Monday, 16 July 2012

टाइगर को पता लगी मीडिया की बेबसी,लाचारी



श्रीगंगानगर-शेर वन का राजा होता है। उसके लिए कोई नोटिफिकेशन जारी नहीं होता। उसने आप को साबित किया होगा तभी वह राजा है।मीडिया ने भी पूरे देश में अपने आप को ताकतवर साबित करवाया। परंतु यहां ऐसा नजारा  देखना पड़ा जो कभी कल्पना नहीं की थी। एसपी के बुलावे पर मीडिया कर्मियों की भीड़,इतनी कि कुर्सी कम पड़ गई। एसपी ने डीजीपी के कहने पर बुलाया था पत्रकारों को। एसपी के अनुसार कुछ पत्रकार डीजीपी से मिले थे कि एसपी उनसे बात नहीं करता। पत्रकार पहुँच गए। कहने लगे .....हाय  कोतवाल फोन नहीं अटेण्ड करता....सी ओ फोन नहीं सुनता.....अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक बात नहीं करता....एसपी केवल तीन चार अखबार वालों के फोन उठाते हैं। सालों से मीडिया का अहम हिस्सा बने पत्रकारों ने एसपी के समक्ष अपनी लाचारी,बेबसी प्रकट की। या ऐसे कहें कि छोटे छोटे अधिकारियों के बारे में प्रलाप किया। संभव पत्रकार ये पढ़कर मुझसे ही खुन्नस रखने लग जाएं...क्योंकि मीडिया छोटे छोटे अधिकारियों की शिकायत करे तो यह लाचारी,बेबसी,कमजोरी ही है। सबसे भ्रष्ट तंत्र में से एक मानी जाने वाली पुलिस का कोई अधिकारी मीडिया को भाव ना दे और मीडिया बजाए उसको आइना दिखाने  के उसकी शिकायत करे...तो यह कमजोरी,लाचारी  ही है मीडिया की। वरना एक पुलिस अधिकारी की इतनी हिम्मत कि वह मीडिया से बात ना करे। एसपी को कहना पड़े। डीजीपी को बताना पड़े। डीजीपी के बाद....किसको कहेंगे। जनता तो मीडिया को कहती है और मीडिया अपने आप को कमजोर मान कर एसपी से गुहार लगाता है। जनता में मीडिया की इमेज क्या बनेगी? श्रीगंगानगर का वह  मीडिया से जिसकी चमक और धमक दिल्ली जयपुर तक जानी जाती है।  आज इतनी लाचार हो गई कि छोटे छोटे अधिकारी उसके बस में नहीं आते। मीडिया को डीजीपी की शरण में जाना पड़ता है ये कहने के लिए कि एसपी हमे बुलाता नहीं। अरे नहीं बुलाए तो नहीं बुलाए.....अपनी शक्ति दिखाओ। परंतु ये संभव नहीं। मीडिया में ही इतने विचार हैं कि क्या कहने....सबके सामने कुछ कहेंगे और अकेले में अफसर की करेंगे लल्ला लोरी। मीडिया के दूसरे साथी की करेंगे आलोचना....आलोचना भी क्या निंदा। बस,अफसर समझ जाता है कि उसे क्या रणनीति अपनानी है। तभी तो ये स्थिति आती है। जितने  मीडिया कर्मी उतनी आवाज...जब आवाज अलग अलग हो तो फिर कैसी ताकत। तभी तो एसपी ने उपदेश दिया कि खबर से अखबार तो बिक सकता है, देश नहीं बन सकता। पहले देश के नागरिक हैं उसके बाद पत्रकार और एसपी। यह सब इसलिए कि यहां कई तरह का मीडिया है। एक वो जो अखबारों के मालिक हैं। दूसरा वो जो उनमें काम करता है। फील्ड में रहता है। खबर के लिए मारा मारी करता है। तीसरा टीवी चैनल वाला मीडिया। राजा कौन है...कहना मुश्किल....एक शेर बनने की कोशिश करता है तो  दूसरा दहाड़ मारता है....दूसरा सामने आता है तो पहला टांग खींच लेता है। मीडिया तो ताकतवर है...लेकिन यह ताकत बट गई।वरना यूं एसपी के सामने थानाप्रभारी और डीजीपी के सामने एसपी की शिकायत करने की नौबत नहीं आती। बात फिर वही कि शेर जंगल का राजा होता है...वह राजा होने के लिए जानवरों का मोहताज नहीं है।मीडिया भी शेर है....किन्तु यहां उसके नाखून और दाँत निकाल कर रख दिये गए हैं। उसका इस्तेमाल वे नहीं कर पाते जो फील्ड में रहते हैं।सैफी सिरोंजी का शेर है....उम्र भर करता रहा हर शख्स पर मैं तबसरे,झांक कर अपने गिरेबाँ में कभी देखा नहीं।   

