छे संस्कारों वाले हैं। सब जानते हैं
कि वे क्या कर रहें हैं। किन्तु दोनों की भलाई इसी में हैं। ये कहने की हिम्मत तो
नहीं कि वे एक दूसरे को ...बना रहें हैं। हां,देश के हालत से ये जरूर साबित होता हैं कि दोनों एक
दूसरे को यूज कर अपनी अपनी सत्ता का आनंद ले रहें हैं। सत्ता के लिए इनको ना तो
अपने आत्म सम्मान से कोई मतलब है। है ना जनता के दुख दर्द से। एक को हिंदुस्तान जैसे महान देश का
प्रधानमंत्री पद मिला हुआ है और दूसरे को एक आज्ञाकारी बेटे से भी अधिक आज्ञाकारी
प्रधानमंत्री। सावन में “कचरा” पुस्तक की लाइन पढ़ो....मन मेरा तरसे नैना
बरसे,आजा गौरी अब के सावन। सब के
आँगन देखो पायल बाजे,छम छम को
तरसे मेरा आँगन।
Monday, 23 July 2012
नर सेवा से पुलिस के चेहरे को निखार रहा है कांस्टेबल प्रमोद
श्रीगंगानगर-
पूरी तरह से कुष्ठ रोगी। शरीर पर जगह जगह हुए घाव में रिस्ता तरल पदार्थ। जिन पर हर वक्त मक्खियाँ की भिनभिनाहट। कुष्ठ के कारण हाथ पैर खुर रहें हैं। आँखों से क्या लगभग पूरे शरीर से
लाचार। ट्राईसिकल पर ही गुजरती है उसकी जिंदगी। इसका ठिकाना है गंगा सिंह चौक। कोई भी व्यक्ति उसके निकट एक पल बिताने से पहले सोचे। परंतु एक व्यक्ति ऐसा भी है जो इसकी सेवा को
अपना अहोभाग्य मानता है। व्यक्ति भी कौन! पुलिस का सिपाही। जी, उसी
पुलिस का सिपाही, जिसके बारे में बुरी
से बुरी बात कहने में कोई संकोच नहीं करता। हां,डरता जरूर है। यह सिपाही
शनिवार अथवा इतवार को सुबह गंगासिंह चौक पहुंचता है। उसकी ट्राईसिकल को खुद ठेलता
हुआ पुराने हॉस्पिटल लाता है। फिर शुरू होती है उसकी सेवा। उसे साइकिल से उठाकर एक
पत्थर पर बैठाता है। उसे मल-मल कर नहलाता है। जैसे कोई माँ अपने बालक
को स्नान करवाती है। उसके घावों पर मरहम लगाएगा। उसको देने वाली दवाई देगा। कपड़ों
को धोएगा। ट्राईसिकल का सामान व्यवस्थित करेगा। लगभग एक से ढेढ घंटा उसको इस काम
में लगता है। फिर उसको उसी प्रकार गंगा सिंह चौक पर छोड़ के आएगा। रास्ते में एक
खोखा पर वह बाल्टी-मग रख देगा जो आते समय उसने ली थी। मजाल है जो इस सेवा के समय
सिपाही के चेहरे या जुबान पर कोई खिझ,झुंझलाहट,हिचकिचाहट,घिन दिखाई दे या किसी को महसूस हो। उसे कोई
देख रहा है तो कोई बात नहीं नहीं देख रहा तो कोई फर्क नहीं। उसकी सेवा इसी प्रकार
होती है। कई माह से सिपाही चुपचाप यह सब उस दौर में कर रहा है जिस दौर में कोई किसी
को एक रुपया भी दे तो बजा कर कर देता है ताकि सभी को पता लग जाए। यह सिपाही.....शांत मन से बिना किसी को
बताए...लगा है ऐसे व्यक्ति की सेवा में जिसे वक्त ने हर प्रकार से
मोहताज बना दिया। प्रमोद नामक यह सिपाही एसपी ऑफिस में है। प्रमोद जी ने ढाबे पर
इस व्यक्ति के खाने का इंतजाम कर रखा है। प्रमोद जी कहते हैं....सभी के लिए तो कुछ करने
की सामर्थ्य नहीं...एक की ज़िम्मेदारी ईश्वर ने मेरे निमित की है। देखें कितने दिन यह सेवा कर
पाऊँगा। प्रमोद जी ने विनम्रता से आग्रह किया कि यह सब किसी को पता ना लगे। लेकिन
आग्रह ना मानने को विवश हूं। क्योंकि ऐसे व्यक्ति के
बारे में सबको पता लगना चाहिए जो निस्वार्थ
भाव से किसी लाचार की सेवा कर रहा है ताकि कोई तो उससे प्रेरित हो सके। आज भी
प्रमोद जी अपना काम करके चुपचाप चले जाते अगर वे हॉस्पिटल में डॉ नरेश बंसल से
इंजेक्शन के सिलसिले में ना मिलते। डॉ बंसल ने मुझे बताया और मुझे अवसर मिला
प्रमोद को यह सेवा करते हुए देखने का। प्रमोद जी की सेवा को कोई भी नाम,ईनाम,सम्मान देने से प्रमोद का नहीं बल्कि उस सम्मान,इनाम और नाम का मान बढ़ेगा। क्योंकि कुछ इंसान ऐसे होते