Friday, 13 July 2012

ये मुर्दों का शहर है,यहां बोलना मना है



श्रीगंगानगर-ये मुर्दों का शहर है। यहां बोलना मना है। अपने आप को जिंदा साबित करने के लिए जुबां खोलोगे तो मुर्दा बना दिये जाओगे। इसलिए जिंदा रहना है तो मुर्दों  की तरह रहो। मुर्दा रहोगे तो जिंदा रहने की हसरत पूरी होती रहेगी। वरना मुर्दों में शामिल होने में एक क्षण भी नहीं लगेगा। शहर में कोई ये कहने वाला भी नहीं होगा कि कोई जिंदा भी है। कहेगा कौन? सब के सब मुर्दे जो हैं। और मुर्दे कभी बोला नहीं करते। समझे! जिंदा हो तब भी मुर्दा रहो। क्योंकि ये मुर्दों का शहर है। यहां ज़िंदों का कोई काम नहीं। कोई नाम नहीं। इसका अपना चलन है। यहां आपको अतिरिक्त रूप से कुछ नहीं करना। आंखों को उतना ही देखने की इजाजत देना जितना जिंदा मुर्दा बने रहने की जरूरत हो। ध्यान रहे मुर्दा ना देखता है,ना सुनता है और ना ही बोलता है। मुर्दा बस केवल मुर्दा है...केवल मुर्दा। पड़ा रहता है वहां जहां उसे पटक दिया जाए। रख दिया जाए। उस पर किसी मौसम का कोई असर नहीं पड़ता। महंगाई,भ्रष्टाचार,जुल्म,अन्याय,प्रताड़ना,उपेक्षा,मजबूरी,लाचारी,बेबसी,गरीबी.....जैसी सभी लानतों,बीमारियों का इससे कोई नाता नहीं है। न तो ये उसकी सेहत पर असर डाल सकती हैं ना वह इनकी परवाह करता है। क्योंकि मुर्दों में कोई संवेदना नहीं होती। भावना नहीं होती। बे भाव के होते हैं मुर्दे। वे ना देख सकते हैं। ना बोल सकते है और ना सुन सकते हैं। जड़ होते हैं वे। बस तुम इन शहरी मुर्दों में शामिल हो जाओ। वैसे तो मुर्दों में अकड़ होती है। लेकिन इस शहर के मुर्दे नायाब हैं। इनमें अकड़ नहीं है। हो भी कहाँ से! ये बिना रीढ़ के जो हैं। बिना रीढ़ के ये सचमुच के मुर्दे हैं। बस तुम्हें ऐसा ही बन कर रहना है। ठेठ गंगानगरी मुर्दा। जिसकी जय जय कार ये करें,तुम भी करो। ये हार पहनाएं तुम ताली बजाओ। जिसको हीरो बनाए,उस पर तुम फूल चढ़ाओ। जिसके ये चरण पखारें तुम उन तलवों को चाटो......अबे चुप! मुर्दों का आत्म सम्मान,स्वाभिमान,नहीं होता। वो मुर्दा है। एक दम खालिस मुर्दा। इसलिए जो बड़े मुर्दे करते हैं तू उनको फॉलो कर। संभव है तुझे ज़िंदों को मुर्दा बनाने वाली टोली में शामिल कर लिया जाए। तेरी पहचान हो जाए खास मुर्दों से। मुर्दों में सबसे अधिक सहन शक्ति होती है। मुर्दा दुख,सुख,मान,अपमान,चोट, से ऊपर उठ चुका होता है। शहरी मुर्दों में यह अधिक होता है। इसलिए याद रखना मुर्दों में जिंदा बनने की कोशिश करके तू मुर्दों की जमात को लजाना मत। उनमें विद्रोह की भावना पैदा मत करना। किसी को बताना भी मत कि तुम जिंदा हो। मुर्दा रहोगे तो जिंदा रहोगे। इसलिए इस शहर में अपने आप को जिंदा साबित करने की जिद छोड़,चल मुर्दा हो जा। बाकी लोगों की तरह। डॉ रमेश अग्रवाल की लाइन हैं....मेरा गम बांट कर लोगों में वो करते हैं काम ऐसे,यहां रो रोके सुनते हैं वहां हंस कर उड़ाते हैं।

Tuesday, 10 July 2012

“पापा आप हमारे स्कूल मत आया करो”


श्रीगंगानगर-बात चार पांच पुरानी होगी। 1971 से 1976 तक बड़ा मंदिर स्कूल में साथ पढ़े एक साथी ने रोका। बोला,यार बड़ी समस्या है। कई आशंका मेरे मन में आई...इससे पहले कि मैं कुछ कहता दोस्त कहने लगा....मेरे बच्चे फलां स्कूल [ बहुत बड़ा अंग्रेजी माध्यम का स्कूल ] में पढ़ते हैं। मैंने कहा, ये तो अच्छी बात है।स्टेट्स सिंबल है। अरे नहीं,साथी कहने लगा, यही समस्या है...बच्चे कहते हैं कि पापा आप स्कूल मत आया करो। स्कूल में दूसरे बच्चों के सामने हमें अच्छा नहीं लगता। क्योंकि यह साथी कमीज पायजामा पहनता है। और जब पापा कमीज पायजामा पहन कर बड़े स्कूल में जाएगा तो फिर बच्चों की रेपुटेशन पर तो असर पड़ेगा ही। मेरे पास साथी की समस्या का कोई समाधान नहीं था। पता नहीं ये वर्तमान शिक्षा का नजरिया है या समाज के बदले रूप का परिदृश्य। यह भी नहीं पूछ सका कि भाई ये बच्चों की सोच के प्रति तेरी पीड़ा है या बड़े स्कूल में पढ़ाने का अफसोस।
दिल्ली से श्रीगंगानगर की बस में। दो लड़कियां,एक लड़का पीछे वाली सीटों पर थे। बात चीत से संस्कारी लगे। पढ़ाई की बात चली तो शहर के बारे में पूछा। दोनों ने कहा अबोहर जाएंगे। अबोहर प्रोपर! दोनों ने एक दूसरे से पूछा। नहीं सादुलशहर। दोनों का जवाब था। दोनों के परिवार सालों से वहीं रहते थे, लेकिन चूंकि ये दोनों बच्चे वर्षों से बाहर रह कर पढ़ाई कर रहे थे, इसलिए एक दूसरे के परिवार से अंजान था। हां इनको नोएडा,गुड़गांव,दिल्ली,जयपुर जैसे बड़े शहरों की तो जानकारी थी,लेकिन अपने उस कस्बे की नहीं जहां उनका बचपन बीता । जहां रहकर उनके परिवार ने उनको इस काबिल बनाया कि वे बड़े शहरों को जान सकें निकट से। सादुलशहर है कितना। एक कौने से कोई बोले तो दूसरे कौने पर सुनाई दे।
दो उदाहरण काफी है  वर्तमान स्थिति को रेखांकित करने के लिए। बच्चों का भविष्य तो बहुत शानदार,जानदार,दमदार हो  गया। मगर बच्चे हमारे होकर भी हमारे नहीं रहे। उनकी दुनिया दादा,नाना के परिवार से बहुत अलग हो गई। उनकी अपनी दुनिया है। उसमें खून के रिश्तों,बचपन के साथियों,निकट के रिशतेदारों के लिए समय नहीं है। ये पैसा तो गाहे बगाहे भेज सकते हैं। समय नहीं दे सकते।बुजुर्ग होते माता  पिता के पास बैठ कर उनको दिलासा देने का समय इनके पास नहीं है। वे उनके पास बैठ कर ये नहीं कह सकते...पापा-मम्मी आप चिंता मत करो मैं हूं ना...आपकी, आपके रिश्तों की चिंता करने के लिए। उनका निर्वहन करने के लिए।“कचरा” की लाइन हैं --पुरवाई सी तेरी चाल काली घटाएँ तेरे बाल,तू चले तो सावन बरसे तू रुके तो बिजली कड़के,दुनिया नाचे दे ताल पे ताल....।

Thursday, 28 June 2012

कहीं ना कहीं कोई ना कोई तो जरूर है......