हैं जिनके पास जाकर मान,सम्मान,ईनाम खुद गौरवान्वित होते हैं। [सॉरी प्रमोद
जी मुझे लिखना पड़ा।]
Thursday, 19 July 2012
वक्त ने बदल दी मरघट की परिभाषा
श्रीगंगानगर-बात
एक प्रसंग से शुरू करते है। परदेशी कबीर जी के घर गया। कबीर जी थे नहीं। उनकी
पत्नी ने बताया कि वो तो अंतिम संस्कार में मरघट गए हैं,आप रुको,वो थोड़ी देर में आ जायेंगे। परदेशी ने कहा, नहीं मुझे जाना है। मैं मरघट होता हुआ चला
जाऊंगा। बस मुझे कबीर जी की पहचान बता दो! कबीर जी की पत्नी ने बताया कि कबीर जी
के सिर पर कलंगी उनकी पहचान है। परदेशी मरघट चला गया। वहां था सन्नाटा। लकड़ियों का
चटकना,कुत्तों का भौंकना,सिसकियाँ इस सन्नाटे को तोड़ रही थी। चिता के
चारों तरफ शोकाकुल लोग थे। लेकिन ये क्या....सभी कलंगी वाले थे। परदेशी सोचने लगा, कबीर जी की पत्नी ने तो बताया था कि कबीर जी
कलंगी वाले होंगे। यहां तो सभी के कलंगी हैं। खैर,परदेशी रुका। संस्कार पूरा हुआ। लोगों ने
अंतिम श्रद्धांजली दी और जाने लगे। परदेशी को और अचरज हुआ। जैसे जैसे लोग मरघट से
निकल रहे थे वैसे वैसे उनकी कलंगी गायब हो रही थी। बस एक व्यक्ति बचा कलंगी वाला।
निश्चित तौर पर वे कबीर जी ही थे। परदेशी ने कबीर
जी को प्रणाम किया। कलंगी होने,खोने
के प्रति जिज्ञासा प्रकट की। कबीर जी बोले, मरघट में चिता के पास खड़े लोग मौत से डरे हुए
ईश्वर के ध्यान में थे। वे सांसारिक मोह,माया,काम,क्रोध से दूर थे। तब
ईश्वर की दृष्टि में सभी समान थे। इसलिए सभी के कलंगी थी। परंतु मरघट से बाहर आते ही सब सांसरिक प्रपंच
में लग गए तो ईश्वर से उनका नाता टूट तो कलंगी भी जाती रही.......
वर्तमान में
ना तो मरघट रहे ना मरघट और चिता की मर्यादा। मरघट पिकनिक स्पॉट और जन संपर्क का माध्यम में
बदल गए। शोक ग्रस्त परिवार के समक्ष हाजिरी लगाई और काम समाप्त।
चिता जल रही है....किसी को शोक है...मरघट की गरिमा है...मर्यादा है उससे किसी को
कोई मतलब ही नहीं रहा। मोबाइल फोन बज रहें हैं। कारोबार हो रहा है। निंदा चुगली...हंसी ठट्ठा चल रहा है।
पार्क शानदार है...सब बैठे हैं अलग अलग ग्रुपों में। जाने वाले की अच्छाई...बुराई...उसके परिवार की
कोई बात नहीं। जाने वाला समाज के लिए क्या करके गया....नहीं कर सका....कोई मतलब
नहीं। ठीक है मरने वाले के साथ नहीं मर सकते। शो मस्ट गो ऑन। परंतु चिता और मरघट की मर्यादा तो कायम रख सकते हैं। मोबाइल मे साइलेंट मोड होता है।
हंसी ठट्ठे की आवाज कम करने में क्या बुराई है? कारोबार की बात भी धीरे धीरे हो सकती है। राम राम
नहीं करना है ना करो...किन्तु ऐसे आचरण से तो बचें जिससे शोक संतप्त परिवार की
भावना आहत
हो। वक्त ने मरघट को मरघट तो नहीं रहने दिया किन्तु इसे मर्यादा हीन गरिमाहीन पिकनिक स्पॉट या चाय,काफी का अड्डा तो मत बनने दो। एक यही तो जगह है जहां
इंसान अपना अंतिम समय देखता है। मौत से रूबरू होता है। किन्तु हमने कुछ भी ऐसा नहीं छोड़ा जिससे इंसान दो घड़ी चिता
के समक्ष खड़ा हो मनन कर सके अपने बारे में। लोक
परलोक के बारे में। मरघट में तो मौत का भय होना स्वाभाविक है पिकनिक स्पॉट पर मौत
का भय कहाँ से आएगा। वहाँ तो मस्ती
और उल्लास होगा। चाहे कम हो चाहे अधिक।
विकास समय की मांग है। लेकिन ऐसा विकास किस काम का जो मूल ही बदल दे। ऐसा
ही हुआ इस क्षेत्र में हर मरघटों के साथ। शबनम वहीद का शेर है...मेरे वजूद को दामन से
झाड़ने वाले,जो तेरी आखिरी मंजिल
है वो मिट्टी हूं मैं।
Subscribe to:
Posts (Atom)