श्रीगंगानगर-चमत्कार होते हैं और संयोग भी। इनके बारे में पढ़ा भी और सुना भी। सृष्टि में कहीं न कहीं कुछ ना कुछ ऐसा जरूर है जो केवल अपनी मर्जी करता है। उसकी मर्जी में हमारा, तुम्हारा, इसका, उसका,किसी का कोई दखल नहीं। वह जो भी है विभिन्न प्रकार से अपने होने का एहसास करवाता रहता है। मौन रहकर घटनाओं के माध्यम से साबित करता है की कहीं ना कहीं किसी ना किसी रूप में मेरा अस्तित्व जरूर है। वह चेताता है...मैं हूं। कोई मानता है...कोई नहीं। कोई मज़ाक उड़ाता है कोई श्र्द्धा प्रकट कर उसकी लीला को प्रणाम करता है। ताजा घटना क्या है....संयोग,चमत्कार,,,,,,उसके होने का सबूत। पाकिस्तान की कोट लकपत जेल में सालों से कैद सरबजीत सिंह और सुरजीत सिंह। कोई ऐसा नहीं जो सरबजीत सिंह के नाम से अंजान हो। ऐसा एक भी नहीं जिसने सुरजीत सिंह के बारे में सुना हो। कहीं कोई जिक्र तक नहीं उसका...उसके परिवार का।  पाक सरबजीत की रिहाई की घोषणा करता है। तब भी सुरजीत सिंह को कोई जिक्र नहीं। कुछ घंटे बाद अचानक पाक घोषणा करता है की सरबजीत को नहीं सुरजीत को छोड़ा जाएगा। जो खुशियां थोड़ी देर पहले सरबजीत सिंह के परिवार के यहां बरसी....उनका रुख बदल गया। वे सुरजीत सिंह के घर छप्पर फाड़ कर आईं। अचानक...एकदम से। जो परिवार सालों से सरबजीत सिंह की रिहाई की कोशिश में लगा था उसका घोषणा के बावजूद कुछ नहीं हुआ। जिसके परिवार का कभी कोई नाम तक नहीं सुना वे अंतर्राष्ट्रीय फीगर बन गए। किसने सोचा था..नाम बादल जाएंगे। किसको पता था की सरबजीत सिंह के साथ कोई सुरजीत सिंह भी है। इस घटना को कोई भी नाम दिया जा सकता है। संयोग....चमत्कार...। जो यह संकेत करती है कि होगा वही जो मेरी इच्छा है। बेशक किसी भी घटना,दुर्घटना,संयोग का माध्यम तो यह संसार ही है...परंतु अंत में होना क्या है वह उसके सिवा कोई नहीं जानता जिसको किसी भी नाम से पुकारा जा सकता है। अब सबके सामने है कि जिसकी कभी चर्चा नहीं उसको आजादी मिल गई। जिसके लिए लंबे समय से यहां से वहाँ तक आवाज बुलंद की जा रही है, उसकी रिहाई घोषणा के बावजूद रुक गई। तो आज ...इस बात से इंकार कौन करेगा कि कहीं ना कहीं कोई ना कोई तो है जो इस संसार से भी ऊपर है। अब कोई ना माने तो ना माने.... । शायर मजबूर कहते हैं...खुदी को बुलंद कर तो रहा हूं मजबूर, डरता हूं,खुदा मुझसे शरमाये ना कोई।  

Wednesday, 27 June 2012

आगे बढ़ती हो
हाथ बढ़ाती हो
झिझकती हो
लौट जाती हो
हर बार,बार बार

Wednesday, 20 June 2012

टिकट की नो टेंशन...चुनाव तो लड़ना ही है



श्रीगंगानगर-जिले के अधिकांश विधानसभा क्षेत्रों में कम से कम एक एक राजनेता ऐसा है जिसे हर हाल में चुनाव लड़ना ही है। ऐसे महानुभाव कांग्रेस में भी हैं और बीजेपी में भी। इनको पार्टी टिकट दे तो वैल एंड गुड....ना दे तो और भी बढ़िया। चुनाव से तो पीछे हटना ही नहीं। तो श्री गंगानगर से शुरू करते हैं। श्रीगंगानगर से शुरू करना है तो राधेश्याम गंगानगर का नाम लिखना ही पड़ेगा। 1977 के बाद कौनसा विधानसभा का चुनाव था जिसमें राधेश्याम जी नहीं थे। 2008 में टिकट नहीं मिली तो पार्टी बदल ली। 2013 में गड़बड़ हुई तो निर्दलीय लड़ेंगे या घर लौटने का रास्ता तलाश करेंगे।  सादुलशहर में यही बात गुरजंट सिंह बराड़ के लिए कही जा सकती है। 1993 में निर्दलीय तौर पर जीते। श्री बराड़ को टिकट मिले ना मिले कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। इनका खुद का वजूद इतना है कि निर्दलीय लड़ कर पूरा समीकरण बदलने की क्षमता है इस परिवार में। ये अलग बात है कि परिवार के राजनीतिक मनमुटाव अब बाहर दिखने लगे हैं। राम प्रताप कासनिया भी इसी श्रेणी के लीडर हैं। पार्टी के विचार,निष्ठा,सिद्धान्त  टिकट मिलने तक ही हैं। ऐसा कौन है जो टिकट ना मिलने पर इनको चुनाव लड़ने से रोक सके। खुद नहीं जीते तो पार्टी उम्मीदवार को चित्त तो कर सकते हैं। रायसिंहनगर के दुलाराम भी इस काम के मास्टर हैं। चुनाव तो लड़ेंगे ही। टिकट दी तो उसका झण्डा उठा लेंगे। राजनीति में इनका एक ही नियम है...चुनाव लड़ना। श्रीकरनपुर के गुरमीत सिंह कुन्नर भी इनसे अलग नहीं है। पिछली बार उन्होने ऐसा ही किया। 2013 में अब अधिक समय नहीं है। असल में इसके लिए इनको दोष देना ठीक नहीं है। अगर ये नेता चुनाव ना लड़ें तो क्या करें...घर बैठ जाएं...और राजनीतिक रूप से हो जाएं शून्य....... । गुरमीत सिंह कुन्नर चुनाव ना लड़ते तो आज कहां होते। जगतार सिंह कंग बनने में देर नहीं लगती राजनीति में। यही होता है राजनीति में। जगह खाली नहीं रहती कभी। आप नहीं तो कोई दूसरा  तैयार है जगह रोकने के लिए। एक बार जगह किसी और ने रोकी नहीं कि आप आउट राजनीति से। अपने आप को राजनीति में बनाए रखने,अपना वजूद साबित करने के लिए टिकट मिले ना मिले चुनाव लड़ना जरूरी हो जाता है। इस बार के चुनाव में कोई नए नाम जुड़ सकते हैं... जगदीश जांदू....अशोक नागपाल....हंस राज पूनिया....बलराम वर्मा.... । राजनीति से हटकर “कचरा” पुस्तक की दो लाइन पढ़ो...प्रीत का मौन निमंत्रण मिलता मुझे तुम्हारी आँखों में,कभी झिझक दिझे कभी तड़फ दिखे हर रोज तुम्हारी आँखों में।

Saturday, 16 June 2012

फेसबुक पर लोग कलाम के पक्ष में



 

श्रीगंगानगर-राष्ट्रपति वही होगा जो कांग्रेस चाहेगी। लेकिन फेसबुक पर अब्दुल कलाम को जबर्दस्त समर्थन मिल रहा है। फेसबुक पर सक्रिय रहेने वाले अधिकांश व्यक्ति श्री कलाम की फोटो लगा उसके पक्ष में माहौल चला रहे है। हर कोई उनको जनता का राष्ट्रपति बता रहा है। श्री कलाम के बारे में यहां तक लिखा गया कि बेशक उन्होने ऐसा कोई काम नहीं किया कि उनको फिर से राष्ट्रपति बनाया जाए...किन्तु ऐसा भी कुछ नहीं किया कि उनको ना बनाया जाए। एक ने लिखा कि श्री कलाम जनता के उम्मीदवार हैं। इस व्यक्ति ने अपनी ओर से जनता से श्री कलाम के नाम का समर्थन करने की अपील की है। वह जानता है कि इस अपील का कोई मतलब नहीं है। क्योंकि जनता के हाथ में कुछ भी नहीं है। इसके बावजूद फेसबुक पर लगें हैं लोग श्री कलाम को राष्ट्रपति बनाने के लिए। उधर जैसे ही कांग्रेस ने प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति का उम्मीदवार घोषित किया फेस बुक पर उसकी निंदा करने की होड़ लग गई। एक ने लिखा—कांग्रेस ने यह साबित कर दिया कि उसे अपनी सरकार में ईमानदार,बेदाग लोगों की जरूरत नहीं। दूसरे ने “प्रणब मुखर्जी की हाय हाय कर दी। किसी ने आक्रोश में यह लिखा—लगता है कि वो बंगाली मछली{पिद्दा} राष्ट्रपति बन कर रहेगा। एक व्यक्ति ने तो फोन नंबर देकर वहां कॉल करने को कह दिया। उसने लिखा – “अगर आप ए. पी. जे. अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति के रूप में देखना चाहते है तो 080-8289-1049 पर काल करे (ये पूर्णतया निशुल्क है). एक मोबाइल से एक ही काल मान्य होगी. तो जल्दी करे कही देर न हो जाये।“ फेस बुक पर लिखने वाले जानते हैं कि राष्ट्रपति बनाना उनके बस की बात नहीं है इसके बावजूद वे श्री कलाम को राष्ट्रपति के लिए परपोज कर रहे हैं। यह श्री कलाम के प्रति उनकी भावना है। एक व्यक्ति ने प्रणब की उम्मीदवारी को देश का बंटाधार करने वाला कदम बताया है। किसी ने लिखा-जब भी कलाम का नाम "राष्ट्रपति " पद के लिया जाता है तो "सोनिया गाँधी" ऐसे डरने लगती है जैसे वो "कलाम" ने होकर कोई "मिसाईल" हो और "दस जनपथ" पे गिरने वाली हो ......अगर कलाम "राष्ट्रपति " बनते हैं तो "सोनिया गाँधी" की सारी पोल खुल जायेगी....और उनका पाप का घड़ा फूट जायेगा ...और फिर से राहुल गाँधी प्रधानमंत्री बनने से रह जायेंगा ! वो तो हमारे "अटल जी" थे जिन्होंने कलाम को "राष्ट्रपति " बनवाया....क्यूंकि उनका "चरित्र" दूध से धुला था....। और अब भी कलामजी को ही "राष्ट्रपति " बनाना चाहते है। अगर फेसबुक पर राष्ट्रपति चुनाव होते तो श्री कलाम ही राष्ट्रपति चुने जाते।

 


Wednesday, 13 June 2012

राज हठ से टूट सकता है ओवरब्रिज का सपना


राज हठ से टूट सकता है ओवरब्रिज का सपना
श्रीगंगानगर- बाल हठ,त्रिया हठ और राज हठ इनका कोई तोड़ किसी के पास नहीं। घर,समाज देश को इनसे वास्ता पड़ता रहता है। बाल हठ मासूमियत लिए होता है।  त्रिया और राज हठ तो ऐसे विचित्र होते हैं कि दुनिया पनाह मांगने लगती है। देश त्रिया हठ से त्राहि त्राहि कर रहा है। मनमोहन सिंह को  पीएम रखना सोनिया का त्रिया हठ ही तो है। श्रीगंगानगर शहर इन दिनों राज हठ से पीड़ित है। राज हठ के प्रतीक हैं जिला कलेक्टर अंबरीष कुमार। इनका हठ है कि ओवरब्रिज बनेगा तो  करनी मार्ग पर ही बनेगा...चाहे जो हो। इनको इस बात से कोई मतलब नहीं कि यह व्यवहारिक है या नहीं। इनको इस बात से भी कोई लेना देना नहीं कि ओवरब्रिज कहां अधिक उपयोगी है। कहां बनाने से जनता को अधिक सुविधा होगी। बस,कह दिया सो कह दिया। उनके इस हठ के कारण गुड के गोबर होने की आशंका हो गई है। इतने अधिक नेताओं के रहते कलेक्टर साहब को कोई यह बताने वाला नहीं है क्या कि ओवरब्रिज की उपयोगिता कहां है। पर ये तो इनसे डरे,सहमे हैं।ये क्यों बताने लगे। पूरा शहर जानता है कि लक्कड़ मंडी से अधिक उपयोगी जगह ओवरब्रिज के लिए हो ही नहीं सकती। नेशनल हाई वे है....कमर्शियल क्षेत्र है...फाटक से पहले रेल का शैंटिंग  प्वाइंट है...जिसके कारण फाटक बार बार बंद रखना पड़ता है। सूरतगढ़ से लेकर यहां तक कोई मौड़ नहीं। रात को कितना भी ट्रैफिक निकले किसी को कोई तकलीफ नहीं। इसमे कोई शक नहीं कि ओवरब्रिज के निर्माण के कारण यहां का कारोबार प्रभावित होगा....लोगों को नुकसान उठाना पड़ेगा...प्रॉपर्टी की कीमत पर असर होगा...। लेकिन बड़े विकास होते हैं तो यह सब होना स्वाभाविक है। इसके लिए लोग मानसिक रूप से तैयार भी हो चुके थे। राज हठ ने इनका मन फिर बदल दिया। अब चलते हैं करनी मार्ग पर। नेशनल हाईवे से आने वाले वाहन कितने मौड़ काटेंगे...मीरा मार्ग पर तो दिन में ही ट्रैफिक बहुत है....रात को तो फिर क्या हाल होगा। लोग तो रात को चैन से शायद ही सो पाएंगे। मीरा चौक पुलिस चौकी की कीमत बढ़ जाएगी। खीची चौक पर भी जगह बढ़ानी पड़ेगी...हां सभी किसी ना किसी कारण से परेशान होंगे...विकास होता है तो परेशानी होती ही है...परंतु विकास भी तो वहीं हो  जहां उसकी उपयोगिता अधिक हो...लोगों को परेशानी कम से कम। करनी मार्ग पर ओवरब्रिज बनने से लक्कड़ मंडी के ट्रैफिक की समस्या तो वैसी की वैसी रहेगी...करनी मार्ग वाले दुखी हो जाएंगे...बस डेंटल कॉलेज की बल्ले बल्ले जरूर  हो जाएगी। राज हठ यही तो चाहता है शायद...। “कचरा” पुस्तक की दो लाइन हैं...मैं तो डायरी हूं तेरे मन की जो कुछ तू लिखेगा,ये वादा रहा उसमे तेरा ही अक्स दिखेगा।


Wednesday, 23 May 2012

घरों में प्रताड़ित तो सास भी कम नहीं होती आजकल


श्रीगंगानगर-वह जमाना और था जब नाई,पंडित या घर का मुखिया लड़का-लड़की का रिश्ता तय कर देता था। उन रिश्तों की गरमाहट हमेशा रहती। समय बढ़ा...रिश्ते करने का ढंग बदला...खटपट होती...होती रहती...रिश्ते निभते...निभाए जाते...घरों की आन,बान शान के लिए। समय तेजी से आगे चला...बहुओं को प्रताड़ना मिलने लगी...कथित रूप से मारा जाना लगा। कानून बना उनकी सुरक्षा के लिए। अब तो बात ही अलग है। प्रताड़ना बहू को नहीं सास-ससुर को दी जाती है। मज़ाक नहीं सही है। कितने ही परिवार हैं जो बहू की प्रताड़ना का संताप झेल रहें हैं। बहू मनमर्जी करती है। उसकी हर जरूरी गैर जरूरी मांग को पूरा करने की कोशिश की जाती है। शिकायत किसको करे! करें तो घर की इज्जत पर आंच आती है। लोग क्या कहेंगे! भिन्न भिन्न प्रकार की बात होगी। बात एक से अनेक व्यक्तियों तक जाएगी। रिश्तेदारों को पता चलेगा। बस,रिश्तेदारों और समाज के डर से अनेक परिवार बहू की प्रताड़ना को घुट घुट कर सहने को मजबूर हैं। हाय, बहू कुछ कर ना ले....हाय बहू कोर्ट कचहरी ना दिखा दे....हे भगवान पीहर वाले थाने में शिकायत ना कर दें। इस आशंका के कारण सास ससुर भीगी बिल्ली बने बहू की हां में हां मिलाने को बेबस हैं। क्योंकि कुछ अनहोनी हो गई तो गया पूरा परिवार अंदर। कोई सुनवाई नहीं...कोई सफाई नहीं। पैसा गया...इज्जत गई साथ में चला जाता है कारोबार...मन की शांति। कानून,पुलिस तो जैसी है,है। समाज को,सामाजिक संगठनों को तो कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे इस प्रकार के परिवारों को सहारा मिले। बहुओं से प्रताड़ित परिवार अपने मन की आशंकाओं को उनके साथ सांझा कर सुकून प्राप्त करें। ये किसी एक समाज की बात नहीं है। लगभग हर समाज में ऐसे घर हैं जहां एक बहू से पूरा घर प्रताड़ित है। कोई तो हो जो इस प्रकार के परिवारों को घुट घुट कर मरने से बचा सके। जिसकी लड़की जाती है या परेशान रहती है। उनको भी तसल्ली मिले। उनके आंसुओं की भी कद्र हो....उनकी भावनाओं को समझा जाए...उनको न्याय मिले। परंतु यह सब किसी और के साथ नाइंसाफी की कीमत पर ना हो। और यह सब समाज कर सकता है...क्योंकि जैसा समाज होता है वैसे ही हम होते हैं। इस पर जल्दी विचार नहीं हुआ तो समाज में अच्छा बहुत कम होगा। दो लाइन हैं...कोशिश करके देख “आरसी” पौंछ सके तो आंसू पौंछ,बाँट सके तो दर्द बाँट ले,पीर सदा बेगानी लिख।

Thursday, 17 May 2012

गौरव की बात है आईपीएस होना यहां आना हमारा दुर्भाग्य



श्रीगंगानगर-श्रीमानआईपीएस गगनदीप सिंगला जी बिना नमस्कार के ही बात शुरू करनी पड़ेगी....क्योंकि आप अहंकारी हो,अव्यवहारिक हो ....आपने नमस्कार का जवाब देना नहीं इसलिए आपको नमस्कार करके अपना अपमान क्यों करवाऊँ। सिंगला जी आपने आईपीएस बनकर यहाँ की जनता पर कोई अहसान नहीं किया। ना तो जनता ने आपके यहां जाकर आपके परिवार से अनुनय विनय की और ना भगवान से प्रार्थना। यह सौ प्रतिशत आपकी मेहनत,लगन और परिवार की मंगलभावना थी जो आप आईपीएस बने। हमारा दुर्भाग्य जो आप प्रशिक्षण के लिए यहां आए। दुर्भाग्य इसलिए कि जो यहां प्रशिक्षण प्राप्त करता है वह एक दिन एसपी बनकर यहां आता है। अगर आप एसपी बनकर आए और आपका स्वभाव और व्यवहार यही रहा तो आपको तो पता नहीं लेकिन जनता को मुश्किल होगी...बहुत मुश्किल। मैंने तो पढ़ा था....आपने पढ़ा कि नहीं पता नहीं...कि ज्ञानवान,गुणवान,बड़े पद वाले इंसान बहुत विनम्र,शालीन होते हैं...आपके इर्द गिर्द तो यह सब है ही नहीं। आईपीएस होना अलग है और ज्ञानवान,गुणवान,व्यवहार कुशल,संस्कारी होना अलग।आईपीएस तो किताबें रट कर मेहनती युवक बन सकता है। परंतु दूसरे गुणों के लिए अपने अंदर झांकना पड़ता है। दूसरों का दर्द,पीड़ा को समझना होता है। ये सब आप करेंगे ऐसा आपका व्यवहार से लगता नहीं।  आईपीएस बनना खुद के लिए,घर,समाज,राज्य के लिए गौरव की बात है। यह गौरव आप  बढ़िया काम से,विनम्रता से,व्यवहार कुशलता से और अधिक बढ़ा सकते हो। यह सब करने का आपके पास अभी तो समय है। एक बार समय हाथ से निकल गया तो आप आईपीएस तो रहेंगे...नाम और दाम भी होंगे आपके पास...किन्तु जनता के दिलों में आपका कोई स्थान नहीं होगा। जहां जाएंगे वहाँ की जनता आपके तुरंत वापिस जाने की दुआ करेगी। निर्णय आपने करना है....हमारा काम तो लिखना है...मानो ना मानो आपकी मर्जी। आपका स्वभाव ये बताता है कि आपने इस लिखे पर गौर तो क्या करना है...लिखने वाले के प्रति मन में गांठ जरूर बांध लेनी है। अकील नूमामी की लाइन है....सिर्फ ले देके यही एक कमी है हममें,हम हर इक शख़्स को इंसान समझ लेते हैं।